लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ भैम्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां सूत्र से कञ् और पक्ष में क्विन् प्रत्यय होकर—१ कञ्पक्ष में —तद् दृश् +कञ्¹= तद् दृश् + अ = तद् दृश । क्विन्-पक्ष में—तद् दृश्+क्विन्= तद् दृश् । अब दोनों पक्षों में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४८) आ सर्वनाम्नः ।६।३।९०॥ सर्वनाम्न आकारोऽन्तादेशः स्याद् दृग्दृशवतुंषु । तादृक्, तादृग् । तादृशी । तादृशः । तादृग्भ्याम् ॥ अर्थ—दृग्, दृश या वतुं परे हो तो सर्वनाम को आकार अन्तादेश हो। व्याख्या—दृग्दृशवतुंषु ।७।३। (दृग्दृशवतुंषु में) । सर्वनाम्नः ।६।१। आ ।१।१। (छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति इस अतिदेश से यहां सुपां सुलुक्० द्वारा प्रथमा का लुक् हो जाता है) । अर्थ —(दृग्दृशवतुंषु) दृग्, दृश या वतुं परे होने पर (सर्वनाम्नः) सर्वनाम के स्थान पर (आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश सर्व- नाम के अन्त्य अन् के स्थान पर होता है। यहां 'दृग्' से तात्पर्य क्विबन्त दृश् से तथा 'दृश' से तात्पर्य कञन्त दृश् से है। इस सूत्र से दोनों पक्षों में 'तद्' इस सर्वनाम के दकार को आकार हो कर सवर्णदीर्घ करने से कञ्पक्ष में 'तादृश' और क्विन्पक्ष में 'तादृश्' बना। कञ्पक्ष वाले 'तादृश' शब्द का उच्चारण पुल्लिङ्ग में 'राम'शब्दवत् होता है। यथा— प्र० तादृश तादृशौ तादृशा | प० तादृशात् तादृशाभ्याम् तादृशेभ्यः द्वि० तादृशम् ,, तादृशान् | ष० तादृशस्य तादृशयोः तादृशानाम् तृ० तादृशेन तादृशाभ्याम् तादृशैः | स० तादृशे ,, तादृशेषु च० तादृशाय ,, तादृशेभ्यः | सं० हे तादृश ! हे तादृशौ ! हे तादृशाः ! सम्बोधन का प्रयोग प्रायः नहीं देखा जाता। इसी प्रकार—१ यादृश = जैसा २. एतादृश = ऐसा । ३. त्वादृश = तुझ जैसा । ४. मादृश = मुझ जैसा । ५ अस्मादृश = हम जैसा । ६ युष्मादृश = तुम सब जैसा । ७ भवादृश = आप जैसा । ८ कीदृश² = कैसा । ६ ईदृश = ऐसा । इत्यादि शब्दों के कञ्पक्ष में रूप बनते हैं³ । 'तादृश्' यहां क्विबन्तपक्ष में प्रक्रिया यथा—'तादृश् + स्' यहां सुँ लोप हो कर प्रत्यय होगा । यथा—तम्पश्यतीति तादृशं । यहां अण् परे रहते लघूपधगुण हो कर उपपदसमास हो जाता है । १. कञ् में ककार की लशक्वतद्धिते (१३६) से तथा ञकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा हो जाती है। 'अ' मात्र शेष रहता है। क्विन् प्रत्यय का पूर्वोक्तरीत्या सर्वापहारलोप हो जाता है। २. इदम्किमोरीश्की (११६७) सूत्र से इदम् को 'ईश्' तथा किम् को 'की' आदेश । ३ स्त्रीलिङ्ग में टिड्ढाणञ्० (१२४७) से ङीप् हो कर 'नदी' की तरह तथा नपुंसक में 'ज्ञान' की तरह रूप होंगे। वत्वन्त में आत्व के उदाहरण—'यावत्, तावत्, एतावत्' आदि समझने चाहिये ।