भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५६ क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र द्वारा शकार को षकार हो जाता है—तादृष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार हो कर—'तादृग्'। अब वाऽवसाने (१८४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'तादृक्, तादृग्' ये दो रूप बनते हैं। क्विबन्त 'तादृश्' की समग्र रूपमाला यथा— प्र० तादृक्-ग् तादृशौ तादृशः | प० तादृशः तादृग्भ्याम् तादृग्भ्यः द्वि तादृशम् ,, तादृशः | ष० ,, तादृशोः तादृशाम् तृ तादृशा तादृग्भ्याम्‡ तादृग्भिः | स० तादृशि ,, तादृक्षु† च० तादृशे ,, तादृग्भ्यः | सं० हे तादृक्-ग्! तादृशौ! तादृशः! ‡ भ्याम् आदि में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाते हैं। † षत्व, डत्व और कुत्व हो कर खरि च (७४) के असिद्ध होने से प्रथम आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर पुनः चर्त्व हो जाता है। इसी प्रकार—१. यादृश् = जैसा। २. एतादृश् = ऐसा। ३. त्वादृश् = तुझ जैसा। ४. मादृश् = मुझ जैसा। ५. अस्मादृश् = हम जैसा। ६. युष्मादृश् = तुम सब जैसा। ७. भवादृश् = आप जैसा। ८. कीदृश् = कैसा। ६. ईदृश् = ऐसा। इत्यादि क्विबन्त शब्दों के रूप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में भी क्विन्-प्रत्ययान्तों के इसी प्रकार रूप बनते हैं। नपुंसक में प्रथमा-द्वितीया को छोड़ कर इसी तरह। [लघु०] व्रश्च० (३०७) इति षः। जश्त्व-चर्त्वे। विट्, विड्। विशौ। विशः। विड्भ्याम्॥ व्याख्या—विश् = वैश्य अथवा प्रजा। विश प्रवेशने (तुदा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने से 'विश्' शब्द निष्पन्न होता है। विश्+स्। सुँलोप, व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, जश्त्व से षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१८४६) द्वारा वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने पर 'विट्, विड्' दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० विट्,-ड् विशौ विशः | प० विशः विड्भ्याम् विड्भ्यः द्वि० विशम् ,, ,, | ष० ,, विशोः विशाम् तृ० विशा विड्भ्याम्* विड्भिः | स० विशि ,, विट्सु,-ट्सुं† च० विशे ,, विड्भ्यः | सं० हे विट्,-ड्! हे विशौ! हे विशः!

  • व्रश्च० (३०७) द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से डत्व होता है। † षत्व, डत्व तथा धुट्प्रक्रिया (८४)। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४६) नशोर्वा ।८।२।६३॥ नशोः कवर्गोऽन्तादेशो वा स्यात् पदान्ते। नक्, नग्। नट्, नड्। नशौ। नशः। नग्भ्याम्, नड्भ्याम्॥ अर्थः—पदान्त में नश् शब्द को विकल्प कर के कवर्ग अन्तादेश होता है।