भारतकोश
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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५६ क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र द्वारा शकार को षकार हो जाता है—तादृष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार हो कर—'तादृग्'। अब वाऽवसाने (१८४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'तादृक्, तादृग्' ये दो रूप बनते हैं। क्विबन्त 'तादृश्' की समग्र रूपमाला यथा— प्र० तादृक्-ग् तादृशौ तादृशः | प० तादृशः तादृग्भ्याम् तादृग्भ्यः द्वि तादृशम् ,, तादृशः | ष० ,, तादृशोः तादृशाम् तृ तादृशा तादृग्भ्याम्‡ तादृग्भिः | स० तादृशि ,, तादृक्षु† च० तादृशे ,, तादृग्भ्यः | सं० हे तादृक्-ग्! तादृशौ! तादृशः! ‡ भ्याम् आदि में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाते हैं। † षत्व, डत्व और कुत्व हो कर खरि च (७४) के असिद्ध होने से प्रथम आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर पुनः चर्त्व हो जाता है। इसी प्रकार—१. यादृश् = जैसा। २. एतादृश् = ऐसा। ३. त्वादृश् = तुझ जैसा। ४. मादृश् = मुझ जैसा। ५. अस्मादृश् = हम जैसा। ६. युष्मादृश् = तुम सब जैसा। ७. भवादृश् = आप जैसा। ८. कीदृश् = कैसा। ६. ईदृश् = ऐसा। इत्यादि क्विबन्त शब्दों के रूप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में भी क्विन्-प्रत्ययान्तों के इसी प्रकार रूप बनते हैं। नपुंसक में प्रथमा-द्वितीया को छोड़ कर इसी तरह। [लघु०] व्रश्च० (३०७) इति षः। जश्त्व-चर्त्वे। विट्, विड्। विशौ। विशः। विड्भ्याम्॥ व्याख्या—विश् = वैश्य अथवा प्रजा। विश प्रवेशने (तुदा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने से 'विश्' शब्द निष्पन्न होता है। विश्+स्। सुँलोप, व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, जश्त्व से षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१८४६) द्वारा वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने पर 'विट्, विड्' दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० विट्,-ड् विशौ विशः | प० विशः विड्भ्याम् विड्भ्यः द्वि० विशम् ,, ,, | ष० ,, विशोः विशाम् तृ० विशा विड्भ्याम्* विड्भिः | स० विशि ,, विट्सु,-ट्सुं† च० विशे ,, विड्भ्यः | सं० हे विट्,-ड्! हे विशौ! हे विशः!

  • व्रश्च० (३०७) द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से डत्व होता है। † षत्व, डत्व तथा धुट्प्रक्रिया (८४)। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४६) नशोर्वा ।८।२।६३॥ नशोः कवर्गोऽन्तादेशो वा स्यात् पदान्ते। नक्, नग्। नट्, नड्। नशौ। नशः। नग्भ्याम्, नड्भ्याम्॥ अर्थः—पदान्त में नश् शब्द को विकल्प कर के कवर्ग अन्तादेश होता है।

४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां व्याख्या—नशो ।६।१। वा इत्यव्ययपदम् । कु ।१।१। (क्विन्प्रत्ययस्य कु म्)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च स) । अर्थ — (नशेः) नश् के स्थान पर (वा) विकल्प करके (कु) कवर्ग आदेश होता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में । अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर होगा । नश् (नाश होने वाला, नश्वर) । णश अदर्शने (दिवा० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'नश्' शब्द निष्पन्न होता है । नश्यतीति नक् । नश् + सु् । सुँलोप होकर नशोर्वा (८ २ ६३) के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (८ २ ३६) द्वारा शकार को षकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार हो कर—नड् । अब एक पक्ष में नशोर्वा (३४६) से कवर्ग—गकार हो जाता है, तब वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'नक्, नग्' । दूसरे पक्ष में केवल चर्त्व करने में—'नट्, नड्' । इस प्रकार चार प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा— प्रथमा नक्, नग्, नट्, नड् नशौ नशः द्वितीया नशम् " " तृतीया नशा नग्भ्याम्, नड्भ्याम्* नग्भिः, नड्भिः * चतुर्थी नशे " " नग्भ्यः, नड्भ्यः * पञ्चमी नशः " " " " षष्ठी " नशोः नशाम् सप्तमी नशि " नक्षु, नट्त्सु, नट्सु† सम्बोधन हे नक्, नग्, नट्, नड् ! हे नशौ ! हे नशः !

  • षत्वे, जश्त्वेन डत्वे, नशोर्वा (३४६) इति विकल्पेन कुत्वे रूपद्वयम् । † षत्वे डत्वे वा कुत्वम् । कुत्वे चर्त्वं कुत्वाभावे धुट्प्रक्रियाविकल्पः । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५०) स्पृशोऽनुदके क्विन् ३।२।५८॥ अनुदके सुंप्युपपदे स्पृशेः क्विन् । घृतस्पृक्, घृतस्पृग् । घृतस्पृशौ । घृतस्पृशः ॥ अर्थ—'उदक' शब्द से भिन्न अन्य सुबन्त उपपद हो तो 'स्पृश्' धातु से परे क्विन् प्रत्यय होता है । व्याख्या—स्पृशः ।५।१। अनुदके ।७।१। क्विन् ।१।१। सुपि ।७।१। (सुपि स्थ से) । अर्थ—(अनुदके) उदकभिन्न' (सुंपि) सुबन्त उपपद हो तो (स्पृशः) स्पृश् धातु से परे (क्विन्) क्विन् प्रत्यय होता है । १ यदि 'उदक' उपपद हो तो स्पृश् में क्विन् नहीं होगा, किन्तु कर्मण्यण् (७६०) द्वारा सामान्यविहित अण् प्रत्यय होकर 'उदकस्पर्श' बन जायगा । यद्यपि 'उदक' उपपद होने पर क्विप् प्रत्यय करने में भी 'उदकस्पृश्' शब्द निष्पन्न हो सकता है और क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) में बहुव्रीहिसमास के आश्रयण से कुत्व भी हो

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६१ घृतस्पृश् (घी को छूने वाला) । घृतं स्पृशतीति घृतस्पृक् । यहां स्पृश् (तुदा० प०) धातु के उपपद में 'उदक' शब्द नहीं है किन्तु 'घृत' सुबन्त है, अतः स्पृशोऽनुदके क्विन् (३५०) से क्विन्प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप तथा उपपदसमास करने से 'घृतस्पृश्' शब्द निष्पन्न होता है । घृतस्पृश् + स् । सुँलोप, व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्व-ककार करने पर—'घृतस्पृक्, घृतस्पृग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं । समग्र रूपमाला यथा — प्र० घृतस्पृक्-ग् घृतस्पृशौ घृतस्पृशः | प० घृतस्पृशः घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भ्यः द्वि० घृतस्पृशम् ,, ,, | प० ,, घृतस्पृशोः घृतस्पृशाम् तृ० घृतस्पृशा घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भिः | स० घृतस्पृशि ,, घृतस्पृक्षु च० घृतस्पृशे ,, घृतस्पृग्भ्यः | सं० हे घृतस्पृक्-ग्! घृतस्पृशौ! घृतस्पृशः! भ्याम् आदियों में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाता है । इसी प्रकार—मन्त्रस्पृश्, जलस्पृश्, तृणस्पृश्, वारिस्पृश्, स्पृश् (यह क्विबन्त है, यहां भी 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि के आश्रयण से कुत्व हो जाता है) आदि शब्दों के रूप बनते हैं । (यहां शकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) अब षकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं— [लघु०] दधृक्, दधृग् । दधृषौ । दधृषः । दधृग्भ्याम् ॥ व्याख्या—'दधृष्' शब्द ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा धिष्णीं (ग्वा० प०) धातु से क्विबन्त निपातित होता है । दधृष् + स् । सुँ-लोप, जश्त्व से डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से गकार तथा वैकल्पिक चर्व से ककार होकर—'दधृक्, दधृग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं ।

  • दधृष् (तिरस्कार करने वाला) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० दधृक्-ग् दधृषौ दधृषः | प० दधृषः दधृग्भ्याम् दधृग्भ्यः द्वि० दधृषम् ,, ,, | प० ,, दधृषोः दधृषाम् तृ० दधृषा दधृग्भ्याम्† दधृग्भिः | स० दधृषि ,, दधृक्षु च० दधृषे ,, दधृग्भ्यः | सं० हे दधृक्-ग्! हे दधृषौ! हे दधृषः! † क्रमशः जश्त्व से डकार और कुत्व से गकार हो जाता है । सकता है तथापि 'अनुदके' कथन के कारण क्विन् भी नहीं होता, ऐसा काशिका- कार आदि प्राचीन वैयाकरणों का मत है; परन्तु नव्य लोगों का कथन है कि क्विन् प्रत्यय तो हो जाता है परन्तु 'अनुदक' कथन के सामर्थ्य से कुत्व नहीं होना । अतः क्विबन्त के 'उदकस्पृट्' आदि रूप बनते हैं ।

४६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] रत्नमुट्, रत्नमुड् । रत्नमुषौ । रत्नमुड्भ्याम् ॥ व्याख्या - रत्नमुष् (रत्न चुराने वाला) । रत्नानि मुष्णातीति रत्नमुट् । रत्नकर्म के उपपद होने पर मुष स्तेये (क्र्या० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर उपपदसमास होकर 'रत्नमुष्' शब्द निष्पन्न होता है। यह क्विबन्त नहीं अतः क्विन्प्रत्य- यस्य कु (३०४) द्वारा कुत्व नहीं होता । रत्नमुष् + स् । सुँलोप, जश्त्व से डकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से टकार हो कर— 'रत्नमुट्, रत्नमुड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा — प्र० रत्नमुट्-ड् रत्नमुषौ रत्नमुषः प० रत्नमुषः रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भ्यः द्वि० रत्नमुषम् ,, ,, ष० ,, रत्नमुषोः रत्नमुषाम् तृ० रत्नमुषा रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भिः स० रत्नमुषि ,, रत्नमुट्सु,-ट्सु च० रत्नमुषे ,, रत्नमुड्भ्यः स० हे रत्नमुट्-ड्! रत्नमुषौ! रत्नमुषः! भ्याम् आदियों में झलां जशोऽन्ते (६७) में जश्त्व-डकार हो जाता है । [लघु०] षट्, षड् । षड्भिः । षड्भ्यः २ । षण्णाम् । षट्सु, षट्सु ॥ व्याख्या — षो अन्तकर्मणि (दिवा० प०) धातु से पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् (६ ३ १०८) द्वारा 'षष्' (छ) शब्द निष्पन्न होता है। यह नित्य बहुवचनान्त है। षष् + अस् (जस् वा शस्) । ष्णान्ता षट् (२६७) से षट्संज्ञा होकर षड्भ्यो लुक् (१८६) से जस् वा शस् का लुक् हो जाता है। अतः झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व डकार तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्त्व टकार हो कर— 'षट्, षड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। भिस् वा भ्यस् में जश्त्व हो जाता है— षड्भिः, षड्भ्यः । षष् + आम् । षट्संज्ञा होकर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से आम् को नुट् का आगम हो जाता है— षष् + नाम् । अब 'आम्' अजादि नहीं रहा अतः भसंज्ञा न हुई, स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) में पदसंज्ञा होकर झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व— डकार, ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार तथा प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११) से डकार को भी णकार करने पर 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि यहां पदान्त होने पर भी न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र से ष्टुत्व का निषेध नहीं होता, क्योंकि उस में 'अनाम्' कह कर 'नाम्' के विषय में छूट दे दी गई है । षष् + सु(सुप्) यहां पदान्त में जश्त्व - डकार होकर ङः सि धुट् (८४) से वैकल्पिक धुट् आगम तथा खरि च (७४) में यथासम्भव दोनों पक्षों में चर्त्व करने से — 'षट्सु, षट्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० ० षट्, षड् प० ० ० षड्भ्यः द्वि० ० ० ,, ,, ष० ० ० षण्णाम् तृ० ० ० षड्भिः स० ० ० षट्सु षट्सु च० ० ० षड्भ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६३ ध्यान रहे कि 'पप्' शब्द षट्सञ्ज्ञक होने से तीनों लिङ्गों में एक समान है। पिपठिष् (पढ़ने की इच्छा करने वाला)। पठितुमिच्छतीति—पिपठीः। पठ् व्यक्तायां वाचि (भ्वा० प०) धातु से सन्प्रत्यय, द्वित्व, अभ्यासकार्य, अभ्यास को इकारादेश, इट् आगम तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर— 'पिपठिष'। अब सनाद्यन्ता धातवः (४६८) सूत्र से धातुसञ्ज्ञा कर क्विँप्प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप तथा अतो लोपः (४७०) से अकार का भी लोप करने पर— 'पिपठिष्' शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्त होने से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। पिपठिष् + स्। हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सुँलोप हो कर—'पिपठिष्'। अब यहां पदान्त में षकार को रुँत्व करना है परन्तु ससजुषो रुँः (१०५) द्वारा पदान्त सकार को ही रुँत्व हो सकता है षकार को नहीं, तो यहां कैसे उस की प्रवृत्ति हो ? इस शङ्का को मन में रख कर इस का समाधान करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं— [लघु०] रुँत्वं प्रति षत्वस्याऽसिद्धत्वात् ससजुषो रुँः (१०५) इति रुँत्वम्॥ अर्थः—रुँत्वविधि के प्रति षत्वविधि असिद्ध है अतः ससजुषो रुँः (१०५) से रुँ आदेश हो जायेगा। व्याख्या—ससजुषो रुँः (८.२.६६) की दृष्टि में आदेशप्रत्यययोः (८.३.५६) सूत्र त्रिपादी में पर होने के कारण पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है अतः उस के किये षकार को वह सकार ही देखता है। इस से 'पिपठिष्' यहां पदान्त में ससजुषो रुँः (१०५) की प्रवृत्ति हो कर—पिपठिर्ँ = 'पिपठिर्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५१) र्वोरुपधाया दीर्घ इकः ।८।२।७६॥ रेफान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घः स्यात् पदान्ते। पिपठीः। पिपठिषौ। पिपठीर्भ्याम् ॥ अर्थः—पदान्त में रेफान्त और वकारान्त धातु की उपधा के इक् को दीर्घ हो। व्याख्या—र्वोः ।६।२। (धातोः का विशेषण होने से तदन्तविधि हो जाती है)। धातोः ।६।१। (सिपि धातो र्रुर्वा से)। उपधायाः ।६।१। इकः ।६।१। दीर्घः ।१।१। पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। समासः— र् च व् च—र्वौ, तयोः = र्वोः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(र्वोः) रेफान्त और वकारान्त (धातोः = धात्वोः) धातुओं की (उपधायाः) उपधा के (इकः) इक् के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। 'पिपठिर्' यहां रेफान्त धातु है अतः पदान्त में प्रकृतसूत्र से इस की उपधा ठकारोत्तर इकार को दीर्घ कर—पिपठीर्। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने पर— 'पिपठीः' प्रयोग सिद्ध होता है। पिपठिष् + औ = पिपठिषौ। इत्यादि।

४६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'पिपठिष् + भ्याम्' । यहा भी रुँत्व तथा दीर्घ हो कर —पिपठीर्भ्याम् । 'पिपठिष् + सु' (सुप्)। रुँत्व तथा दीर्घ हो कर—पिपठीर् + सु। अब आदेश- प्रत्यययो (१५०) से षत्व तथा खरवसानयोर्विसर्जनीय (६३) मे विसर्ग आदेश युग- पत् प्राप्त होते हैं । परन्तु षत्व के असिद्ध होने से प्रथम विसर्ग आदेश हो जाता है — पिपठीः सु । पुन वा शरि (१०४) मे विकल्प कर के विसर्ग को विसर्ग और पक्ष में विसर्जनीयस्य स (१०३) से सकार आदेश हो जाना है—१ पिपठीः सु २ पिपठीस्सु । अब इन दोनो रूपो मे क्रमश विसर्ग और सकार का व्यवधान पडने से ईकार—इण् से परे सकार को आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व प्राप्त नही हो सकता । इस पर षत्व करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ।८।३।५८॥ एतै प्रत्येक व्यवधानेऽपि इण्कुभ्या परस्य सस्य मूर्धन्यादेश स्यात् । ष्टुत्वेन पूर्वस्य ष —पिपठीष्षु । पिपठीः षु ।। अर्थ —नुम्, विसर्जनीय और शर् इन मे किसी एक के व्यवधान होने पर भी इण् कवर्ग से परे सकार को मूर्धन्य आदेश हो जाता है । व्याख्या—इण्को ।५।२। (यह अधिकृत है) । नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये ।७।१। अपि इत्यव्ययपदम् । स ।६।१। (सहे साडः स से) । मूर्धन्य ।१।१। (अपदान्तस्य मूर्धन्य ग) । समास —नुम् च विसर्जनीयश्च शर् च=नुम्विसर्जनीयशर, इतरेतर- द्वन्द्व । तेषा व्यवाय (व्यवधानम्) =नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाय, तस्मिन्=नुम्विसर्ज- नीयशर्व्यवाये, षष्ठीतत्पुरुष । यहा भाष्यकार ने प्रत्येक का व्यवधान स्वीकार किया है [प्रत्येक व्यवायशब्द परिसमाप्यत इति भाष्यम्] । अर्थ —(इण्को ) इण् प्रत्या- हार अथवा कवर्ग से परे (स ) स् के स्थान पर (मूर्धन्य ) मूर्धन्य आदेश (नुम्विसर्ज- नीयशर्व्यवाये) नुम्, विसर्ग अथवा शर् इन मे से किसी एक का व्यवधान होने पर (अपि) भी हो जाता है । सकार को मूर्धन्य (मूर्धा स्थान वाला) षकार हो जाता है—यह पीछे आदेशप्रत्यययो (१५०) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं । 'पिपठीः सु' यहा विसर्ग का व्यवधान तथा 'पिपठीस्सु' यहा शर्-सकार का व्यवधान होने पर भी इण् ईकार से परे दोनों जगह प्रकृतसूत्र से सकार को मूर्धन्य षकार हो जाता है—१ पिपठीः षु, २ पिपठीस् षु । अब सकारपक्ष मे ष्टुना ष्टुः (६४) से सकार को षकार होकर—'१ पिपठीः षु, २ पिपठीष्षु' इस प्रकार दो रूप निष्पन्न होते हैं । इसकी समग्र रूपमाला यथा— प्र० पिपठीः , पिपठिषौ पिपठिष | ष० पिपठिष विपठिषो पिपठिषाम् द्वि० पिपठिषम् ,, ,, | स० पिपठिषि ,, { पिपठीः षु तृ० पिपठिषा पिपठीर्भ्याम् पिपठीर्भिः | { पिपठीष्षु च० पिपठिषे , पिपठीर्भ्य | स० हे पिपठीः ! विपठिषौ ! विपठिष ! प० पिपठिष ,, पिपठीर्भ्य | —०—

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६५ [लघु०] चिकीः। चिकीर्षौ। चिकीर्भ्याम्। चिकीर्षु ॥ व्याख्या—चिकीर्षू (करने की इच्छा वाला) । कर्तुमिच्छतीति चिकीः। डुकृञ् करणे (तना० उभ०) धातु से धातोः कर्मणः० (७०५) से सन्प्रत्यय, इको झल् (७०६) से कित्त्व के कारण गुणाभाव, अज्झनगमां सनि (७०८) से दीर्घ, ऋत इद्धातोः (६६०) से इत्त्व, रपर, हलि च (६१२) ने उपधादीर्घ, द्वित्व, अभ्यासकार्य, कुहोश्चुः (४५४) से चुत्व तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो कर—'चिकीर्ष'। अब सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा होकर कर्त्ता में क्विँप्, उस का सर्वापहार- लोप तथा अतो लोपः (४७०) ने अकार का लोप करने पर—'चिकीर्षू' शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसंज्ञा हो कर इस से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। 'चिकीर्षू + स्' यहाँ सुँलोप होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) के प्राप्त होने पर रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता है—'चिकीर्'। अब अवसान में खरवसानयोः० (६३) से रेफ को विसर्ग करने पर—'चिकीः' प्रयोग सिद्ध होता है। इस की रूपमाला यथा— प्र० चिकीः चिकीर्षौ चिकीर्षः । प० चिकीर्षः चिकीर्भ्याम् चिकीर्भ्यः द्वि० चिकीर्षम् " " । ष० " चिकीर्षोः चिकीर्षाम् तृ० चिकीर्षा चिकीर्भ्याम् चिकीर्भिः स० चिकीर्षि " चिकीर्षु* च० चिकीर्षे " चिकीर्भ्यः सं० हे चिकीः ! चिकीर्षौ ! चिकीर्षः ! † यहां पदान्त में रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता है। ध्यान रहे कि रात्सस्य (८.२.२४) की दृष्टि में षत्व (८.३.५६) असिद्ध है। वह इसे सकार ही समझता है।

  • यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। अभ्यास (४५) (१) 'उपपद' किसे कहते हैं ? सूत्र बता कर व्याख्यान करें। (२) स्पृशोऽनुदके क्विन् सूत्र में 'अनुदके' कथन का क्या प्रयोजन है ? (३) 'चिकीर्षु' में खर् परे होने पर भी रेफ को विसर्ग क्यों नहीं होता ? (४) पिपठिष्, तादृश्, चिकीर्षू, घृतस्पृश्— शब्दों की प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपुरःसर शब्दनिष्पत्ति करें। (५) 'चिकीर्षू + सुप्' यहां षकार में रात्सस्य सूत्र कैसे प्रवृत्त हो सकता है ? (६) निम्नलिखित रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. षट् । २. यादृक् । ३. नक् । ४. षण्णाम् । ५. दधृग्भ्याम् । ६. घृत- स्पृक् । ७. पिपठीः । ८. विट् । ६. चिकीः । १०. पिपठिष्षु । (७) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि, र्वोरुपधाया दीर्घ इकः, आ सर्वनाम्नः—इन सूत्रों की सविस्तर व्याख्या करें। (८) चिकीर्षू, पिपठिष्, ईदृश्, उदकस्पृश्—शब्दों की रूपमाला लिखें । (यहां षकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : : — ल० प्र० (३०)

४६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अब सकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का निरूपण करते हैं— [लघु०] विद्वान्। विद्वांसौ। हे विद्वन् १॥ व्याख्या—विद् ज्ञाने (अदा० प०) धातु से लँट्, उसके स्थान पर शतृँ, शप्, उस का लुक् तथा विदेः शतुर्वसुः (८३३) से शतृँ को वसुँ आदेश करने से 'विद्वस्' शब्द निष्पन्न होता है। वसुँ आदेश में उकार की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः 'विद्वस्' शब्द उगित् है। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। यहां पुँल्लिङ्ग में इस के रूप दर्शाये जायेंगे। विद्वस् + सु। उगित् होने से उगिदचां० (२८६) द्वारा नुँम् आगम, सान्त- महत संयोगस्य (३८२) म सान्तसंयोग के नकार की उपधा को दीर्घ होकर— विद्वान्स् + स्। अब सुँलोप तथा संयोगान्तस्य लोप (२०) से संयोगान्तलोप करने से 'विद्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप नहीं होता। किञ्च सान्त-वस्वन्त न होने म वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां द (२६२) द्वारा दत्व भी नहीं होता। 'विद्वस् + औ'। नुँम् आगम तथा सान्तमहत ०(३४२) स दीर्घ हो—विद्वान्स्

  • औ। नश्चापदान्तस्य झलि (७८) म नकार को अनुस्वार करने पर 'विद्वांसौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यय् परे न होने स अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होना। कई लोग 'विद्वासौ' वा 'विद्वान्सौ' लिखते हैं—वे ठीक नहीं। इसी प्रकार—'विद्वांसः' आदि बनते हैं। विद्वस् + अम् (शस्)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५३) वसोः सम्प्रसारणम् ॥६।४।१३१॥ वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रसारणं स्यात्। विदुषः। वसुंस्रंसु० (२६२) इति द—विद्वद्भ्याम्॥ अर्थ—वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग को सम्प्रसारण हो जाता है। व्याख्या—वसोः ६।१। (भस्य का विशेषण होने से अथवा प्रत्यय होने से तदन्तविधि हो जाती है)। भस्य ६।१। (अधिकृत है)। अङ्गस्य ६।१। (अधिकृत है)। सम्प्रसारणम् १।१। अर्थ—(वसोः = वस्वन्तस्य) वसुंप्रत्ययान्त (भस्य) भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण हो जाता है। विद्वस् + शस्। यहां 'विद्वस्' यह वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग है अतः इस के द्वितीय वकार [न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) का ध्यान कर लें] को उकार सम्प्रसारण होकर—विद् उस् + अस्। सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा आदेश- प्रत्यययो (१५०)१ म प्रत्यय के सकार को षकार करने पर—विदुषस् = 'विदुषः' १. ऋग्वेद (१।२५।६) के भाष्य में सायणमाधव ने 'दाशुषे' प्रयोग में शासिवसि- घसीनां च (५५४) में षत्व किया है, पर यह ठीक नहीं। पूर्वोत्तरसाहचर्य से

हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ४६७ प्रयोग सिद्ध होता है । इसीप्रकार आगे भी अजादि विभक्तियों में प्रक्रिया होती है । ‘विद्वस् + भ्याम्’ यहां वसुस्रंसु० (२६२) से पदान्त सकार को दकार होकर —विद्वद्भ्याम् । इसीप्रकार अन्य हलादि विभक्तियों में भी । हे विद्वस् + स् । यहां नुँम्, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप करने से—हे विद्वन् । सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ न होगा । विद्वस् (विद्वान्) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० विद्वान् विद्वांसौ विद्वांसः | प० विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः द्वि० विद्वांसम् ,, विदुषः | ष० ,, विदुषोः विदुषाम् तृ० विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः | स० विदुषि ,, विद्वत्सु च० विदुषे ,, विद्वद्भ्यः | सं० हे विद्वन्! हे विद्वांसौ! हे विद्वांसः! इसीप्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप होते हैं— शब्द अर्थ प्रत्यय शस् का रूप १. ऊषिवस् रह चुका क्वसुँ ऊषुपः१ २. तस्थिवस् ठहर चुका ,, तस्थुषः ३. सेदिवस् गमन कर चुका ,, सेदुषः ४. प्रसेदिवस् प्रसन्न हो चुका ,, प्रसेदुषः ५. निपेदिवस् बैठ चुका ,, निपेदुषः ६. निपेतिवस् गिर चुका ,, निपेतुषः ७. ददिवस् दे चुका ,, ददुषः ८. शुश्रुवस् सुन चुका ,, शुश्रुवुषः२ ९. उपेयिवस् प्राप्त कर चुका ,, उपेयुषः १०. अनाश्वस् भोजन न कर चुका ,, अनाशुषः ११. दाश्वस् दे चुका ,, दाशुषः १२. अधिजिग्मिवस् प्राप्त कर चुका ,, अधिजिग्मुषः इस सूत्र में ‘वस्’ धातु ही इष्ट है आदेश वा प्रत्यय नहीं । अतः यहां आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से ही षत्व करना चाहिये । १. इन में यथासम्भव प्राप्त इट् आगम भसञ्ज्ञकों में प्रवृत्त नहीं होता । अकृतव्यूहाः पाणिनीयाः (५०) अर्थात् इस व्याकरण शास्त्र में निमित्त को विनाशोन्मुख देख कर तत्प्रयुक्त कार्य नहीं करना चाहिये । जब ‘वसुँ’ प्रत्यय, भसञ्ज्ञकों में वकार को सम्प्रसारण हो जाने से वलादि ही नहीं रहता तब तत्प्रयुक्त कार्य वलादि- लक्षण इट् आगम भी नही होता । २. शुश्रुवस् + अस् (शस्) में सम्प्रसारण और पूर्वरूप हो कर ‘शुश्रुउस् + अस्’ इस दशा में अचि श्नु० (१६६) से धातु के उकार को उवँङ् हो जाता है ।

४६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ईयसुन्प्रत्ययान्तों के रूप भी प्राय 'विद्वस्' शब्द की तरह होते हैं। केवल शसादियों में सम्प्रसारणकार्य तथा भ्याम् आदि मे दत्त्व नहीं होता। निदर्शनार्थ 'श्रेयस्' (दोनों में अधिक अच्छा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांस प० श्रेयस श्रेयोभ्याम् श्रेयोभ्यः द्वि० श्रेयांसम् " श्रेयस प० ,, श्रेयसो. श्रेयसाम् तृ० श्रेयसा श्रेयोभ्याम्‡ श्रेयोभि स० श्रेयसि " श्रेयस्सु, -स्सु† च० श्रेयसे " श्रेयोभ्य स० हे श्रेयन् ! श्रेयांसौ ! श्रेयांसः !- ‡ ससजुषो रुः (१०५), हशि च (१०७) । † वा शरि (१०४) । इसीप्रकार निम्नस्थ ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्दों के रूप बनते हैं— १ अणीयस् = दोनों में अधिक सूक्ष्म | १५ नेदीयस् = दोनों में अधिक निकट २ अल्पीयस् = दोनों में अधिक थोड़ा | १६ पटीयस् = दोनों में अधिक चतुर ३, ऋजीयस् = दोनों में अधिक सरल | १७ पापीयम् – दोनों में अधिक पापी ४. कनीयम् = { दोनों में अधिक युवा | १८ प्रथीयरू = दोनों मे अधिक विस्तृत { दोनों मे अधिक छोटा | १६ प्रेयस् = दोनो में अधिक प्रिय ५ क्रशीयस् = दोनों में अधिक कृश | २०, बलीयस् = दोनों में अधिक बलवान् ६ क्षेपीयस् = दोनों में अधिक तेज | २१ भूयम् = दोनो में अधिक मात्रा वाला ७ क्षोदीयस् = दोनों में अधिक क्षुद्र | २२ महीयस् = दोनों में अधिक बड़ा ८ गरीयस् = दोनों में अधिक भारी | २३. म्रदीयम् = दोनों में अधिक मृदु ६. जवीयस् = दोनों में अधिक वेगवान् | २४ यवीयम् = दोनों में अधिक युवा १०. ज्यायस् = { दोनों में अधिक प्रशस्य | २५ लघीयम् = दोनों में अधिक छोटा { दोनों में अधिक वृद्ध | २६. वरीयस् = दोनों में अधिक विशाल ११ दवीयस् = दोनों में अधिक दूर | २७. साधीयस् = दोनों में अधिक अच्छा १२ द्रढीयस् = दोनों में अधिक दृढ | २८. स्थवीयस् = दोनों में अधिक स्थूल १३ द्राघीयम् = दोनों में अधिक दीर्घ | २६. स्थेयस् = दोनों में अधिक स्थिर १४ धनीयम् = दोनों में अधिक धनी | ३०. ह्रसीयस् = दोनों में अधिक छोटा नोट–जब ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में आते हैं तब उगिदचश्च (१२४६), से ङीप् प्रत्यय होकर – श्रेयसी, अल्पीयसी, कनीयसी, प्रभृति शब्द बन जाते हैं। वसुं- प्रत्ययान्तों में भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है परन्तु सम्प्रसारण विशेष होता है। यथा— विदुषी, स्तुषी आदि । इन सब का उच्चारण नदीशब्दवत् समझना चाहिये। नपुंसक में वस्वन्तों को पदान्त मे दत्व होगा - विद्वत्, विदुषी, विद्वांसि आदि। [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५४) पुंसोऽसुङ् ।७।१।८६॥ सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुसोऽसुङ् स्यात् । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ । पुंसः । पुम्भ्याम् । पुंसु ॥ अर्थ.—सर्वनामस्थान की विवक्षा हो तो 'पुस्' को असुङ् आदेश होता है। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । पुमः ।६।१।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६६ असुँङ् ।१।१। 'सर्वनामस्थाने' में परसप्तमी मानने से 'परमपुमान्' यहां अनिष्ट स्वर प्राप्त होता है । अतः विषय-सप्तमी मान कर 'विवक्षिते' का अध्याहार कर लेते हैं। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान विवक्षित होने पर (पुंसः) पुंस् शब्द के स्थान पर (असुंङ्) असुंङ् आदेश हो जाता है । सर्वनामस्थान (सुं, औ, जस्, अम्, औट्) लाने से पूर्व उस के लाने की इच्छा- मात्र होने पर ही असुंङ् आदेश हो जाता है। असुंङ् डित् है, अतः वह ङिच्च (४६) द्वारा 'पुंस्' के अन्त्य अल्-सकार के स्थान पर होता है । पुंस् (पुरुष)। पूञ् पवने(भ्वा० उभ०) धातु से पूजो डुम्सुन्¹(उणा० ६१८) द्वारा 'डुम्सुन्' प्रत्यय हो कर उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में बहुलग्रहणसामर्थ्य से आदिर्निटुडवः(४६२) द्वारा डु की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु चुटू (१२६) से केवल डकार की ही इत्सञ्ज्ञा होकर उस का तथा उँन् अनुबन्ध का लोप करने से—पू+ उम्स् । डित्त्वकरणसामर्थ्य से टि का भी लोप हो कर—प्+उम्स्=पुम्स् । अब नश्चापदान्तस्य झलि (७८) द्वारा अपदान्त मकार को अनुस्वार करने पर 'पुंस्' शब्द निष्पन्न होता है । अब 'सुं' सर्वनामस्थान करने की इच्छामात्र में, प्रत्यय करने से पूर्व हीं पुंसो- ऽसुंङ् (३५४) द्वारा सकार को असुंङ् आदेश होने पर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से अनुस्वार भी अपने पूर्वस्वरूप मकार में परिणत हुआ—पुमस् । अब सुंप्रत्यय लाने पर उगिदचांम्०(२८६) से नुँम्, अनुबन्धलोप, सान्तमहत ० (३४२) से दीर्घ, सुंलोप तथा संयोगान्तलोप होकर—'पुमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्बुद्धि में केवल सान्तमहतः०(३४२) से दीर्घ नहीं होता शेष सब प्रक्रिया सुंप्रत्ययवत् जानें—हे पुमन् ! । पुंस्+औ=पुमस्+औ । नुँम्, दीर्घ तथा अनुस्वार होकर—पुमांसौ । इसी प्रकार अन्य सर्वनामस्थान प्रत्ययों में भी जान लें । अब आगे शसादि विभक्तियों की विवक्षा में असुँङ् न होगा । पुंस्+अस् (शस्) = पुंसः । पुंस्+भ्याम् । यहां संयोगान्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्त² सकार का लोप होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार अनुस्वार पुनः मकाररूप में परिणत हो जाता है—पुम्+भ्याम् । अब मोऽनुस्वारः (७७) से पदान्त मकार को १. 'पातेर्डुम्सुन्' इति पाठान्तरम् । सूतेः सस्य पः ह्रस्वो म्सुंप्रत्यय इति स्त्रियामिति सूत्रे भाष्य उक्तम् । न्यासे तु—'पुनातेर्मक्सुँन् ह्रस्वश्चे'ति पठितम् । उपेयप्रति- पत्त्यर्था उपाया अव्यवस्थिता इति तत्त्वम् । २. अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय) की गणना अट्- प्रत्याहार तथा शर्प्रत्याहार में भाष्यकार ने स्वीकार की है । इस से अनुस्वार को हल् मान कर हलोऽनन्तराः संयोगः(१३) से संयोगसञ्ज्ञा हो जाती है ।

४७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अनुस्वार तथा वा पदान्तस्य (८०) द्वारा उसे विकल्प करके परसवर्ण—मकार करने मे—'पुम्भ्याम्, पुभ्याम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। पुस् + सुप् । संयोगान्तलोप, अनुस्वार की मकाररूप मे परिणति तथा मोऽनु- स्वार (७१) से अनुस्वार होकर 'पुंसु'। यहा यय् परे न रहने से वा पदान्तस्य (८०) प्रवृत्त नही होता'। 'पुम्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पुमान् पुमांसौ पुमांस प० पुस पुम्भ्याम् पुम्क्य द्वि० पुमासम् ,, पुंसः प० ,, पुंसो पुंसाम् तृ० पुंसा पुम्भ्याम्† पुम्भि स० पुंसि ,, पुंसु च० पुंस ,, पुम्भ्य सं० हे पुमन् ! हे पुमांसौ ! हे पुमास ! † भ्याम्, भिस् और भ्यस् मे अनुस्वारपक्षीय रूप भी न भूलें। [लघु०] ऋदुशनस्० (२०५) इत्यनङ् । उशना । उशनसौ ॥ व्याख्या—उशनस् (शुक्राचार्य)। शुक्रो दैत्यगुरु काव्य उशना भार्गव कवि — इत्यमर' । वश कान्तौ (अदा० प०) धातु से वशे कनसिं (उणा० ६७८) द्वारा 'कनसिं' प्रत्यय तथा ग्रहिज्या० (६३४) से सम्प्रसारण और सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप होकर 'उशनम्' शब्द निष्पन्न होता है। उशनस् + सुँ । यहा ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से सकार को अनङ् आदेश होकर अङ् अनुबन्ध के लुप्त हो जाने पर—उशन अनू + सु । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—उशनन् + सु । सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से नान्त की उपधा को दीर्घ हो—उशनान् + सु्। हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का भी लोप होकर—'उशना' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार उशनम् + औ = उशनसौ । इत्यादि । हे उशनम् + स् । यहां अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२८) अस्य सम्बुद्धौ वाऽनङ् नलोपश्च वा वाच्यः॥ हे उशन ! , हे उशनन् ! , हे उशनः ! । हे उशनसौ ! । उशनोभ्याम् । उशन सु, उशनस्सु ॥ अर्थ—सम्बुद्धि परे होने पर उशनस् शब्द के सकार को विकल्प से अनङ् आदेश हो तथा नकार का लोप भी विकल्प से हो। १. जनश्रुति है कि अनुभूतिस्वरूपाचार्य के मुख से एक वार पण्डितसभा मे 'पुंसु' के स्थान पर 'पुक्षु' प्रयोग उच्चरित हो गया । पण्डितो ने इस पर उन का बहुत उपहास किया । इस उपहास से खिन्न होकर उन्होंने 'पुंक्षु' प्रयोग की साधुता के लिये सरस्वती देवी की कृपा से अपना नया व्याकरण (सारस्वतव्याकरण) रचा। इस मे उन्होंने असम्भवे पुंसः कक् सौ सूत्र बना कर सप्तमीबहुवचन के परे रहते पुस् के अन्त में क्क् का आगम कर सयोगमध्यगत सकार का किसी तरह लोप कर 'पुंक्षु' की सिद्धि दर्शाई है।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७१ व्याख्या—सम्बुद्धि में 'हे उशनस् + स्' यहां प्रकृतवार्त्तिक से उशनस् के सकार को विकल्प कर के अनँङ् आदेश हो कर अनँङ्पक्ष में अनुबन्धलोप, पररूप, सुंलोप तथा नकार का वैकल्पिक लोप करने से—'हे उशन, हे उशनन्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। अनँङ् के अभाव में सुंलोप, रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—'हे उशनः' यह एक रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार कुल मिला कर सम्बुद्धि में तीन रूप बनते हैं— अनँङ्पक्षे (नकारलोपे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (१) हे उशन ! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ " (नकारलोपाऽभावे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (२) हे उशनन्! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ अनँङोऽभावे $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (३) हे उशनः! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ काशिका में यहां एक सुन्दर प्राचीन श्लोक दिया हुआ है— सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । माध्यन्दिनिर्वष्टि गुणं त्विगन्ते नपुंसके व्याघ्रपदां वरिष्ठः॥ नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि इस वार्त्तिक का उल्लेख महाभाष्य में कहीं नहीं आया। कौमुदीकार ने काशिका का भावानुवाद प्रस्तुत किया प्रतीत होता है। अत एव कई लोग इसे प्रमाण नहीं मानते। उशनस् + भ्याम्। यहां पदान्त में ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—उशनोभ्याम्। उशनस् + सुप्। यहां पदान्त में रुँत्व, खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो विसर्जनीयस्य सः(१०३) सूत्र से सकार के प्राप्त होने पर उस के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र से वैकल्पिक विसर्ग आदेश करने से—'उशनःसु, उशनस्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा उशना उशनसौ उशनसः द्वितीया उशनसम् " " तृतीया उशनसा उशनोभ्याम् उशनोभिः चतुर्थी उशनसे " उशनोभ्यः पञ्चमी उशनसः " " षष्ठी " उशनसोः उशनसाम् सप्तमी उशनसि " उशनःसु, उशनस्सु सम्बोधन हे उशन, उशनन्, उशनः! हे उशनसौ ! हे उशनसः ! [लघु०] अनेहा । अनेहसौ । हे अनेहः ! ॥ व्याख्या—अनेहस् = (समय)। कालो दिष्टोऽप्यनेहापि — इत्यमरः। 'नञ्' उपपद वाली हन हिंसा-गत्योः (अदा० प०) धातु से नञि हन एह च (उणा० ६६३) सूत्र द्वारा 'असि' प्रत्यय तथा हन् को 'एह' आदेश होकर नञ्कार्य करने से—'अनेहस्' १. शेखरकार तथा बालमनोरमाकार का अनेहस् शब्द को असुँन्नन्त लिखना ठीक नहीं, क्योंकि तब उगिदचाम्० (२८६) द्वारा नुँम् प्रसक्त होगा।

४७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां शब्द निष्पन्न होता है। इसकी प्रक्रिया भी 'उशनस्' शब्दवत् होती है केवल सम्बुद्धि मे इस का एक रूप बनता है। रूपमाला यथा— प्र० अनेहा† अनेहसौ अनेहस | प० अनेहस अनेहोभ्याम् अनेहोभ्य द्वि० अनेहसम् ,, , | ष० ,, अनेहसो अनेहसाम् तृ० अनेहसा अनेहोभ्याम्‡ अनेहोभि | स० अनेहसि ,, अनेह सु-स्सु* च० अनेहस ,, अनेहोभ्य | स० हे अनेह । @ अनेहसौ। अनेहस । †ऋदुशनस्० (२०५) से अनङ्, अनुबन्धलोप, पररूप, नान्त की उपधा को दीर्घ, सुँलोप तथा नलोप होकर— 'अनेहा' सिद्ध होता है। ‡ससजुषो रुँ (१०५), हशि च (१०७), आव्गुण (२७) । *रुँत्व विसर्ग होकर वा शरि (१०४) प्रवृत्त हो जाता है । @सुँलोप, रुँत्व तथा अवसान मे रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया तथा रूपमाला वाला केवल एक ही शब्द है— पुरुदमस् । इस का वेद मे ही प्रयोग देखा जाता है । इस का अर्थ 'इन्द्र' आदि है। 'बहुत कर्मों वाला' इस अर्थ मे यह विशेषणवाची होने से त्रिलिङ्गी है। इसे वैदिक समझ कर ही कौमुदीकार ने सम्भवत इस का उल्लेख नही किया । [लघु०] वेधा । वेधसौ ।'हे वेध '। वेधोभ्याम् ॥ व्याख्या—वेधस् = (ब्रह्मा) । स्रष्टा प्रजापतिर्वेधा इत्यमरः । विपूर्वकं डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो० उभ०) धातु से विधाञो वेध च (उणा० ६६४) इस औणा- दिकसूत्र द्वारा 'असिँ' प्रत्यय तथा सोपसर्ग 'धा' को 'वेध्' आदेश होकर 'वेधस्' शब्द निष्पन्न होता है । वेधस् + सुँ । असन्तस्य चाधातो (३४३) मे दीर्घ, हल्ङ्याब्भ्यो ०(१७६) से सुँलोप तथा प्रकृति के सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—वेधा । अन्य विभक्तियो मे 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया जानें । रूपमाला यथा— प्र० वेधा वेधसौ वेधस | प० वेधस वेधोभ्याम् वेधोग्य द्वि० वेधसम् ,, ,, | ष० ,, वेधसो वेधसाम् तृ० वेधसा वेधोभ्याम्† वेधोभि | स० वेधसि ,, वेध सु,-स्सु च० वेधसे ,, वेधोग्य | स० हे वेध । * वेधसौ । वेधस । †रुँत्व, उत्व तथा गुण हो जाता है । *सुँलोप, रुँत्व तथा विसर्ग होते हैं । इसीप्रकार—१. वनौकस् (बन्दर), २ दिवौकस् (देवता), ३ हिरण्यरेतस् (सूर्य वा अग्नि), ४ चन्द्रमस् (चन्द्रमा), ५. सुमनस् (देवता), ६ प्रचेतस् (वरुण), ७ सुमेधस् (अच्छी बुद्धि वाला), ८ नृचक्षस् (मनुष्यों पर दृष्टि रखने वाला । अथर्व०), ९ जातवेदस् (अग्नि), १० अङ्गिरस् (एक ऋषि) ११. विश्ववेदस् (सब कुछ जानने वाला), १२ पुरोधस् (पुरोहित), १३ वयाधस् (तरुण, जवान) १४.

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७३ दुर्वासस् (एक ऋषि), १५. विमनस् (दुःखी पुरुष), १६. विडौजस् (इन्द्र) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं।¹ अदस् (वह-दूरवर्त्ती पदार्थ जिसका अङ्गुली से निर्देश नहीं किया जा सकता)। न दस्यते = उत्क्षिप्यतेऽङ्‌गुलिर्यत्र-इस विग्रह में नञ्पूर्वक दस् धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'अदस्' शब्द निष्पन्न होता है। त्यदादियों के अन्तर्गत होने के कारण इस की सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसंज्ञा होती है। यह शब्द त्रिलिङ्गी है। यहां पुंलिङ्ग में इस की सुबन्त-प्रक्रिया का निरूपण करते है— [लघु०] विधि-सूत्रम्- (३५५) अदस औ सुँलोपश्च ॥७।२।१०७॥ अदस औत् स्यात् सौ परे सुँलोपश्च। तदोः० (३१०) इति सः। असौ। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। वृद्धिः॥ अर्थः-सुँ परे होने पर अदस् शब्द के अन्त्य सकार को औकार तथा सुं का लोप हो जाता है। व्याख्या-सौ ।७।१। (तदोः सः सावनन्त्ययोः से)। अदसः ।६।१। औ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। सुंलोपः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। समासः--सोर्लोपः = सुलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः- (सौ) सुँ परे होने पर (अदसः) अदस् शब्द के स्थान पर (औ) 'औ' आदेश होता है (च) तथा (सुंलोपः) सुँ का भी लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह औकार आदेश अन्त्य अल् सकार के स्थान पर होगा। 'अदस औ' इस अंश में यह सूत्र त्यदादीनामः (१६३) सूत्र का अपवाद है। अदस् + सुँ। यहां त्यदादीनामः (१६३) के प्राप्त होने पर अदस औ सुँलो- पश्च (३५५) सूत्र से सकार को औकार तथा सुं का लोप होकर - अद+औ। वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने से- 'अदौ'। अब प्रत्ययलक्षण द्वारा लुप्त हुए सुँ- प्रत्यय को मान कर तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) सूत्र से दकार को सकार करने पर- 'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि 'अदौ' इस अवस्था में अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) सूत्र भी प्राप्त होता है परन्तु तदोः सः० (७.२.१०६) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध होने से वह प्रवृत्त नहीं होता। अदस् + औ। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से सकार को अकार तथा अतो १. यहां यह ज्ञातव्य है कि असन्त शब्द में 'अस्' यदि धातु का अवयव होगा तो अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र में 'अधातोः' कथन के कारण उस असन्त की उपधा को दीर्घ न होगा। यथा-सुपूर्वक वस् आच्छादने (अदा० आ०) धातु से क्विन् प्रत्यय करने पर 'सुवस्' (अच्छी तरह ढांपने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। यह शब्द असन्त तो है पर इस के अन्त में 'अस्' यह 'वस्' धातु का अवयव है अतः 'सुवस्+स्' में उपधादीर्घ न होगा, सुंलोप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से- सुवः, सुवसौ, सुवसः - आदि रूप बनेगे। इसी प्रकार पिण्ड- ग्रस्, पिण्डग्लस् (पिण्ड खाने वाला) आदि शब्दों के रूप समझने चाहियें।

गुणे (२७४) से पररूप कर—'अद्+औ'। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर—'अदौ'। इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(३५६) अदसोऽसेर्दादु दो मः ॥८।२।८०॥ अदसोऽमान्तस्य दात् परस्य उदूतो स्तो दस्य मश्च। आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य-उ, दीर्घस्य-ऊ। अमू। जस शी (१५२)। गुण ॥ अर्थ --जिस के अन्त में सकार न हो ऐसे अदस् शब्द के दकार से पर वर्ण को उकार और ऊकार हो जाता है तथा दकार को मकार भी होता है। व्याख्या—अदस ।६।१। असे ।६।१। दात् ।५।१। उ ।१।१। द ।६।१। मः ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थं) । समास—नास्ति सि = सकार (सकाराद् इकार उच्चारणार्थ ) यस्मिन् स =असि, तस्य =असे । नञ्बहुव्रीहिसमास. । यह 'अदस' का विशेषण है। अदस् शब्द के अन्त में सकार होता है अत यहां असकारान्त अदस् शब्द का ग्रहण अभिप्रेत है। उश्च ऊश्च=उ, समाहारद्वन्द्व । अर्थ -(असे.) असान्त अर्थात् जिस के अन्त में सकार विद्यमान नही ऐस (अदस ) अदस् शब्द के (दात्) दकार स पर वर्ण के स्थान पर (उ) उकार या ऊकार आदेश हो जाता है तथा (द ) दकार के स्थान पर (म ) म् आदेश भी हो जाता है। असान्त अदस् शब्द के दकार से परे वाला वर्ण प्राय ह्रस्व या दीर्घ हुआ करता है¹। स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ह्रस्व वर्ण के स्थान पर ह्रस्व उकार तथा दीर्घ वर्ण के स्थान पर दीर्घ ऊकार होगा²। 'अदौ' यहां असान्त अदस् शब्द के दकार से परे दीर्घ ओकार विद्यमान है। अत प्रकृतसूत्र से ओकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + अस् (जस्) । यहा त्यदादीनाम (१६३) से सकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, जसः शी (१५२) से जस् को शी तथा आदगुण (२७) सूत्र से गुण होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५७) एत ईद् बहुवचने ॥८।२।८१॥ अदसो दात्परस्य एत ईद्, दस्य च मो बहुह्वर्थोक्तौ। अमी। पूर्वत्रा- १. कही-कही 'हल्' भी पाया जाता है, जैस—अदद्र्यङ्, अमुमुयङ्। यहा दकार से परे 'र्' है। २. आन्तर्य अर्थात् सादृश्य चार प्रकार का होता है—यह हम पीछे स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र पर लिख चुके हैं। यहाँ प्रमाणकृत (मात्राकृत) आन्तर्य द्वारा ह्रस्व के स्थान पर ह्रस्व तथा दीर्घ के स्थान पर दीर्घ आदेश होता है। दकार से परे यदि हल् हो तो उसे भी ह्रस्व उकार आदेश होता है।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७५ सिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चाद् उत्व-मत्वे । अमुम् । अमू । अमून् । मुत्वे कृते घिसञ्ज्ञायां नाभावः ॥ अर्थः— अदस् शब्द के दकार से परे एकार को ईकार तथा दकार को मकार हो जाता है बहुत अर्थों की उक्ति में । व्याख्या—अदसः ।६।१। दात् ।५।१। (अदसोऽसेर्दादु० से) । एतः ।६।१। ईत् ।१।१। दः ।६।१। मः ।१।१। (अदसोऽसेः० से) । बहुवचने ।७।१। समासः—बहूनां वचनम्—उक्तिः=बहुवचनम्, तस्मिन्=बहुवचने । षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अर्थः— (बहुवचने) बहुत्व की विवक्षा में (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (दात्) दकार से परे (एतः) 'ए' के स्थान पर (ईत्) 'ई' आदेश हो जाता है तथा (दः) उस दकार के स्थान पर भी (मः) 'म्' आदेश हो जाता है । 'अदे' यहां प्रकृतसूत्र से एकार को ईकार तथा दकार को मकार होकर— 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है । अदस् + अम् । यहां त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—'अद + अम्' । अब यहां अमि पूर्वः (६.१.१०३) से पूर्वरूप तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) से उत्व- मत्व युगपत् प्राप्त होते हैं । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उत्वमत्वविधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' बन जाता है । तदनन्तर उत्व-मत्व हो 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध होता है । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चादुत्वमत्वे । अर्थात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र से—अदसोऽसेः० (३५६) तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम अमि पूर्वः (१३५) आदि सूत्रों द्वारा विभक्तिकार्य होगा तदनन्तर उन सूत्रों की प्रवृत्ति होगी । परन्तु अब इस पर यह विचार उपस्थित होता है कि क्या पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से कार्य असिद्ध किया जाता है या शास्त्र असिद्ध ? यदि किये हुए कार्य को असिद्ध मानेंगे तो प्रथम कार्य का विद्यमान होना आवश्यक होगा; क्योंकि यदि कार्य ही विद्यमान न रहेगा तो पुनः वह असिद्ध कैसे हो १. यहां 'बहुवचन' शब्द से पारिभाषिक बहुवचन—जस्, शस् आदि का ग्रहण नहीं करना चाहिये । क्योंकि वैसा अर्थ करने से 'अदेभ्यः=अमीभ्यः, अदेभिः= अमीभिः' आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर भी 'अदे=अमी' यहां प्रयोगसिद्धि न हो सकेगी । क्योंकि 'अदे' में एकार स्वयं बहुवचन है इस से परे अन्य कोई बहुवचन नहीं है । अतः यहां 'बहुवचने' पद को यौगिक स्वीकार कर 'बहुतों की उक्ति अर्थात् बहुत्व की विवक्षा में' ऐसा अर्थ करना उचित है । इस अर्थ से 'अदे' आदि सब स्थानों पर बहुत्व की विवक्षा वर्तमान रहने से कोई दोष प्राप्त नहीं होता । इस सूत्र पर भाष्यकार ने लिखा है—नेदं पारिभाषिकस्य बहुवचन- स्य ग्रहणम् । किन्तर्हि ? अन्वर्थग्रहणमेतत् । बहूनामर्थानां वचनम्=बहुवचनम् ।

सकेगा ? अतः कार्यासिद्धपक्ष में प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र के बल से भावी असिद्ध कार्य कर चुकने पर पश्चात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से वह पूर्व की दृष्टि में असिद्ध होगा अन्यथा नहीं। इस पक्ष में 'अद + अम्' यहां प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (३१) द्वारा पूर्वरूप की अपेक्षा पर होने से उत्व-मत्व होकर—'अमु + अम्' बन जायगा। तदनन्तर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा मुकार्य को पूर्वरूप की दृष्टि में असिद्ध माना जायगा। अब इस मुकार्य के असिद्ध मान जाने पर भी पूर्वरूप नहीं हो सकेगा, क्योंकि- देवदत्तस्य हन्तरि हते देवदत्तस्य पुनरुन्मज्जनं न भवति अर्थात् देव- दत्त के हन्ता के मारे जाने पर भी देवदत्त की पुनरुत्पत्ति नहीं हो सकती। इस न्याया- नुसार 'द' के हन्ता 'मु' के असिद्ध होने पर भी पुनः 'द' नहीं आ सकेगा, क्योंकि उस का तो विनाश हो चुका है। इस प्रकार 'द' के न आने से अक् नहीं मिलेगा तब अमि पूर्वः (१३५) द्वारा पूर्वरूप न हो सकेगा। अतः यह पक्ष ठीक नहीं। अब यदि शास्त्रासिद्धपक्ष स्वीकार करते हैं तो इस पक्ष में दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा परशास्त्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। इस से पूर्वके सवासप्त अध्यायों के सूत्रों की दृष्टि में वह सूत्र नहीं रहता, उस के न रहने से विप्रतिषेध नहीं हो सकता, क्योंकि विप्रतिषेध वहां होता है जहां अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाश सूत्र परस्पर की दृष्टि में भावात्मक होते हुए एक स्थान पर प्राप्त हों। यहां पूर्व की दृष्टि में पर सूत्र अभावात्मक होने से वर्तमान नहीं रहता अतः प्रथम पूर्वसूत्र प्रवृत्त होता है और तदनन्तर असिद्ध सूत्र। इस प्रकार इस पक्ष के स्वीकार करने में 'अद + अम्' यहां पर अदसोऽसे ० तथा अमि पूर्वं इन दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा अमि पूर्वं (६।१।१०२) की दृष्टि में अदसोऽसे० (८।२।८०) सूत्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। अतः प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' हो जाने पर पश्चात् उत्व-मत्व करने से 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार कोई दोष उत्पन्न नहीं होता। अतः पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र में शास्त्रासिद्धपक्ष ही स्वीकार करना चाहिये, कार्यासिद्ध नहीं। अत एव ग्रन्थकार ने भी पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र की वृत्ति में इसी पक्ष का अनुमोदन किया है—'सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रम् असिद्धम्” । विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र पर भी यही स्वीकार किया है—"पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वाद् रुत्वमेव”। भाष्यकार भी इसी पक्ष के पक्षपाती हैं—पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधोऽभावादुत्तरस्य। इस विषय पर अन्य विस्तृत विचार व्याकरण के उच्चग्रन्थों में देखें। अदस् + अस् (शस्)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + अस्। अब अदसोऽसे ० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिवत्कार्य—पूर्वसवर्णदीर्घ और शस् के सकार को नकार करने से—'अदान्'। अब अदसोऽसे ० (३५६) से दकारोत्तर आकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर 'अमूंन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + आ (टा)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + आ। अब यहां

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७७ यद्यपि अदसोऽसेः० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिकार्य अर्थात् टाङसिँ- ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से टा को इन आदेश प्राप्त होता है तथापि न मु ने (३५८) सूत्र के आरम्भसामर्थ्य से¹ वह नहीं होता; अतः अदसोऽसेः० (३५६) से दकारोत्तर अकार को उकार तथा दकार को मकार हो जाता है अमु+आ। अब यहां 'मु'- भाव के असिद्ध होने से शेषो घ्यसखि (१७०) द्वारा घिसञ्ज्ञा नहीं हो सकती, और बिना घिसञ्ज्ञा के आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) सूत्र से टा को ना नहीं हो सकता; पर हमें 'ना' करना अभीष्ट है। अतः 'मु' भाव को सिद्ध करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है – [लघु०] निषेध-सूत्रम्— (३५८) न मु ने ॥८।२।३॥ 'ना'भावे कर्तव्ये कृते च 'मु'भावो नाऽसिद्धः। अमुना। अमूभ्याम् ३। अमीभिः। अमुष्मै। अमीभ्यः २। अमुष्मात्। अमुष्य। अमुयोः २। अमी- षाम्। अमुष्मिन्। अमीषु ॥ अर्थः—'ना' आदेश करना हो या कर चुके हों तो 'मु' आदेश असिद्ध नहीं होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। मु। १।१। ने ।७।१। असिद्धम् ।१।१। (पूर्वत्रा- सिद्धम् से)। समासः—म् च उश्च = मु। समाहारद्वन्द्वः । 'ने' यह ना-शब्द के सप्तमी का एकवचन है—ना+ङि=ना+इ=ने। यहां परसप्तमी या विषयसप्तमी समझनी चाहिये । अर्थः—(ने) 'ना' के विषय में अथवा 'ना' परे होने पर (मु) 'मु' आदेश (असिद्धम्) असिद्ध (न) नहीं होता । 'अमु+आ' यहां ना के विषय में 'मु' आदेश असिद्ध न हुआ तो घिसञ्ज्ञा होकर आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा को ना करने पर—'अमुना' प्रयोग सिद्ध हुआ। सूचना—ध्यान रहे कि 'अमुना' में 'ना' के परे होने पर 'मु' आदेश के असिद्ध होने से सुपि च (१४१) द्वारा दीर्घ प्राप्त होता है। वह भी न मु ने (३५८) से 'मु' आदेश के सिद्ध हो जाने पर नहीं होता। इसीलिये तो 'ने' में दो प्रकार की सप्तमी स्वीकार कर के 'ना करने में या ना परे होने पर' ऐसा अर्थ किया गया है। अदस्+भ्याम्। त्यदाद्यत्व और पररूप करने पर सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है—अदाभ्याम्। अब अदसोऽसेः० (३५६) से ऊत्व-मत्व करने से— 'अमूभ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस्+भिस्। त्यदाद्यत्व और पररूप कर 'अद+भिस्'। इस अवस्था में १. यदि यहाँ टा को इन कर दें तो न मु ने (३५८) सूत्र बनाने का कुछ प्रयोजन नहीं रहता। अतः इस का बनाना तभी सार्थक किया जा सकता है जब 'इन' आदेश न होकर 'मु' हो जाये। यही इस का आरम्भसामर्थ्य है।

अतो भिस ऐस् (१४२) प्राप्त होता है, परन्तु उस का नेदमदसोरको (२७६) से निषेध हो जाना है । अब बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एकारादेश कर एत ईद् बहुवचने (३५७) से एकार को ईकार तथा दकार को मकार करने से—'अमीभि' प्रयोग सिद्ध होता है । अदम् + ए(ङे) । त्यदाद्यत्व, पररूप, सर्वनाम्न स्मै (१५३) से ङे को स्मै, मुत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) स षत्व होकर—अमुष्मै । अदस् + भ्यस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व मत्व होकर—अमीभ्य । अदम् + अस् (ङसिँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा ङसिङ्यो स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'स्मात्' आदेश उत्व-मत्व तथा षत्व होकर —अमुष्मात् । अदस् + थस (ङस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाङसिङसामिनात्स्या (१४०) से स्य आदेश, उत्व मत्व तथा षत्व होकर—अमुष्य । अदस् + ओस । त्यदाद्यत्व पररूप, ओसि च (१४७) मे एत्व, एचोऽयवा- याव (२२) मे अय आदेश होकर —अदयो । अब उत्व-मत्व होकर—अमुयो । अदस् + आम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, आमि सर्वनाम्न सुँट् (१५५) से सुँट् आगम, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) मे ईत्व-मत्व और षत्व करने से—'अमीषाम्' प्रयोग सिद्ध होना है । अदम् + इ (ङि) । त्यदाद्यत्व, पररूप, ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) मे ङि को स्मिन्, मु आदेश तथा षत्व करने पर—अमुष्मिन् । अदस + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व-मत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व करने पर—अमीषु । अदस् (वह) शब्द की पुंलिङ्ग मे रूपमाला यथा— प्र० असौ अमू अमी | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्य द्वि० अमुम् ,, अमून् | ष० अमुष्य अमुयो अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभि | स ० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । (यहां सकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इति हलन्ता पुंलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ —यहा हलन्त पुंलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं । अभ्यास (४६) (१) (क) 'विद्वान्' मे वसुंस्त्रसुं० द्वारा दत्व क्यो नहीं होता ? (ख) 'विद्वांसौ' मे अनुस्वार को परसवर्ण क्यो नही होता ? (ग) 'अनेहम्' को असुंमन्त मानने मे क्या दोष है ?