भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

अथ हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् [लघु०] स्वमोर्लुक्। दत्वम्। स्वनडुत्, स्वनडुद्। स्वनडुही। चतुरनडुहो ० (२५६) इत्याम्। स्वनड्वांहि। पुनस्तद्वत्¹। शेषं पुंवत् ॥ व्याख्या—स्वनडुह् (अच्छे बैलों वाला कुल वा क्षेत्र आदि)। सु—शोभना, अनड्वाह = वृषभा यस्य तत् स्वनडुत्। यहां 'सु' और 'अनडुह्' का बहुव्रीहिसमास होता है। समाससञ्ज्ञा होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) द्वारा प्रातिपदिक- सञ्ज्ञा होकर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। स्वनडुह् + सु (सुं) : यहां हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) द्वारा सुं लोप प्राप्त होता है। परन्तु अपवाद होने के कारण उस का बाध कर स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) द्वारा सुं का लुक् हो जाता है। पुनः प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) द्वारा पदसञ्ज्ञा² हो जाने से वसुस्रंसु० (२६२) सूत्र से हकार को दकार³ तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-दकार होकर—'स्वनडुत्, स्वनडुद्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। स्वनडुह् + औ। यहां नपुंसकाच्च (२३५) सूत्र से 'औ' को 'शी' आदेश हो कर अनुबन्धलोप करने से—स्वनडुही। स्वनडुह् + जस्। यहां जश्शसोः शि (२३७) से जस् को शि आदेश, शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, चतुरनडुहोरामुदात्तः (२५६) से आम् का आगम तथा नपुंसकस्य झलच (२३६) से नुम् का आगम होकर—'स्व- नडु आन् ह् + इ'। अब इको यणचि (१५) से यण् और नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार करने से—'स्वनड्वांहि' प्रयोग सिद्ध होता है। स्वनडुह् + अम्। यहां भी स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक्, पदान्त में हकार को दकार तथा वैकल्पिक चर्त्व करने से—स्वनडुत्, स्वनडुद्। औट् में औ की तरह तथा शस् में जस् की तरह रूप बनते हैं। शेष विभक्तियों में पुंवत् (पुंल्लिङ्ग की तरह) रूप होते हैं। 'स्वनडुह्' की रूपमाला यथा— १ पुनः उसी प्रकार अर्थात् द्वितीया विभक्ति के रूप भी प्रथमाविभक्ति के समान होते हैं। क्योंकि नपुंसक में सुं के समान अम् का भी लुक् हो जाता है। 'औ' तथा 'औट्' में तो कोई अन्तर ही नहीं, और शस् को भी जस् के समान 'शि' आदेश होता है। यह नियम प्रायः सर्वत्र नपुंसक में प्रयुक्त होता है। २ ध्यान रहे कि पदसञ्ज्ञा अङ्गकार्य नहीं क्योंकि यह अङ्ग (प्रकृति) और प्रत्यय दोनों की समुदाय संज्ञा है। अतः पदसञ्ज्ञा करने से न लुमताङ्गस्य (१६१) द्वारा प्रत्ययलक्षण का निषेध नहीं होता। ३. वसुस्रंसु० (२६२) यह अङ्गाधिकारस्थ कार्य है, अतः यह तदन्त में भी प्रवृत्त होता है। देखें पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (५०)।