लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 521, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या—अभ्यस्तात् ।५।१। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। नपुंसकस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। नुँम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से)। अर्थ—(अभ्य- स्तात्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे (शतुः) जो शतृँ प्रत्यय, तदन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प कर के (नुँम्) नुँम् हो जाता है (सर्वनाम- स्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो। ददत् + इ। यहां 'शि' यह सर्वनामस्थान परे है, अभ्यस्त होने से'नाभ्यस्ताच्छतुः (३४५) से नुँम्निषेध प्राप्त था, पर नपुंसकत्व में प्रवृत्तसूत्र से विकल्प से नुँम् का आगम होकर अनुस्वार-परसवर्ण करने से—'ददन्ति, ददति' ये दो रूप बनते हैं। नपुं- सक में 'ददत्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ददत्,-द् ददती ददन्ति,ददति पं० ददतः ददद्भ्याम् ददद्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, ष० ,, ददतोः ददताम् तृ० ददता ददद्भ्याम् ददद्भिः स० ददति ,, ददत्सु च० ददते ,, ददद्भ्यः सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है। [लघु०] तुदन् ॥ व्याख्या—तुदत् (दुःख देता हुआ कुल आदि)। शत्रन्त। तुदँ व्यथने (तुदा० उभं०) धातु से शतृँ प्रत्यय, उस की सार्वधातुकसञ्ज्ञा, तुदादिभ्यः शः (६५१) से श प्रत्यय, अनुबन्धलोप और अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने से—'तुदत्' शब्द निष्पन्न होता है। तुदत्+सुँ। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व करने से—तुदत्, तुदद्। तुदत्+औ=तुदत्+ई (शी)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधिसूत्रम्—(३६५) आच्छीनद्योर्नुम् ।७।१।८०॥ अवर्णान्तादङ्गात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुँम् वा शीनद्योः। तुदन्ती, तुदती। तुदन्ति॥ अर्थः—अवर्णान्त अङ्ग से परे जो शतृँ प्रत्यय का अवयव तदन्त अङ्ग को विकल्प करके नुँम् का आगम हो जाता है शी या नदी परे हो तो। व्याख्या—आत् ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति- विपरिणाम हो जाता है)। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। अङ्गस्य ।६।१। (अधि- कृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। (वा नपुंसकस्य से)। नुँम् ।१।१। शीनद्योः ।७।२। 'आत्' यह 'अङ्गात्' का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि हो कर 'अवर्णान्तात्' बन जाता है। अर्थः—(आत्=अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (शतुः) जो शतृँ- प्रत्यय का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प करके (नुँम्) नुँम् हो जाता है (शीनद्योः) शी और नदी परे हो तो। 'नदी' से यहां ङीप् आदि इष्ट हैं।