भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०७ तुदत् + ई । यहां 'तुद्' यह अवर्णान्त अङ्ग है, इस से परे 'त्' यह शतृँ का अवयव है । तदन्त अङ्ग 'तुदत्' है । इस से परे शी के रहने से विकल्प कर के नुँम् का आगम हो जाता है । नुँम्-पक्ष में अनुस्वार परसवर्ण प्रक्रिया करने पर—तुदन्ती । नुँम् के अभाव में—तुदती । तुदत् + जस् = तुदत् + शि । सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर झलन्त होने से नपुंस- कस्य झलचः (२३६) ने नुँम् का आगम हो कर अनुस्वार-परसवर्ण-प्रक्रिया करने से—'तुदन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० तुदत्-द् तुदन्ती,तुदती तुदन्ति | प० तुदतः तुदद्भ्याम् तुदद्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, तुदतोः तुदताम् तृ० तुदता तुदद्भ्याम् तुदद्भिः | स० तुदति ,, तुदत्सु च० तुदते ,, तुदद्भ्यः | सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है । प्रकृतसूत्र से भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि शत्रन्त तथा अदादिगण की 'या, पा' आदि आकारान्त शत्रन्त धातुओं से तथा स्य के आगे शतृँ प्रत्यय होने पर नपुं- सक के द्विवचन शी में अङ्ग को वैकल्पिक नुँम् का आगम प्राप्त होता है । इस पर भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्त धातुओं को अग्रिमसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६६) शप्श्यनोर्नित्यम् ७।१।८१॥ शप्श्यनोरात् परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नित्यं नुँम् शीनद्योः । पचन्ती । पचन्ति । दीव्यत् । दीव्यन्ती । दीव्यन्ति ॥ अर्थः– शप् वा श्यन् के अवर्ण से परे जो शतृँप्रत्यय का अवयव (त्), तदन्त अङ्ग को नित्य नुँम् का आगम हो जाता है शी अथवा नदी¹ परे हो तो । व्याख्या—शप्श्यनोः ।६।२। आत् ।५।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । नित्यम् ।२।१। (क्रिया- विशेषणम्) । नुँम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः–(शप्श्यनोः) शप् वा श्यन् के (आत्) अवर्ण से परे (शतुः) जो शतृँ का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (नित्यम्) नित्य (नुँम्) नुँम् हो जाता है (शीनद्योः) शी अथवा नदी परे हो तो । भ्वादि और चुरादिगण में शप् तथा दिवादिगण में श्यन् विकरण हुआ करता है। भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्तों की इस सूत्र से शी या नदी (ङीप् आदि) परे होने पर नित्य नुँम् का आगम हो जाता है । पचत् (पकाता हुआ कुल आदि) । पच् (डुपचँष् पाके) यह भ्वादिगणीय उभयपदी धातु है । इस से परे लँट् को शतृँप्रत्यय तथा शप् विकरण हो कर—पच् शप् १. नदी के उदाहरण 'भवन्ती, दीव्यन्ती' आदि हैं ।