भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 633 में से

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पृष्ठ 523

५०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

शतृँ = पच् अ अत् । अब यहां यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् (१३३) सूत्र द्वारा पच् + अ = 'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा होकर अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने से 'पचत्' शब्द निष्पन्न होता है । पचत् + औ = पचत् + ई (शी) । यहां अन्तादिवच्च (४१) की सहायता से 'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है । इस से परे 'त्' यह शतृँ-प्रत्यय का अवयव है, तदन्त अङ्ग 'पचत्' है । इस से परे 'शी' के रहने से प्रकृतसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया हो जाती है—पचन्ती । पचत् + जस् = पचत् + शि । झलन्त होने से नुँम् का आगम और पूर्ववत् अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—'पचन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है । 'पचत्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा— प्र० पचत्-द् पचन्ती पचन्ति । प० पचतः पचद्भ्याम् पचद्भ्यः द्वि० „ „ „ । ष० „ पचतोः पचताम् तृ० पचता पचद्भ्याम् पचद्भिः । स० पचति „ पचत्सु घ० पचते „ पचद्भ्यः । सं० हे पचत्-द् ! पचन्ती ! पचन्ति ! इसी प्रकार—गच्छत् (जाता हुआ), चलत् (चलता हुआ), भवत् (होता हुआ), नयत् (ले जाता हुआ), नमत् (नमस्कार करता हुआ), वदत् (बोलता हुआ) इत्यादि भ्वादिगणीय तथा चोरयत् (चुराता हुआ) प्रभृति चुरादिगणीय धातुओं के रूप भी समझ लेने चाहियें । दीव्यत् (खेलता हुआ वा चमकता हुआ कुल आदि) दिवुँ क्रीडाविजिगीषा० (दिवा० प०) धातु से लँट्, शतृँ प्रत्यय तथा श्यन् विकरण होकर—दिव् + श्यन् + शतृँ = दिव् य अत् । अब हलि च (६१२) से उपधादीर्घ तथा अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने पर 'दीव्यत्' शब्द निष्पन्न होता है । दीव्यत् + औ = दीव्यत् + ई (शी) । यहां श्यन् के यकारोत्तर अवर्ण से परे शतृँ का अवयव तकार विद्यमान है, अतः तदन्त 'दीव्यत्' को शी परे होने पर नित्य नुँम् का आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—दीव्यन्ती । जस् में पूर्ववत्—दीव्यन्ति । 'दीव्यत्' की नपुंसक में रूपमाला यथा-- प्र० दीव्यत्-द् दीव्यन्ती दीव्यन्ति । प० दीव्यतः दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भ्यः द्वि० „ „ „ । ष० „ दीव्यतोः दीव्यताम् तृ० दीव्यता दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भिः । स० दीव्यति „ दीव्यत्सु च० दीव्यते „ दीव्यद्भ्यः । सं० हे दीव्यत्-द् ! दीव्यन्ती ! दीव्यन्ति ! इसी प्रकार—सीव्यत् (सीता हुआ), अस्यत् (फेंकता हुआ), कुप्यत् (क्रोध करता हुआ), शुष्यत् (शुद्ध होता हुआ) इत्यादि दिवादिगणीय शत्रन्तों के रूप होते हैं । शत्नन्तों पर विशेष स्मरणीय— (१) अभ्यस्तसञ्ज्ञक शब्द। इस श्रेणी में ददत्, दधत्, जुह्वत्, बिभ्यत्,

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