भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६१ चाहिये। जैसे वर्णों से स्वार्थ में 'कार' प्रत्यय लगाया जाता है (अकार, इकार, उकार, ककार आदि) वैसे धातुओं के निर्देश करने में भी 'इ' (इक्) या 'ति' (शित्प्) लगाये जाते हैं। यथा- गमि व गच्छति, एधि व एधते, चलि व चलति आदि। इन सब का तात्पर्य गम्, एध्, चल् आदि मूल धातुओं से ही होता है। [लघु०] वा०- (४) अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ॥ अक्षौहिणी सेना ॥ अर्थः- 'अक्ष' शब्द के अन्त्य अवर्ण से 'ऊहिनी' शब्द का आदि ऊकार परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। ऐसा अधिक-वचन करना चाहिये। व्याख्या- (अक्षात् ।५।१।) 'अक्ष' शब्द से (ऊहिन्याम् ।७।१।) 'ऊहिनी' शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है; ऐसा (उपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्) अधिक-वचन करना चाहिये। ध्यान रहे कि इस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' की अनुवृत्ति होने से सर्वत्र पूर्व में अवर्ण और पर में अच् का ग्रहण होता है। उदाहरण यथा - 'अक्षौहिणी'। 'अक्ष + ऊहिनी' (अक्षाणाम् ऊहिनीति षष्ठीतत्पुरुष-समासः) यहां 'अ + ऊ' का स्थान 'कण्ठ + ओष्ठ' होने से तादृश-स्थान वाला 'औ' वृद्धि एकादेश हो - अक्ष् 'औ' हिनी = 'अक्षौहिणी' बना। अब पूर्व-पदात् सञ्ज्ञायामगः (८.४.३) सूत्र से नकार को णकार आदेश करने से 'अक्षौहिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां गुण की प्राप्ति में वृद्धि कही गई है अतः यह वार्त्तिक गुण का अपवाद है। [लघु०] वा०- (५) प्राद् ऊहोढोढ्येपैष्येषु ॥ प्रौहः। प्रौढः। प्रौढिः। प्रैषः। प्रैष्यः॥ अर्थः- 'प्र' शब्द के अन्त्य अवर्ण से ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्दों का आदि अच् परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या-प्रात् ।५।१। ऊहोढोढ्येपैष्येषु ।७।३। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। समासः-ऊहश्च ऊढश्च ऊढिश्च एषश्च एष्यश्च तेषु = ऊहोढोढ्येपैष्येषु। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः- (प्रात्) 'प्र' शब्द से (ऊहोढोढ्येपैष्येषु) ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्द परे १. 'अक्षौहिणी' विशेष परिमाण वाली सेना कहाती है। इस का परिमाण यथा- अक्षौहिण्याः प्रमाणं तु खाङ्गाष्टैकद्विकैर्गजैः। रथैरैतैर्हयैस्त्रिघ्नैः पञ्चघ्नैश्च पदातिभिः ॥ २१८७० हाथी ⎫ · २१८७० रथ ⎪ अक्षौहिणी ६५६१० घोड़े (रथवाहकों से अतिरिक्त) ⎬ सेना · १०९३५० पैदल ⎭