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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६१ चाहिये। जैसे वर्णों से स्वार्थ में 'कार' प्रत्यय लगाया जाता है (अकार, इकार, उकार, ककार आदि) वैसे धातुओं के निर्देश करने में भी 'इ' (इक्) या 'ति' (शित्प्) लगाये जाते हैं। यथा- गमि व गच्छति, एधि व एधते, चलि व चलति आदि। इन सब का तात्पर्य गम्, एध्, चल् आदि मूल धातुओं से ही होता है। [लघु०] वा०- (४) अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ॥ अक्षौहिणी सेना ॥ अर्थः- 'अक्ष' शब्द के अन्त्य अवर्ण से 'ऊहिनी' शब्द का आदि ऊकार परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। ऐसा अधिक-वचन करना चाहिये। व्याख्या- (अक्षात् ।५।१।) 'अक्ष' शब्द से (ऊहिन्याम् ।७।१।) 'ऊहिनी' शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है; ऐसा (उपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्) अधिक-वचन करना चाहिये। ध्यान रहे कि इस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' की अनुवृत्ति होने से सर्वत्र पूर्व में अवर्ण और पर में अच् का ग्रहण होता है। उदाहरण यथा - 'अक्षौहिणी'। 'अक्ष + ऊहिनी' (अक्षाणाम् ऊहिनीति षष्ठीतत्पुरुष-समासः) यहां 'अ + ऊ' का स्थान 'कण्ठ + ओष्ठ' होने से तादृश-स्थान वाला 'औ' वृद्धि एकादेश हो - अक्ष् 'औ' हिनी = 'अक्षौहिणी' बना। अब पूर्व-पदात् सञ्ज्ञायामगः (८.४.३) सूत्र से नकार को णकार आदेश करने से 'अक्षौहिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां गुण की प्राप्ति में वृद्धि कही गई है अतः यह वार्त्तिक गुण का अपवाद है। [लघु०] वा०- (५) प्राद् ऊहोढोढ्येपैष्येषु ॥ प्रौहः। प्रौढः। प्रौढिः। प्रैषः। प्रैष्यः॥ अर्थः- 'प्र' शब्द के अन्त्य अवर्ण से ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्दों का आदि अच् परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या-प्रात् ।५।१। ऊहोढोढ्येपैष्येषु ।७।३। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। समासः-ऊहश्च ऊढश्च ऊढिश्च एषश्च एष्यश्च तेषु = ऊहोढोढ्येपैष्येषु। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः- (प्रात्) 'प्र' शब्द से (ऊहोढोढ्येपैष्येषु) ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्द परे १. 'अक्षौहिणी' विशेष परिमाण वाली सेना कहाती है। इस का परिमाण यथा- अक्षौहिण्याः प्रमाणं तु खाङ्गाष्टैकद्विकैर्गजैः। रथैरैतैर्हयैस्त्रिघ्नैः पञ्चघ्नैश्च पदातिभिः ॥ २१८७० हाथी ⎫ · २१८७० रथ ⎪ अक्षौहिणी ६५६१० घोड़े (रथवाहकों से अतिरिक्त) ⎬ सेना · १०९३५० पैदल ⎭

६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एव) एक (वृद्धि) वृद्धि आदेश हो । उदाहरण यथा - प्र+ऊह = प्र् 'औ' ह = 'प्रौहः' । [ उत्तम तर्क वा उत्तम तर्क करने वाला ] प्र+ऊढ = प्र् 'औ' ढ = 'प्रौढः' । [ बढ़ा हुआ वा अधेड़ ] प्र+ऊढि = प्र् 'औ' ढि = 'प्रौढिः' । [ प्रौढ़ता व शेखी ] प्र+एष = प्र् 'ऐ' ष = 'प्रैषः' । [ प्रेरणा, घञन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्र+एष्य = प्र् 'ऐ' ष्य = 'प्रैष्यः' । [ प्रेरणीय, सेवक, ण्यदन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्रैष, प्रैष्य यहां एङि पररूपम् (३८) से पररूपम् प्राप्त था शेष स्थानों पर आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण प्राप्त था । यह वार्त्तिक इन दोनों का अपवाद है । [लघु०] वा०- (६) ऋते च तृतीया-समासे ॥ सुखेन ऋतः = सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमर्तः ॥ अर्थ - तृतीया-समास में अवर्ण से ऋत शब्द का आदि ऋवर्ण परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है । व्याख्या-आत् ।५।१। (आद् गुण सूत्र से) । ऋते ।३।१। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । तृतीया-समासे ।७।१। अर्थ - (तृतीया समासे) तृतीया-तत्पुरुष-समास में (आत्) अवर्ण से (ऋते) 'ऋत' शब्द परे होने पर (च) भी (पूर्व परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा - 'सुखेन ऋतः' यह लौकिक-विग्रह है । अलौकिक-विग्रह अर्थात् 'सुख टा ऋत सुँ' में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र द्वारा टा और सुँ का लुक् हो जाने पर 'सुख+ऋत' ऐसा बनता है । अब इस वार्त्तिक से पूर्व-अवर्ण और पर = ऋवर्ण के स्थान पर वृद्धि करनी है । 'अ+ऋ' का स्थान 'कण्ठ+मूर्धा' है । कण्ठ+मूर्धा' स्थान वाला वृद्धि-संज्ञकों में कोई नहीं, सब का 'कण्ठ' स्थान ही तुल्य है । अब यदि 'आ' यह वृद्धि एकादेश करें तो उरण्रपरः (२६) सूत्र से रपर होकर 'आर्' हो जाने से 'कण्ठ+मूर्धा' स्थान तुल्य हो जायेगा । तो ऐसा करने से—सुख् 'आर्' त् = 'सुखार्तः' प्रयोग हो कर विभक्ति लाने से 'सुखार्तः' सिद्ध हो जाता है । इस का अर्थ— सुख से प्राप्त हुआ अर्थात् सुखी है । अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि अवर्ण से 'ऋत' परे होने पर वृद्धि का विधान समास में तो करना ही चाहिये, क्योंकि 'सुखेन+ऋतः' यहां लौकिक- विग्रह में वृद्धि न हो कर गुण एकादेश होने से 'सुखेतर्तः' प्रयोग बन सके । परन्तु 'तृतीया का ही समास हो अन्य विभक्तियों का न हो' इस कथन का क्या प्रयोजन है? क्यों समास मात्र में ही वृद्धि का विधान न कर दिया जाये ? इस का उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि यदि 'तृतीया' न कहेंगे, समास-मात्र में ही वृद्धि विधान करेंगे तो 'परमश्चासौ ऋतः = परम+ऋतः' यहां गुण न हो कर वृद्धि हो जायेगी, क्योंकि समास

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३ तो यहां भी है। अब यहां कर्मधारय-समास में गुण हो कर 'परमर्तः' यह इष्ट प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'परमर्तः' का अर्थ 'मुक्त' है। [लघु०] वा०- (७) प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ऋणे ॥ प्रार्णम् । वत्सतरार्णम् इत्यादि ॥ अर्थः-प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन छः शब्दों के अन्त्य अवर्ण से परे 'ऋण' शब्द का आदि ऋवर्ण होने पर पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या- प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ।६।३। (यहां पञ्चमी-विभक्ति के स्थान पर षष्ठी-विभक्ति समझनी चाहिये)। ऋणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। अर्थः-(प्र- वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम्) प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन शब्दों से (ऋणे) ऋण शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा- (१) प्र+ऋण = प्र् 'आर्' ण = 'प्रार्णम्' [अधिक व उत्तम ऋण] । (२) वत्सतर+ऋण = वत्सतर् 'आर्' ण = 'वत्सतरार्णम्' [बछड़े के लिये ऋण] । (३) कम्बल+ऋण = कम्बल् 'आर्' ण = 'कम्बलार्णम्' [कम्बल का ऋण] । (४) वसन+ऋण = वसन् 'आर्' ण = 'वसनार्णम्' [कपडे का ऋण] । (५) ऋण+ऋण = ऋण् 'आर्' ण = 'ऋणार्णम्' [ऋण चुकाने के लिये ऋण] । (६) दश+ऋण = दश् 'आर्' ण = 'दशार्णः' [दश प्रकार के जल वाला देश-विशेष] । ध्यान रहे कि अन्तिम उदाहरण में बहुव्रीहि-समास है। इस में 'दशन्' के नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से लोप हो जाता है। यह वार्त्तिक भी गुण एकादेश का अपवाद है। अभ्यास (७) (१) निम्नस्थ रूपों में उत्सर्गनिर्देशपूर्वक ससूत्र सन्धि करें- १. विश्वौहः। २. प्रौहः। ३. भारीहः। ४. अवैति। ५. अभ्युपैति। ६. ऋणार्णम्। ७. उपैता (तृच्)। ८. अवैधते। ९. प्रौढिः। १०. अक्षौहिणी। ११. प्रैति। १२. ममैधते। १३. दशार्णः। १४. प्रेष्यः। १५. प्रैथे। १६. दुःखार्तः। (२) एत्येधत्यूठ्सु सूत्र में 'एजादि' ग्रहण क्यों किया जाता है? (३) ऋते च तृतीया-समासे में तृतीया-ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (४) 'अक्षौहिणी' सेना का परिमाण बताओ। (५) एति और एधति में 'ति' ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (६) 'उपसङ्ख्यान' शब्द का क्या अर्थ होता है? (७) एत्येधत्यूठ्सु, प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु, अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ये सूत्र या वार्त्तिक किन २ के अपवाद हैं? सोदाहरण समझाइये।

६४ || भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् — (३५) उपसर्गाः क्रिया-योगे ।१।४।५८॥ प्रादयः क्रिया-योगे उपसर्ग-सञ्ज्ञाः स्युः । १ प्र । २ परा । ३ अप । ४ सम् । ५ अनु । ६ अव । ७ निस्¹ । ८ निर् । ९ दुस् । १० दुर् । ११ वि । १२ आङ् । १३ नि । १४ अधि । १५ अपि । १६ अति । १७ सु । १८ उद् । १९ अभि । २० प्रति । २१ परि । २२ उप—एते प्रादयः ॥ अर्थ — क्रिया-योग में प्रादि 'उपसर्ग' सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (इसी सूत्र का अंश, जिसे योग-विभाग करके भाष्य- कार ने अलग किया है) । उपसर्गाः ।१।३। क्रिया-योगे ।७।१। समास —'प्र'शब्द आदि- र्येषान्ते प्रादयः । तद् गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि समास [इस समास का विवेचन (१३३) सूत्र पर देखें] । क्रियया योगः =क्रिया-योगः, तस्मिन् क्रिया-योगे । तृतीया-तत्पुरुष- समास । अर्थ — (क्रिया-योगे) क्रिया के साथ अन्वित होने पर (प्रादयः) 'प्र' आदि २२ शब्द (उपसर्गाः) उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं । यह सूत्र प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधिकार में पढ़ा गया है, अतः इन की निपात-सञ्ज्ञा भी साथ ही समझ लेनी चाहिये । निपात-सञ्ज्ञा का प्रयोजन 'अव्यय' बनाना है [देखें —स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७)] । प्रादि कौन २ से हैं ? इस का ज्ञान गण-पाठ से होता है । मूल में प्रादि- गण दे दिया गया है । गण-पाठ महामुनि पाणिनि ने रचा है । प्रादि-गण पर विशेष विचार आगे यत्र तत्र बहुत किया जायेगा । नोट — प्रादि-गण में 'उद्' के स्थान पर 'उत्' पाठ प्रायः सब लघुकौमुदियों तथा सिद्धान्तकौमुदियों में देखा जाता है पर वह अशुद्ध है, क्योंकि उदश्चरः सकर्म- कात् (७३६), उदि कूले रुजिवहोः (३.२.३१), उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) इत्यादि पाणिनि-सूत्रों से इस के दकारान्त होने का ही निश्चय होता है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् —(३६) भूवादयो धातवः ।१।३।१॥ क्रिया-वाचिनो भ्वादयो धातु-सञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थ —क्रिया के वाचक 'भू' आदि धातु-सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—भूवादयः ।१।३। धातवः ।१।३। समास —भूश्च वाश्च भूवौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । वा गति-गन्धनयोः इत्यादादिको धातुः । आदिश्च आदिश्च =आदी । भूवौ आदी येषां ते भूवादयः, बहुव्रीहि-समास । प्रथम आदि-शब्द प्रभृति-वचन, द्वितीय


१ कई लोग यहां शङ्का किया करते हैं कि निस् और निर् में तथा दुस् और दुर् में किसी एक का ही पाठ उपसर्गों में करना चाहिये दोनों का नहीं, क्योंकि सान्त भी सर्वत्र ससजुषो रुः (८.२.६६) से रेफान्त ही हो जाया करते हैं । इस का समाधान यह है कि निस्, दुस् में जो सकार को रुँ होता है, उससे असिद्ध होने से प्राप्त कार्य नहीं हो पाते, जैसे —'निरयते, दुरयते' में उपसर्गादयतौ (८.२.१९) से लत्व नहीं होता, क्योंकि उस की दृष्टि में 'र्' असिद्ध है । 'निर्, दुर्' में लत्व हो जाता है—'निलयते, दुलयते' । इस लिये इन्हें भिन्न २ पढ़ा गया है ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५ वादि-शब्दः प्रकार-वचनः । भू-प्रभृतयो वा-सदृशा इत्यर्थः । वा—धातुना सादृश्यं क्रिया- वाचकत्वेनैव बोध्यम् । अर्थः—(भू-वादयः) क्रिया-वाची भ्वादि (धातवः) धातु- संज्ञक हों । क्रिया काम को कहते हैं । खाना, पीना, उठना, बैठना, करना आदि क्रियाएं हैं । क्रिया अर्थ वाले भ्वादि [यहां केवल भ्वादि-गण ही नहीं समझना चाहिये, अपितु समग्र धातु-पाठ का ग्रहण करना चाहिये] धातु-संज्ञक होते हैं । यहां यदि क्रिया-वाची नहीं कहते तो 'याः पश्यति' (जिन स्त्रियों को देखता है) यहां 'या+शस्' में आतो धातोः (१६७) से आकार का अनिष्ट लोप प्राप्त होता है, क्योंकि भ्वादियों में 'या' का पाठ देखा जाता है । अब क्रिया-वाची कहने से यह दोष नहीं आता; क्योंकि यहां 'या' का अर्थ क्रिया नहीं अपितु 'जो' है । यह टावन्त सर्वनाम है । अब अग्रिम-सूत्र में उपसर्ग और धातु-संज्ञा का फल बतलाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३७) उपसर्गाद् ऋति धातौ ।६।१।८८॥ अवर्णान्तादुपसर्गाद् ऋकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । प्रार्च्छति ॥ अर्थः —अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है) । उपसर्गात् ।५।१। ऋति ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने के कारण यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा इस में तदादि-विधि हो जाती है) । धातौ ।७।१। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः (आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (ऋति= ऋकारादौ) ऋकारादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— प्रार्च्छति (जाता है) । 'प्र+ऋच्छति' यहां 'ऋच्छ्' (भ्वा० वा तुदा०) यह गमनक्रिया-वाची होने से भूवादयो धातवः (३६) के अनुसार धातु-संज्ञक है; इस के साथ योग होने के कारण उपसर्गाः क्रिया-योगे (३५) सूत्र द्वारा 'प्र' की उपसर्ग-संज्ञा हो जाती है । तो अब 'प्र' इस अवर्णान्त उपसर्ग से 'ऋच्छ्' यह ऋकारादि धातु परे वर्त्तमान है, अतः उरण्रपरः (२६) की सहायता से उपसर्गादृति धातौ (३७) द्वारा पूर्व=अ और पर=ऋ के स्थान पर 'आर्' यह एक वृद्धि आदेश हो कर—प् र् 'आर्' च्छति='प्रार्च्छति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र भी आद् गुणः (२७) द्वारा प्राप्त गुण एकादेश का अपवाद समझना चाहिये । अभ्यास (८) (१) प्रादि-गण में कितने अजन्त और कितने हलन्त शब्द हैं ? (२) प्रादि-गण में 'उत्' अथवा 'उद्' कौन सा पाठ युक्त है; सप्रमाण लिखें ? (३) 'निस्-निर्' 'दुस्-दुर्' ये दो २ क्यों पढ़े गये हैं ? ल० प्र० (५)

६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(४) भूवादयो धातव सूत्र में वकार का आगमन कैसे और क्यो हो जाता है ? (५) अधोलिखित रूपो मे सोपपत्तिक सूत्र-निर्देश करते हुए सन्धि करें— १ प्र+ऋञ्जते । २ कन्या+ऋञ्जते । ३ परा+ऋध्नोति । ४ बाला+ऋध्नोति । ५ प्र+ऋणोति । ६ न+ऋणोति । ७ उप+ऋच्छन् । ८ पिता+ऋच्छति ।¹ ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३८) एङि पररूपम् ।६।१।९४॥ आदुपसर्गादेङादौ धातौ परे पररूपमेकादेश स्यात्। प्रेजते । उपोषति ॥ अर्थ—अवर्णान्त उपसर्ग से एङादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पररूप एकादेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।१।१। (आद् गुण से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है)। उपसर्गात् ।५।१। धातौ ।७।१। (उपसर्गादृति धातौ से)। एङि ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने मे यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादि विधि हो जाती है)। पूर्व-परयो ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयो यह अधिकृत है । 'एक' के स्थान पर 'एकम्', 'पररूपम्' का विशेषण होने से किया गया है । अथवा 'आदेश' होने से 'एक' ही रहता है)। पर-रूपम् ।१।१। अर्थ—(आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (एङि = एङादौ) एङादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकम्) एक (पररूपम्) पररूप आदेश हो जाता है । 'पररूप' से तात्पर्य 'पर' मे है, 'रूप' ग्रहण स्पष्ट प्रतिपत्ति (बोध) के लिये है। उदाहरण यथा— प्रेजते (अत्यन्त चमकता है)। 'प्र+एजते' (एजृँ दीप्तौ धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है²) यहा 'प्र' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'एजते' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ए) के स्थान पर एक पररूप 'ए' आदेश करने से—प्र् 'ए' जते = 'प्रेजते' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । उपोषति (जलाता है) । 'उप+ओषति' (उष दाहे धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है) यहा 'उप' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'ओषति' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ओ) के स्थान पर एक पररूप 'ओ' आदेश करने से—उप् 'ओ' षति='उपोषति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र वृद्धिरेचि (३३) सूत्र का अपवाद है । ध्यान रहे कि एति ओर एधति के विषय मे इस का भी अपवाद एत्येधत्यूठ्सु (३४) सूत्र है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६) अचोऽन्त्यादि टि ।१।१।६४॥ अचां मध्ये योऽन्त्य स आदिर्यस्य तट्टिसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ—अचों मे जो अन्त्य अच्, वह है आदि म जिस के, उस शब्द-समुदाय की टि-सञ्ज्ञा होती है ।

१. यहा सावधानी से सन्धि करनी चाहिये, गुण के उदाहरण भी मिश्रित हैं । २ एजृँ कम्पने परस्मैपदी है अत उस का यहा प्रयोग नही ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६७ व्याख्या—अचः ।६।१। [यहां यतश्च निर्धारणम् (२.३.४१) सूत्र द्वारा निर्धा- रण में षष्ठी-विभक्ति होती है। यथा—'नृणां ब्राह्मणः श्रेष्ठः'। किञ्च यहां जाति में एकवचन हुआ समझना चाहिये]। अन्त्यादि ।१।१। टि ।१।१। समासः—अन्ते भवो- ऽन्त्यः, अन्त्य आदिर्यस्य शब्द-स्वरूपस्य तत् अन्त्यादि, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः— (अचः) अचों के मध्य में (अन्त्यादि) जो अन्त्य अच्, वह है आदि में जिस के ऐसा शब्द- स्वरूप (टि) 'टि' सञ्ज्ञक होता है। यथा—'मनस्' यहां अचों में अन्त्य अच् नका- रोत्तर अकार है, वह जिस के आदि में है ऐसा शब्द-स्वरूप 'अस्' है; अतः इस की इस सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जानी है। एवम्—'पतत्' यहां 'अत्' की, 'आताम्' यहां 'आम्' की, 'ध्वम्' यहां 'अम्' की तथा 'अग्निचित्' यहां 'इत्' की 'टि' सञ्ज्ञा समझनी चाहिये। जहां अन्त्य अच् से परे अन्य कोई वर्ण नहीं होता; वहां केवल उस अन्त्य अच् की ही 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। यथा—'कुल' यहां अचों में अन्त्य अच् लका- रोत्तर अकार है, यह किसी के आदि में नहीं, यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः स एव ज्येष्ठः स एव कनिष्ठः इस न्यायानुसार अपने ही आदि और अपने ही अन्त में वर्त्तमान है अतः यहां केवल 'अ' की ही 'टि' सञ्ज्ञा होती है [इस विषय का स्पष्टीकरण आद्य- न्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र की व्याख्या समझने के बाद ही हो सकता है]। अब अग्रिम वार्त्तिक में 'टि' सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] वा० — (८) शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् ॥ तच्च टेः । शकन्धुः । कर्कन्धुः । कुलटा । मनीषा । आकृतिगणोऽयम् । मार्तण्डः ॥ अर्थः—शकन्धु आदि शब्दों में (उन की सिद्धि के अनुरूप) पररूप कहना चाहिये। (तत्) वह पररूप (टेः) टि (च) और अच् के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—शकन्ध्वादिषु ।७।३। पररूपम् ।१।१। वाच्यम् ।१।१। अर्थः— (शकन्ध्वादिषु) शकन्धु आदि शब्दों में (पररूपम्) पररूप (वाच्यम्) कहना चाहिये। शकन्धु आदि बने बनाए अर्थात् पर-रूप कार्य किये हुए शब्द एक गण में मुनिवर कात्यायन ने पढ़े हैं। इस गण का प्रथम शब्द 'शकन्धु' होने से इस गण का नाम शकन्ध्वादिगण है¹। अब इस वार्त्तिक द्वारा कात्यायन जी कहते हैं कि इन में पर-रूप कर लेना चाहिये; इस पर प्रश्न उत्पन्न होता है कि किस के स्थान पर पर-रूप करें ? इस का उत्तर सुतरां यह मिल जाता है कि योग के अनुसार इन को विभक्त कर उन उन के स्थान पर पर-रूप किया जाये, जिन के स्थान पर पर-रूप करने से गणपठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकरण में यह वार्त्तिक पढ़ा गया है उस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' पदों की अनुवृत्ति आ रही है; तथा वह एकः पूर्व-परयोः (६.१.८४) १. इसी प्रकार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिये; यथा—प्रादि-गण, सर्वादि-गण आदि। गणों के पाठ से लाघव होता है; अन्यथा सभी शब्दों को सूत्रों में पढ़ना पड़ेगा। कात्यायनीयगणपाठ भी अद्यत्वे पाणिनीयगणपाठ में मिश्रित मिलता है।

६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

के' अधिकार के अन्तर्गत है। अतः प्रकरण-वशात् तो यही प्राप्त होता है कि—'पूर्व अवर्ण और पर अच् के स्थान पर एक पर-रूप आदेश हो'। अब यदि प्रकरणानुसार इन के स्थान पर पररूप एकादेश करते हैं तो और तो सब गण-पठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं, केवल 'मनीषा' और 'पतञ्जलि' शब्द सिद्ध नहीं होते, क्योंकि यहां 'मनस्+ ईषा' और 'पतत्+अञ्जलि' इस प्रकार छेद होने से अवर्ण नहीं मिलता। अब यदि प्रकरणागत 'अवर्ण' की बजाय 'टि' कर दें [टि और अच् के स्थान पर पररूप एका- देश हो] तो सब शब्द जैसे गण में पढ़े गये हैं वैसे के वैसे सिद्ध हो जाते हैं, कोई दोष नहीं आता। अतः इन शकन्ध्वादिषु में पूर्व=टि और पर= अच् के स्थान पर पर- रूप एकादेश करना ही युक्त है। ग्रन्थकार ने अपने मन में यह सब विचार कर इसी लिये तच्च टेः कहा है। शकन्ध्वादि गण-पठित शब्द यथा— (१) शकन्धु (शकानाम् = देशविशेषाणाम् अन्धु = कूप शकन्धु । गवेषणी- योऽस्य प्रयोग )। 'शक्+अन्धु' यहां ककारोत्तर अकार की अचोऽन्त्यादि टि (३६) सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। इस टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर विभक्ति लाने से—शक् 'अ' न्धु— 'शकन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (२) कर्कन्धु (कर्काणाम् = राजविशेषाणाम् अन्धु = कूप, कर्कन्धु¹ । अन्वे- षणीयोऽस्य प्रयोग ) । 'कर्क + अन्धु' यहां भी पूर्ववत् ककारोत्तर अकार = टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कर्क 'अ' न्धु = 'कर्कन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (३) कुलटा (व्यभिचारिणी स्त्री) । 'कुल +अटा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'अटा' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कुल् 'अ' टा = 'कुलटा'² प्रयोग सिद्ध हो जाता है।


१ बेर के वृक्ष का नाम 'कर्कन्धू' है। यह कर्कोपपद डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो०) धातु से औणादिक 'कू' प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस का निपातन अन्दू- दुम्मू-जम्बू-कफेलू-कर्कन्धू-धिधिए. (६३) इस उणादि सूत्र में किया गया है, कर्कम् = कण्टकं दधातीति कर्कन्धू । यह शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिङ्ग दोनो प्रकार का होता है। 'कर्कन्धु' ऐसा ह्रस्वोवर्णान्त शब्द भी कही २ बेरवाची मिलता है। वहां उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में 'बहुल' ग्रहण के सामर्थ्य से 'कू' प्रत्यय की बजाय 'कु' प्रत्यय समझना चाहिये। बेर-वाची इस 'कर्कन्धु' शब्द का शकन्ध्वा- दिषो में पाठ करना व्यर्थ है, क्योकि वहां 'डुधाञ्' धातु है 'अन्धु' शब्द नहीं। अतः वहा पररूप करने की कोई आवश्यकता ही नहीं। इस में क्षीरस्वामी तथा हेमचन्द्राचार्य आदि का बेरवाचक कर्कन्धुशब्द में पररूप दर्शाना चिन्त्य ही है। २ अट गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यच (७८६) इति कर्त्तर्यचि अजाद्यतष्टाप् (१२४५) इति टापि अटेति सिध्यति । अटतीत्यटा ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६६ (४) मनीषा (बुद्धि) । 'मनस् + ईषा' यहां अचोऽन्त्यादि टि (३६) से 'अस्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश करने से— मन् 'ई' पा = 'मनीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ग्रन्थकार ने यहां सम्पूर्ण शकन्ध्वादि-गण नहीं लिखा । निम्न-लिखित शब्द भी इसी गण में आते हैं— (५) हलीषा (हलस्य ईषा = दण्डः, हलीषा । हल का दण्ड) । 'हल + ईषा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पर-रूप आदेश करने से— हल् 'ई' पा = 'हलीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'मनीषा' की देखादेखी 'हलीषा' का 'हलस् + ईषा' छेद करना भूल है। (६) लाङ्गलीषा (लाङ्गलस्य = हलस्य ईषा = दण्डः = लाङ्गलीषा, हल का दण्ड)। 'लाङ्गल + ईषा' यहां लकारोत्तर अवर्ण = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश हो कर— लाङ्गल 'ई' पा = 'लाङ्गलीषा' प्रयोग सिद्ध होता है । (७) पतञ्जलिः (व्याकरणमहाभाष्यकार भगवान् पतञ्जलि) । 'पतत् + अञ्जलि' यहां 'अत्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'अञ्जलि' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश हो कर— पत् 'अ' ञ्जलि = 'पतञ्जलिः'² प्रयोग सिद्ध होता है । (८) सारङ्गः (चातक वा हरिण) । 'सार + अङ्ग' यहां रेफोत्तर अवर्ण = टि और 'अङ्ग' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से —सार् 'अ' ङ्ग = 'सारङ्गः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि चातक और हरिण अर्थ में ही इस का शकन्ध्वादियों में पाठ है, अन्य अर्थ में शकन्ध्वादियों में पाठ न होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्णदीर्घ हो कर 'साराङ्गः' बन जाता है। अत एव गणपाठ में सारङ्गः पशु-पक्षिणोः ऐसा उल्लेख किया गया है । (६) सीमन्तः (सीमन्तोऽन्तः = सीमन्तः) । 'सीम + अन्त'³ यहां मकारोत्तर अवर्ण = टि और 'अन्त' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश कुलानामता = कुलटा । कुलान्यटतीति विग्रहे तु कर्मण्यणि टिड्ढाणञ्० (१२४७) इति ङीपि कुलाटीति स्यात् । १. ईष गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् भावे गुरोश्च हलः (८६८) इति अ-प्रत्ययः । स्त्रियामित्यधिकारात् ततष्टाप्, मनस ईषा = गतिः, मनीषा । बुद्धेर्मनीषेत्युच्यते । २. पतन् अञ्जलिर्यस्मिन् नमस्कार्यत्वाद् असौ पतञ्जलिः, बहुव्रीहि-समासः । तपस्य- न्त्या गोपीनाम्याः स्त्रिया अञ्जलेः सर्परूपेण पतितोऽयं पतञ्जलिरिति पौराणिक- संवादे तु 'अञ्जलेः पतन्' इति विग्रहः; तत्र च मयूर-व्यंसकादित्वात् समासः । ३. यहां समास में विभक्ति-लोप होने से पदत्व के कारण न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो जाता है ।

७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

करने से—सीमन् अ' न्त = 'सीमन्त' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । केशों की सीमा के अन्त अर्थात् मांग को 'सीमन्त' कहते हैं । स्त्रिया जब कङ्घी द्वारा बाल सवारती हैं तो बालों के मध्य जो रेखा सी हो जाती है उसे सीमन्त या मांग कहते हैं । सीमन्तः केशवेशे (गणपाठ) — 'मांग' से भिन्न अर्थ मे इस का शकन्ध्वादि-गण में पाठ न होने के कारण अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्ण दीर्घ हो कर सीमान्त' (भूमि आदि की सीमा का अन्त) प्रयोग बनेगा । आकृति-गणोऽयम् । आकृत्या = स्वरूपेण = कार्य-दर्शनेन गण्यते = परिचीयत इति आकृति-गण । अर्थ — (अयम्) यह शक्न्धु आदि शब्दा का समूह (आकृति-गण ) आकृति से गिना जाता है । इस का भाव यह है कि शकन्ध्वादि जितने शब्द गण मे पढ़े गये हैं, ये इतने ही हैं, ऐसा नही समझना चाहिये । किन्तु जिस २ शब्द मे पर- रूप-कार्य हुआ दीखे पर कोई विधायक वचन न हो उसे शकन्ध्वादि-गण मे गिन लेना चाहिये' । यथा—'मार्तण्ड' शब्द लोक मे प्रसिद्ध है, इस मे पररूप हुआ मिलता है, अत इसे भी शकन्ध्वादिगण के अन्तर्गत समझना चाहिये । इस की साधन-प्रक्रिया यथा— 'मृतञ्चाऽदोऽण्डम्' इस कर्मधारय-समास मे विभक्तियों का लुक् हो कर 'मृत+अण्ड' हो जाता है। अब तकारोत्तर अवर्ण तथा 'अण्ड' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश करने से मृत् 'अ' ण्ड = 'मृतण्ड' बन जाता है । मृतण्डे भव = मार्तण्ड,२ यहा तत्र भवः (१०८६) से अण्, तद्धितेष्वचामादे (६३८) से आदि-वृद्धि तथा यस्येति च (२३६) से अकार का लोप हो जाता है । केचिदत्र—मृत्तोऽण्डो यस्य स = मृतण्ड, मृतण्डस्य अपत्यम् = मार्तण्ड, तस्यापत्यम् (१००१) इत्यण् इत्येव विगृह्णन्ति । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४०) ओमाङोश्च ।६।१।९२॥ ओमि आङि चात् परे पररूपमेकादेश स्यात् । शिवायोन्नमः । 'शिव

  • एहि' इति स्थिते— अर्थ —अवर्ण से ओम् अथवा आङ् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर एक पर रूप आदेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुण मे) । ओमाङो ।७।२। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्व-परयो. यह अधिकृत है) । पर-रूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् से) । समास —ओम् च आङ् च =ओमाङौ, तयो =ओमाङो, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(आत्) अवर्ण से (ओमाङो) ओम् अथवा आङ् परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (पररूपम्) पररूप (एक ) एकादेश हो जाता १. इस गण के आकृति-गण होने में प्रोपाभ्या समर्थाभ्याम् (१ ३ ४२) [सम्+ अर्थाभ्याम्], व्यवहृपणो समर्थयो. (२ ३ ५७) [सम् +अर्थयो ] इत्यादि पाणिनि के निर्देश प्रमाण हैं । २ मार्त्तण्ड =मरे हुए अण्डे मे होने वाला=सूर्य, इस की क्या मार्कण्डेय-पुराण के १०५वें अध्याय मे देखें ।

२. सन्धि प्रकरण (अच्-सन्धि, हल्-सन्धि, विसर्ग-सन्धि एवं स्वादिसन्धि)

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७१ है । 'ओम्' यह अव्यय तथा 'आङ्' यह उपसर्ग है । 'आङ्' के ङकार की प्रयोग-दशा में हलन्त्यम् (१) सूत्र से 'इत्' संज्ञा हो जाती है; अतः तस्य लोपः (३) से लोप होने के कारण 'आ' शेष रह जाता है । उदाहरण यथा — शिवायोन्नमः [ओं नमः शिवाय = शिव जी के प्रति नमस्कार हो] । 'शिवाय +ओन्नमः' ['ओम्+नमः' यहां मोऽनुस्वारः (७७) से मकार को अनुस्वार हो कर वा पदान्तस्य (८०) से उसे वैकल्पिक परसवर्ण नकार हो जाता है] यहां यकारोत्तर अवर्ण से 'ओम्' परे है, अतः पूर्व = अवर्ण और पर = ओकार के स्थान पर 'ओ' यह एक पररूप आदेश हो कर शिवायू 'ओ' न्मः = 'शिवायोन्नमः' प्रयोग सिद्ध होता है । शिवेहि (शिव जी आओ) । 'शिव ! आ + इहि' यहां आद् गुणः (२७) सूत्र से 'आ + इ' के स्थान पर 'ए' यह गुण एकादेश हो कर—'शिव एहि' रूप बना । अब यहां 'आङ्' न होने से ओमाङोश्च (४०) सूत्र प्राप्त नहीं होता; इस पर 'ए' में आङ्त्व लाने के लिये अग्रिम अतिदेश-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम् —(४१) अन्तादिवच्च ।६।१।८२॥ योऽयमेकादेशः स पूर्वस्यान्तवत् परस्यादिवत् स्यात् । शिवेहि ॥ अर्थः—(पूर्व और पर के स्थान पर) जो यह एकादेश किया जाता है वह पूर्व के अन्त के समान तथा पर के आदि के समान होता है । व्याख्या—एकः ।१।१। पूर्व-परयोः ।६।२। (एकः पूर्व-परयोः से) । अन्तादिवत् इत्यव्ययपदम् । च इत्यव्ययपदम् । समासः—अन्तश्च आदिश्च = अन्तादी, इतरेतर- द्वन्द्वः । अन्तादिभ्यां तुल्यम् = अन्तादिवत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८) इति वति-प्रत्ययः । अर्थः—(एकः) यह एकादेश (पूर्व-परयोः) पूर्व और पर के (अन्ता- दिवत्) अन्त और आदि के समान होता है । तात्पर्य यह है कि एकः पूर्व-परयोः (६.१.८२) सूत्र से जिस एकादेश का अधिकार किया गया है वह एकादेश पूर्व के अन्त के समान तथा पर के आदि के समान होता है। इस सम्पूर्ण एकादेश के अधिकार में पूर्व और पर वर्ण ही स्थानीय हैं; इन वर्णों के एकादेश के अखण्ड होने से इन में अन्त और आदि नहीं बन सकते । अतः यहां पूर्व से पूर्व-वर्ण-घटित (पूर्व वर्ण वाला) शब्द तथा पर से पर-वर्ण-घटित (पर वर्ण वाला) शब्द ग्रहण किया जाता है । यथा— 'क्षीरप + इन' यहां आद् गुणः (२७) से पकारोत्तर अकार तथा 'इन' शब्द के आदि इकार के स्थान पर 'ए' यह एक गुणादेश हो एकाजुत्तरपदे णः (२८६) से णत्व करने पर 'क्षीरपेण' बनता है । यहां एकादेश 'ए' है । यह 'ए' पूर्व-शब्द अर्थात् 'क्षीरप' शब्द के अन्त = अ के समान तथा पर-शब्द अर्थात् 'इन' के आदि = इ के समान होगा । अर्थात् इस 'ए' को अकार मान कर अकाराश्रित कार्य तथा इकार मान कर इकाराश्रित कार्य हो जाएंगे । इस सूत्र के उदाहरण 'काशिका' आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखने चाहियें । 'शिव + एहि' यहां 'ए' यह एकादेश है । यह एकादेश पूर्व शब्द के अन्त के

७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् समान होगा। पूर्व शब्द 'आ' है। इस का अन्त भी 'आ' है। (क्योंकि एक अक्षर में—वही अपना आदि और वही अपना अन्त हुआ करता है। जैसे किसी का एक पुत्र हो तो उस के लिये वही बड़ा और वही छोटा हुआ करता है) अतः यह 'आ' 'आङ्' के सदृश होगा अर्थात् जो २ कार्य 'आङ्' के रहने पर हो सकते हैं, वे इस के रहने पर भी होंगे। 'आङ्' के होने से ओमाङोश्च (४०) सूत्र प्रवृत्त होता है, वह अब 'ए' के होने से भी होगा। तो इस प्रकार ओमाङोश्च (४०) सूत्र से पूर्व + पर के स्थान पर एक पररूप 'ए' हो कर—शिव् 'ए' हि = 'शिवेहि' प्रयोग सिद्ध होता है। शङ्का—ओमाङोश्च (४०) सूत्र में यदि 'आङ्' का ग्रहण न भी करें तो भी 'शिवेहि' आदि रूप यथेष्ट सिद्ध हो सकते हैं। तथाहि—'शिव + आ + इहि' यहां प्रथम अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्ण-दीर्घ हो—'शिवा + इहि' बन जायेगा, पुनः आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने से 'शिवेहि' प्रयोग सिद्ध हो जायेगा। तो ओमाङोश्च (४०) सूत्र में 'आङ्' ग्रहण क्या किया गया है ? समाधान—पाणिनीय-व्याकरण में असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे यह एक परिभाषा है। इस का अभिप्राय यह है कि जहां अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग कार्य युगपत् = इकट्ठे उपस्थित हों वहां बहिरङ्ग को असिद्ध समझ कर प्रथम अन्तरङ्ग कार्य कर लेना चाहिये। बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग कार्यों का विस्तार-पूर्वक विचार व्याकरण के उच्च- ग्रन्थों में किया गया है वहीं देखें। यहां इतना समझ लेना चाहिये कि धातूपसर्गयो कार्यमन्तरङ्गम् अर्थात् धातु और उपसर्ग का पारस्परिक कार्य अन्तरङ्ग होता है। 'शिव + आ + इहि' यहां 'आ' यह उपसर्ग तथा 'इहि' यह धातु है। अतः 'आ + इ' के स्थान पर गुण कार्य अन्तरङ्ग होने से प्रथम होगा, सवर्ण-दीर्घ बहिरङ्ग होने से प्रथम न होगा। इस से जब 'शिव + एहि' बन जायेगा तब यदि ओमाङोश्च (४०) में 'आङ्' का ग्रहण न करेंगे तो वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश होकर—'शिवैहि' ऐसा अनिष्ट प्रयोग बन जायेगा। अतः इस की निवृत्ति के लिये सूत्र में 'आङ्' का ग्रहण अत्यावश्यक है। नोट—ध्यान रहे कि ओमाङोश्च (४०) सूत्र वृद्धिरेचि (३३) तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) दोनों का अपवाद है। अभ्यास (६) (१) आकृति-गण किसे कहते हैं ? शकन्ध्वादि-गण के आकृति गण होने में क्या प्रमाण है ? सविस्तर प्रकाश डालें। (२) 'न + एजते' में एङि पररूपम्, 'अव + एहि' में एत्येधत्यूठ्सु, 'लाङ्गल + ईषा' में आद् गुणः, 'कुल + अटा' में अकः सवर्णे दीर्घः सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होते ? (३) तच्च टे यह किस की उक्ति है ? इस का अभिप्राय स्पष्ट करें। (४) अन्तादिवच्च की आवश्यकता बताते हुए सूत्रार्थ पर प्रकाश डालें।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७३ (५) 'कर्कन्धुः' पर क्षीरस्वामी के मत का खण्डन करें। (६) सारङ्गः-साराङ्गः; सीमन्तः-सीमान्तः; कुलटा-कुलाटी; इन पदयुगलों का सप्रमाण परस्पर भेद निरूपण करें। (७) अधोलिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद कर उसे सूत्रों द्वारा प्रमाणित करें— १. कोमित्यवोचत्। २. प्रेषयति। ३. पतञ्जलिः। ४. कदोढा (कदा +आङ्+ऊढा)। ५. उपेहि। ६. मार्तण्डः। ७. अवेजते। ८. लाङ्ग- लीषा। ६. प्रोपति। १०. मनीषा। ११. प्रेषणीयम्। १२. कृष्णेहि। १३. अश्मन्तकः (शकन्ध्वादि०)। (८) निम्न-लिखित वचनों की सोदाहरण व्याख्या करें— १. यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः स एव ज्येष्ठः स एव कनिष्ठः। २. असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे। ३. धातूपसर्गयोः कार्यमन्तरङ्गम्। (६) 'टि' संज्ञा-विधायक सूत्र का सोदाहरण विवेचन करें। ---::०::--- [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४२) अकः सवर्णे दीर्घः ।६।१।१०१॥ अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात्। दैत्यारिः। श्रीशः। विष्णूदयः। होतॄकारः॥ अर्थः—अक् से सवर्ण अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान में दीर्घ एकादेश हो जाता है। व्याख्या—अकः ।१।१। सवर्णे ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्व- परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। दीर्घः ।१।१। अर्थः— (अकः) अक् से (सवर्णे) सवर्ण (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+पर के स्थान में (एकः) एक (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है। अक् प्रत्याहार में 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ' ये पांच वर्ण आते हैं; इन से परे यदि इन का कोई सवर्ण अच् हो तो इन दोनों के स्थान पर एक दीर्घ आदेश हो जाता है। यद्यपि दीर्घ अच् बहुत हैं, तथापि स्थानेऽन्तरतमः (१७) से वही दीर्घ किया जाता है जो इन स्थानियों के तुल्य होता है। उदाहरण यथा— (१) दैत्यारिः (दैत्यों का शत्रु—भगवान् विष्णु)। 'दैत्य्+अरि' यहां यकारोत्तरवर्ती अकार अक् है; इस से परे 'अरि' शब्द का आदि अकार सवर्ण अच् है। अतः इन दोनों के स्थान पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा 'आ' यह दीर्घ एकादेश हो कर विभक्ति लाने से—दैत्य् 'आ' रि = 'दैत्यारिः' प्रयोग सिद्ध होता है। दैत्यानाम् अरिः = दैत्यारिः। (२) श्रीशः (लक्ष्मी का स्वामी = भगवान् विष्णु)। 'श्री+ईश' यहां रेफोत्तर ईकार अक् और उस से परे 'ईश' शब्द का आदि ईकार सवर्ण अच् है। इन दोनों के स्थान पर 'ई' यह सवर्ण-दीर्घ एकादेश हो कर विभक्ति लाने से—श्र् 'ई' श = 'श्रीशः' प्रयोग सिद्ध होता है। श्रिय ईशः = श्रीशः।

७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (३) विष्णूदय (विष्णो —तन्नामदेवविशेषस्य, सूर्यस्य वा उदय =आवि- र्भाव उन्नतिर्वा विष्णूदय, विष्णु या सूय का उदय)। विष्णु+उदय यहा णकारोत्तर उकार 'अक्' है, इस से परे 'उदय' शब्द का आदि उकार सवर्ण अच् है अत पूर्व+ पर के स्थान पर 'ऊ' यह सवर्ण दीर्घ एकादेश करने स---विष्ण् ऊ' दय='विष्णूदय' प्रयोग सिद्ध होता है। (४) होतॄकार' (होतृऋकार = होतॄकार । होता का ऋकार) । 'होतृ+ ऋकार यहा पूर्व+पर के स्थान पर ऋ' यह एक सवर्ण दीर्घ हो कर—होतृ ऋ' कार='होतॄकार प्रयोग सिद्ध होता है। ऌकार का उदाहरण अप्रसिद्ध तथा कठिन होने से यहा नही दिया गया, सिद्धान्तकौमुदी म दिया गया है, वही देखें। यह सूत्र अकार के विषय मे आद् गुण (२७) सूत्र का तथा अन्यत्र इको यणचि (१५) सूत्र का अपवाद है। अभ्यास (१०) (१) निम्नस्थ प्रयोगों म सन्धिविच्छेद कर सूत्रो द्वारा उसे सिद्ध करें— १ दण्डाग्रम्। २ मधूदके। ३ दधीन्द्र । ४ होतॄश्य । ५ कुमारीहते । ६ पितॄणम्। ७ विद्यानन्द । ८ भूमीश । ६ परमार्थ । १० यथार्थ । ११ विधूदय । १२ विद्यार्थी । १३ महीन । १४ वेदाभ्यास । १५ कमलाकर । १६ कर्तॄणि । १७ भानूदय । १८ पक्तॄजीपम् । १६ तरूध्व॑म् । २० गिरीश । (२) अधो लिखित रूपा म सूत्रार्थसमन्वय करते हुए सन्धि करें— १ कदा+अगात् । २ महती+इच्छा । ३ हरि+इन्द्र । ४ मधु+ उत्तमम् । ५ कर्तृ+ऋद्धि । ६ सनक+आदि । ७ फलानि+ इमानि । ८ कारु+उत्तम । ६ प्रति+ईक्षते । १० वधू+उत्सव । ११ कदा+अत्र । १२ सती+ईश । १३ श्रद्धा+अस्ति । १४ मुनि+इन्द्र । १५ अन्त+आदि । १६ यदा+आसीत् । १७ नदी+इदानीम् । १८ तरु+उपेत । १६ भ्रातृ+ऋद्धि । २० तुल्य+आस्य । (३) अक सवर्णे दीर्घ सूत्र किस २ सूत्र का अपवाद है ? [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४३) एड पदान्तादति।६।१।१०५॥ पदान्तादेङोऽति परे पूर्व-रूपम् एकादेश स्यात् । हरेऽव । विष्णोऽव ॥ अर्थ—पदान्त एङ् से अत् परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो । व्याख्या—पदान्तात् ।५।१। एङ ।५।१। अति ।७।१। पूर्व-परयो ।६।२। एकः ।१।१। (एक पूर्व-परयो यह अधिकृत है)। पूर्व ।१।१। (अमि पूर्व से) । अर्थ —

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७५ (पदान्तात्) पदान्त (एङः) एङ् से (अति) अत् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्वरूप आदेश हो जाता है। 'एङ्' प्रत्याहार में 'ए, ओ' ये दो वर्ण आते हैं; यदि ये वर्ण पद के अन्त में स्थित हों और इन से परे अत् अर्थात् ह्रस्व अकार हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। यह सूत्र एचोऽयवायावः (२२) सूत्र का अपवाद है। उदाहरण यथा— (१) हरेऽव (हे हरे ! रक्षा करो)। 'हरे+अव' यहां 'हरे' यह सम्बोधन का एकवचनान्त होने से पद है; इस पद के अन्त वाले एकार=एङ् से 'अव' शब्द का आदि अत् परे है; अतः इन दोनों के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ए' हो कर— हर् 'ए' व='हरेऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (२) विष्णोऽव (हे विष्णो ! रक्षा करो)। 'विष्णो+अव' यहां भी पूर्ववत् पूर्व=ओकार और पर=अकार के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ओ' आदेश हो कर—विष्ण् 'ओ' व='विष्णोऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। नोट—'ऽ' यह चिह्न करें या न करें अपनी इच्छा पर निर्भर है। यह केवल इस बात को प्रकट करता है कि यहां पहले अकार था¹। कई लोग इस चिह्न को अकार समझ कर वैसा उच्चारण करते हैं, यह उन की भूल है; क्योंकि जब एकादेश हो गया तो पुनः अवर्ण कहां से आया ? सूत्र में पदान्त कहने का अभिप्राय यह है कि 'जे+अ=जयः, ने+अ=नयः, भो+अ=भवः' इत्यादि में अपदान्त एङ् से अत् परे होने पर पूर्वरूप एकादेश न हो। अभ्यास (११) (१) निम्न-लिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद कर उसे सूत्रों द्वारा प्रमाणित करें— १. अग्नेऽत्र । २. वायोऽत्र । ३. गुरवेऽदात् । ४. रामोऽस्ति । ५. पचते- ऽसौ । ६. नमोऽस्तु । ७. संसारेऽधुना । ८. सर्पोऽहम् । ९. तेऽमी । १०. ब्राह्मणोऽब्रवीत् । ११. वटोऽयम् । १२. ब्रह्मणेऽस्तु । १३. वचनो- ऽनुनासिकः । १४. स्थानेऽन्तरतमः । १५. पण्डितोऽपि । (२) सूत्रार्थ-समन्वय पूर्वक सन्धि करें— १. ते+अकर्मकाः । २. पुरुषो+अत्र । ३. वने+अस्मिन् । ४. ततो+ अन्यत्र । ५. आधारो+अधिकरणम् । ६. सहयुक्ते+अप्रधाने । ७. १. यह चिह्न अत्यन्त आधुनिक है, तभी तो भ्यसो भ्यम् (३२३) सूत्र के महाभाष्य में लिखा है—किमयं 'भ्यम्'शब्द आहोस्विद् 'अभ्यम्'शब्दः ? कुतः सन्देहः ? समानो निर्देशः । यहां समानो निर्देशः से सिद्ध होता है कि पहले उक्त चिह्न नहीं था; प्रत्युत भट्टोजिदीक्षित के समय में भी नहीं था । अत एव समुदाङ्भ्यो यमो- ऽग्रन्थे (१.३.७५) सूत्र पर दीक्षित ने वृत्ति में ('अग्रन्थे' इतिच्छेदः) ऐसा लिखा है : यदि तब यह चिह्न होता तो 'यमोऽग्रन्थे' होने से छेद लिखना व्यर्थ था।

७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् उपो + अधिवे च । ८ अभ्यासो + अत्र । ६ को + अपि । १० अन्यो

  • असौ । ११ वे + अपि । १२ लोवे + अत्र । १३ इको + असवर्णे । १४ एचो + अयवायाव । १५ उपदेशे + अज् । (३) एडः पदान्तादति में 'पदान्त' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? ० [लघु०] विधि-सूत्रम् (४४) सर्वत्र विभाषा गोः । ६।१।११८॥ लोके वेदे चैङन्तस्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते । गोअग्रम् । एङन्तस्य किम् ? चित्रग्वग्रम् । पदान्ते किम् ? गोः ॥ अर्थ—लोक और वेद में एङन्त 'गो' शब्द को पदान्त में विकल्प कर के प्रकृतिभाव हो जाता है । व्याख्या—सर्वत्र इत्यव्ययपदम्¹ । पदान्तस्य । ६।१। (एङः पदान्तादति से 'पदान्तात्' पद आ कर विभक्तिविपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है । इसे यदि सप्तमी- विभक्ति में परिणत करें तो भी कुछ दोष नहीं होता, जैसा कि ग्रन्थकार ने वृत्ति में किया है) । एङः । ६।१। (एङः पदान्तादति में विभक्ति-विपरिणाम द्वारा प्राप्त होता है । यह 'गो' पद का विशेषण है, अतः इम में येन विधिस्र्तदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर एङन्तस्य' बन जाता है) । गोः । ६।१। अति । ७।१। (एङः पदान्तादति से) । विभाषा । १।१। प्रकृत्या । ३।१। (प्रकृत्यान्तःपादमव्यपरे से) । अवस्थानं भवतीति शेषः । अर्थः— (सर्वत्र) चाहे यजुर्वेद हो या अन्य वेद अथवा लोक ही क्यो न हो सब जगह (पदान्तस्य) पदान्त (एङ = एङन्तस्य) जो एङ्—न्त (गोः) गो शब्द का (अति) अत् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (प्रकृत्या) स्वभाव से अवस्थान होजाता है । एङन्त गो शब्द में ओदन्त गो शब्द का ग्रहण समझना चाहिये, क्योकि एदन्त गो शब्द तो कभी हो ही नहीं सकता । प्रकृति का अर्थ है स्वभाव । वर्णों का स्वभाव उन का स्वरूप ही हो सकता है । 'प्रकृति में रहते हैं या प्रकृति-भाव को प्राप्त होते हैं' इस का तात्पर्य प्रयोग का मूल अवस्था म रह जाना अर्थात् कोई विकार न होना ही है । अत एव प्रकृति-भाव-स्थल में सहिताकार्य—सन्धि नहीं होती । उदाहरण यथा— 'गो + अग्र' ('गवाम् अग्रम्' ऐसा यहा षष्ठी-तत्पुरुष-समास है) यहा यद्यपि १ पीछे में 'यजुषि = यजुर्वेद में' की अनुवृत्ति आ रही थी; उस की निवृत्ति के लिये यहा 'सर्वत्र' पद का ग्रहण किया गया है । लौकिक और वैदिक के भेद से संस्कृत- भाषा दो प्रकार की होती है । लौकिक-भाषा लोक अर्थात् काव्यादि लौकिक- ग्रन्थों में या बोलचाल में प्रयुक्त होनी है, यहा लौकिक-भाषा के लिये केवल 'भाषा' शब्द का प्रयोग किया जाता है । यथा—प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११) । वैदिक-भाषा वेद में ही प्रयुक्त होनी है, उसके लिये यहा कुछ विशेष नियम हैं । परन्तु यह सूत्र 'सर्वत्र' अर्थात् दोनों भाषाओ मे समानरूप से प्रवृत्त होता है ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७७ समास के कारण गो-शब्द से परे 'आम्' सुँप् का सुँपो धातु-प्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से लुक् हुआ २ है, तथापि प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र की सहायता से यहां सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद-सञ्ज्ञा अक्षुण्ण है; अतः गो शब्द के अन्त में पदान्त एड् वर्त्तमान है; इस के आगे 'अग्र' शब्द का आदि अत् भी मौजूद है। तो यहां गो-शब्द प्रकृति मे अर्थात् अपने स्वरूप में सन्धि-कार्य से रहित वैसे का वैसा विकल्प से रहेगा। जहां प्रकृतिभाव होगा वहां विभक्ति लाने मे—'गोअग्रम्' प्रयोग सिद्ध होगा। ध्यान रहे कि यहां प्रथम एडः पदान्तादति (४३) से पूर्व-रूप प्राप्त था। पुनः उस का बाध कर अवङ् स्फोटायनस्य (४७) से वैकल्पिक अवङ् प्राप्त होता था। यह सूत्र उस का अपवाद समझना चाहिये। जहां प्रकृति-भाव नहीं होगा वहां अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त होगा¹। यहां 'एङन्त' कहने का यह प्रयोजन है कि ओदन्त गो शब्द को ही प्रकृति भाव हो, उकारान्त गोशब्द को न हो। यद्यपि गोशब्द स्वयम् ओदन्त है उकारान्त नहीं; तथापि समास में गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र से ह्रस्व करने पर उका- रान्त हो जाया करता है। उदाहरण यथा—'चित्रगु+अग्र' [चित्रा गावो यस्य स चित्रगुः, बहुव्रीहि-समासः। चित्रगोरग्रम् इति षष्ठी-तत्पुरुष-समासे सुँब्लुकि रूपमिदम्] यहां गोशब्द के एङन्त न होने से सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से प्रकृतिभाव नहीं होता; इको यणचि (१५) से उकार को वकार हो कर विभक्ति लाने पर 'चित्रग्वग्रम्' प्रयोग बन जाता है²। यहां गोशब्द को पदान्त में प्रकृतिभाव इसलिये कहा गया है कि अपदान्त में प्रकृतिभाव न हो जाये। यथा—'गो+अस्' (यहां गोशब्द से ङसिं वा ङस् प्रत्यय किया गया है) यहां पदान्त न होने से यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता, ङसि-ङसोश्च (१७३) सूत्र से पूर्वरूप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से 'गोः' प्रयोग बन जाता है। इस की विशेषतया सिद्धि 'अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरण' में 'गो' शब्द पर देखें³। १. यहां कई लोग विकल्प-पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप कर 'गोऽग्रम्' ऐसा मूल में पाठ लिखते हैं; यह उन की भूल है क्योंकि यह सूत्र अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र का अपवाद है, एडः पदान्तादति (४३) सूत्र का नहीं; अतः इस के प्रवृत्त हो चुकने पर पक्ष में उसी की प्रवृत्ति करनी योग्य है। हां जब वह प्रवृत्त हो चुकेगा तब वैकल्पिक होने से पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) सूत्र भी प्रवृत्त हो जायेगा। २. ध्यान रहे कि यदि किसी अवयवी का एक अवयव विकृत हो जाये तो भी वह वही रहता है अन्य नहीं हो जाता; यथा—यदि किसी कुत्ते की पूंछ कट जाए तो भी वह कुत्ता ही रहता है अन्य नहीं हो जाता। इसी प्रकार यहां यद्यपि गो शब्द का अवयव ओकार विकृत हो कर उकार बन गया है; तथापि वह गो शब्द ही रहता है—एकदेशविकृतमनन्यवत् (परिभाषा)। ३. 'हे चित्रगोऽग्रम्' में भी प्रकृतिभाव न होगा, क्योंकि यहां एड् लाक्षणिक (कृत्रिम)

७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अब प्रकृतिभाव के अभाव पक्ष में अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त करने के लिये दो परिभाषाएं लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४५) अनेकाल् शित् सर्वस्य ।१।१।५४॥ [ अनेकाल् य आदेश शिश्च, स सर्वस्य षष्ठी-निर्दिष्टस्य स्थाने स्यात् ।] इति प्राप्ते— (यहां पर वृत्ति हम ने जोड़ी है, ग्रन्थकार ने स्पष्ट होने से नहीं लिखी) अर्थ —जिस आदेश में अनेक अल् (वर्ण) हों तथा जिस का शकार इत्सञ्ज्ञक हो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है । इस परिभाषा के प्राप्त होने पर [अग्रिम परिभाषा प्रवृत्त हो जाती है] । व्याख्या—अनेकाल् ।१।१। शित् ।१।१। सर्वस्य ।६।१। समास —न एक = अनेक, नञ्तत्पुरुष । अनेकोऽल् यस्य स =अनेकाल् बहुव्रीहि-समास । श् (शकार ) इत् यस्य स शित् बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(अनेकाल्) अनेक अलों वाला तथा (शित्) शकार इत् वाला आदेश (सर्वस्य) सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है । 'अल्' प्रत्याहार में सम्पूर्ण वर्ण आ जाते हैं, अत अल् या वर्ण पर्याय अर्थात् एकार्थ-वाची शब्द हैं। जिस आदेश में एक से अधिक अल् या वर्ण हों अथवा जिस आदेश के शकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो तो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होगा। अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र कहता है कि आदेश स्थानीय के अन्त्य अल् को हो, परन्तु यह सूत्र अनेकाल् तथा शित् आदेशों को सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होना बतलाता है। अत यह सूत्र अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र का अपवाद है ।१ अनेकाल् आदेश का उदाहरण यथा—रामै । यहां 'भिस्' स्थानीय के सम्पूर्ण स्थान पर अतो भिस ऐस् (१४२) से ऐस् आदेश होता है । ऐस् में दो अल् हैं अत यह अनेकाल् है । यह सूत्र न होता तो अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा भिस् के अन्त्य सकार को फिर उस के बाधक आदेः परस्य (७२) से आदि को 'ऐस्' हो जाता । शित् आदेश का उदाहरण यथा—इत । यहां 'इदम्' स्थानीय के सम्पूर्ण स्थान पर इदम इश् (११६७) से इश् आदेश होता है । इश् शित् है। यह सूत्र न होता तो अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा इदम् के अन्त्य मकार को इश् हो जाता । शङ्का—जितने 'इश्' आदि शित् आदेश हैं वे सब अनेक अलों वाले हैं, अनेकाल् होने के कारण ही वे सब सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर हो सकते हैं । पुन सूत्र में 'शित्' के लिये विशेष यत्न क्या किया गया है ? समाधान—इस प्रकार शित् ग्रहण के बिना भी कार्य के सिद्ध हो जाने से महामुनि पाणिनि यह परिभाषा जतलाना चाहते हैं कि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् है प्रतिपदोक्त (स्वाभाविक) नहीं—लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणम् (प०) । १ इसी प्रकार आदेः परस्य (७२) सूत्र का भी यह अपवाद समझना चाहिये ।

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७६ अर्थात् अनुबन्धों के कारण किसी को अनेकाल् नहीं मान लेना चाहिये जब तक कि उस के अन्य अल् अनेक न हों । जिस की इत्सञ्ज्ञा होती है उसे अनुबन्ध कहते हैं । ‘इश्’ आदि में शकार आदि की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः शकार आदि अनुबन्ध हैं । अब यदि ‘इश्’ में अनुबन्ध शकार को छोड़ दें तो केवल ‘इ’ रह जाता है । तब यह अनेकाल् नहीं रहता; अतः यह सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर प्राप्त नहीं हो सकता । इस लिये ‘शित्’ ग्रहण आवश्यक है । [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४६) ङिच्च ।१।१।५२॥ ङिदनेकालप्यन्त्यस्यैव स्यात् ॥ अर्थः—ङित् आदेश चाहे अनेकाल् भी क्यों न हो अन्त्य अल् के स्थान पर ही होता है । व्याख्या—ङित् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अन्त्यस्य ।६।१।(अलोऽन्त्यस्य से)। समासः—ङ् (ङकारः) इत् यस्य स ङित्, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः—(ङित्) ङकार इत् वाला आदेश (अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता है । यह सूत्र अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) सूत्र का अपवाद है । जिस आदेश के ङकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो फिर वह चाहे अनेक अलों वाला भी क्यों न हो सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर न होकर अन्त्य अल् के स्थान पर ही होगा । इस सूत्र का उदाहरण अग्रिम सूत्र पर देखें । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४७) अवङ् स्फोटायनस्य ।६।१।१२६॥ पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वा स्यादचि । गवाग्रम् । गोऽग्रम् । पदान्ते किम् ? गवि ॥ अर्थः—पदान्त में जो एङ्, तदन्त गो-शब्द को अच् परे होने पर विकल्प कर के अवङ् आदेश हो जाता है । व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है । इस का सप्तमी विभक्ति में भी विपरिणाम हो सकता है जैसा कि ग्रन्थकार ने किया है) । एङः ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है; यह ‘गोः’ पद का विशेषण है, अतः इस से तदन्त-विधि हो कर ‘एङन्तस्य’ बन जाता है)। गोः ।६।१। (सर्वत्र विभाषा गोः से)। अचि ।७।१। (इको यणचि से) । अवङ् ।१।१। स्फोटायनस्य ।६।१। (यहां ‘स्फोटायन’ ग्रहण उस के सत्कार के लिये है, क्योंकि ‘विभाषा’ पद तो पीछे से आ ही जाता है) । अर्थः—(पदान्तस्य ) पद के अन्त वाला (एङन्तस्य) जो एङ्, तदन्त (गोः) गो-शब्द के स्थान पर (अचि) अच् परे रहते (अवङ्) अवङ् आदेश हो जाता है (स्फोटायनस्य) स्फोटायन आचार्य के मत में । ‘स्फोटायन’ पाणिनि से पूर्ववर्त्ती व्याकरण के आचार्य हो चुके हैं; कहते हैं कि ये वैयाकरणों में प्रसिद्ध स्फोटतत्त्व के उपज्ञाता थे । इस सूत्र में पाणिनि ने उन

८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् के मत का उल्लेख किया है । यह 'अवङ्' आदेश स्फोटायन आचार्य के मत में होता है, अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता । हमें सब आचार्य प्रमाण हैं, अतः अवङ् आदेश विकल्प से होगा¹ । उदाहरण यथा— 'गो + अग्र' यहां समास में षष्ठी के बहुवचन 'आम्' का लुक् हुआ है; अतः प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) द्वारा सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'गो' की पद- सञ्ज्ञा है । इस के अन्त में पदान्त एङ् = ओ वर्त्तमान है । इस से परे 'अग्र' शब्द का आदि अकार अच् भी वर्त्तमान है । अतः इस सूत्र से 'गो' को अवङ् आदेश प्राप्त होता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) से इस आदेश की अन्त्य अल् = ओकार के स्थान पर प्राप्ति होती है, परन्तु अनेक अलों वाला होने के कारण अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) द्वारा सम्पूर्ण 'गो' के स्थान पर प्राप्त होता है । पुनः ङिच्च (४६) सूत्र की सहायता से अन्त्य अल् 'ओ' को अवङ् आदेश हो कर —'ग् अवङ् + अग्र' हो जाता है । अब ङकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्ण दीर्घ एकादेश करने पर—'गवाग्र' बना । अब विभक्ति लाने से— 'गवाग्रम्' प्रयोग सिद्ध होता है । जिस पक्ष में अवङ् आदेश नहीं होता वहां एङः पदान्तादति (४३) से पूर्व रूप हो कर 'गोऽग्रम्' प्रयोग बन जाता है । इस प्रकार प्रकृतिभाव वाले रूप सहित कुल तीन रूप हो जाते हैं । प्रकृतिभाव के पक्ष में— (१) गोअग्रम् । [सर्वत्र विभाषा गोः] । प्रकृतिभाव के अभाव में— { (२) गवाग्रम् । [अवङ् स्फोटायनस्य] । { (३) गोऽग्रम् । [एङः पदान्तादति] । यहां पदान्त ग्रहण इस लिये किया है कि अपदान्त एङन्त 'गो' को अवङ् न हो । यथा—गो + ङि = गवि । यहां गो-शब्द से परे सप्तमी का एकवचन 'ङि' प्रत्यय किया गया है, अतः यहां गो शब्द पदान्त नहीं । इस लिये अवङ् आदेश न हो कर एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो जाता है । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— १ गवेश, गधीश । २ गवेश्वर, गवीश्वर । ३ गोऽधिप, गवाधिप, गोडधिप । ४ गवेच्छा, गविच्छा । ५ गवोदय, गवूदय । ६ गर्वाद्ध, गवूद्धि । ७ गवोढ, गवूढ । ८ गवानृतम् । ६ गवाक्ष । १० गवादनी । ध्यान रहे कि अवङ् आदेश में केवल ङकार की ही इत्सञ्ज्ञा होती है । १ वैयाकरण इस विभाषा अर्थात् विकल्प को क्वचित् व्यवस्थितविभाषा मानते हैं । जो विकल्प व्यवस्थित अर्थात् निश्चितरूप से कहीं नित्य प्रवृत्त हो और कहीं बिल्कुल नहीं उसे व्यवस्थितविभाषा कहते हैं। यह अवङ् आदेश गवाक्ष (झरोखा), गवादनी (चरगाह) आदि प्रयोगों में नित्य प्रवृत्त होता है, वहां इसके 'गोअक्ष, गोऽक्ष' आदि रूप नहीं बनते । परन्तु इसे सर्वत्र व्यवस्थितविभाषा भी नहीं समझना चाहिये जैसा कि मूलोक्त उदाहरण में इसे व्यवस्थितविभाषा नहीं माना गया ।