भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

करने से—सीमन् अ' न्त = 'सीमन्त' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । केशों की सीमा के अन्त अर्थात् मांग को 'सीमन्त' कहते हैं । स्त्रिया जब कङ्घी द्वारा बाल सवारती हैं तो बालों के मध्य जो रेखा सी हो जाती है उसे सीमन्त या मांग कहते हैं । सीमन्तः केशवेशे (गणपाठ) — 'मांग' से भिन्न अर्थ मे इस का शकन्ध्वादि-गण में पाठ न होने के कारण अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्ण दीर्घ हो कर सीमान्त' (भूमि आदि की सीमा का अन्त) प्रयोग बनेगा । आकृति-गणोऽयम् । आकृत्या = स्वरूपेण = कार्य-दर्शनेन गण्यते = परिचीयत इति आकृति-गण । अर्थ — (अयम्) यह शक्न्धु आदि शब्दा का समूह (आकृति-गण ) आकृति से गिना जाता है । इस का भाव यह है कि शकन्ध्वादि जितने शब्द गण मे पढ़े गये हैं, ये इतने ही हैं, ऐसा नही समझना चाहिये । किन्तु जिस २ शब्द मे पर- रूप-कार्य हुआ दीखे पर कोई विधायक वचन न हो उसे शकन्ध्वादि-गण मे गिन लेना चाहिये' । यथा—'मार्तण्ड' शब्द लोक मे प्रसिद्ध है, इस मे पररूप हुआ मिलता है, अत इसे भी शकन्ध्वादिगण के अन्तर्गत समझना चाहिये । इस की साधन-प्रक्रिया यथा— 'मृतञ्चाऽदोऽण्डम्' इस कर्मधारय-समास मे विभक्तियों का लुक् हो कर 'मृत+अण्ड' हो जाता है। अब तकारोत्तर अवर्ण तथा 'अण्ड' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश करने से मृत् 'अ' ण्ड = 'मृतण्ड' बन जाता है । मृतण्डे भव = मार्तण्ड,२ यहा तत्र भवः (१०८६) से अण्, तद्धितेष्वचामादे (६३८) से आदि-वृद्धि तथा यस्येति च (२३६) से अकार का लोप हो जाता है । केचिदत्र—मृत्तोऽण्डो यस्य स = मृतण्ड, मृतण्डस्य अपत्यम् = मार्तण्ड, तस्यापत्यम् (१००१) इत्यण् इत्येव विगृह्णन्ति । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४०) ओमाङोश्च ।६।१।९२॥ ओमि आङि चात् परे पररूपमेकादेश स्यात् । शिवायोन्नमः । 'शिव

  • एहि' इति स्थिते— अर्थ —अवर्ण से ओम् अथवा आङ् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर एक पर रूप आदेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुण मे) । ओमाङो ।७।२। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्व-परयो. यह अधिकृत है) । पर-रूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् से) । समास —ओम् च आङ् च =ओमाङौ, तयो =ओमाङो, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(आत्) अवर्ण से (ओमाङो) ओम् अथवा आङ् परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (पररूपम्) पररूप (एक ) एकादेश हो जाता १. इस गण के आकृति-गण होने में प्रोपाभ्या समर्थाभ्याम् (१ ३ ४२) [सम्+ अर्थाभ्याम्], व्यवहृपणो समर्थयो. (२ ३ ५७) [सम् +अर्थयो ] इत्यादि पाणिनि के निर्देश प्रमाण हैं । २ मार्त्तण्ड =मरे हुए अण्डे मे होने वाला=सूर्य, इस की क्या मार्कण्डेय-पुराण के १०५वें अध्याय मे देखें ।