लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ६६ (४) मनीषा (बुद्धि) । 'मनस् + ईषा' यहां अचोऽन्त्यादि टि (३६) से 'अस्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश करने से— मन् 'ई' पा = 'मनीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ग्रन्थकार ने यहां सम्पूर्ण शकन्ध्वादि-गण नहीं लिखा । निम्न-लिखित शब्द भी इसी गण में आते हैं— (५) हलीषा (हलस्य ईषा = दण्डः, हलीषा । हल का दण्ड) । 'हल + ईषा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पर-रूप आदेश करने से— हल् 'ई' पा = 'हलीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'मनीषा' की देखादेखी 'हलीषा' का 'हलस् + ईषा' छेद करना भूल है। (६) लाङ्गलीषा (लाङ्गलस्य = हलस्य ईषा = दण्डः = लाङ्गलीषा, हल का दण्ड)। 'लाङ्गल + ईषा' यहां लकारोत्तर अवर्ण = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश हो कर— लाङ्गल 'ई' पा = 'लाङ्गलीषा' प्रयोग सिद्ध होता है । (७) पतञ्जलिः (व्याकरणमहाभाष्यकार भगवान् पतञ्जलि) । 'पतत् + अञ्जलि' यहां 'अत्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'अञ्जलि' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश हो कर— पत् 'अ' ञ्जलि = 'पतञ्जलिः'² प्रयोग सिद्ध होता है । (८) सारङ्गः (चातक वा हरिण) । 'सार + अङ्ग' यहां रेफोत्तर अवर्ण = टि और 'अङ्ग' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से —सार् 'अ' ङ्ग = 'सारङ्गः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि चातक और हरिण अर्थ में ही इस का शकन्ध्वादियों में पाठ है, अन्य अर्थ में शकन्ध्वादियों में पाठ न होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्णदीर्घ हो कर 'साराङ्गः' बन जाता है। अत एव गणपाठ में सारङ्गः पशु-पक्षिणोः ऐसा उल्लेख किया गया है । (६) सीमन्तः (सीमन्तोऽन्तः = सीमन्तः) । 'सीम + अन्त'³ यहां मकारोत्तर अवर्ण = टि और 'अन्त' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश कुलानामता = कुलटा । कुलान्यटतीति विग्रहे तु कर्मण्यणि टिड्ढाणञ्० (१२४७) इति ङीपि कुलाटीति स्यात् । १. ईष गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् भावे गुरोश्च हलः (८६८) इति अ-प्रत्ययः । स्त्रियामित्यधिकारात् ततष्टाप्, मनस ईषा = गतिः, मनीषा । बुद्धेर्मनीषेत्युच्यते । २. पतन् अञ्जलिर्यस्मिन् नमस्कार्यत्वाद् असौ पतञ्जलिः, बहुव्रीहि-समासः । तपस्य- न्त्या गोपीनाम्याः स्त्रिया अञ्जलेः सर्परूपेण पतितोऽयं पतञ्जलिरिति पौराणिक- संवादे तु 'अञ्जलेः पतन्' इति विग्रहः; तत्र च मयूर-व्यंसकादित्वात् समासः । ३. यहां समास में विभक्ति-लोप होने से पदत्व के कारण न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो जाता है ।