लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
के' अधिकार के अन्तर्गत है। अतः प्रकरण-वशात् तो यही प्राप्त होता है कि—'पूर्व अवर्ण और पर अच् के स्थान पर एक पर-रूप आदेश हो'। अब यदि प्रकरणानुसार इन के स्थान पर पररूप एकादेश करते हैं तो और तो सब गण-पठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं, केवल 'मनीषा' और 'पतञ्जलि' शब्द सिद्ध नहीं होते, क्योंकि यहां 'मनस्+ ईषा' और 'पतत्+अञ्जलि' इस प्रकार छेद होने से अवर्ण नहीं मिलता। अब यदि प्रकरणागत 'अवर्ण' की बजाय 'टि' कर दें [टि और अच् के स्थान पर पररूप एका- देश हो] तो सब शब्द जैसे गण में पढ़े गये हैं वैसे के वैसे सिद्ध हो जाते हैं, कोई दोष नहीं आता। अतः इन शकन्ध्वादिषु में पूर्व=टि और पर= अच् के स्थान पर पर- रूप एकादेश करना ही युक्त है। ग्रन्थकार ने अपने मन में यह सब विचार कर इसी लिये तच्च टेः कहा है। शकन्ध्वादि गण-पठित शब्द यथा— (१) शकन्धु (शकानाम् = देशविशेषाणाम् अन्धु = कूप शकन्धु । गवेषणी- योऽस्य प्रयोग )। 'शक्+अन्धु' यहां ककारोत्तर अकार की अचोऽन्त्यादि टि (३६) सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। इस टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर विभक्ति लाने से—शक् 'अ' न्धु— 'शकन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (२) कर्कन्धु (कर्काणाम् = राजविशेषाणाम् अन्धु = कूप, कर्कन्धु¹ । अन्वे- षणीयोऽस्य प्रयोग ) । 'कर्क + अन्धु' यहां भी पूर्ववत् ककारोत्तर अकार = टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कर्क 'अ' न्धु = 'कर्कन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (३) कुलटा (व्यभिचारिणी स्त्री) । 'कुल +अटा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'अटा' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कुल् 'अ' टा = 'कुलटा'² प्रयोग सिद्ध हो जाता है।
१ बेर के वृक्ष का नाम 'कर्कन्धू' है। यह कर्कोपपद डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो०) धातु से औणादिक 'कू' प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस का निपातन अन्दू- दुम्मू-जम्बू-कफेलू-कर्कन्धू-धिधिए. (६३) इस उणादि सूत्र में किया गया है, कर्कम् = कण्टकं दधातीति कर्कन्धू । यह शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिङ्ग दोनो प्रकार का होता है। 'कर्कन्धु' ऐसा ह्रस्वोवर्णान्त शब्द भी कही २ बेरवाची मिलता है। वहां उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में 'बहुल' ग्रहण के सामर्थ्य से 'कू' प्रत्यय की बजाय 'कु' प्रत्यय समझना चाहिये। बेर-वाची इस 'कर्कन्धु' शब्द का शकन्ध्वा- दिषो में पाठ करना व्यर्थ है, क्योकि वहां 'डुधाञ्' धातु है 'अन्धु' शब्द नहीं। अतः वहा पररूप करने की कोई आवश्यकता ही नहीं। इस में क्षीरस्वामी तथा हेमचन्द्राचार्य आदि का बेरवाचक कर्कन्धुशब्द में पररूप दर्शाना चिन्त्य ही है। २ अट गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यच (७८६) इति कर्त्तर्यचि अजाद्यतष्टाप् (१२४५) इति टापि अटेति सिध्यति । अटतीत्यटा ।