भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६७ व्याख्या—अचः ।६।१। [यहां यतश्च निर्धारणम् (२.३.४१) सूत्र द्वारा निर्धा- रण में षष्ठी-विभक्ति होती है। यथा—'नृणां ब्राह्मणः श्रेष्ठः'। किञ्च यहां जाति में एकवचन हुआ समझना चाहिये]। अन्त्यादि ।१।१। टि ।१।१। समासः—अन्ते भवो- ऽन्त्यः, अन्त्य आदिर्यस्य शब्द-स्वरूपस्य तत् अन्त्यादि, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः— (अचः) अचों के मध्य में (अन्त्यादि) जो अन्त्य अच्, वह है आदि में जिस के ऐसा शब्द- स्वरूप (टि) 'टि' सञ्ज्ञक होता है। यथा—'मनस्' यहां अचों में अन्त्य अच् नका- रोत्तर अकार है, वह जिस के आदि में है ऐसा शब्द-स्वरूप 'अस्' है; अतः इस की इस सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जानी है। एवम्—'पतत्' यहां 'अत्' की, 'आताम्' यहां 'आम्' की, 'ध्वम्' यहां 'अम्' की तथा 'अग्निचित्' यहां 'इत्' की 'टि' सञ्ज्ञा समझनी चाहिये। जहां अन्त्य अच् से परे अन्य कोई वर्ण नहीं होता; वहां केवल उस अन्त्य अच् की ही 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। यथा—'कुल' यहां अचों में अन्त्य अच् लका- रोत्तर अकार है, यह किसी के आदि में नहीं, यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः स एव ज्येष्ठः स एव कनिष्ठः इस न्यायानुसार अपने ही आदि और अपने ही अन्त में वर्त्तमान है अतः यहां केवल 'अ' की ही 'टि' सञ्ज्ञा होती है [इस विषय का स्पष्टीकरण आद्य- न्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र की व्याख्या समझने के बाद ही हो सकता है]। अब अग्रिम वार्त्तिक में 'टि' सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] वा० — (८) शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् ॥ तच्च टेः । शकन्धुः । कर्कन्धुः । कुलटा । मनीषा । आकृतिगणोऽयम् । मार्तण्डः ॥ अर्थः—शकन्धु आदि शब्दों में (उन की सिद्धि के अनुरूप) पररूप कहना चाहिये। (तत्) वह पररूप (टेः) टि (च) और अच् के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—शकन्ध्वादिषु ।७।३। पररूपम् ।१।१। वाच्यम् ।१।१। अर्थः— (शकन्ध्वादिषु) शकन्धु आदि शब्दों में (पररूपम्) पररूप (वाच्यम्) कहना चाहिये। शकन्धु आदि बने बनाए अर्थात् पर-रूप कार्य किये हुए शब्द एक गण में मुनिवर कात्यायन ने पढ़े हैं। इस गण का प्रथम शब्द 'शकन्धु' होने से इस गण का नाम शकन्ध्वादिगण है¹। अब इस वार्त्तिक द्वारा कात्यायन जी कहते हैं कि इन में पर-रूप कर लेना चाहिये; इस पर प्रश्न उत्पन्न होता है कि किस के स्थान पर पर-रूप करें ? इस का उत्तर सुतरां यह मिल जाता है कि योग के अनुसार इन को विभक्त कर उन उन के स्थान पर पर-रूप किया जाये, जिन के स्थान पर पर-रूप करने से गणपठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकरण में यह वार्त्तिक पढ़ा गया है उस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' पदों की अनुवृत्ति आ रही है; तथा वह एकः पूर्व-परयोः (६.१.८४) १. इसी प्रकार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिये; यथा—प्रादि-गण, सर्वादि-गण आदि। गणों के पाठ से लाघव होता है; अन्यथा सभी शब्दों को सूत्रों में पढ़ना पड़ेगा। कात्यायनीयगणपाठ भी अद्यत्वे पाणिनीयगणपाठ में मिश्रित मिलता है।