लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(४) भूवादयो धातव सूत्र में वकार का आगमन कैसे और क्यो हो जाता है ? (५) अधोलिखित रूपो मे सोपपत्तिक सूत्र-निर्देश करते हुए सन्धि करें— १ प्र+ऋञ्जते । २ कन्या+ऋञ्जते । ३ परा+ऋध्नोति । ४ बाला+ऋध्नोति । ५ प्र+ऋणोति । ६ न+ऋणोति । ७ उप+ऋच्छन् । ८ पिता+ऋच्छति ।¹ ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३८) एङि पररूपम् ।६।१।९४॥ आदुपसर्गादेङादौ धातौ परे पररूपमेकादेश स्यात्। प्रेजते । उपोषति ॥ अर्थ—अवर्णान्त उपसर्ग से एङादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पररूप एकादेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।१।१। (आद् गुण से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है)। उपसर्गात् ।५।१। धातौ ।७।१। (उपसर्गादृति धातौ से)। एङि ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने मे यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादि विधि हो जाती है)। पूर्व-परयो ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयो यह अधिकृत है । 'एक' के स्थान पर 'एकम्', 'पररूपम्' का विशेषण होने से किया गया है । अथवा 'आदेश' होने से 'एक' ही रहता है)। पर-रूपम् ।१।१। अर्थ—(आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (एङि = एङादौ) एङादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकम्) एक (पररूपम्) पररूप आदेश हो जाता है । 'पररूप' से तात्पर्य 'पर' मे है, 'रूप' ग्रहण स्पष्ट प्रतिपत्ति (बोध) के लिये है। उदाहरण यथा— प्रेजते (अत्यन्त चमकता है)। 'प्र+एजते' (एजृँ दीप्तौ धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है²) यहा 'प्र' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'एजते' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ए) के स्थान पर एक पररूप 'ए' आदेश करने से—प्र् 'ए' जते = 'प्रेजते' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । उपोषति (जलाता है) । 'उप+ओषति' (उष दाहे धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है) यहा 'उप' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'ओषति' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ओ) के स्थान पर एक पररूप 'ओ' आदेश करने से—उप् 'ओ' षति='उपोषति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र वृद्धिरेचि (३३) सूत्र का अपवाद है । ध्यान रहे कि एति ओर एधति के विषय मे इस का भी अपवाद एत्येधत्यूठ्सु (३४) सूत्र है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६) अचोऽन्त्यादि टि ।१।१।६४॥ अचां मध्ये योऽन्त्य स आदिर्यस्य तट्टिसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ—अचों मे जो अन्त्य अच्, वह है आदि म जिस के, उस शब्द-समुदाय की टि-सञ्ज्ञा होती है ।
१. यहा सावधानी से सन्धि करनी चाहिये, गुण के उदाहरण भी मिश्रित हैं । २ एजृँ कम्पने परस्मैपदी है अत उस का यहा प्रयोग नही ।