भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५ वादि-शब्दः प्रकार-वचनः । भू-प्रभृतयो वा-सदृशा इत्यर्थः । वा—धातुना सादृश्यं क्रिया- वाचकत्वेनैव बोध्यम् । अर्थः—(भू-वादयः) क्रिया-वाची भ्वादि (धातवः) धातु- संज्ञक हों । क्रिया काम को कहते हैं । खाना, पीना, उठना, बैठना, करना आदि क्रियाएं हैं । क्रिया अर्थ वाले भ्वादि [यहां केवल भ्वादि-गण ही नहीं समझना चाहिये, अपितु समग्र धातु-पाठ का ग्रहण करना चाहिये] धातु-संज्ञक होते हैं । यहां यदि क्रिया-वाची नहीं कहते तो 'याः पश्यति' (जिन स्त्रियों को देखता है) यहां 'या+शस्' में आतो धातोः (१६७) से आकार का अनिष्ट लोप प्राप्त होता है, क्योंकि भ्वादियों में 'या' का पाठ देखा जाता है । अब क्रिया-वाची कहने से यह दोष नहीं आता; क्योंकि यहां 'या' का अर्थ क्रिया नहीं अपितु 'जो' है । यह टावन्त सर्वनाम है । अब अग्रिम-सूत्र में उपसर्ग और धातु-संज्ञा का फल बतलाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३७) उपसर्गाद् ऋति धातौ ।६।१।८८॥ अवर्णान्तादुपसर्गाद् ऋकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । प्रार्च्छति ॥ अर्थः —अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है) । उपसर्गात् ।५।१। ऋति ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने के कारण यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा इस में तदादि-विधि हो जाती है) । धातौ ।७।१। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः (आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (ऋति= ऋकारादौ) ऋकारादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— प्रार्च्छति (जाता है) । 'प्र+ऋच्छति' यहां 'ऋच्छ्' (भ्वा० वा तुदा०) यह गमनक्रिया-वाची होने से भूवादयो धातवः (३६) के अनुसार धातु-संज्ञक है; इस के साथ योग होने के कारण उपसर्गाः क्रिया-योगे (३५) सूत्र द्वारा 'प्र' की उपसर्ग-संज्ञा हो जाती है । तो अब 'प्र' इस अवर्णान्त उपसर्ग से 'ऋच्छ्' यह ऋकारादि धातु परे वर्त्तमान है, अतः उरण्रपरः (२६) की सहायता से उपसर्गादृति धातौ (३७) द्वारा पूर्व=अ और पर=ऋ के स्थान पर 'आर्' यह एक वृद्धि आदेश हो कर—प् र् 'आर्' च्छति='प्रार्च्छति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र भी आद् गुणः (२७) द्वारा प्राप्त गुण एकादेश का अपवाद समझना चाहिये । अभ्यास (८) (१) प्रादि-गण में कितने अजन्त और कितने हलन्त शब्द हैं ? (२) प्रादि-गण में 'उत्' अथवा 'उद्' कौन सा पाठ युक्त है; सप्रमाण लिखें ? (३) 'निस्-निर्' 'दुस्-दुर्' ये दो २ क्यों पढ़े गये हैं ? ल० प्र० (५)