भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

६४ || भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् — (३५) उपसर्गाः क्रिया-योगे ।१।४।५८॥ प्रादयः क्रिया-योगे उपसर्ग-सञ्ज्ञाः स्युः । १ प्र । २ परा । ३ अप । ४ सम् । ५ अनु । ६ अव । ७ निस्¹ । ८ निर् । ९ दुस् । १० दुर् । ११ वि । १२ आङ् । १३ नि । १४ अधि । १५ अपि । १६ अति । १७ सु । १८ उद् । १९ अभि । २० प्रति । २१ परि । २२ उप—एते प्रादयः ॥ अर्थ — क्रिया-योग में प्रादि 'उपसर्ग' सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (इसी सूत्र का अंश, जिसे योग-विभाग करके भाष्य- कार ने अलग किया है) । उपसर्गाः ।१।३। क्रिया-योगे ।७।१। समास —'प्र'शब्द आदि- र्येषान्ते प्रादयः । तद् गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि समास [इस समास का विवेचन (१३३) सूत्र पर देखें] । क्रियया योगः =क्रिया-योगः, तस्मिन् क्रिया-योगे । तृतीया-तत्पुरुष- समास । अर्थ — (क्रिया-योगे) क्रिया के साथ अन्वित होने पर (प्रादयः) 'प्र' आदि २२ शब्द (उपसर्गाः) उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं । यह सूत्र प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधिकार में पढ़ा गया है, अतः इन की निपात-सञ्ज्ञा भी साथ ही समझ लेनी चाहिये । निपात-सञ्ज्ञा का प्रयोजन 'अव्यय' बनाना है [देखें —स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७)] । प्रादि कौन २ से हैं ? इस का ज्ञान गण-पाठ से होता है । मूल में प्रादि- गण दे दिया गया है । गण-पाठ महामुनि पाणिनि ने रचा है । प्रादि-गण पर विशेष विचार आगे यत्र तत्र बहुत किया जायेगा । नोट — प्रादि-गण में 'उद्' के स्थान पर 'उत्' पाठ प्रायः सब लघुकौमुदियों तथा सिद्धान्तकौमुदियों में देखा जाता है पर वह अशुद्ध है, क्योंकि उदश्चरः सकर्म- कात् (७३६), उदि कूले रुजिवहोः (३.२.३१), उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) इत्यादि पाणिनि-सूत्रों से इस के दकारान्त होने का ही निश्चय होता है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् —(३६) भूवादयो धातवः ।१।३।१॥ क्रिया-वाचिनो भ्वादयो धातु-सञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थ —क्रिया के वाचक 'भू' आदि धातु-सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—भूवादयः ।१।३। धातवः ।१।३। समास —भूश्च वाश्च भूवौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । वा गति-गन्धनयोः इत्यादादिको धातुः । आदिश्च आदिश्च =आदी । भूवौ आदी येषां ते भूवादयः, बहुव्रीहि-समास । प्रथम आदि-शब्द प्रभृति-वचन, द्वितीय


१ कई लोग यहां शङ्का किया करते हैं कि निस् और निर् में तथा दुस् और दुर् में किसी एक का ही पाठ उपसर्गों में करना चाहिये दोनों का नहीं, क्योंकि सान्त भी सर्वत्र ससजुषो रुः (८.२.६६) से रेफान्त ही हो जाया करते हैं । इस का समाधान यह है कि निस्, दुस् में जो सकार को रुँ होता है, उससे असिद्ध होने से प्राप्त कार्य नहीं हो पाते, जैसे —'निरयते, दुरयते' में उपसर्गादयतौ (८.२.१९) से लत्व नहीं होता, क्योंकि उस की दृष्टि में 'र्' असिद्ध है । 'निर्, दुर्' में लत्व हो जाता है—'निलयते, दुलयते' । इस लिये इन्हें भिन्न २ पढ़ा गया है ।

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