भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३ तो यहां भी है। अब यहां कर्मधारय-समास में गुण हो कर 'परमर्तः' यह इष्ट प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'परमर्तः' का अर्थ 'मुक्त' है। [लघु०] वा०- (७) प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ऋणे ॥ प्रार्णम् । वत्सतरार्णम् इत्यादि ॥ अर्थः-प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन छः शब्दों के अन्त्य अवर्ण से परे 'ऋण' शब्द का आदि ऋवर्ण होने पर पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या- प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ।६।३। (यहां पञ्चमी-विभक्ति के स्थान पर षष्ठी-विभक्ति समझनी चाहिये)। ऋणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। अर्थः-(प्र- वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम्) प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन शब्दों से (ऋणे) ऋण शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा- (१) प्र+ऋण = प्र् 'आर्' ण = 'प्रार्णम्' [अधिक व उत्तम ऋण] । (२) वत्सतर+ऋण = वत्सतर् 'आर्' ण = 'वत्सतरार्णम्' [बछड़े के लिये ऋण] । (३) कम्बल+ऋण = कम्बल् 'आर्' ण = 'कम्बलार्णम्' [कम्बल का ऋण] । (४) वसन+ऋण = वसन् 'आर्' ण = 'वसनार्णम्' [कपडे का ऋण] । (५) ऋण+ऋण = ऋण् 'आर्' ण = 'ऋणार्णम्' [ऋण चुकाने के लिये ऋण] । (६) दश+ऋण = दश् 'आर्' ण = 'दशार्णः' [दश प्रकार के जल वाला देश-विशेष] । ध्यान रहे कि अन्तिम उदाहरण में बहुव्रीहि-समास है। इस में 'दशन्' के नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से लोप हो जाता है। यह वार्त्तिक भी गुण एकादेश का अपवाद है। अभ्यास (७) (१) निम्नस्थ रूपों में उत्सर्गनिर्देशपूर्वक ससूत्र सन्धि करें- १. विश्वौहः। २. प्रौहः। ३. भारीहः। ४. अवैति। ५. अभ्युपैति। ६. ऋणार्णम्। ७. उपैता (तृच्)। ८. अवैधते। ९. प्रौढिः। १०. अक्षौहिणी। ११. प्रैति। १२. ममैधते। १३. दशार्णः। १४. प्रेष्यः। १५. प्रैथे। १६. दुःखार्तः। (२) एत्येधत्यूठ्सु सूत्र में 'एजादि' ग्रहण क्यों किया जाता है? (३) ऋते च तृतीया-समासे में तृतीया-ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (४) 'अक्षौहिणी' सेना का परिमाण बताओ। (५) एति और एधति में 'ति' ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (६) 'उपसङ्ख्यान' शब्द का क्या अर्थ होता है? (७) एत्येधत्यूठ्सु, प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु, अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ये सूत्र या वार्त्तिक किन २ के अपवाद हैं? सोदाहरण समझाइये।