लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एव) एक (वृद्धि) वृद्धि आदेश हो । उदाहरण यथा - प्र+ऊह = प्र् 'औ' ह = 'प्रौहः' । [ उत्तम तर्क वा उत्तम तर्क करने वाला ] प्र+ऊढ = प्र् 'औ' ढ = 'प्रौढः' । [ बढ़ा हुआ वा अधेड़ ] प्र+ऊढि = प्र् 'औ' ढि = 'प्रौढिः' । [ प्रौढ़ता व शेखी ] प्र+एष = प्र् 'ऐ' ष = 'प्रैषः' । [ प्रेरणा, घञन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्र+एष्य = प्र् 'ऐ' ष्य = 'प्रैष्यः' । [ प्रेरणीय, सेवक, ण्यदन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्रैष, प्रैष्य यहां एङि पररूपम् (३८) से पररूपम् प्राप्त था शेष स्थानों पर आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण प्राप्त था । यह वार्त्तिक इन दोनों का अपवाद है । [लघु०] वा०- (६) ऋते च तृतीया-समासे ॥ सुखेन ऋतः = सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमर्तः ॥ अर्थ - तृतीया-समास में अवर्ण से ऋत शब्द का आदि ऋवर्ण परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है । व्याख्या-आत् ।५।१। (आद् गुण सूत्र से) । ऋते ।३।१। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । तृतीया-समासे ।७।१। अर्थ - (तृतीया समासे) तृतीया-तत्पुरुष-समास में (आत्) अवर्ण से (ऋते) 'ऋत' शब्द परे होने पर (च) भी (पूर्व परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा - 'सुखेन ऋतः' यह लौकिक-विग्रह है । अलौकिक-विग्रह अर्थात् 'सुख टा ऋत सुँ' में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र द्वारा टा और सुँ का लुक् हो जाने पर 'सुख+ऋत' ऐसा बनता है । अब इस वार्त्तिक से पूर्व-अवर्ण और पर = ऋवर्ण के स्थान पर वृद्धि करनी है । 'अ+ऋ' का स्थान 'कण्ठ+मूर्धा' है । कण्ठ+मूर्धा' स्थान वाला वृद्धि-संज्ञकों में कोई नहीं, सब का 'कण्ठ' स्थान ही तुल्य है । अब यदि 'आ' यह वृद्धि एकादेश करें तो उरण्रपरः (२६) सूत्र से रपर होकर 'आर्' हो जाने से 'कण्ठ+मूर्धा' स्थान तुल्य हो जायेगा । तो ऐसा करने से—सुख् 'आर्' त् = 'सुखार्तः' प्रयोग हो कर विभक्ति लाने से 'सुखार्तः' सिद्ध हो जाता है । इस का अर्थ— सुख से प्राप्त हुआ अर्थात् सुखी है । अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि अवर्ण से 'ऋत' परे होने पर वृद्धि का विधान समास में तो करना ही चाहिये, क्योंकि 'सुखेन+ऋतः' यहां लौकिक- विग्रह में वृद्धि न हो कर गुण एकादेश होने से 'सुखेतर्तः' प्रयोग बन सके । परन्तु 'तृतीया का ही समास हो अन्य विभक्तियों का न हो' इस कथन का क्या प्रयोजन है? क्यों समास मात्र में ही वृद्धि का विधान न कर दिया जाये ? इस का उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि यदि 'तृतीया' न कहेंगे, समास-मात्र में ही वृद्धि विधान करेंगे तो 'परमश्चासौ ऋतः = परम+ऋतः' यहां गुण न हो कर वृद्धि हो जायेगी, क्योंकि समास