भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७१ है । 'ओम्' यह अव्यय तथा 'आङ्' यह उपसर्ग है । 'आङ्' के ङकार की प्रयोग-दशा में हलन्त्यम् (१) सूत्र से 'इत्' संज्ञा हो जाती है; अतः तस्य लोपः (३) से लोप होने के कारण 'आ' शेष रह जाता है । उदाहरण यथा — शिवायोन्नमः [ओं नमः शिवाय = शिव जी के प्रति नमस्कार हो] । 'शिवाय +ओन्नमः' ['ओम्+नमः' यहां मोऽनुस्वारः (७७) से मकार को अनुस्वार हो कर वा पदान्तस्य (८०) से उसे वैकल्पिक परसवर्ण नकार हो जाता है] यहां यकारोत्तर अवर्ण से 'ओम्' परे है, अतः पूर्व = अवर्ण और पर = ओकार के स्थान पर 'ओ' यह एक पररूप आदेश हो कर शिवायू 'ओ' न्मः = 'शिवायोन्नमः' प्रयोग सिद्ध होता है । शिवेहि (शिव जी आओ) । 'शिव ! आ + इहि' यहां आद् गुणः (२७) सूत्र से 'आ + इ' के स्थान पर 'ए' यह गुण एकादेश हो कर—'शिव एहि' रूप बना । अब यहां 'आङ्' न होने से ओमाङोश्च (४०) सूत्र प्राप्त नहीं होता; इस पर 'ए' में आङ्त्व लाने के लिये अग्रिम अतिदेश-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम् —(४१) अन्तादिवच्च ।६।१।८२॥ योऽयमेकादेशः स पूर्वस्यान्तवत् परस्यादिवत् स्यात् । शिवेहि ॥ अर्थः—(पूर्व और पर के स्थान पर) जो यह एकादेश किया जाता है वह पूर्व के अन्त के समान तथा पर के आदि के समान होता है । व्याख्या—एकः ।१।१। पूर्व-परयोः ।६।२। (एकः पूर्व-परयोः से) । अन्तादिवत् इत्यव्ययपदम् । च इत्यव्ययपदम् । समासः—अन्तश्च आदिश्च = अन्तादी, इतरेतर- द्वन्द्वः । अन्तादिभ्यां तुल्यम् = अन्तादिवत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८) इति वति-प्रत्ययः । अर्थः—(एकः) यह एकादेश (पूर्व-परयोः) पूर्व और पर के (अन्ता- दिवत्) अन्त और आदि के समान होता है । तात्पर्य यह है कि एकः पूर्व-परयोः (६.१.८२) सूत्र से जिस एकादेश का अधिकार किया गया है वह एकादेश पूर्व के अन्त के समान तथा पर के आदि के समान होता है। इस सम्पूर्ण एकादेश के अधिकार में पूर्व और पर वर्ण ही स्थानीय हैं; इन वर्णों के एकादेश के अखण्ड होने से इन में अन्त और आदि नहीं बन सकते । अतः यहां पूर्व से पूर्व-वर्ण-घटित (पूर्व वर्ण वाला) शब्द तथा पर से पर-वर्ण-घटित (पर वर्ण वाला) शब्द ग्रहण किया जाता है । यथा— 'क्षीरप + इन' यहां आद् गुणः (२७) से पकारोत्तर अकार तथा 'इन' शब्द के आदि इकार के स्थान पर 'ए' यह एक गुणादेश हो एकाजुत्तरपदे णः (२८६) से णत्व करने पर 'क्षीरपेण' बनता है । यहां एकादेश 'ए' है । यह 'ए' पूर्व-शब्द अर्थात् 'क्षीरप' शब्द के अन्त = अ के समान तथा पर-शब्द अर्थात् 'इन' के आदि = इ के समान होगा । अर्थात् इस 'ए' को अकार मान कर अकाराश्रित कार्य तथा इकार मान कर इकाराश्रित कार्य हो जाएंगे । इस सूत्र के उदाहरण 'काशिका' आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखने चाहियें । 'शिव + एहि' यहां 'ए' यह एकादेश है । यह एकादेश पूर्व शब्द के अन्त के