लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् समान होगा। पूर्व शब्द 'आ' है। इस का अन्त भी 'आ' है। (क्योंकि एक अक्षर में—वही अपना आदि और वही अपना अन्त हुआ करता है। जैसे किसी का एक पुत्र हो तो उस के लिये वही बड़ा और वही छोटा हुआ करता है) अतः यह 'आ' 'आङ्' के सदृश होगा अर्थात् जो २ कार्य 'आङ्' के रहने पर हो सकते हैं, वे इस के रहने पर भी होंगे। 'आङ्' के होने से ओमाङोश्च (४०) सूत्र प्रवृत्त होता है, वह अब 'ए' के होने से भी होगा। तो इस प्रकार ओमाङोश्च (४०) सूत्र से पूर्व + पर के स्थान पर एक पररूप 'ए' हो कर—शिव् 'ए' हि = 'शिवेहि' प्रयोग सिद्ध होता है। शङ्का—ओमाङोश्च (४०) सूत्र में यदि 'आङ्' का ग्रहण न भी करें तो भी 'शिवेहि' आदि रूप यथेष्ट सिद्ध हो सकते हैं। तथाहि—'शिव + आ + इहि' यहां प्रथम अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्ण-दीर्घ हो—'शिवा + इहि' बन जायेगा, पुनः आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने से 'शिवेहि' प्रयोग सिद्ध हो जायेगा। तो ओमाङोश्च (४०) सूत्र में 'आङ्' ग्रहण क्या किया गया है ? समाधान—पाणिनीय-व्याकरण में असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे यह एक परिभाषा है। इस का अभिप्राय यह है कि जहां अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग कार्य युगपत् = इकट्ठे उपस्थित हों वहां बहिरङ्ग को असिद्ध समझ कर प्रथम अन्तरङ्ग कार्य कर लेना चाहिये। बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग कार्यों का विस्तार-पूर्वक विचार व्याकरण के उच्च- ग्रन्थों में किया गया है वहीं देखें। यहां इतना समझ लेना चाहिये कि धातूपसर्गयो कार्यमन्तरङ्गम् अर्थात् धातु और उपसर्ग का पारस्परिक कार्य अन्तरङ्ग होता है। 'शिव + आ + इहि' यहां 'आ' यह उपसर्ग तथा 'इहि' यह धातु है। अतः 'आ + इ' के स्थान पर गुण कार्य अन्तरङ्ग होने से प्रथम होगा, सवर्ण-दीर्घ बहिरङ्ग होने से प्रथम न होगा। इस से जब 'शिव + एहि' बन जायेगा तब यदि ओमाङोश्च (४०) में 'आङ्' का ग्रहण न करेंगे तो वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश होकर—'शिवैहि' ऐसा अनिष्ट प्रयोग बन जायेगा। अतः इस की निवृत्ति के लिये सूत्र में 'आङ्' का ग्रहण अत्यावश्यक है। नोट—ध्यान रहे कि ओमाङोश्च (४०) सूत्र वृद्धिरेचि (३३) तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) दोनों का अपवाद है। अभ्यास (६) (१) आकृति-गण किसे कहते हैं ? शकन्ध्वादि-गण के आकृति गण होने में क्या प्रमाण है ? सविस्तर प्रकाश डालें। (२) 'न + एजते' में एङि पररूपम्, 'अव + एहि' में एत्येधत्यूठ्सु, 'लाङ्गल + ईषा' में आद् गुणः, 'कुल + अटा' में अकः सवर्णे दीर्घः सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होते ? (३) तच्च टे यह किस की उक्ति है ? इस का अभिप्राय स्पष्ट करें। (४) अन्तादिवच्च की आवश्यकता बताते हुए सूत्रार्थ पर प्रकाश डालें।