लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ७३ (५) 'कर्कन्धुः' पर क्षीरस्वामी के मत का खण्डन करें। (६) सारङ्गः-साराङ्गः; सीमन्तः-सीमान्तः; कुलटा-कुलाटी; इन पदयुगलों का सप्रमाण परस्पर भेद निरूपण करें। (७) अधोलिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद कर उसे सूत्रों द्वारा प्रमाणित करें— १. कोमित्यवोचत्। २. प्रेषयति। ३. पतञ्जलिः। ४. कदोढा (कदा +आङ्+ऊढा)। ५. उपेहि। ६. मार्तण्डः। ७. अवेजते। ८. लाङ्ग- लीषा। ६. प्रोपति। १०. मनीषा। ११. प्रेषणीयम्। १२. कृष्णेहि। १३. अश्मन्तकः (शकन्ध्वादि०)। (८) निम्न-लिखित वचनों की सोदाहरण व्याख्या करें— १. यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः स एव ज्येष्ठः स एव कनिष्ठः। २. असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे। ३. धातूपसर्गयोः कार्यमन्तरङ्गम्। (६) 'टि' संज्ञा-विधायक सूत्र का सोदाहरण विवेचन करें। ---::०::--- [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४२) अकः सवर्णे दीर्घः ।६।१।१०१॥ अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्यात्। दैत्यारिः। श्रीशः। विष्णूदयः। होतॄकारः॥ अर्थः—अक् से सवर्ण अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान में दीर्घ एकादेश हो जाता है। व्याख्या—अकः ।१।१। सवर्णे ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्व- परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। दीर्घः ।१।१। अर्थः— (अकः) अक् से (सवर्णे) सवर्ण (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+पर के स्थान में (एकः) एक (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है। अक् प्रत्याहार में 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ' ये पांच वर्ण आते हैं; इन से परे यदि इन का कोई सवर्ण अच् हो तो इन दोनों के स्थान पर एक दीर्घ आदेश हो जाता है। यद्यपि दीर्घ अच् बहुत हैं, तथापि स्थानेऽन्तरतमः (१७) से वही दीर्घ किया जाता है जो इन स्थानियों के तुल्य होता है। उदाहरण यथा— (१) दैत्यारिः (दैत्यों का शत्रु—भगवान् विष्णु)। 'दैत्य्+अरि' यहां यकारोत्तरवर्ती अकार अक् है; इस से परे 'अरि' शब्द का आदि अकार सवर्ण अच् है। अतः इन दोनों के स्थान पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा 'आ' यह दीर्घ एकादेश हो कर विभक्ति लाने से—दैत्य् 'आ' रि = 'दैत्यारिः' प्रयोग सिद्ध होता है। दैत्यानाम् अरिः = दैत्यारिः। (२) श्रीशः (लक्ष्मी का स्वामी = भगवान् विष्णु)। 'श्री+ईश' यहां रेफोत्तर ईकार अक् और उस से परे 'ईश' शब्द का आदि ईकार सवर्ण अच् है। इन दोनों के स्थान पर 'ई' यह सवर्ण-दीर्घ एकादेश हो कर विभक्ति लाने से—श्र् 'ई' श = 'श्रीशः' प्रयोग सिद्ध होता है। श्रिय ईशः = श्रीशः।