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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

तेषामर्थे महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः।
अतस्त्वां क्लीबवद् ब्रूयां युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ७२ ॥
महाराज! मैं निश्चय कर चुका हूँ कि मुझे उन्हींके लिये युद्ध करना है; अतः तुमसे नपुंसककी तरह पूछ रहा हूँ कि तुम युद्धसम्बन्धी सहयोगको छोड़कर मुझसे और क्या चाहते हो? ॥ ७२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वचः।
इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतनः ॥ ७३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**आचार्य! इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरी बात सुनिये। इतना कहकर राजा युधिष्ठिर व्यथित और अचेत-से होकर उनसे कुछ भी बोल न सके ॥ ७३ ॥

संजय उवाच

तं गौतमः प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम् ।
अवध्योऽहं महीपाल युद्ध्यस्व जयमाप्नुहि ॥ ७४ ॥
**संजय कहते हैं—**पृथ्वीपते! कृपाचार्य यह समझ गये कि युधिष्ठिर क्या कहना चाहते हैं; अतः उन्होंने उनसे इस प्रकार कहा—'राजन्! मैं अवध्य हूँ। जाओ, युद्ध करो और विजय प्राप्त करो' ॥ ७४ ॥

प्रीतस्तेऽभिगमनेनाहं जयं तव नराधिप ।
आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७५ ॥
'नरेश्वर! तुम्हारे इस आगमनसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; अतः सदा उठकर मैं तुम्हारी विजयके लिये शुभकामना करूँगा। यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ ७५ ॥

एतच्छ्रुत्वा महाराज गौतमस्य विशाम्पते ।
अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट् ॥ ७६ ॥
महाराज! प्रजानाथ! कृपाचार्यकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर उनकी अनुमति ले जहाँ मद्रराज शल्य थे, उस ओर चले गये ॥ ७६ ॥

स शल्यमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।
उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनःश्रेयसं वचः ॥ ७७ ॥
दुर्जय वीर शल्यको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उनसे अपने हितकी बात कही— ॥ ७७ ॥

अनुमानये त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये विगतकल्मषः । जयेयं नु परान् राजन्ननुज्ञातस्त्वया रिपून् ॥ ७८ ॥ 'दुर्धर्ष वीर! मैं पापरहित एवं निरपराध रहकर आपके साथ युद्ध करूँगा; इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। राजन्! आपकी आज्ञा पाकर मैं समस्त शत्रुओंको युद्धमें परास्त कर सकता हूँ' ॥ ७८ ॥

शल्य उवाच

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय वै रणे ॥ ७९ ॥ **शल्य बोले—**महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं युद्धमें तुम्हारी पराजयके लिये तुम्हें शाप दे देता ॥ ७९ ॥ तुष्टोऽस्मि पूजितश्चास्मि यत् काङ्क्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जयमाप्नुहि ॥ ८० ॥ अब मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुमने मेरा बड़ा सम्मान किया। तुम जो चाहते हो, वह पूर्ण हो। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्ध करो और विजय प्राप्त करो ॥ ८० ॥

ब्रूहि चैव परं वीर केनार्थः किं ददामि ते ।
एवंगते महाराज युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ८१ ॥
वीर! तुम कुछ और बताओ, किस प्रकार तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा? मैं तुम्हें क्या दूँ? महाराज! इस परिस्थितिमें युद्धविषयक सहयोगको छोड़कर तुम मुझसे और क्या चाहते हो? ॥ ८१ ॥

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ८२ ॥
पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ ॥ ८२ ॥

करिष्यामि हि ते कामं भागिनेय यथेप्सितम् ।
ब्रवीम्यतः क्लीबवत् त्वां युद्धादन्यत् किमिच्छसि ॥ ८३ ॥
इसलिये मैं तुमसे नपुंसककी भाँति कह रहा हूँ। बताओ, तुम युद्धविषयक सहयोगके सिवा और क्या चाहते हो? मेरे भानजे! मैं तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करूँगा ॥ ८३ ॥

युधिष्ठिर उवाच
मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मद्वितमुत्तमम् ।
कामं युद्ध्य परस्यार्थे वरमेतं वृणोम्यहम् ॥ ८४ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**महाराज! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ कि आप प्रतिदिन उत्तम हितकी सलाह मुझे देते रहें। अपने इच्छानुसार युद्ध दूसरेके लिये करें ॥ ८४ ॥

शल्य उवाच
किमत्र ब्रूहि साह्यं ते करोमि नृपसत्तम ।
कामं योत्स्ये परस्यार्थे बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ ८५ ॥
**शल्य बोले—**नृपश्रेष्ठ! बताओ, इस विषयमें मैं तुम्हारी क्या सहायता करूँ? कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ; अतः अपने इच्छानुसार युद्ध तो मैं तुम्हारे विपक्षीकी ओरसे ही करूँगा ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिर उवाच
स एव मे वरः शल्य उद्योगे यस्त्वया कृतः ।
सूतपुत्रस्य संग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया ॥ ८६ ॥
(त्वां हि योक्ष्यति सूतत्वे सूतपुत्रस्य मातुल ।
दुर्योधनो रणे शूरमिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥)
**युधिष्ठिर बोले—**मामाजी! जब युद्धके लिये उद्योग चल रहा था, उन दिनों आपने मुझे जो वर दिया था, वही वर आज भी मेरे लिये आवश्यक है। सूतपुत्रका अर्जुनके साथ युद्ध

हो तो उस समय आपको उसका उत्साह नष्ट करना चाहिये। मामाजी! मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि उस युद्धमें दुर्योधन आप-जैसे शूरवीरको सूतपुत्रके सारथिका कार्य करनेके लिये अवश्य नियुक्त करेगा॥ ८६॥

शल्य उवाच सम्पत्स्यत्येष ते कामः कुन्तीपुत्र यथेप्सितम्। गच्छ युध्यस्व विश्रब्धः प्रतिजाने वचस्तव॥ ८७॥ **शल्य बोले—**कुन्तीनन्दन! तुम्हारा यह अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। जाओ, निश्चिन्त होकर युद्ध करो। मैं तुम्हारे वचनका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करता हूँ॥ ८७॥

संजय उवाच अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम्। निर्जगाम महासैन्याद् भ्रातृभिः परिवारितः॥ ८८॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने मामा मद्रराज शल्यकी अनुमति लेकर भाइयोंसे घिरे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उस विशाल सेनासे बाहर निकल गये॥ ८८॥

वासुदेवस्तु राधेयमाहवेऽभिजगाम वै। तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः॥ ८९॥ इसी समय भगवान् श्रीकृष्ण उस युद्धमें राधानन्दन कर्णके पास गये। वहाँ जाकर उन गदाग्रजने पाण्डवोंके हितके लिये उससे इस प्रकार कहा—॥ ८९॥

श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात् किल न योत्स्यसे। अस्मान् वरय राधेय यावद् भीष्मो न हन्यते॥ ९०॥ 'कर्ण! मैंने सुना है, तुम भीष्मसे द्वेष होनेके कारण युद्ध नहीं करोगे। राधानन्दन! ऐसी दशामें जबतक भीष्म मारे नहीं जाते हैं, तबतक हमलोगोंका पक्ष ग्रहण कर लो॥ ९०॥

हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम्। धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत् समम्॥ ९१॥ 'राधेय! जब भीष्म मारे जायँ, उसके बाद तुम यदि ठीक समझो तो युद्धमें पुनः दुर्योधनकी सहायताके लिये चले आना'॥ ९१॥

कर्ण उवाच न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव। त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम्॥ ९२॥ **कर्ण बोला—**केशव! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं दुर्योधनका हितैषी हूँ। उसके लिये अपने प्राणोंको निछावर किये बैठा हूँ; अतः मैं उसका अप्रिय कदापि नहीं करूँगा॥ ९२॥

संजय उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णः संन्यवर्तत भारत ।
युधिष्ठिरपुरोगैश्च पाण्डवैः सह संगतः ॥ ९३ ॥
संजय कहते हैं— भारत! कर्णकी यह बात सुनकर श्रीकृष्ण लौट आये और युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंसे जा मिले ॥ ९३ ॥

अथ सैन्यस्य मध्ये तु प्राक्रोशत् पाण्डवाग्रजः ।
योऽस्मान् वृणोति तमहं वरये साह्यकारणात् ॥ ९४ ॥
तदनन्तर ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने सेनाके बीचमें खड़े होकर पुकारा— 'जो कोई वीर सहायताके लिये हमारे पक्षमें आना स्वीकार करे, उसे मैं भी स्वीकार करूँगा' ॥ ९४ ॥

अथ तान् समभिप्रेक्ष्य युयुत्सुरिदमब्रवीत् ।
प्रीतात्मा धर्मराजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ९५ ॥
उस समय आपके पुत्र युयुत्सुने पाण्डवोंकी ओर देखकर प्रसन्नचित्त हो धर्मराज कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ ९५ ॥

अहं योत्स्यामि भवतः संयुगे धृतराष्ट्रजान् ।
युष्मदर्थं महाराज यदि मां वृणुषेऽनघ ॥ ९६ ॥
'महाराज! निष्पाप नरेश! यदि आप मुझे स्वीकार करें तो मैं आपलोगोंके लिये युद्धमें धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे युद्ध करूँगा' ॥ ९६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एह्येहि सर्वे योत्स्यामस्तव भ्रातॄनपण्डितान् ।
युयुत्सो वासुदेवश्च वयं च ब्रूम सर्वशः ॥ ९७ ॥
युधिष्ठिर बोले— युयुत्सो! आओ, आओ। हम सब लोग मिलकर तुम्हारे इन मूर्ख भाइयोंसे युद्ध करेंगे। यह बात हम और भगवान् श्रीकृष्ण सभी कह रहे हैं ॥ ९७ ॥

वृणोमि त्वां महाबाहो युद्ध्यस्व मम कारणात् ।
त्वयि पिण्डश्च तन्तुश्च धृतराष्ट्रस्य दृश्यते ॥ ९८ ॥
महाबाहो! मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये युद्ध करो। राजा धृतराष्ट्रकी वंशपरम्परा तथा पिण्डोदक-क्रिया तुमपर ही अवलम्बित दिखायी देती है ॥ ९८ ॥

भजस्वास्मान् राजपुत्र भजमानान् महाद्युते ।
न भविष्यति दुर्बुद्धिर्धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ॥ ९९ ॥
महातेजस्वी राजकुमार! हम तुम्हें अपनाते हैं। तुम भी हमें स्वीकार करो। अत्यन्त क्रोधी दुर्बुद्धि दुर्योधन अब इस संसारमें जीवित नहीं रहेगा ॥ ९९ ॥

संजय उवाच

ततो युयुत्सुः कौरव्यान् परित्यज्य सुतांस्तव ।

(स सत्यमिति मन्वानो युधिष्ठिरवचस्तदा ।)
जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम् ॥ १०० ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर युयुत्सु युधिष्ठिर-की बातको सच मानकर आपके सभी पुत्रोंको त्यागकर डंका पीटता हुआ पाण्डवोंकी सेनामें चला गया ॥ १०० ॥
(अवसद् धार्तराष्ट्रस्य कुत्सयन् कर्म दुष्कृतम् ।
सेनामध्ये हि तैः साकं युद्धाय कृतनिश्चयः ॥)
वह दुर्योधनके पापकर्मकी निन्दा करता हुआ युद्धका निश्चय करके पाण्डवोंके साथ उन्हींकी सेनामें रहने लगा।
ततो युधिष्ठिरो राजा सम्प्रहृष्टः सहानुजः ।
जग्राह कवचं भूयो दीप्तिमत् कनकोज्ज्वलम् ॥ १०१ ॥
तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित अत्यन्त प्रसन्न हो सोनेका बना हुआ चमकीला कवच धारण किया ॥ १०१ ॥
प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्वरथान् पुरुषर्षभाः ।
ततो व्यूहं यथापूर्वं प्रत्यव्यूहन्त ते पुनः ॥ १०२ ॥
फिर वे सभी श्रेष्ठ पुरुष अपने-अपने रथपर आरूढ़ हुए; इसके बाद उन्होंने पुनः शत्रुओंके मुकाबलेमें पहलेकी भाँति ही अपनी सेनाकी व्यूह-रचना की ॥ १०२ ॥
अवादयन् दुन्दुभींश्च शतशश्चैव पुष्करान् ।
सिंहनादांश्च विविधान् विनेदुः पुरुषर्षभाः ॥ १०३ ॥
उन श्रेष्ठ पुरुषोंने सैकड़ों दुन्दुभियाँ और नगारे बजाये तथा अनेक प्रकारसे सिंह-गर्जनाएँ कीं ॥ १०३ ॥
रथस्थान् पुरुषव्याघ्रान् पाण्डवान् प्रेक्ष्य पार्थिवाः ।
धृष्टद्युम्नादयः सर्वे पुनर्जहृषिरे तदा ॥ १०४ ॥
पुरुषसिंह पाण्डवोंको पुनः रथपर बैठे देख धृष्टद्युम्न आदि राजा बड़े प्रसन्न हुए ॥ १०४ ॥
गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान् मानयतां च तान् ।
दृष्ट्वा महीक्षितस्तत्र पूजयाञ्चक्रिरे भृशम् ॥ १०५ ॥
माननीय पुरुषोंका सम्मान करनेवाले पाण्डवोंके उस गौरवको देखकर सब भूपाल उनकी बड़ी प्रशंसा करने लगे ॥ १०५ ॥
सौहृदं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् ।
दयां च ज्ञातिषु परां कथयाञ्चक्रिरे नृपाः ॥ १०६ ॥
सब राजा महात्मा पाण्डवोंके सौहार्द, कृपाभाव, समयोचित कर्तव्यके पालन तथा कुटुम्बियोंके प्रति परम दयाभावकी चर्चा करने लगे ॥ १०६ ॥
साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसंहिताः ।

वाचः पुण्याः कीर्तिमतां मनोहृदयहर्षणाः ॥ १०७ ॥
यशस्वी पाण्डवोंके लिये सब ओरसे उनकी स्तुतिप्रशंसासे भरी हुई 'साधु-साधु' की बातें निकलती थीं। उन्हें ऐसी पवित्र वाणी सुननेको मिलती थी, जो मन और हृदयके हर्षको बढ़ानेवाली थी ॥ १०७ ॥

म्लेच्छाश्चार्याश्च ये तत्र ददृशुः शुश्रुवुस्तथा ।
वृत्तं तत् पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदाः ॥ १०८ ॥
वहाँ जिन-जिन म्लेच्छों और आर्योंने पाण्डवोंका वह बर्ताव देखा तथा सुना, वे सब गद्गदकण्ठ होकर रोने लगे ॥ १०८ ॥

ततो जघ्नुर्महाभेरीः शतशश्च सहस्रशः ।
शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान् दध्मुर्हृष्टा मनस्विनः ॥ १०९ ॥
तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सभी मनस्वी पुरुषोंने सैकड़ों और हजारों बड़ी-बड़ी भेरियों तथा गोदुग्धके समान श्वेत शंखोंको बजाया ॥ १०९ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मादिसम्मानने
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म आदिका समादरविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके तीन श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं।]


* उपर्युक्त पाँच श्लोक कितनी ही प्रतियोंमें नहीं हैं और कितनी ही प्रतियोंमें हैं।

अध्याय (पृष्ठ 1699)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुश्चत्वारिं‍शोऽध्यायः

कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ

धृतराष्ट्र उवाच

एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च ।
के पूर्वं प्राहरंस्तत्र कुरवः पाण्डवा नु किम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! इस प्रकार जब मेरे पुत्रों और पाण्डवोंने अपनी-अपनी सेनाओंका व्यूह लगा लिया, तब वहाँ उनमेंसे पहले किन्होंने प्रहार किया, कौरवोंने या पाण्डवोंने? ॥ १ ॥

संजय उवाच

भ्रातृभिः सहितो राजन् पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा प्रययौ सह सेनया ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! भाइयोंसहित आपका पुत्र दुर्योधन भीष्मको आगे करके सेनासहित आगे बढ़ा ॥ २ ॥

तथैव पाण्डवाः सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।
भीष्मेण युद्धमिच्छन्तः प्रययुर्हृष्टमानसाः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार समस्त पाण्डव भी भीमसेनको आगे करके भीष्मसे युद्ध करनेकी इच्छा रखकर प्रसन्न मनसे आगे बढ़े ॥ ३ ॥

क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः ।
भेरीमृदङ्गमुरजा हयकुञ्जरनिःस्वनाः ॥ ४ ॥
उभयोः सेनयोर्ह्यासंस्ततस्तेऽस्मान् समाद्रवन् ।
वयं तान् प्रतिनर्दन्तस्तदासीत् तुमुलं महत् ॥ ५ ॥
फिर तो दोनों सेनाओंमें सिंहनाद, किलकारियोंके शब्द, क्रकच, नरसिंघे, भेरी, मृदंग और ढोल आदि वाद्योंकी ध्वनि तथा घोड़ों और हाथियोंके गर्जनेके शब्द गूँजने लगे। पाण्डव सैनिक हमलोगोंपर टूट पड़े और हमलोगोंने भी विकट गर्जना करते हुए उनपर धावा बोल दिया। इस प्रकार अत्यन्त घोर युद्ध होने लगा ॥ ४-५ ॥

महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रये
समागमे पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।
चकम्पिरे शङ्खमृदङ्गनिःस्वनैः
प्रकम्पितानीव वनानि वायुना ॥ ६ ॥

भीषण मारकाटसे युक्त उन महान् संग्राममें आपके पुत्रों तथा पाण्डवोंकी विशाल सेनाएँ प्रचण्ड वायुसे विकम्पित हुए वनोंकी भाँति शंख और मृदंगके शब्दोंसे काँपने लगीं ॥ ६ ॥
नरेन्द्रनागाश्वरथाकुलाना-
मभ्यागतानामशिवे मुहूर्ते ।
बभूव घोषस्तुमुलश्चमूंनां
वातोद्धूतानामिव सागराणाम् ॥ ७ ॥
राजाओं, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंसे भरी हुई उभय पक्षकी सेनाएँ उस अमंगलमय मुहूर्तमें जब एक-दूसरेके सम्मुख और समीप आयीं, उस समय वायुसे उद्वेलित समुद्रोंकी भाँति उनका भयंकर कोलाहल सब ओर गूँजने लगा ॥ ७ ॥
तस्मिन् समुत्थिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे ।
भीमसेनो महाबाहुः प्राणदद् गोवृषो यथा ॥ ८ ॥
उस रोमांचकारी भयंकर शब्दके प्रकट होते ही महाबाहु भीमसेन साँड़की भाँति गर्जने लगे ॥ ८ ॥
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं वारणानां च बृंहितम् ।
सिंहनादं च सैन्यानां भीमसेनरवोऽभ्यभूत् ॥ ९ ॥
भीमसेनकी वह गर्जना शंख और दुन्दुभियोंके गम्भीर घोष, गजराजोंके चिग्घाड़नेकी आवाज तथा सैनिकोंके सिंहनादको भी दबाकर सब ओर सुनायी देने लगी ॥ ९ ॥
हयानां ह्रेषमाणानामनीकेषु सहस्रशः ।
सर्वानभ्यभवच्छब्दान् भीमस्य नदतः स्वनः ॥ १० ॥
उन सेनाओंमें हजारों घोड़े जोर-जोरसे हिनहिना रहे थे; परंतु गर्जना करते हुए भीमसेनका शब्द उन सब शब्दोंको दबाकर ऊपर उठ गया था ॥ १० ॥
तं श्रुत्वा निनदं तस्य सैन्यास्तव वितत्रसुः ।
जीमूतस्येव नदतः शक्राशनिसमस्वनम् ॥ ११ ॥
वे मेघके समान गम्भीर स्वरमें गर्जन-तर्जन कर रहे थे। उनका शब्द इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान भयानक था। उस सिंहनादको सुनकर आपके समस्त सैनिक संत्रस्त हो उठे थे ॥ ११ ॥
वाहनानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ।
शब्देन तस्य वीरस्य सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥ १२ ॥
जैसे सिंहकी आवाज सुनकर दूसरे वन्य पशु भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार वीर भीमसेनकी गर्जनासे भयभीत हो कौरव-सेनाके समस्त वाहन मल-मूत्र करने लगे ॥ १२ ॥
दर्शयन् घोरमात्मानं महाभ्रमिव नादयन् ।
बिभीषयंस्तव सुतान् भीमसेनः समभ्ययात् ॥ १३ ॥

महान् मेघके समान अपने भयंकर रूपको प्रकट करते, गर्जते तथा आपके पुत्रोंको डराते हुए भीमसेन कौरव-सेनापर चढ़ आये ॥ १३ ॥ तमायान्तं महेष्वासं सोदर्याः पर्यवारयन् । छादयन्तः शरव्रातैर्मेघा इव दिवाकरम् ॥ १४ ॥ महान् धनुर्धर भीमसेनको आते देख दुर्योधनके भाइयों (तथा अन्य वीरों)-ने जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार बाणसमूहोंसे उन्हें आच्छादित करते हुए सब ओरसे घेर लिया ॥ १४ ॥ दुर्योधनश्च पुत्रस्ते दुर्मुखो दुःशलः शलः । दुःशासनश्चातिरथस्तथा दुर्मर्षणो नृप ॥ १५ ॥ विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः । पुरुमित्रो जयो भोजः सौमदत्तिश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ महाचापानि धुन्वन्तो मेघा इव सविद्युतः । आददानाश्च नाराचान् निर्मुक्ताशीविषोपमान् ॥ १७ ॥ (अग्रतः पाण्डुसेनाया ह्यतिष्ठन् पृथिवीक्षितः ॥) नरेश्वर! आपके पुत्र दुर्योधन, दुर्मुख, दुःशल, शल, अतिरथी दुःशासन, दुर्मर्षण, विविंशति, चित्रसेन, महारथी विकर्ण, पुरुमित्र, जय, भोज तथा पराक्रमी भूरिश्रवा—ये सभी वीर अपने बड़े-बड़े धनुषोंको कँपाते और छूटनेपर विषधर सर्पके समान प्रतीत होनेवाले बाणोंको हाथमें लेते हुए बिजलियोंसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे। ये सभी भूपाल पाण्डव-सेनाके सम्मुख (भीमसेनको घेरकर) खड़े हो गये ॥ १५—१७ ॥ अथ ते द्रौपदीपुत्राः सौभद्रश्च महारथः । नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षदः ॥ १८ ॥ धार्तराष्ट्रान् प्रतिययुर्ददयन्तः शितैः शरैः । वज्रैरिव महावेगैः शिखराणि धराभृताम् ॥ १९ ॥ तदनन्तर द्रौपदीके पाँचों पुत्र, महारथी अभिमन्यु, नकुल, सहदेव तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये सभी योद्धा वज्रके समान महान् वेगशाली तीक्ष्ण बाणोंद्वारा पर्वत-शिखरोंकी भाँति धृतराष्ट्रपुत्रोंको पीड़ा देते हुए उनपर चढ़ आये ॥ १८-१९ ॥ तस्मिन् प्रथमसंग्रामे भीमज्यातालनिःस्वने । तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः ॥ २० ॥ उस प्रथम संग्राममें जब भयानक धनुषोंकी टंकार तथा ताल ठोंकनेकी आवाज हो रही थी, आपके तथा पाण्डवोंके दलमें भी कोई युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ २० ॥ लाघवं द्रोणशिष्याणामपश्यं भरतर्षभ । निमित्तवेधिनां चैव शरानुत्सृजतां भृशम् ॥ २१ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समय मैंने द्रोणाचार्यके उन शिष्योंकी फुर्ती देखी। वे बड़ी तीव्र गतिसे बाण छोड़ते और लक्ष्यको बींध डालते थे॥ २१॥ नोपशाम्यति निर्घोषो धनुषां कूजतां तथा। विनिश्चेरुः शरा दीप्ता ज्योतींषीव नभस्तलात्॥ २२॥ वहाँ टंकार करते हुए धनुषोंके शब्द कभी शान्त नहीं होते थे। आकाशसे नक्षत्रोंके समान उन धनुषोंसे चमकीले बाण प्रकट हो रहे थे॥ २२॥ सर्वे त्वन्ये महीपालाः प्रेक्षका इव भारत। ददृशुर्दर्शनीयं तं भीमं ज्ञातिसमागमम्॥ २३॥ भरतनन्दन! दूसरे सब राजालोग उस कुटुम्बीजनोंके भयंकर दर्शनीय संग्रामको दर्शककी भाँति देखने लगे॥ २३॥ ततस्ते जातसंरम्भाः परस्परकृतागसः। अन्योन्यस्पर्धया राजन् व्ययाच्छन्त महारथाः॥ २४॥ राजन्! बाल्यावस्थामें वे सभी एक-दूसरेका अपराध कर चुके थे। सबका स्मरण हो आनेसे वे सभी महारथी रोषमें भर गये और एक-दूसरेके प्रति स्पर्धा रखनेके कारण युद्धमें विजयी होनेके लिये विशेष परिश्रम करने लगे॥ २४॥ कुरुपाण्डवसेने ते हस्त्यश्वरथसंकुले। शुशुभाते रणेऽतीव पटे चित्रार्पिते इव॥ २५॥ हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई कौरव-पाण्डवोंकी वे सेनाएँ पटपर अंकित हुई चित्रमयी सेनाओंकी भाँति उस रणभूमिमें विशेष शोभा पा रही थीं॥ २५॥ ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रगृहीतशरासनाः। सहसैन्याः समापेतुः पुत्रस्य तव शासनात्॥ २६॥ तदनन्तर आपके पुत्र दुर्योधनकी आज्ञासे अन्य सब राजा भी हाथमें धनुष-बाण लिये सेनाओंसहित वहाँ आ पहुँचे॥ २६॥ युधिष्ठिरेण चादिष्टाः पार्थिवास्ते सहस्रशः। विनदन्तः समापेतुः पुत्रस्य तव वाहिनीम्॥ २७॥ इसी प्रकार युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर सहस्रों नरेश गर्जना करते हुए आपके पुत्रकी सेनापर टूट पड़े॥ २७॥ उभयोः सेनयोस्तीव्रः सैन्यानां स समागमः। अन्तर्धीयत चादित्यः सैन्येन रजसाऽऽवृतः॥ २८॥ उन दोनों सेनाओंका वह संघर्ष अत्यन्त दुःसह था। सेनाकी धूलसे आच्छादित हो सूर्यदेव अदृश्य हो गये॥ २८॥ प्रयुद्धानां प्रभग्नानां पुनरावर्तिनामपि। नात्र स्वेषां परेषां वा विशेषः समदृश्यत॥ २९॥

कुछ लोग युद्ध करते, कुछ भागते और कुछ भागकर फिर लौट आते थे। इस बातमें अपने और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ २९ ॥
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ।
अतिसर्वाण्यनीकानि पिता तेऽभिव्यरोचत ॥ ३० ॥
जिस समय वह अत्यन्त भयानक तुमुल युद्ध छिड़ा हुआ था, उस समय आपके ताऊ भीष्मजी उन समस्त सेनाओंसे ऊपर उठकर अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि युद्धारम्भे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें युद्धका आरम्भविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 1704)

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

उभय पक्षके सैनिकोंका द्वन्द्व-युद्ध

संजय उवाच

पूर्वाह्ने तस्य रौद्रस्य युद्धमहो विशाम्पते ।
प्रावर्तत महाघोरं राज्ञां देहावकर्तनम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— प्रजानाथ! उस भयंकर दिनके प्रथम भागमें महाभयानक युद्ध होने लगा, जो राजाओंके शरीरका उच्छेद करनेवाला था ॥ १ ॥

कुरुणां सृञ्जयानां च जिगीषूणां परस्परम् ।
सिंहानामिव संह्रादो दिवमुर्वी च नादयन् ॥ २ ॥
कौरव और सृंजयवंशी वीर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे। उनका वह सिंहनाद पृथ्वी और आकाशको प्रतिध्वनित कर रहा था ॥ २ ॥

आसीत् किलकिलाशब्दस्तलशङ्खरवैः सह ।
जज्ञिरे सिंहनादाश्च शूराणां प्रतिगर्जताम् ॥ ३ ॥
तल और शंखोंकी ध्वनिके साथ सैनिकोंका किलकिल शब्द गूँज उठा। एक-दूसरेके प्रति गर्जना करनेवाले शूरवीरोंके सिंहनाद होने लगे ॥ ३ ॥

तलत्राभिहताश्चैव ज्याशब्दा भरतर्षभ ।
पत्तीनां पादशब्दश्च वाजिनां च महास्वनः ॥ ४ ॥
तोत्राङ्कुशनिपातश्च आयुधानां च निःस्वनः ।
घण्टाशब्दश्च नागानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ ५ ॥
तस्मिन् समुदिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे ।
बभूव रथनिर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! तलत्राणके आघातसे टकरायी हुई प्रत्यंचाओंके शब्द, पैदल सिपाहियोंके पैरोंकी धमक, उच्चस्वरसे होनेवाली घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चाबुक और अंकुशके आघातका शब्द, हथियारोंकी झनझनाहट तथा एक-दूसरेपर धावा करनेवाले गजराजोंके घण्टानाद—ये सब शब्द मिलकर ऐसी भयंकर आवाज प्रकट करने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उसीमें रथोंके पहियोंकी घरघराहट होने लगी, जो मेघोंकी विकट गर्जनाके समान जान पड़ती थी ॥ ४—६ ॥

ते मनः क्रूरमाधाय समभित्यक्तजीविताः ।
पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ॥ ७ ॥
वे समस्त कौरव सैनिक अपने मनको कठोर बना प्राणोंकी बाजी लगाकर ऊँची ध्वजाएँ फहराते हुए पाण्डवोंपर धावा करने लगे ॥ ७ ॥

अथ शान्तनवो राजन्नभ्यधावद् धनंजयम् ।
प्रगृह्य कार्मुकं घोरं कालदण्डोपमं रणे ॥ ८ ॥
राजन्! तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्म उस युद्धभूमिमें कालदण्डके समान भीषण धनुष लेकर अर्जुनकी ओर दौड़े ॥ ८ ॥
अर्जुनोऽपि धनुर्गृह्य गाण्डीवं लोकविश्रुतम् ।
अभ्यधावत तेजस्वी गाङ्गेयं रणमूर्धनि ॥ ९ ॥
उधरसे महातेजस्वी अर्जुन भी अपना लोकविख्यात गाण्डीव धनुष लेकर युद्धके मुहानेपर गंगानन्दन भीष्मकी ओर दौड़े ॥ ९ ॥
तावुभौ कुरुशार्दूलौ परस्परवधैषिणौ ।
गाङ्गेयस्तु रणे पार्थं विद्ध्वा नाकम्पयद् बली ॥ १० ॥
वे दोनों कुरुकुलके सिंह थे और एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखते थे। बलवान् भीष्म युद्धमें अर्जुनको घायल करके भी उन्हें विचलित न कर सके ॥ १० ॥
तथैव पाण्डवो राजन् भीष्मं नाकम्पयद् युधि ।
सात्यकिस्तु महेष्वासः कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ११ ॥
राजन्! उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुन भी भीष्मको युद्धमें हिला न सके। दूसरी ओर महाधनुर्धर सात्यकिने कृतवर्मापर धावा किया ॥ ११ ॥
तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
सात्यकिः कृतवर्माणं कृतवर्मा च सात्यकिम् ॥ १२ ॥
आनर्च्छतुः शरैर्घोरैस्तक्षमाणौ परस्परम् ।
उन दोनोंमें बड़ा भयंकर रोमांचकारी युद्ध हुआ। सात्यकिने कृतवर्माको और कृतवर्माने सात्यकिको भयंकर बाणोंसे घायल करते हुए एक-दूसरेको बड़ी पीड़ा पहुँचाई ॥ १२ १/२ ॥
तौ शरार्चितसर्वाङ्गौ शुशुभाते महाबलौ ॥ १३ ॥
वसन्ते पुष्पशबलौ पुष्पिताविव किंशुकौ ।
वे दोनों महाबली वीर सर्वांगमें बाणोंसे छिदे होनेके कारण वसन्त-ऋतुमें खिले हुए दो पुष्पयुक्त पलाश वृक्षोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ १३ १/२ ॥
अभिमन्युर्महेष्वासं बृहद्बलमयोधयत् ॥ १४ ॥
ततः कोसलराजासावभिमन्योर्विशाम्पते ।
ध्वजं चिच्छेद समरे सारथिं च न्यपातयत् ॥ १५ ॥
अभिमन्युने महान् धनुर्धर बृहद्बलके साथ युद्ध किया। प्रजानाथ! कोसलनरेश बृहद्बलने उस युद्धमें अभिमन्युके ध्वजको काट दिया और सारथिको मार गिराया ॥ १४-१५ ॥
सौभद्रस्तु ततः क्रुद्धः पातिते रथसारथौ ।
बृहद्बलं महाराज विव्याध नवभिः शरैः ॥ १६ ॥

महाराज! अपने रथके सारथिके मारे जानेपर सुभद्रकुमार अभिमन्यु कुपित हो उठे और उन्होंने बृहद्बलको नौ बाणोंसे घायल कर दिया ।। १६ ।।

अथापराभ्यां भल्लाभ्यां शिताभ्यामरिमर्दनः । ध्वजमेकेन चिच्छेद पार्ष्णिमेकेन सारथिम् ।। १७ ।। अन्योन्यं च शरैः क्रुद्धौ ततक्षाते परस्परम् । तत्पश्चात् शत्रुमर्दन अभिमन्युने अन्य दो तीखे बाणोंसे बृहद्बलके ध्वजको काट डाला, फिर एक बाणसे उनके पृष्ठरक्षकको और दूसरेसे सारथिको मार डाला। फिर वे दोनों अत्यन्त कुपित हो तीखे सायकोंद्वारा एक-दूसरेको बेधने लगे ।। १७ १/२ ।।

मानिनं समरे दृप्तं कृतवैरं महारथम् ।। १८ ।। भीमसेनस्तव सुतं दुर्योधनमयोधयत् । युद्धमें अभिमान प्रकट करनेवाले, घमंडी और पहलेके वैरी आपके महारथी पुत्र दुर्योधनसे भीमसेन युद्ध करने लगे ।। १८ १/२ ।।

तावुभौ नरशार्दूलौ कुरुमुख्यौ महाबलौ ।। १९ ।। अन्योन्यं शरवर्षाभ्यां ववृषाते रणाजिरे । वे दोनों नरश्रेष्ठ महाबली वीर कुरुकुलके प्रधान व्यक्ति थे। उन्होंने समरांगणमें एक-दूसरेपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। १९ १/२ ।।

तौ वीक्ष्य तु महात्मानौ कृतिनौ चित्रयोधिनौ ।। २० ।। विस्मयः सर्वभूतानां समजायत भारत । भारत! वे दोनों महामनस्वी अस्त्रविद्याके विद्वान् तथा विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले थे। उन्हें देखकर समस्त प्राणियोंको बड़ा विस्मय हुआ ।। २० १/२ ।।

दुःशासनस्तु नकुलं प्रत्युद्याय महाबलम् ।। २१ ।। अविध्यन्निशितैर्बाणैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः । दुःशासनने आगे बढ़कर मर्मस्थानोंको विदीर्ण करनेवाले अपने बहुसंख्यक तीखे बाणोंद्वारा महाबली नकुलको घायल कर दिया ।। २१ १/२ ।।

तस्य माद्रीसुतः केतुं सशरं च शरासनम् ।। २२ ।। चिच्छेद निशितैर्बाणैः प्रहसन्निव भारत । अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ।। २३ ।। भारत! तब माद्रीकुमार नकुलने भी हँसते हुए-से तीखे बाण मारकर दुःशासनके धनुष-बाण और ध्वजको काट गिराया और पचीस बाण मारकर उसे घायल कर दिया ।। २२-२३ ।।

पुत्रस्तु तव दुर्धर्षो नकुलस्य महाहवे । तुरङ्गांश्चिच्छिदे बाणैर्ध्वजं चैवाभ्यपातयत् ।। २४ ।।

इसके बाद आपके दुर्धर्ष पुत्रने उस महायुद्धमें नकुलके घोड़ोंको अपने सायकोंद्वारा काट डाला और ध्वजको भी नीचे गिरा दिया ॥ २४ ॥ दुर्मुखः सहदेवं च प्रत्युद्याय महाबलम् । विव्याध शरवर्षेण यतमानं महाहवे ॥ २५ ॥ महाबली सहदेव उस महासमरमें अपनी विजय-के लिये बड़ा प्रयत्न कर रहे थे। उन्हें आपके पुत्र दुर्मुखने धावा करके अपने बाणोंकी वर्षासे घायल कर दिया ॥ २५ ॥ सहदेवस्ततो वीरो दुर्मुखस्य महारणे । शरेण भृशतीक्ष्णेन पातयामास सारथिम् ॥ २६ ॥ तब वीरवर सहदेवने उस महायुद्धमें अत्यन्त तीखे बाणसे दुर्मुखके सारथिको मार गिराया ॥ २६ ॥ तावन्योन्यं समासाद्य समरे युद्धदुर्मदौ । त्रासयेतां शरैर्घोरैः कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥ २७ ॥ वे दोनों युद्धदुर्मद वीर समरांगणमें एक-दूसरेसे टक्कर लेकर पूर्वकृत अपराधोंका बदला लेनेकी इच्छा रखते हुए भयंकर बाणोंद्वारा एक-दूसरेको भयभीत करने लगे ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरः स्वयं राजा मद्रराजानमभ्ययात् । तस्य मद्राधिपश्चापं द्विधा चिच्छेद मारिष ॥ २८ ॥ स्वयं राजा युधिष्ठिरने मद्रराज शल्यपर आक्रमण किया। राजन्! मद्रराजने युधिष्ठिरके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥ २८ ॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अन्यत् कार्मुकमादाय वेगवद् बलवत्तरम् ॥ २९ ॥ ततो मद्रेश्वरं राजा शरैः संनतपर्वभिः । छादयामास संक्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३० ॥ तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा वेगयुक्त एवं प्रबलतर धनुष ले लिया और झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा मद्रराज शल्यको ढक दिया। फिर क्रोधमें भरकर कहा— 'खड़े रहो, खड़े रहो' ॥ २९-३० ॥ धृष्टद्युम्नस्ततो द्रोणमभ्यद्रवत भारत । तस्य द्रोणः सुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् ॥ ३१ ॥ त्रिधा चिच्छेद समरे पाञ्चाल्यस्य तु कार्मुकम् । भरतनन्दन! एक ओरसे धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया। तब द्रोणने अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धमें दूसरोंके मारनेके साधनभूत धृष्टद्युम्नके सुदृढ़ धनुषके तीन टुकड़े कर डाले ॥ ३१ १/२ ॥ शरं चैव महाघोरं कालदण्डमिवापरम् ॥ ३२ ॥

प्रेषयामास समरे सोऽस्य काये न्यमज्जत । तदनन्तर उस रणक्षेत्रमें उन्होंने द्वितीय कालदण्डके समान अत्यन्त भयंकर बाण चलाया। वह बाण धृष्टद्युम्नके शरीरमें धँस गया ॥ ३२ १/२ ॥ अथान्यद् धनुरादाय सायकांश्च चतुर्दश ॥ ३३ ॥ द्रोणं द्रुपदपुत्रस्तु प्रतिविव्याध संयुगे । तावन्योन्यं सुसंक्रुद्धौ चक्रतुः सुभृशं रणम् ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने दूसरा धनुष लेकर चौदह सायक चलाये और उस युद्धभूमिमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेपर अत्यन्त कुपित हो भीषण संग्राम करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ सौमदत्तिं रणे शङ्खो रभसं रभसो युधि । प्रत्युद्ययौ महाराज तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३५ ॥ महाराज! वेगशाली शंखने उस युद्धमें वेगवान् वीर भूरिश्रवापर धावा किया और कहा—'खड़े रहो, खड़े रहो' ॥ ३५ ॥ तस्य वै दक्षिणं वीरो निर्बिभेद रणे भुजम् । सौमदत्तिस्तथा शङ्खं जत्रुदेशे समाहनत् ॥ ३६ ॥ वीर शंखने रणभूमिमें भूरिश्रवाकी दाहिनी भुजा विदीर्ण कर डाली; फिर भूरिश्रवाने भी शंखके गलेकी हँसलीपर बाण मारा ॥ ३६ ॥ तयोस्तदभवद् युद्धं घोररूपं विशाम्पते । दृप्तयोः समरे पूर्वं वृत्रावासवयोरिव ॥ ३७ ॥ राजन्! उस समरभूमिमें इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति उन दोनों अभिमानी वीरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ३७ ॥ बाह्लीकं तु रणे क्रुद्धं क्रुद्धरूपो विशाम्पते । अभ्यद्रवदमेयात्मा धृष्टकेतुर्महारथः ॥ ३८ ॥ प्रजानाथ! रणक्षेत्रमें कुपित हुए बाह्लीकपर अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न महारथी धृष्टकेतुने क्रोधपूर्वक आक्रमण किया ॥ ३८ ॥ बाह्लीकस्तु रणे राजन् धृष्टकेतुममर्षणः । शरैर्बहुभिरानर्च्छत् सिंहनादमथानदत् ॥ ३९ ॥ राजन्! अमर्षशील बाह्लीकने समरांगणमें बहुत-से बाणोंद्वारा धृष्टकेतुको पीड़ा दी और सिंहके समान गर्जना की ॥ ३९ ॥ चेदिराजस्तु संक्रुद्धो बाह्लीकं नवभिः शरैः । विव्याध समरे तूर्णं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ४० ॥ तब चेदिराज धृष्टकेतुने अत्यन्त क्रुद्ध होकर जैसे मतवाला हाथी किसी मदोन्मत्त गजराजपर हमला करता है, उसी प्रकार तुरंत ही नौ बाण मारकर उस युद्धभूमिमें

बाह्लीकको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ४० ॥
तौ तत्र समरे क्रुद्धौ नर्दन्तौ च पुनः पुनः ।
समीयतुः सुसंक्रुद्धावङ्गारकबुधाविव ॥ ४१ ॥
उस रणभूमिमें वे दोनों वीर परस्पर कुपित हो रोषमें भरे हुए मंगल और बुधकी भाँति बारंबार गर्जते हुए युद्ध कर रहे थे ॥ ४१ ॥
राक्षसं रौद्रकर्माणं क्रूरकर्मा घटोत्कचः ।
अलम्बुषं प्रत्युदियाद् बलं शक्र इवाहवे ॥ ४२ ॥
जैसे इन्द्रने युद्धमें बल नामक दैत्यपर चढ़ाई की थी, उसी प्रकार क्रूरकर्मा घटोत्कचने भयंकर कर्म करनेवाले अलम्बुष नामक राक्षसपर आक्रमण किया ॥ ४२ ॥
घटोत्कचस्ततः क्रुद्धो राक्षसं तं महाबलम् ।
नवत्या सायकैस्तीक्ष्णैर्दारयामास भारत ॥ ४३ ॥
भरतनन्दन! क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने नब्बे तीखे बाणोंद्वारा उस महाबली राक्षस अलम्बुषको विदीर्ण कर दिया ॥ ४३ ॥
अलम्बुषस्तु समरे भैमसेनिं महाबलम् ।
बहुधा दारयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४४ ॥
तब अलम्बुषने भी महाबली भीमसेनपुत्र घटोत्कचको झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समरांगणमें बहुत प्रकारसे घायल कर दिया ॥ ४४ ॥
व्यभ्राजेतां ततस्तौ तु संयुगे शरविक्षतौ ।
यथा देवासुरे युद्धे बलशक्रौ महाबलौ ॥ ४५ ॥
जैसे देवासुर-संग्राममें महाबली बलासुर और इन्द्र घायल हो गये थे, उसी प्रकार इस युद्धमें एक-दूसरेके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अलम्बुष और घटोत्कच अद्भुत शोभा धारण कर रहे थे ॥ ४५ ॥
शिखण्डी समरे राजन् द्रौणिमभ्युद्ययौ बली ।
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धः शिखण्डिनमुपस्थितम् ॥ ४६ ॥
नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं विद्ध्वा ह्यकम्पयत् ।
शिखण्ड्यपि ततो राजन् द्रोणपुत्रमताडयत् ॥ ४७ ॥
सायकेन सुपीतेन तीक्ष्णेन निशितेन च ।
तौ जघ्नतुस्तदान्योन्यं शरैर्बहुविधैर्मृधे ॥ ४८ ॥
राजन्! बलवान् शिखण्डीने रणक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामापर धावा किया। तब अश्वत्थामाने कुपित हो एक तीखे नाराचके द्वारा निकट आये हुए शिखण्डीको अत्यन्त घायल करके कम्पित कर दिया। महाराज! तब शिखण्डीने भी पीले रंगके तेज धारवाले तीखे सायकसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको गहरी चोट पहुँचायी; तदनन्तर वे दोनों अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ४६—४८ ॥

भगदत्तं रणे शूरं विराटो वाहिनीपतिः । अभ्ययात् त्वरितो राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ४९ ॥ राजन्! संग्रामशूर भगदत्तपर सेनापति विराटने बड़ी उतावलीके साथ आक्रमण किया। फिर तो उन दोनोंमें युद्ध होने लगा ॥ ४९ ॥ विराटो भगदत्तं तु शरवर्षेण भारत । अभ्यवर्षत् सुसंक्रुद्धो मेघो वृष्ट्या इवाचलम् ॥ ५० ॥ भारत! विराटने अत्यन्त कुपित होकर भगदत्तपर अपने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो मेघ पर्वतपर जलकी बूँदें बरसा रहा हो ॥ ५० ॥ भगदत्तस्ततस्तूर्णं विराटं पृथिवीपतिम् । छादयामास समरे मेघः सूर्यमिवोदितम् ॥ ५१ ॥ तब जैसे बादल उगे हुए सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार भगदत्तने समरभूमिमें बाणोंकी वर्षाद्वारा पृथिवीपति विराटको आच्छादित कर दिया ॥ ५१ ॥ बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं कृपः शारद्वतो ययौ । तं कृपः शरवर्षेण छादयामास भारत ॥ ५२ ॥ गौतमं कैकयः क्रुद्धः शरवृष्ट्याभ्यपूरयत् । भरतनन्दन! केकयराज बृहत्क्षत्रपर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने आक्रमण किया और अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उन्हें ढक दिया। तब केकयराजने भी क्रुद्ध होकर अपने सायकोंकी वर्षासे कृपाचार्यको आच्छादित कर दिया ॥ ५२ १/२ ॥ तावन्योन्यं हयान् हत्वा धनुश्छित्त्वा च भारत ॥ ५३ ॥ विरथावसियुद्धाय समीयतुरमर्षणौ । तयोस्तदभवद् युद्धं घोररूपं सुदारुणम् ॥ ५४ ॥ भारत! वे दोनों वीर एक-दूसरेके घोड़ोंको मार धनुषके टुकड़े करके रथहीन हो अमर्षमें भरकर खड्गद्वारा युद्ध करनेके लिये आमने-सामने खड़े हुए। फिर तो उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर एवं दारुण युद्ध होने लगा ॥ ५३-५४ ॥ द्रुपदस्तु ततो राजन् सैन्धवं वै जयद्रथम् । अभ्युद्ययौ हृष्टरूपो हृष्टरूपं परंतपः ॥ ५५ ॥ राजन्! दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रुपदने बड़े हर्षके साथ सिन्धुराज जयद्रथपर धावा किया। जयद्रथ भी बहुत प्रसन्न था ॥ ५५ ॥ ततः सैन्धवको राजा द्रुपदं विशिखैस्त्रिभिः । ताडयामास समरे स च तं प्रत्यविध्यत ॥ ५६ ॥ तत्पश्चात् सिन्धुराज जयद्रथने समरांगणमें तीन बाणोंद्वारा द्रुपदको गहरी चोट पहुँचायी। द्रुपदने भी बदलेमें उसे बींध डाला ॥ ५६ ॥ तयोस्तदभवद् युद्धं घोररूपं सुदारुणम् ।

ईक्षणप्रीतिजननं शुक्राङ्गारकयोरिव ।। ५७ ।। उन दोनोंका वह घोर एवं अत्यन्त भयंकर युद्ध शुक्र और मंगलके संघर्षकी भाँति नेत्रोंके लिये हर्ष उत्पन्न करनेवाला था ।। ५७ ।। विकर्णस्तु सुतस्तुभ्यं सुतसोमं महाबलम् । अभ्ययाज्जवनैरश्वैस्ततो युद्धमवर्तत ।। ५८ ।। आपके पुत्र विकर्णने तेज चलनेवाले घोड़ोंद्वारा महाबली सुतसोमपर धावा किया। तत्पश्चात् उनमें भारी युद्ध होने लगा ।। ५८ ।। विकर्णः सुतसोमं तु विद्ध्वा नाकम्पयच्छरैः । सुतसोमो विकर्णं च तदद्भुतमिवाभवत् ।। ५९ ।। विकर्ण अपने बाणोंसे सुतसोमको घायल करके भी उन्हें कम्पित न कर सका। इसी प्रकार सुतसोम भी विकर्णको विचलित न कर सके। उन दोनोंका यह पराक्रम अद्भुत-सा प्रतीत हुआ ।। ५९ ।। सुशर्माणं नरव्याघ्रश्चेकितानो महारथः । अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धः पाण्डवार्थे पराक्रमी ।। ६० ।। नरश्रेष्ठ पराक्रमी महारथी चेकितानने पाण्डवोंके लिये अत्यन्त कुपित होकर सुशर्मापर धावा किया ।। ६० ।। सुशर्मा तु महाराज चेकितानं महारथम् । महता शरवर्षेण वारयामास संयुगे ।। ६१ ।। महाराज! सुशर्माने भारी बाण-वर्षाके द्वारा महारथी चेकितानको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ६१ ।। चेकितानोऽपि संरब्धः सुशर्माणं महाहवे । प्राच्छादयत् तमिषुभिर्महामेघ इवाचलम् ।। ६२ ।। तब चेकितानने भी रोषमें भरकर उस महायुद्धमें अपने बाणोंकी वर्षासे सुशर्माको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे महामेघ जलकी वर्षासे पर्वतको आच्छादित कर देता है ।। ६२ ।। शकुनिः प्रतिविन्ध्यं तु पराक्रान्तं पराक्रमी । अभ्यद्रवत राजेन्द्र मत्तः सिंह इव द्विपम् ।। ६३ ।। राजेन्द्र! पराक्रमी शकुनि पराक्रमसम्पन्न प्रतिविन्ध्यपर चढ़ आया, ठीक उसी तरह जैसे मतवाला सिंह किसी हाथीपर आक्रमण करता है ।। ६३ ।। यौधिष्ठिरस्तु संक्रुद्धः सौबलं निशितैः शरैः । व्यदारयत संग्रामे मघवानिव दानवम् ।। ६४ ।। जिस प्रकार इन्द्र संग्रामभूमिमें किसी दानवको विदीर्ण करते हैं, उसी प्रकार युधिष्ठिरके पुत्र प्रतिविन्ध्यने अत्यन्त कुपित होकर सुबलपुत्र शकुनिको अपने तीखे बाणोंसे बेध डाला ।। ६४ ।।