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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

वृष्णिवंशी महारथी सात्यकिको रथसेनासे घिरा हुआ देख दुर्योधनने अत्यन्त कुपित होकर अपने समस्त भाइयोंसे कहो— ॥ १५ ॥ तथा कुरुत कौरव्या यथा वः सात्यको युधि । न जीवन् प्रतिनिर्याति महतोऽस्माद् रथव्रजात् ॥ १६ ॥ ‘कौरवो! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे इस समरांगणमें आये हुए सात्यकि हमारे इस महान् रथ-समुदायसे जीवित न निकलने पावें ॥ १६ ॥ तस्मिन् हते हतं मन्ये पाण्डवानां महद् बलम् । तथेति च वचस्तस्य परिगृह्य महारथाः ॥ १७ ॥ शैनेयं योधयामासुर्भीष्मायाभ्युद्यतं रणे । ‘सात्यकिके मारे जानेपर मैं पाण्डवोंकी विशाल सेनाको मरी हुई ही मानता हूँ।’ दुर्योधनकी इस बातको मानकर कौरव महारथियोंने रणभूमिमें भीष्मका सामना करनेके लिये उद्यत हुए सात्यकिसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १७ १/२ ॥ (अभिमन्युं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्याभ्युद्यतं वधे ।) काम्बोजराजो बलवान् वारयामास संयुगे ॥ १८ ॥ इसी प्रकार भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत होकर आते हुए अर्जुनकुमार अभिमन्युको बलवान् काम्बोजराजने युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १८ ॥ आर्जुनिं नृपतिर्विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः । पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन् विव्याध तं नृप ॥ १९ ॥ राजन्! नरेश्वर! काम्बोजराजने झुकी हुई गाँठवाले अनेक बाणोंद्वारा अभिमन्युको घायल करके पुनः चौंसठ बाणोंसे मारकर उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १९ ॥ सुदक्षिणस्तु समरे पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिं चास्य नवभिरिच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ॥ २० ॥ तदनन्तर समरांगणमें भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले काम्बोजराज सुदक्षिणने अभिमन्युको पुनः पाँच बाण मारे और नौ बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ २० ॥ तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे । यदाभ्यधावद् गाङ्गेयं शिखण्डी शत्रुकर्शनः ॥ २१ ॥ जब शत्रुसूदन शिखण्डीने गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया था, उस समय उन दोनों (अभिमन्यु और सुदक्षिण)-के संघर्षमें वहाँ बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २१ ॥ विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयन्तौ महाचमूम् । भीष्मं च युधि संरब्धावादद्रवन्तौ महारथौ ॥ २२ ॥ बूढ़े राजा महारथी विराट और द्रुपद दुर्योधनकी उस विशाल सेनाको रोकते हुए अत्यन्त क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें भीष्मपर चढ़ आये ॥ २२ ॥

अश्वत्थामा रणे क्रुद्धः समायाद्रथसत्तमः । ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोस्तस्य च भारत ॥ २३ ॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा रणभूमिमें कुपित होकर आया। भारत! फिर अश्वत्थामाका विराट और द्रुपदके साथ भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २३ ॥

विराटो दशभिर्भल्लैराजघान परंतप । यतमानं महेष्वासं द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ २४ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! राजा विराटने संग्राममें शोभा पानेवाले प्रयत्नशील एवं महाधनुर्धर अश्वत्थामाको भल्ल नामक दस बाणोंसे घायल किया ॥ २४ ॥

द्रुपदश्च त्रिभिर्बाणैर्विव्याध निशितैस्तदा । गुरुपुत्रं समासाद्य प्रहरन्तौ महाबलौ ॥ २५ ॥ अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध बहुभिः शरैः । विराटद्रुपदौ वीरौ भीष्मं प्रति समुद्यतौ ॥ २६ ॥ उस समय द्रुपदने भी तीन तीखे बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको घायल कर दिया। इस प्रकार प्रहार करते हुए उन दोनों महाबली नरेशोंको अश्वत्थामाने अनेक बाणोंद्वारा बींध डाला। विराट और द्रुपद दोनों वीर भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत थे ॥ २५-२६ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम वृद्धयोश्चरितं महत् । यद् द्रौणिसायकान् घोरान् प्रत्यवारयतां युधि ॥ २७ ॥ राजन्! वहाँ उन दोनों बूढ़े नरेशोंका हमने अद्भुत एवं महान् पराक्रम यह देखा कि वे युद्धमें अश्वत्थामाके भयंकर बाणोंका निवारण करते जा रहे थे ॥ २७ ॥

सहदेवं तथा यान्तं कृपः शारद्वतोऽभ्ययात् । यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ॥ २८ ॥ इसी प्रकार भीष्मपर चढ़ाई करनेवाले सहदेवको शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने सामने आकर रोका, मानो वनमें किसी मतवाले हाथीपर मदोन्मत्त गजराजने आक्रमण किया हो ॥ २८ ॥

कृपश्च समरे शूरो माद्रीपुत्रं महारथम् । आजघान शरैस्तूर्णं सप्तत्या रुक्मभूषणैः ॥ २९ ॥ शूरवीर कृपाचार्यने समरभूमिमें महारथी माद्रीकुमार सहदेवको सुवर्णभूषित सत्तर बाणोंसे तुरंत घायल कर दिया ॥ २९ ॥

तस्य माद्रीसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद सायकैः । अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध नवभिः शरैः ॥ ३० ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने भी अपने सायकोंद्वारा उनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये और धनुष कट जानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय समरे भारसाधनम् ।

माद्रीपुत्रं सुसंहृष्टो दशभिर्निशितैः शरैः ॥ ३१ ॥ आजघानोरसि क्रुद्ध इच्छन् भीष्मस्य जीवितम् । तदनन्तर भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले कृपाचार्यने समरांगणमें भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा धनुष लेकर अत्यन्त हर्षके साथ सहदेवकी छातीमें क्रोधपूर्वक दस तीखे बाण मारे ॥ ३१ १/२ ॥

तथैव पाण्डवो राजञ्छारद्वतममर्षणम् ॥ ३२ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो भीष्मस्य वधकाङ्क्षया । तयोर्युद्धं समभवद् घोररूपं भयावहम् ॥ ३३ ॥ राजन्! इसी प्रकार पाण्डुकुमार सहदेवने भी कुपित हो भीष्मके वधकी इच्छासे अमर्षशील कृपाचार्यकी छातीमें अपने बाणोंद्वारा प्रहार किया। उन दोनोंका वह युद्ध अत्यन्त घोर एवं भयंकर हो चला ॥ ३२-३३ ॥

नकुलं तु रणे क्रुद्धो विकर्णः शत्रुतापनः । विव्याध सायकैः षष्ट्या रक्षन् भीष्मं महाबलम् ॥ ३४ ॥ दूसरी ओर क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी विकर्णने युद्धके मैदानमें महाबली भीष्मकी रक्षामें तत्पर हो साठ बाणोंद्वारा नकुलको घायल कर दिया ॥ ३४ ॥

नकुलोऽपि भृशं विद्धस्तव पुत्रेण धीमता । विकर्णं सप्तसप्तत्या निर्बिभेद शिलीमुखैः ॥ ३५ ॥ आपके बुद्धिमान् पुत्र विकर्णद्वारा अत्यन्त घायल होकर नकुलने भी सतहत्तर बाणोंसे विकर्णको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३५ ॥

तत्र तौ नरशार्दूलौ भीष्महेतोः परंतपौ । अन्योन्यं जघ्नुतुर्वीरौ गोष्ठे गोवृषभाविव ॥ ३६ ॥ जैसे गोशालामें दो साँड़ आपसमें लड़ते हों, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों पुरुषसिंह वीर विकर्ण और नकुल भीष्मकी रक्षाके लिये एक-दूसरेपर घातक प्रहार कर रहे थे ॥ ३६ ॥

घटोत्कचं रणे यान्तं निघ्नन्तं तव वाहिनीम् । दुर्मुखः समरे प्रायाद् भीष्महेतोः पराक्रमी ॥ ३७ ॥ उसी समय पराक्रमी दुर्मुखने समरभूमिमें भीष्मकी रक्षाके लिये राक्षस घटोत्कचपर आक्रमण किया, जो युद्धके मैदानमें आपकी सेनाका संहार करता हुआ आगे बढ़ रहा था ॥ ३७ ॥

हैडिम्बस्तु रणे राजन् दुर्मुखं शत्रुतापनम् । आजघानोरसि क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ॥ ३८ ॥ राजन्! उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले दुर्मुखको क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥

भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः । षष्ट्या वीरो नदन् हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ॥ ३९ ॥ तब वीर दुर्मुखने हर्षपूर्वक गर्जना करते हुए अपने तीखी नोकवाले बाणोंद्वारा भीमसेनके पुत्र घटोत्कचको युद्धके मुहानेपर साठ बाणोंसे बींध डाला ॥ ३९ ॥ धृष्टद्युम्नं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् । हार्दिक्यो वारयामास रथश्रेष्ठं महारथः ॥ ४० ॥ इसी प्रकार भीष्मके वधकी इच्छासे आते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको महारथी कृतवर्माने रोक दिया ॥ ४० ॥ हार्दिक्यः पार्षतं चापि विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः । पुनः पञ्चाशता तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ४१ ॥ कृतवर्माने द्रुपदकुमारको लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे बींधकर फिर तुरंत ही पचास बाणोंसे घायल किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४१ ॥ आजघान महाबाहुः पार्षतं तं महारथम् । तं चैव पार्षतो राजन् हार्दिक्यं नवभिः शरैः ॥ ४२ ॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः । इस प्रकार महाबाहु कृतवर्माने महारथी धृष्टद्युम्नको गहरी चोट पहुँचायी। राजन्! तब धृष्टद्युम्नने भी कंकपत्रविभूषित सीधे जानेवाले तीखे एवं पैने नौ बाणोंसे कृतवर्माको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥ तयोः समभवद् युद्धं भीष्महेतोर्महाहवे ॥ ४३ ॥ अन्योन्यातिशये युक्तं यथा वृत्रमहेन्द्रयोः । उस समय भीष्मजीके निमित्त उस महान् संग्राममें वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनों वीरोंका घोर युद्ध होने लगा, जिसमें वे एक-दूसरेसे आगे बढ़ जानेके प्रयत्नमें लगे थे ॥ ४३ १/२ ॥ भीमसेनं तथाऽऽयान्तं भीष्मं प्रति महारथम् ॥ ४४ ॥ भूरिश्रवाभ्ययात् तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । इसी तरह महारथी भीष्मकी ओर आते हुए भीमसेनपर भूरिश्रवाने तुरंत आक्रमण किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४४ १/२ ॥ सौमदत्तिरथो भीममाजघान स्तनान्तरे ॥ ४५ ॥ नाराचेन सुतीक्ष्णेन रुक्मपुङ्खेन संयुगे । तदनन्तर सोमदत्तकुमारने युद्धस्थलमें सुवर्णमय पंखसे युक्त अत्यन्त तीखे नाराचद्वारा भीमसेनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४५ १/२ ॥ उरःस्थेन बभौ तेन भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ स्कन्दशक्त्या यथा क्रौञ्चः पुरा नृपतिसत्तम ।

नृपश्रेष्ठ! छातीमें लगे हुए उस बाणसे प्रतापी भीमसेन वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयकी शक्तिसे आविद्ध होनेपर क्रौंच पर्वतकी शोभा हुई थी॥ ४६ १/२ ॥
तौ शरान् सूर्यसंकाशान् कर्मारपरिमार्जितान् ॥ ४७ ॥
अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते नरर्षभौ ।
क्रोधमें भरे हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ युद्धमें एक-दूसरेपर लोहारके द्वारा माँजकर साफ किये हुए सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंका प्रहार कर रहे थे॥ ४७ १/२ ॥
भीमो भीष्मवधाकाङ्क्षी सौमदत्तिं महारथम् ॥ ४८ ॥
तथा भीष्मजये गृध्नुः सौमदत्तिस्तु पाण्डवम् ।
कृतप्रतिकृते यत्तौ योधयामासतू रणे ॥ ४९ ॥
भीमसेन भीष्मके वधकी इच्छा रखकर महारथी भूरिश्रवापर चोट करते थे और भूरिश्रवा भीष्मकी विजय चाहता हुआ पाण्डुकुमार भीमसेनपर प्रहार करता था। वे दोनों युद्धमें एक-दूसरेके अस्त्रोंका प्रतीकार करते हुए लड़ रहे थे॥ ४८-४९॥
युधिष्ठिरं तु कौन्तेयं महत्या सेनया वृतम् ।
भीष्माभिमुखमायान्तं भारद्वाजो न्यवारयत् ॥ ५० ॥
(तत्र युद्धमभूद् घोरं तयोः पुरुषसिंहयोः ।)
दूसरी ओर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको विशाल सेनाके साथ भीष्मके सम्मुख आते देख द्रोणाचार्यने रोक दिया; वहाँ उन दोनों पुरुषसिंहोंमें घोर युद्ध हुआ॥ ५० ॥
द्रोणस्य रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ।
श्रुत्वा प्रभद्रका राजन् समकम्पन्त मारिष ॥ ५१ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके रथकी घरघराहट मेघकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी। आर्य! उसे सुनकर प्रभद्रक वीर काँप उठे॥ ५१॥
सा सेना महती राजन् पाण्डुपुत्रस्य संयुगे ।
द्रोणेन वारिता यत्ता न चचाल पदात् पदम् ॥ ५२ ॥
महाराज! उस युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी वह विशाल सेना द्रोणके द्वारा जब रोक दी गयी, तब प्रयत्न करनेपर भी वह एक पग भी आगे न बढ़ सकी॥ ५२॥
चेकितानं रणे यत्तं भीष्मं प्रति जनेश्वर ।
चित्रसेनस्तव सुतः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५३ ॥
जनेश्वर! दूसरी ओर भीष्मके प्रति प्रयत्नपूर्वक आक्रमण करनेवाले क्रोधमें भरे हुए चेकितानको रणभूमिमें आपके पुत्र चित्रसेनने रोक दिया॥ ५३॥
भीष्महेतोः पराक्रान्तश्चित्रसेनः पराक्रमी ।
चेकितानं परं शक्त्या योधयामास भारत ॥ ५४ ॥
तथैव चेकितानोऽपि चित्रसेनमवारयत् ।
तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे ॥ ५५ ॥

पराक्रमी चित्रसेन भीष्मकी रक्षाके लिये पराक्रम दिखा रहा था। भारत! उसने पूरी शक्ति लगाकर चेकितानके साथ युद्ध किया। इसी प्रकार चेकितानने भी चित्रसेनकी गति रोक दी। उन दोनोंकी मुठभेड़में वहाँ महान् युद्ध होने लगा ।। ५४-५५ ।।
अर्जुनो वार्यमाणस्तु बहुशस्तत्र भारत ।
विमुखीकृत्य पुत्रं ते सेनां तव ममर्द ह ।। ५६ ।।
भरतनन्दन! वहाँ बारंबार रोके जानेपर भी अर्जुनने आपके पुत्रको युद्धसे विमुख करके आपकी सेनाको रौंद डाला ।। ५६ ।।
दुःशासनोऽपि परया शक्त्या पार्थमवारयत् ।
कथं भीष्मं न नो हन्यादिति निश्चित्य भारत ।। ५७ ।।
भारत! उस समय दुःशासन भी यह निश्चय करके कि ये किसी प्रकार हमारे भीष्मको मार न सकें, पूरी शक्ति लगाकर अर्जुनको रोकनेका प्रयत्न करता रहा ।। ५७ ।।
(पार्थोऽपि समरे राजन् दुःशासनमताडयत् ।
ताडिते बहुधा पुत्रे पार्थबाणैरजिह्मगैः ।।
बभूव व्यथिता सेना दृष्ट्वा पार्थपराक्रमम् ।
पुनश्च ताडिता तेन पार्थेनामिततेजसा ।।)
राजन्! अर्जुनने भी समरमें दुःशासनको अपने बाणोंसे बहुत घायल किया। सीधे जानेवाले अर्जुनके बाणोंसे आपके पुत्रके बार-बार घायल होनेपर पार्थके उस पराक्रमको देखकर आपकी सारी सेना व्यथित हो उठी। अमित तेजस्वी अर्जुनने उसे बारंबार पीड़ित किया।
सा वध्यमाना समरे पुत्रस्य तव वाहिनी ।
लोड्यते रथिभिः श्रेष्ठैस्तत्र तत्रैव भारत ।। ५८ ।।
भरतनन्दन! उस संग्राममें आपके पुत्रकी सारी सेनाको जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ रथियोंने बाणोंसे विद्ध करके मथ डाला था ।। ५८ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। १११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वन्द्वयुद्धविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १११ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६१ श्लोक हैं।]

११२-

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यका अश्वत्थामाको अशुभ शकुनोंकी सूचना देते हुए उसे भीष्मकी रक्षाके लिये धृष्टद्युम्नसे युद्ध करनेका आदेश देना

संजय उवाच

अथ वीरो महेष्वासो मत्तवारणविक्रमः ।
समादाय महच्चापं मत्तवारणवारणम् ॥ १ ॥
विधुन्वानो नरश्रेष्ठो द्रावयाणो वरूथिनीम् ।
पृतनां पाण्डवेयानां गाहमाना महाबलः ॥ २ ॥
निमित्तानि निमित्तज्ञः सर्वतो वीक्ष्य वीर्यवान् ।
प्रतपन्तमनीकानि द्रोणः पुत्रमभाषत ॥ ३ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर महाधनुर्धर, मतवाले हाथीके समान पराक्रमी, वीर, नरश्रेष्ठ, महाबली तथा शुभाशुभ निमित्तोंके ज्ञाता एवं अद्भुत शक्तिशाली द्रोणाचार्य मतवाले हाथियोंकी गतिको कुण्ठित कर देनेवाले विशाल धनुषको हाथमें लेकर उसे खींचने और विपक्षी सेनाको भगाने लगे। उन्होंने पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करते समय सब ओर बुरे निमित्त (शकुन) देखकर शत्रुसेनाको संताप देते हुए पुत्र अश्वत्थामासे इस प्रकार कहा— ॥

अयं हि दिवसस्तात यत्र पार्थो महाबलः ।
जिघांसुः समरे भीष्मं परं यत्नं करिष्यति ॥ ४ ॥
‘तात! यही वह दिन है, जब कि महाबली अर्जुन समरभूमिमें भीष्मको मार डालनेकी इच्छासे महान् प्रयत्न करेंगे ॥ ४ ॥

उत्पतन्ति हि मे बाणा धनुः प्रस्फुरतीव च ।
योगमस्त्राणि गच्छन्ति क्रूरे मे वर्तते मतिः ॥ ५ ॥
‘मेरे बाण तरकससे उछले पड़ते हैं, धनुष फड़क उठता है, अस्त्र स्वयं ही धनुषसे संयुक्त हो जाते हैं और मेरे मनमें क्रूरकर्म करनेका संकल्प हो रहा है ॥ ५ ॥

दिक्ष्वशान्तानि घोराणि व्याहरन्ति मृगद्विजाः ।
नीचैर्गृध्रा निलीयन्ते भारतानां चमूं प्रति ॥ ६ ॥
‘सम्पूर्ण दिशाओंमें पशु और पक्षी अशान्तिपूर्ण भयंकर बोली बोल रहे हैं। गीध नीचे आकर कौरव-सेनामें छिप रहे हैं ॥ ६ ॥

नष्टप्रभ इवादित्यः सर्वतो लोहिता दिशः ।
रसते व्यथते भूमिः कम्पतीव च सर्वशः ॥ ७ ॥

‘सूर्यकी प्रभा मन्द-सी पड़ गयी है। सम्पूर्ण दिशाएँ लाल हो रही हैं। पृथिवी सब ओरसे कोलाहलपूर्ण, व्यथित और कम्पित-सी हो रही है ।। ७ ।।
कङ्का गृध्रा बलाकाश्च व्याहरन्ति मुहुर्मुहुः ।
शिवाश्चैवाशिवा घोरा वेदयन्त्यो महद् भयम् ।। ८ ।।
(ववाशिरे भयकरा दीप्तास्याभिमुखे रवेः ।)
‘कंक, गीध और बगले बारंबार बोल रहे हैं। अमंगलमयी घोररूपवाली गीदड़ियाँ महान् भयकी सूचना देती हुई सूर्यकी ओर मुँह करके भयानक बोली बोला करती हैं और उनका मुँह प्रज्वलित-सा जान पड़ता है ।। ८ ।।
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलात् ।
सकबन्धाश्च परिघो भानुमावृत्य तिष्ठति ।। ९ ।।
‘सूर्यमण्डलके मध्यभागसे बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरी हैं। कबन्धयुक्त परिघ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर स्थित है ।। ९ ।।
परिवेषस्तथा घोरश्चन्द्रभास्करयोरभूत् ।
वेद्यानो भयं घोरं राज्ञां देहावकर्तनम् ।। १० ।।
‘चन्द्रमा और सूर्यके चारों ओर भयंकर घेरा पड़ने लगा है, जो क्षत्रियोंके शरीरका विनाश करनेवाले घोर भयकी सूचना दे रहा है ।। १० ।।
देवतायतनस्थाश्च कौरवेन्द्रस्य देवताः ।
कम्पन्ते च हसन्ते च नृत्यन्ति च रुदन्ति च ।। ११ ।।
‘कौरवराज धृतराष्ट्रके देवालयोंकी देवमूर्तियाँ हिलती, हँसती, नाचती तथा रोती जान पड़ती हैं ।। ११ ।।
अपसव्यं ग्रहाश्चक्रुरलक्ष्माणं दिवाकरम् ।
अवाक्शिराश्च भगवानुपातिष्ठत चन्द्रमाः ।। १२ ।।
‘ग्रहोंने सूर्यकी वामावर्त परिक्रमा करके उन्हें अशुभ लक्षणोंका सूचक बना दिया है, भगवान् चन्द्रमा अपने दोनों कोनोंके सिरे नीचे करके उदित हुए हैं ।। १२ ।।
वपूंषि च नरेन्द्राणां विगताभानि लक्षये ।
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु न च भ्राजन्ति दंशिताः ।। १३ ।।
‘राजाओंके शरीरोंको मैं श्रीहीन देख रहा हूँ। दुर्योधनकी सेनाओंमें जो लोग कवच धारण करके स्थित हैं, उनकी शोभा नहीं हो रही है ।। १३ ।।
सेनयोरुभयोश्चापि समन्ताच्छ्रूयते महान् ।
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो गाण्डीवस्य च निःस्वनः ।। १४ ।।
‘दोनों ही सेनाओंमें चारों ओर पांचजन्य शंखका गम्भीर घोष और गाण्डीवधनुषकी टंकारध्वनि सुनायी देती है ।। १४ ।।
ध्रुवमास्थाय बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि संयुगे ।

अपास्यान्थान् रणे योधामभ्येष्यति पितामहम् ॥ १५ ॥
'इससे यह निश्चय जान पड़ता है कि अर्जुन युद्धस्थलमें उत्तम अस्त्रोंका आश्रय ले दूसरे योद्धाओंको दूर हटाकर रणभूमिमें पितामह भीष्मके पास पहुँच जायेंगे ॥ १५ ॥
हृष्यन्ति रोमकूपाणि सीदतीव च मे मनः ।
चिन्तयित्वा महाबाहो भीष्मार्जुनसमागमम् ॥ १६ ॥
'महाबाहो! भीष्म और अर्जुनके युद्धका विचार करके मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं और मन शिथिल-सा होता जा रहा है ॥ १६ ॥
तं चेह निकृतिप्रज्ञं पाञ्चाल्यं पापचेतसम् ।
पुरस्कृत्य रणे पार्थो भीष्मस्यायोधनं गतः ॥ १७ ॥
'शठताके पूरे पण्डित उस पापात्मा पांचाल-राजकुमार शिखण्डीको यहाँ रणमें आगे करके कुन्तीकुमार अर्जुन भीष्मसे युद्ध करनेके लिये गये हैं ॥ १७ ॥
अब्रवीच्च पुरा भीष्मो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ।
स्त्री ह्येषा विहिता धात्रा दैवाच्च स पुनः पुमान् ॥ १८ ॥
'भीष्मने पहले ही यह कह दिया था कि मैं शिखण्डीको नहीं मारूँगा; क्योंकि विधाताने इसे स्त्री ही बनाया था। फिर भाग्यवश यह पुरुष हो गया ॥ १८ ॥
अमङ्गल्यध्वजश्चैव याज्ञसेनिर्महाबलः ।
न चामङ्गलिके तस्मिन् प्रहरेदापगासुतः ॥ १९ ॥
'इसके सिवा द्रुपदका यह महाबली पुत्र अपनी ध्वजामें अमंगलसूचक चिह्न धारण करता है। अतः इस अमांगलिक शिखण्डीपर गंगानन्दन भीष्म कभी प्रहार नहीं करेंगे ॥ १९ ॥
एतद् विचिन्तयानस्य प्रज्ञा सीदति मे भृशम् ।
अभ्युद्यतो रणे पार्थः कुरुवृद्धमुपाद्रवत् ॥ २० ॥
'इन सब बातोंपर जब मैं विचार करता हूँ, तब मेरी बुद्धि अत्यन्त शिथिल हो जाती है। आज अर्जुनने पूरी तैयारीके साथ रणभूमिमें कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मजीपर धावा किया है ॥ २० ॥
युधिष्ठिरस्य च क्रोधो भीष्मश्चार्जुनसङ्गतः ।
मम चास्त्रसमारम्भः प्रजानामशिवं ध्रुवम् ॥ २१ ॥
'युधिष्ठिरका क्रोध करना, भीष्म और अर्जुनका संघर्ष होना और मेरा अपने विविध अस्त्रोंके प्रयोगके लिये उद्योग करना—ये तीनों बातें निश्चय ही प्रजाजनोंके अमंगलकी सूचना देनेवाली हैं ॥ २१ ॥
मनस्वी बलवाञ्छूरः कृतास्त्रो लघुविक्रमः ।
दूरपाती दृढेषुश्च निमित्तज्ञश्च पाण्डवः ॥ २२ ॥

'पाण्डुनन्दन अर्जुन मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्रविद्याके पण्डित, शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, सुदृढ़ बाणोंका संग्रह रखनेवाले तथा शुभाशुभ निमित्तोंके ज्ञाता हैं ।। २२ ।। अजेयः समरे चापि देवैरपि सवासवैः । बलवान् बुद्धिमांश्चैव जितक्लेशो युधां वरः ।। २३ ।। 'इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उन्हें युद्धमें पराजित नहीं कर सकते। वे बलवान्, बुद्धिमान्, क्लेशोंपर विजय पानेवाले और योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं ।। २३ ।। विजयी च रणे नित्यं भैरवास्त्रश्च पाण्डवः । तस्य मार्गं परिहरन् द्रुतं गच्छ यतव्रत ।। २४ ।। 'उन्हें युद्धमें सदा विजय प्राप्त होती है। पाण्डुनन्दन अर्जुनके अस्त्र बड़े भयंकर हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! इसलिये तुम उनका रास्ता छोड़कर शीघ्र भीष्मजीकी रक्षाके लिये चले जाओ ।। २४ ।। पश्याद्यैतन्महाघोरे संयुगे वैशसं महत् । हेमचित्राणि शूराणां महान्ति च शुभानि च ।। २५ ।। कवचान्यवदीर्यन्ते शरैः संनतपर्वभिः । छिद्यन्ते च ध्वजाग्राणि तोमराश्च धनूंषि च ।। २६ ।। 'देखो, इस महाघोर संग्राममें आज यह कैसा महान् जनसंहार हो रहा है? शूरवीरोंके स्वर्णजटित, शुभ एवं महान् कवच अर्जुनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा विदीर्ण किये जा रहे हैं। ध्वजके अग्रभाग, तोमर और धनुषोंके टुकड़े-टुकड़े किये जा रहे हैं ।। २५-२६ ।। प्रासाश्च विमलास्तीक्ष्णाः शक्तयश्च कनकोज्ज्वलाः । वैजयन्त्यश्च नागानां संक्रुद्धेन किरीटिना ।। २७ ।। 'चमकीले प्रास, सुवर्णजटित होनेके कारण सुनहरी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली तीखी शक्तियाँ और हाथियोंपर फहराती हुई वैजयन्ती पताकाएँ क्रोधमें भरे हुए किरीटधारी अर्जुनके द्वारा छिन्न-भिन्न की जा रही हैं ।। २७ ।। नायं संरक्षितुं कालः प्राणान् पुत्रोपजीविभिः । याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजयाय च ।। २८ ।। 'बेटा! आश्रित रहकर जीविका चलानेवाले पुरुषोंके लिये यह अपने प्राणोंकी रक्षाका अवसर नहीं है। तुम स्वर्गको सामने रखकर यश और विजयकी प्राप्तिके लिये भीष्मजीके पास जाओ ।। २८ ।। रथनागहयावर्तां महाघोरां सुदुर्गमाम् । रथेन संग्रामनदीं तरत्येष कपिध्वजः ।। २९ ।। 'यह युद्ध एक महाघोर और अत्यन्त दुर्गम नदीके समान है। उसमें रथ, हाथी और घोड़े भँवर हैं, कपिध्वज अर्जुन रथरूपी नौकाके द्वारा इसे पार कर रहे हैं ।। २९ ।।

ब्रह्मण्यता दमो दानं तपश्च चरितं महत् । इहैव दृश्यते पार्थे भ्राता यस्य धनंजयः ॥ ३० ॥ भीमसेनश्च बलवान् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । वासुदेवश्च वार्ष्णेयो यस्य नाथो व्यवस्थितः ॥ ३१ ॥ ‘यहाँ केवल कुन्तीकुमार युधिष्ठिरमें ही ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति, इन्द्रियसंयम, दान, तप और श्रेष्ठ सदाचार आदि सद्गुण दिखायी देते हैं, जिनके फलस्वरूप उन्हें अर्जुन, बलवान् भीम तथा माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल और सहदेव-जैसे भाई मिले हैं एवं वृष्णिनन्दन भगवान् वासुदेव उनके रक्षक और सहायक बनकर सदा साथ रहते हैं ॥ ३०-३१ ॥

तस्यैष मन्युप्रभवो धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । तपोदग्धशरीरस्य कोपो दहति भारतीम् ॥ ३२ ॥ ‘इस दुर्बुद्धि दुर्योधनका शरीर उन्हींकी तपस्यासे दग्धप्राय हो गया है और इसकी भारती सेनाको उन्हींकी क्रोधाग्नि जलाकर भस्म किये देती है ॥ ३२ ॥

एष संदृश्यते पार्थो वासुदेवव्यपाश्रयः । दारयन् सर्वसैन्यानि धार्तराष्ट्राणि सर्वशः ॥ ३३ ॥ ‘देखो, भगवान् वासुदेवकी शरणमें रहनेवाले ये अर्जुन कौरवोंकी सम्पूर्ण सेनाओंको सब ओरसे विदीर्ण करते हुए इधर ही आते दिखायी देते हैं ॥ ३३ ॥

एतदालोक्यते सैन्यं क्षोभ्यमाणं किरीटिना । महोर्मिनद्धं सुमहत् तिमिनेव महाजलम् ॥ ३४ ॥ ‘जैसे तिमि नामक महामत्स्य उत्तालतरंगोंसे युक्त महासागरके जलको मथ डालता है, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके द्वारा मथित हो यह कौरवसेना विक्षुब्ध होती दिखायी देती है ॥ ३४ ॥

हाहाकिलकिलाशब्दाः श्रूयन्ते च चमूमुखे । याहि पाञ्चालदायादमहं यास्ये युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥ ‘सेनाके प्रमुख भागमें हाहाकार और किलकिलाहटके शब्द सुनायी देते हैं। तुम द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नका सामना करनेके लिये जाओ और मैं युधिष्ठिरपर चढ़ाई करूँगा ॥

दुर्गमं ह्यन्तरं राज्ञो व्यूहस्यामिततेजसः । समुद्रकुक्षिप्रतिमं सर्वतोऽतिरथैः स्थितैः ॥ ३६ ॥ ‘अमित तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके व्यूहके भीतर प्रवेश करना समुद्रके अंदर प्रवेश करनेके समान बहुत कठिन है; क्योंकि उनके चारों ओर अतिरथी योद्धा खड़े हैं ॥ ३६ ॥

सात्यकिश्चाभिमन्युश्च धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । पर्य्यरक्षन्त राजानं यमौ च मनुजेश्वरम् ॥ ३७ ॥ ‘सात्यकि, अभिमन्यु, धृष्टद्युम्न, भीमसेन और नकुल, सहदेव नरेश्वर राजा युधिष्ठिरकी रक्षा कर रहे हैं ॥ ३७ ॥

उपेन्द्रसदृशः श्यामो महाशाल इवोद्गतः । एष गच्छत्यनीकाग्रे द्वितीय इव फाल्गुनः ॥ ३८ ॥ ‘यह देखो, भगवान् विष्णुके समान श्याम और महान् शालवृक्षके समान ऊँचा अभिमन्यु द्वितीय अर्जुनके समान सेनाके आगे-आगे चल रहा है ॥ ३८ ॥ उत्तमास्त्राणि चाधत्स्व गृहीत्वा च महद् धनुः । पार्षतं याहि राजानं युध्यस्व च वृकोदरम् ॥ ३९ ॥ ‘तुम अपने उत्तम अस्त्रोंको धारण करो और विशाल धनुष लेकर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा भीमसेनके साथ युद्ध करो ॥ ३९ ॥ को हि नेच्छेत् प्रियं पुत्रं जीवन्तं शाश्वतीः समाः । क्षत्रधर्मं तु सम्प्रेक्ष्य ततस्त्वां नियुनज्म्यहम् ॥ ४० ॥ ‘अपना प्यारा पुत्र नित्य-निरन्तर जीवित रहे, यह कौन नहीं चाहता है तथापि क्षत्रिय-धर्मपर दृष्टि रखकर मैं तुम्हें इस कार्यमें नियुक्त कर रहा हूँ ॥ ४० ॥ एष चातिरणे भीष्मो दहते वै महाचमूम् । युद्धेषु सदृशस्तात यमस्य वरुणस्य च ॥ ४१ ॥ ‘तात! ये भीष्म रणक्षेत्रमें यमराज और वरुणके समान पराक्रम दिखाते हुए पाण्डवोंकी विशाल सेनाको अत्यन्त दग्ध कर रहे हैं’ ॥ ४१ ॥ (पुत्रं समनुशास्यैवं भारद्वाजः प्रतापवान् । महारणे महाराज धर्मराजमयोधयत् ॥) महाराज! अपने पुत्रको इस प्रकार आदेश देकर प्रतापी द्रोणाचार्य इस महायुद्धमें धर्मराजके साथ युद्ध करने लगे।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्रोणाश्वत्थामसंवादे द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्रोण और अश्वत्थामाका संवादविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४२ १/३ श्लोक हैं।]

११३-

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

कौरवपक्षके दस प्रमुख महारथियोंके साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीमसेनका अद्भुत पराक्रम

संजय उवाच

भगदत्तः कृपः शल्यः कृतवर्मा तथैव च ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ १ ॥
चित्रसेनो विकर्णश्च तथा दुर्मर्षणादयः ।
दशैते तावका योधा भीमसेनमयोधयन् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, सिन्धुराज जयद्रथ, चित्रसेन, विकर्ण तथा दुर्मर्षण—ये दस योद्धा भीमसेनके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १-२ ॥

महत्या सेनया युक्ता नानादेशसमुत्थया ।
भीष्मस्य समरे राजन् प्रार्थयाना महद् यशः ॥ ३ ॥
नरेश्वर! इनके साथ अनेक देशोंसे आयी हुई विशाल सेना मौजूद थी। ये समरभूमिमें भीष्मके महान् यशकी रक्षा करना चाहते थे ॥ ३ ॥

शल्यस्तु नवभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत् ।
कृतवर्मा त्रिभिर्बाणैः कृपश्च नवभिः शरैः ॥ ४ ॥
शल्यने नौ बाणोंसे भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी। फिर कृतवर्माने तीन और कृपाचार्यने उन्हें नौ बाण मारे ॥ ४ ॥

चित्रसेनो विकर्णश्च भगदत्तश्च मारिष ।
दशभिर्दशभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयन् ॥ ५ ॥
आर्य! फिर लगे हाथ चित्रसेन, विकर्ण और भगदत्तने भी दस-दस बाण मारकर भीमसेनको घायल कर दिया ॥

सैन्धवश्च त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत् ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥ ६ ॥
दुर्मर्षणस्तु विंशत्या पाण्डवं निशितैः शरैः ।
फिर सिन्धुराज जयद्रथने तीन, अवन्तीके विन्द और अनुविन्दने पाँच-पाँच तथा दुर्मर्षणने बीस तीखे बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन भीमसेनको चोट पहुँचायी ॥ ६ ½ ॥

स तान् सर्वान् महाराज राजमानान् पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥
प्रवीरान् सर्वलोकस्य धार्तराष्ट्रान् महारथान् ।

जघान समरे वीरः पाण्डवः परवीरहा ॥ ८ ॥
महाराज! तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुकुमार वीर भीमसेनने सम्पूर्ण जगत्‌के उन समस्त राजाओं, प्रमुख वीरों तथा आपके महारथी पुत्रोंको पृथक्-पृथक् बाण मारकर समरांगणमें घायल कर दिया ॥ ७-८ ॥
सप्तभिः शल्यमाविध्यत् कृतवर्माणमष्टभिः ।
कृपस्य सशरं चापं मध्ये चिच्छेद भारत ॥ ९ ॥
भारत! भीमसेनने शल्यको सात और कृतवर्माको आठ बाणोंसे बींध डाला। फिर कृपाचार्यके बाणसहित धनुषको बीचसे ही काट दिया ॥ ९ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं पुनर्विव्याध सप्तभिः ।
विन्दानुविन्दौ च तथा त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥ १० ॥
धनुष कट जानेपर उन्होंने पुनः सात बाणोंसे कृपाचार्यको घायल किया। फिर विन्द और अनुविन्दको तीन-तीन बाण मारे ॥ १० ॥
दुर्मर्षणं च विंशत्या चित्रसेनं च पञ्चभिः ।
विकर्णं दशभिर्बाणैः पञ्चभिश्च जयद्रथम् ॥ ११ ॥
विद्ध्वा भीमोऽनदद्धृष्टः सैन्धवं च पुनस्त्रिभिः ।
तत्पश्चात् दुर्मर्षणको बीस, चित्रसेनको पाँच, विकर्णको दस तथा जयद्रथको पाँच बाणोंसे बींधकर भीमसेनने बड़े हर्षके साथ सिंहनाद किया और जयद्रथको पुनः तीन बाणोंसे बींध डाला ॥ ११ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय गौतमो रथिनां वरः ॥ १२ ॥
भीमं विव्याध संरब्धो दशभिर्निशितैः शरैः ।
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष लेकर क्रोधपूर्वक चलाये हुए दस तीखे बाणोंद्वारा भीमसेनको बींध डाला ॥ १२ १/२ ॥
स विद्धो दशभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपः ॥ १३ ॥
(व्यनदत् समरे शूरः सिंहवद् रणमूर्धनि ।)
जैसे महान् गजराज अंकुशोंसे पीड़ित होनेपर चिग्घाड़ उठता है, उसी प्रकार उन दस बाणोंसे घायल होनेपर शूरवीर भीमसेनने युद्धके मुहानेपर सिंहके समान गर्जना की ॥ १३ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः प्रतापवान् ।
गौतमं ताडयामास शरैर्बहुभिराहवे ॥ १४ ॥
महाराज! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने रणक्षेत्रमें कृपाचार्यको अनेक बाणोंद्वारा घायल किया ॥ १४ ॥
सैन्धवस्य तथाश्वांश्च सारथिं च त्रिभिः शरैः ।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय कालान्तकसमद्युतिः ॥ १५ ॥

इसके बाद प्रलयकालीन यमराजके समान तेजस्वी भीमसेनने तीन बाणोंद्वारा सिन्धुराज जयद्रथके घोड़ों तथा सारथिको यमलोक भेज दिया ॥ १५ ॥

हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवप्लुत्य महारथः ।
शरांश्चिक्षेप निशितान् भीमसेनस्य संयुगे ॥ १६ ॥

तब उस अश्वहीन रथसे तुरंत ही कूदकर महारथी जयद्रथने युद्धस्थलमें भीमसेनके ऊपर बहुत-से तीखे बाण चलाये ॥ १६ ॥

तस्य भीमो धनुर्मध्ये द्वाभ्यां चिच्छेद मारिष ।
भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मनः ॥ १७ ॥

माननीय भरतश्रेष्ठ! उस समय भीमसेनने दो भल्ल मारकर महामना सिन्धुराजके धनुषको बीचसे ही काट दिया ॥ १७ ॥

स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ।
चित्रसेनरथं राजन्नारुरोह त्वरान्वितः ॥ १८ ॥

राजन्! धनुषके कटने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुआ जयद्रथ तुरंत ही चित्रसेनके रथपर जा बैठा ॥ १८ ॥

अत्यद्भुतं रणे कर्म कृतवांस्तत्र पाण्डवः ।
महारथाञ्शरैर्विद्ध्वा वारयित्वा च मारिष ॥ १९ ॥
विरथं सैन्धवं चक्रे सर्वलोकस्य पश्यतः ।

आर्य! वहाँ पाण्डुनन्दन भीमसेनने रणक्षेत्रमें यह अद्भुत कर्म किया कि सब महारथियोंको बाणोंसे घायल करके रोक दिया और सब लोगोंके देखते-देखते सिन्धुराजको रथहीन कर दिया ॥ १९ १/२ ॥

तदा न ममृषे शल्यो भीमसेनस्य विक्रमम् ॥ २० ॥
स संधाय शरांस्तीक्ष्णान् कर्मारपरिमार्जितान् ।
भीमं विव्याध समरे तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥

उस समय राजा शल्य भीमसेनके उस पराक्रमको न सह सके। उन्होंने लोहारके माँजे हुए पैने बाणोंका संधान करके समरभूमिमें भीमसेनको बींध डाला और कहा—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २०-२१ ॥

कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तश्च वीर्यवान् ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ चित्रसेनश्च संयुगे ॥ २२ ॥
दुर्मर्षणो विकर्णश्च सिन्धुराजश्च वीर्यवान् ।
भीमं ते विव्यधुस्तूर्णं शल्यहेतोररिंदमाः ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् कृपाचार्य, कृतवर्मा, पराक्रमी भगदत्त, अवन्तीके विन्द और अनुविन्द, चित्रसेन, दुर्मर्षण, विकर्ण और पराक्रमी सिन्धुराज जयद्रथ शत्रुओंका दमन करनेवाले इन वीरोंने राजा शल्यकी रक्षाके लिये भीमसेनको तुरंत ही घायल कर दिया ॥ २२-२३ ॥

स च तान् प्रतिविव्याध पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।
शल्यं विव्याध सप्तत्या पुनश्च दशभिः शरैः ॥ २४ ॥
फिर भीमसेनने भी उन सबको पाँच-पाँच बाणोंसे घायल करके तुरंत ही बदला लिया। इसके बाद उन्होंने शल्यको पहले सत्तर और फिर दस बाणोंसे बींध डाला ॥ २४ ॥
तं शल्यो नवभिर्भित्त्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ।
सारथिं चास्य भल्लेन गाढं विव्याध मर्मणि ॥ २५ ॥
यह देख शल्यने भीमसेनको पहले नौ बाणोंसे विदीर्ण करके फिर पाँच बाणोंद्वारा घायल किया। साथ ही एक भल्लके द्वारा उनके सारथिके भी मर्मस्थानोंमें अधिक चोट पहुँचायी ॥ २५ ॥
विशोकं प्रेक्ष्य निर्भिन्नं भीमसेनः प्रतापवान् ।
मद्रराजं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २६ ॥
उस समय प्रतापी भीमसेनने अपने सारथि विशोकको अत्यन्त क्षत-विक्षत हुआ देख तीन बाणोंसे मद्रराज शल्यकी भुजाओं तथा छातीमें प्रहार किया ॥ २६ ॥
(भगदत्तं तथा वीरं कृतवर्माणमाहवे ।)
तथेतरान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
ताडयामास समरे सिंहवद् विननाद च ॥ २७ ॥
भगदत्त, वीरवर कृतवर्मा तथा अन्य महाधनुर्धर वीरोंको उन्होंने तीन-तीन सीधे जानेवाले सायकोंद्वारा समरभूमिमें मारा और सिंहके समान गर्जना की ॥ २७ ॥
ते हि यत्ता महेष्वासाः पाण्डवं युद्धकोविदम् ।
त्रिभिस्त्रिभिरकुण्ठाग्रैर्भृशं मर्मस्वताडयन् ॥ २८ ॥
तब उन सभी महाधनुर्धरोंने एक साथ प्रयत्न करके तीखे अग्रभागवाले तीन-तीन बाणोंद्वारा युद्धकुशल पाण्डुपुत्र भीमके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २८ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासो भीमसेनो न विव्यथे ।
पर्वतो वारिधाराभिर्वर्षमाणैरिवाम्बुदैः ॥ २९ ॥
उनके द्वारा अत्यन्त घायल होनेपर भी महाधनुर्धर भीमसेन बादलोंकी बरसायी हुई जलधाराओंसे पर्वतकी भाँति तनिक भी व्यथित एवं विचलित नहीं हुए ॥ २९ ॥
स तु क्रोधसमाविष्टः पाण्डवानां महारथः ।
मद्रेश्वरं त्रिभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा महायशाः ॥ ३० ॥
कृपं च नवभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा समन्ततः ।
प्राग्ज्योतिषं शतैराजौ राजन् विव्याध सायकैः ॥ ३१ ॥
राजन्! तब क्रोधमें भरे हुए पाण्डवोंके महारथी महायशस्वी भीमसेनने मद्रराज शल्यको तीन और कृपाचार्यको नौ बाणोंद्वारा सब ओरसे अत्यन्त घायल करके प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्तको सैकड़ों बाणोंद्वारा समरभूमिमें बींध डाला ॥ ३०-३१ ॥

ततस्तु सशरं चापं सात्वतस्य महात्मनः । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ ३२ ॥ तत्पश्चात् सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति भीमसेनने अत्यन्त तीखे क्षुरप्रके द्वारा महामना कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काट डाला ॥ ३२ ॥ तथान्यद् धनुरुपादाय कृतवर्मा वृकोदरम् । आजघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचेन परंतपः ॥ ३३ ॥ तब शत्रुओंको संताप देनेवाले कृतवर्माने दूसरा धनुष लेकर भीमसेनकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें नाराचके द्वारा प्रहार किया ॥ ३३ ॥ भीमस्तु समरे विद्ध्वा शल्यं नवभिरायसैः । भगदत्तं त्रिभिश्चैव कृतवर्माणमष्टभिः ॥ ३४ ॥ द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु विव्याध गौतमप्रभृतीन् रथान् । तेऽपि तं समरे राजन् विव्यधुर्निशितैः शरैः ॥ ३५ ॥ तत्पश्चात् भीमसेनने समरांगणमें लोहेके बने हुए नौ बाणोंसे राजा शल्यको बेधकर तीन बाणोंसे भगदत्तको, आठसे कृतवर्माको और दो-दो बाणोंद्वारा कृपाचार्य आदि रथियोंको बींध डाला। राजन्! फिर उन्होंने भी अपने तीखे बाणोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया ॥ ३४-३५ ॥ स तथा पीड्यमानोऽपि सर्वशस्त्रैर्महारथैः । मत्वा तृणेन तांस्तुल्यान् विचचार गतव्यथः ॥ ३६ ॥ उन महारथियोंद्वारा सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित किये जानेपर भी भीमसेन उन्हें तिनकोंके समान मानकर व्यथारहित हो विचरण करने लगे ॥ ३६ ॥ ते चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाय निशिताञ्छरान् । प्रेषयामासुरव्यग्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३७ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ उन वीरोंने भी व्यग्रतारहित हो भीमसेनपर सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें तीखे बाण चलाये ॥ ३७ ॥ तस्य शक्तिं महावेगां भगदत्तो महारथः । चिक्षेप समरे वीरः स्वर्णदण्डां महामते ॥ ३८ ॥ महामते! उस समरभूमिमें वीर महारथी भगदत्तने भीमसेनपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित एक महावेगशालिनी शक्ति चलायी ॥ ३८ ॥ तोमरं सैन्धवो राजा पट्टिशं च महाभुजः । शतघ्नीं च कृपो राजञ्छरं शल्यश्च संयुगे ॥ ३९ ॥ सिन्धुदेशके राजा महाबाहु जयद्रथने तोमर और पट्टिश चलाया। राजन्! कृपाचार्यने शतघ्नीका प्रयोग किया तथा राजा शल्यने युद्धस्थलमें एक बाण मारा ॥ ३९ ॥ अथेतरे महेष्वासाः पञ्च पञ्च शिलीमुखान् ।

भीमसेनं समुद्दिश्य प्रेषयामासुरोजसा ॥ ४० ॥

इनके सिवा दूसरे धनुर्धर वीरोंने भी भीमसेनको लक्ष्य करके बलपूर्वक पाँच-पाँच बाण

चलाये ॥ ४० ॥

तोमरं च द्विधा चक्रे क्षुरप्रेणानिलात्मजः ।

पट्टिशं च त्रिभिर्बाणैश्चिच्छेद तिलकाण्डवत् ॥ ४१ ॥

परंतु वायुपुत्र भीमसेनने एक क्षुरप्रसे जयद्रथके चलाये हुए तोमरके दो टुकड़े कर दिये;

फिर तीन बाण मारकर पट्टिशको तिलके डंठलके समान टूक-टूक कर डाला ॥ ४१ ॥

स बिभेद शतघ्नीं च नवभिः कङ्कपत्रिभिः ।

मद्रराजप्रयुक्तं च शरं छित्त्वा महारथः ॥ ४२ ॥

शक्तिं चिच्छेद सहसा भगदत्तेरितां रणे ।

तत्पश्चात् कंकपत्रयुक्त नौ बाणोंद्वारा शतघ्नीको छिन्न-भिन्न कर दिया। इसके बाद

महारथी भीमसेनने मद्रराज शल्यके चलाये हुए बाणको काटकर रणक्षेत्रमें भगदत्तकी

चलायी हुई शक्तिके भी सहसा टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४२ ½ ॥

तथेतराञ्छरान् घोरान् शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४३ ॥

भीमसेनो रणश्लाघी त्रिधैकैकं समाच्छिनत् ।

तांश्च सर्वान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥ ४४ ॥

तदनन्तर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा अन्यान्य योद्धाओंके चलाये हुए

भयंकर शरसमूहोंको भी युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीमसेनने काटकर एक-एकके तीन-

तीन टुकड़े कर दिये। इस प्रकार शत्रुओंके अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण करके भीमसेनने उन

सभी महाधनुर्धर वीरोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥

ततो धनंजयस्तत्र वर्तमाने महारणे ।

आजगाम रथेनाजौ भीमं दृष्ट्वा महारथम् ॥ ४५ ॥

निघ्नन्तं समरे शत्रून् योधयानं च सायकैः ।

तब उस महासमरमें महारथी भीमसेनको, जो समरभूमिमें सायकोंद्वारा शत्रुओंका

संहार करते हुए उनके साथ युद्ध कर रहे थे, देखकर रथके द्वारा अर्जुन भी वहीं आ

पहुँचे ॥ ४५ ½ ॥

तौ तु तत्र महात्मानौ समेतौ वीक्ष्य पाण्डवौ ॥ ४६ ॥

न शशंसुर्जयं तत्र तावकाः पुरुषर्षभाः ।

उन दोनों महामनस्वी पाण्डव बन्धुओंको एकत्र हुआ देख आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने

वहाँ अपनी विजयकी आशा त्याग दी ॥ ४६ ½ ॥

अथार्जुनो रणे भीमं योधयन्तं महारथान् ॥ ४७ ॥

भीष्मस्य निधनाकाङ्क्षी पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।

आससाद रणे वीरांस्तावकान् दश भारत ॥ ४८ ॥

भरतनन्दन! उस रणक्षेत्रमें भीम जिनके साथ युद्ध कर रहे थे, आपके पक्षके उन दस महारथी वीरोंके सामने भीष्मके वधकी इच्छा रखनेवाले अर्जुन भी शिखण्डीको आगे किये आ पहुँचे ।। ४७-४८ ।।

ये स्म भीमं रणे राजन् योधयन्तो व्यवस्थिताः ।
बीभत्सुस्तानथाविध्यद् भीमस्य प्रियकाम्यया ।। ४९ ।।

राजन्! जो लोग रणक्षेत्रमें भीमसेनके साथ युद्ध करते हुए खड़े थे, उन सबको अर्जुनने भीमका प्रिय करनेकी इच्छासे अच्छी तरह घायल कर दिया ।। ४९ ।।

ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत् ।
अर्जुनस्य वधार्थाय भीमसेनस्य चोभयोः ।। ५० ।।

तब राजा दुर्योधनने अर्जुन और भीमसेन दोनोंके वधके लिये सुशर्माको भेजा ।। ५० ।।

सुशर्मन् गच्छ शीघ्रं त्वं बलौघैः परिवारितः ।
जहि पाण्डुसुतावेतौ धनंजयवृकोदरौ ।। ५१ ।।

भेजते समय उसने कहा—‘सुशर्मन्! तुम विशाल सेनाके साथ शीघ्र जाओ और अर्जुन तथा भीमसेन इन दोनों पाण्डुकुमारोंको मार डालो’ ।। ५१ ।।

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य त्रैगर्तः प्रस्थलाधिपः ।
अभिद्रुत्य रणे भीममर्जुनं चैव धन्विनौ ।। ५२ ।।
रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात् पर्यवारयत् ।
ततः प्रवृत्ते युद्धमर्जुनस्य परैः सह ।। ५३ ।।

दुर्योधनकी यह बात सुनकर प्रस्थलाके स्वामी त्रिगर्तराज सुशर्माने रणक्षेत्रमें धावा करके भीमसेन और अर्जुन दोनों धनुर्धर वीरोंको अनेक सहस्र रथोंद्वारा सब ओरसे घेर लिया। उस समय अर्जुनका शत्रुओंके साथ घोर युद्ध होने लगा ।। ५२-५३ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीमपराक्रमे
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीमसेनका पराक्रमविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११३ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं।]

छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः ॥ १ ॥

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंके साथ युद्धमें भीमसेन और अर्जुनका अद्भुत पुरुषार्थ

संजय उवाच

अर्जुनस्तु रणे शल्यं यतमानं महारथम् ।
छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! उस समय रणक्षेत्रमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले महारथी शल्यको अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा करके ढक दिया ॥ १ ॥

सुशर्माणं कृपं चैव त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत ।
प्राग्ज्योतिषं च समरे सैन्धवं च जयद्रथम् ॥ २ ॥
चित्रसेनं विकर्णं च कृतवर्माणमेव च ।
दुर्मर्षणं च राजेन्द्र ह्यावन्त्यौ च महारथौ ॥ ३ ॥
एकैकं त्रिभिरानर्च्छत् कङ्कबर्हिणवाजितैः ।
उसके बाद सुशर्मा और कृपाचार्यको भी तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला। राजेन्द्र! फिर समरांगणमें प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त, सिन्धुराज जयद्रथ, चित्रसेन, विकर्ण, कृतवर्मा, दुर्मर्षण तथा महारथी विन्द और अनुविन्द—इनमेंसे प्रत्येकको गीधकी पाँखसे युक्त तीन-तीन बाणोंद्वारा विशेष पीड़ा दी ॥ २-३ १/२ ॥

शरैरतिरथो युद्धे पीडयन् वाहिनीं तव ॥ ४ ॥
जयद्रथो रणे पार्थं विद्ध्वा भारत सायकैः ।
भीमं विव्याध तरसा चित्रसेनरथे स्थितः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् अतिरथी वीर अर्जुनने युद्धमें आपकी सेनाको बाणसमूहोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित कर दिया। भारत! चित्रसेनके रथपर बैठे हुए जयद्रथने रणक्षेत्रमें कुन्तीकुमार अर्जुनको घायल करके भीमसेनको भी बहुत-से सायकोंद्वारा वेगपूर्वक बींध डाला ॥ ४-५ ॥

शल्यश्च समरे जिष्णुं कृपश्च रथिनां वरः ।
विव्यधाते महाराज बहुधा मर्मभेदिभिः ॥ ६ ॥
महाराज! फिर रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्य तथा शल्यने भी समरांगणमें मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाले बाणोंद्वारा अर्जुनको बारंबार घायल किया ॥ ६ ॥

चित्रसेनादयश्चैव पुत्रास्तव विशाम्पते ।
पञ्चभिः पञ्चभिस्तूर्णं संयुगे निशितैः शरैः ॥ ७ ॥