महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एक ओर तो वे दुर्धर्ष सैनिक युद्धके लिये उद्यत रहेंगे और दूसरी ओरसे अकेला मैं रहूँगा; परंतु मैं न तो युद्ध करूँगा और न कोई शस्त्र ही धारण करूँगा॥
आभ्यामन्यतरं पार्थ यत् ते हृद्यतरं मतम्।
तद् वृणीतां भवानग्रे प्रवार्यस्त्वं हि धर्मतः॥ २०॥
अर्जुन! इन दोनोंमेंसे कोई एक वस्तु, जो तुम्हारे मनको अधिक प्रिय जान पड़े, तुम पहले चुन लो; क्योंकि धर्मके अनुसार पहले तुम्हें ही अपनी मनचाही वस्तु चुननेका अधिकार है॥ २०॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनंजयः।
अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम्॥ २१॥
नारायणममित्रघ्नं कामाज्जातमजं नृषु।
सर्वक्षत्रस्य पुरतो देवदानवयोरपि॥ २२॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार धनंजयने संग्रामभूमिमें युद्ध न करनेवाले उन भगवान् श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना, जो साक्षात् शत्रुहन्ता नारायण हैं और अजन्मा होते हुए भी स्वेच्छासे देवता, दानव तथा समस्त क्षत्रियोंके सम्मुख मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २१-२२॥
दुर्योधनस्तु तत् सैन्यं सर्वमावरयत् तदा।
सहस्राणां सहस्रं तु योधानां प्राप्य भारत॥ २३॥
कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा सम्प्राप परमां मुदम्।
दुर्योधनस्तु तत् सैन्यं सर्वमादाय पार्थिवः॥ २४॥
ततोऽभ्ययाद् भीमबलो रौहिणेयं महाबलः।
सर्वं चागमने हेतुं स तस्मै संन्यवेदयत्।
प्रत्युवाच ततः शौरिर्धार्तराष्ट्रमिदं वचः॥ २५॥
जनमेजय! तब दुर्योधनने वह सारी सेना माँग ली, जो अनेक सहस्र सैनिकोंकी सहस्रों टोलियोंमें संगठित थी। उन योद्धाओंको पाकर और श्रीकृष्णको ठगा गया समझकर राजा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका बल भयंकर था। वह सारी सेना लेकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीके पास गया और उसने उन्हें अपने आनेका सारा कारण बताया। तब शूरवंशी बलरामजीने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको इस प्रकार उत्तर दिया॥ २३—२५॥
बलदेव उवाच
विदितं ते नरव्याघ्र सर्वं भवितुमर्हति।
यन्मयोक्तं विराटस्य पुरा वैवाहिके तदा॥ २६॥
**बलदेवजी बोले—**पुरुषसिंह! पहले राजा विराटके यहाँ विवाहोत्सवके अवसरपर मैंने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें मालूम हो गया होगा॥ २६॥
निगृह्योक्तो हृषीकेशस्त्वदर्थं कुरुनन्दन।
मया सम्बन्धकं तुल्यमिति राजन् पुनः पुनः॥ २७॥
न च तद् वाक्यमुक्तं वै केशवं प्रत्यपद्यत।
न चाहमुत्सहे कृष्णं विना स्थातुमपि क्षणम्॥ २८॥
कुरुनन्दन! तुम्हारे लिये मैंने श्रीकृष्णको बाध्य करके कहा था कि हमारे साथ दोनों पक्षोंका समानरूपसे सम्बन्ध है। राजन्! मैंने वह बात बार-बार दुहरायी, परंतु श्रीकृष्णको जँची नहीं और मैं श्रीकृष्ण-को छोड़कर एक क्षण भी अन्यत्र कहीं ठहर नहीं सकता॥
नाहं सहायः पार्थस्य नापि दुर्योधनस्य वै।
इति मे निश्चिता बुद्धिर्वासुदेवमवेक्ष्य ह॥ २९॥
अतः मैं श्रीकृष्णकी ओर देखकर मन-ही-मन इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि मैं न तो अर्जुनकी सहायता करूँगा और न दुर्योधनकी ही॥ २९॥
जातोऽसि भारते वंशे सर्वपार्थिवपूजिते।
गच्छ युध्यस्व धर्मेण क्षात्रेण पुरुषर्षभ॥ ३०॥
पुरुषरत्न! तुम समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित भरत-वंशमें उत्पन्न हुए हो। जाओ, क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करो॥ ३०॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्तस्तु तदा परिष्वज्य हलायुधम्।
कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा युद्धान्मेने जितं जयम्॥ ३१॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बलभद्रजीके ऐसा कहनेपर दुर्योधनने उन्हें हृदयसे लगाया और श्रीकृष्णको ठगा गया जानकर युद्धसे अपनी निश्चित विजय समझ ली॥ ३१॥
सोऽभ्ययात् कृतवर्माणं धृतराष्ट्रसुतो नृपः।
कृतवर्मा ददौ तस्य सेनामक्षौहिणीं तदा॥ ३२॥
तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन कृतवर्माके पास गया। कृतवर्माने उसे एक अक्षौहिणी सेना दी॥
स तेन सर्वसैन्येन भीमेन कुरुनन्दनः।
वृतः परिययौ हृष्टः सुहृदः सम्प्रहर्षयन्॥ ३३॥
उस सारी भयंकर सेनाके द्वारा घिरा हुआ कुरुनन्दन दुर्योधन अपने सुहृदोंका हर्ष बढ़ाता हुआ बड़ी प्रसन्नताके साथ हस्तिनापुरको लौट गया॥ ३३॥
ततः पीताम्बरधरो जगत्स्रष्टा जनार्दनः।
गते दुर्योधने कृष्णः किरीटिनमथाब्रवीत् ।
अयुध्यमानः कां बुद्धिमास्थायाहं वृतस्त्वया ॥ ३४ ॥
दुर्योधनके चले जानेपर पीताम्बरधारी जगत्स्रष्टा जनार्दन श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! मैं तो युद्ध करूँगा नहीं; फिर तुमने क्या सोच-समझकर मुझे चुना है?’ ॥ ३४ ॥
अर्जुन उवाच
भवान् समर्थस्तान् सर्वान् निहन्तुं नात्र संशयः ।
निहन्तुमहमप्येकः समर्थः पुरुषर्षभ ॥ ३५ ॥
**अर्जुन बोले—**भगवन्! आप अकेले ही उन सबको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। पुरुषोत्तम! (आपकी ही कृपासे) मैं भी अकेला ही उन सब शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हूँ ॥ ३५ ॥
भवांस्तु कीर्तिमाँल्लोके तद् यशस्त्वां गमिष्यति ।
यशसां चाहमप्यर्थी तस्मादसि मया वृतः ॥ ३६ ॥
परंतु आप संसारमें यशस्वी हैं। आप जहाँ भी रहेंगे, वह यश आपका ही अनुसरण करेगा। मुझे भी यशकी इच्छा है ही; इसीलिये मैंने आपका वरण किया है ॥ ३६ ॥
सारथ्यं तु त्वया कार्यमिति मे मानसं सदा ।
चिररात्रेप्सितं कामं तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ३७ ॥
मेरे मनमें बहुत दिनोंसे यह अभिलाषा थी कि आपको अपना सारथि बनाऊँ—अपने जीवनरथकी बागडोर आपके हाथोंमें सौंप दूँ। मेरी इस चिरकालिक अभिलाषाको आप पूर्ण करें ॥ ३७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ (गीता ५।१८)
गीताप्रेस, गोरखपुर
संजयकी श्रीकृष्ण एवं पाण्डवोंसे भेंट
गीताप्रेस, गोरखपुर
कौरव-सभामें विराट् रूप
गीताप्रेस, गोरखपुर
संजयको दिव्य दृष्टि
गीताप्रेस, गोरखपुर
सबमें भगवत्-दर्शन
भक्तोंके द्वारा प्रेमसे दिये हुए पत्र, पुष्प, फल, जल आदिको भगवान् प्रत्यक्ष प्रकट होकर ग्रहण करते हैं!
[गीताप्रेस, गोरखपुर]
भीष्म और अर्जुनका युद्ध
भीष्मपितामहकी सेवामें श्रीकृष्णसहित पाण्डव
वासुदेव उवाच
उपपन्नमिदं पार्थ यत् स्पर्धसि मया सह ।
सारथ्यं ते करिष्यामि कामः सम्पद्यतां तव ॥ ३८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! तुम जो (शत्रुओंपर विजय पानेमें) मेरे साथ स्पर्धा रखते हो, यह तुम्हारे लिये ठीक ही है। मैं तुम्हारा सारथ्य करूँगा। तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण हो ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं प्रमुदितः पार्थः कृष्णेन सहितस्तदा ।
वृतो दशार्हप्रवरैः पुनरायाद् युधिष्ठिरम् ॥ ३९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार (अपनी इच्छा पूर्ण होनेसे) प्रसन्न हुए अर्जुन श्रीकृष्णके सहित मुख्य-मुख्य दशार्हवंशी यादवोंसे घिरे हुए पुनः युधिष्ठिरके पास आये ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि कृष्णसारथ्यस्वीकारे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें श्रीकृष्णका सारथ्यस्वीकारविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना
वैशम्पायन उवाच
शल्यः श्रुत्वा तु दूतानां सैन्येन महता वृतः ।
अभ्ययात् पाण्डवान् राजन् सह पुत्रैर्महारथैः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके दूतोंके मुखसे उनका संदेश सुनकर राजा शल्य अपने महारथी पुत्रोंके साथ विशाल सेनासे घिरकर पाण्डवोंके पास चले ॥ १ ॥
तस्य सेनानिवेशोऽभूदध्यर्धमिव योजनम् ।
तथा हि विपुलां सेनां बिभर्ति स नरर्षभः ॥ २ ॥
नरश्रेष्ठ शल्य इतनी अधिक सेनाका भरण-पोषण करते थे कि उसका पड़ाव पड़नेपर आधी योजन भूमि घिर जाती थी ॥ २ ॥
अक्षौहिणीपती राजन् महावीर्यपराक्रमः ।
विचित्रकवचाः शूरा विचित्रध्वजकार्मुकाः ॥ ३ ॥
विचित्राभरणाः सर्वे विचित्ररथवाहनाः ।
विचित्रस्रग्धराः सर्वे विचित्राम्बरभूषणाः ॥ ४ ॥
स्वदेशवेषाभरणा वीराः शतसहस्रशः ।
तस्य सेनाप्रणेतारो बभूवुः क्षत्रियर्षभाः ॥ ५ ॥
राजन्! महान् बलवान् और पराक्रमी शल्य अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे। सैकड़ों और हजारों वीर क्षत्रियशिरोमणि उनकी विशाल वाहिनीका संचालन करनेवाले सेनापति थे। वे सब-के-सब शौर्य-सम्पन्न, अद्भुत कवच धारण करनेवाले तथा विचित्र ध्वज एवं धनुषसे सुशोभित थे। उन सबके अंगोंमें विचित्र आभूषण शोभा दे रहे थे। सभीके रथ और वाहन विचित्र थे। सबके गलेमें विचित्र मालाएँ सुशोभित थीं। सबके वस्त्र और अलंकार अद्भुत दिखायी देते थे। उन सबने अपने-अपने देशकी वेश-भूषा धारण कर रखी थी ॥ ३—५ ॥
व्यथयन्निव भूतानि कम्पयन्निव मेदिनीम् ।
शनैर्विश्रामयन् सेनां स ययौ येन पाण्डवः ॥ ६ ॥
राजा शल्य समस्त प्राणियोंको व्यथित और पृथ्वीको कम्पित-से करते हुए अपनी सेनाको धीरे-धीरे विभिन्न स्थानोंपर ठहराकर विश्राम देते हुए उस मार्गपर चले, जिससे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके पास शीघ्र पहुँच सकते थे ॥ ६ ॥
ततो दुर्योधनः श्रुत्वा महात्मानं महारथम् । उपायान्तमभिद्रुत्य स्वयमानर्च भारत ॥ ७ ॥ भरतनन्दन! उन्हीं दिनों दुर्योधनने महारथी एवं महामना राजा शल्यका आगमन सुनकर स्वयं आगे बढ़कर (मार्गमें ही) उनका सेवा-सत्कार प्रारम्भ कर दिया ॥ ७ ॥
कारयामास पूजार्थं तस्य दुर्योधनः सभाः । रमणीयेषु देशेषु रत्नचित्राः स्वलंकृताः ॥ ८ ॥ दुर्योधनने राजा शल्यके स्वागत-सत्कारके लिये रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से सभाभवन तैयार कराये, जिनकी दीवारोंमें रत्न जड़े हुए थे। उन भवनोंको सब प्रकारसे सजाया गया था ॥ ८ ॥
शिल्पिभिर्विविधैश्चैव क्रीडास्तत्र प्रयोजिताः । तत्र वस्त्राणि माल्यानि भक्ष्यं पेयं च सत्कृतम् ॥ ९ ॥ नाना प्रकारके शिल्पियोंने उनमें अनेकानेक क्रीड़ा-विहारके स्थान बनाये थे। वहाँ भाँति-भाँतिके वस्त्र, मालाएँ, खाने-पीनेके सामान तथा सत्कारकी अन्यान्य वस्तुएँ रखी गयी थीं ॥ ९ ॥
कूपांश्च विविधाकारा मनोहर्षविवर्धनाः । वाप्यश्च विविधाकारा औदकानि गृहाणि च ॥ १० ॥ अनेक प्रकारके कुएँ तथा भाँति-भाँतिकी बाविड़ियाँ बनायी गयी थीं, जो हृदयके हर्षको बढ़ा रही थीं। बहुत-से ऐसे गृह बने थे, जिनमें जलकी विशेष सुविधा सुलभ की गयी थी ॥ १० ॥
स ताः सभाः समासाद्य पूज्यमानो यथामरः । दुर्योधनस्य सचिवैर्देशे देशो समन्ततः ॥ ११ ॥ सब ओर विभिन्न स्थानोंमें बने हुए उन सभाभवनोंमें पहुँचकर राजा शल्य दुर्योधनके मन्त्रियोंद्वारा देवताओं-की भाँति पूजित होते थे ॥ ११ ॥
आजगाम सभामन्यां देवावसथवर्चसम् । स तत्र विषयैर्युक्तः कल्याणैरतिमानुषैः ॥ १२ ॥ इस तरह (यात्रा करते हुए) शल्य किसी दूसरे सभाभवनमें गये, जो देवमन्दिरोंके समान प्रकाशित होता था। वहाँ उन्हें अलौकिक कल्याणमय भोग प्राप्त हुए ॥ १२ ॥
मेनेऽभ्यधिकमात्मानमवमेने पुरंदरम् । पप्रच्छ स ततः प्रेष्यान् प्रहृष्टः क्षत्रियर्षभः ॥ १३ ॥ उस समय उन क्षत्रियशिरोमणि नरेशने अपने-आपको सबसे अधिक सौभाग्यशाली समझा। उन्हें देवराज इन्द्र भी अपनेसे तुच्छ प्रतीत हुए। उस समय अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने सेवकोंसे पूछा— ॥ १३ ॥
युधिष्ठिरस्य पुरुषाः केऽत्र चक्रुः सभा इमाः ।
आनीयन्तां सभाकाराः प्रदेयार्हा हि मे मताः ॥ १४ ॥ ‘युधिष्ठिरके किन आदमियोंने ये सभाभवन बनाये हैं। उन सबको बुलाओ। मैं उन्हें पुरस्कार देनेके योग्य मानता हूँ ॥ १४ ॥
प्रसादमेषां दास्यामि कुन्तीपुत्रोऽनुमन्यताम् । दुर्योधनाय तत् सर्वं कथयन्ति स्म विस्मिताः ॥ १५ ॥ ‘मैं इन सबको अपनी प्रसन्नताके फलस्वरूप कुछ पुरस्कार दूँगा, कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको भी मेरे इस व्यवहारका अनुमोदन करना चाहिये।’ यह सुनकर सब सेवकोंने विस्मित हो दुर्योधनसे वे सारी बातें बतायीं ॥ १५ ॥
सम्पृहृष्टो यदा शल्यो दिदित्सुरपि जीवितम् । गूढो दुर्योधनस्तत्र दर्शयामास मातुलम् ॥ १६ ॥ जब हर्षमें भरे हुए राजा शल्य (अपने प्रति किये गये उपकारके बदले) प्राणतक देनेको तैयार हो गये, तब गूप्तरूपसे वहीं छिपा हुआ दुर्योधन मामा शल्यके सामने गया ॥ १६ ॥
तं दृष्ट्वा मद्रराजश्च ज्ञात्वा यत्नं च तस्य तम् । परिष्वज्याब्रवीत् प्रीत इष्टोऽर्थो गृह्यतामिति ॥ १७ ॥ उसे देखकर तथा उसीने यह सारी तैयारी की है, यह जानकर मद्रराजने प्रसन्नतापूर्वक दुर्योधनको हृदयसे लगा लिया और कहा—‘तुम अपनी अभीष्ट वस्तु मुझसे माँग लो’ ॥ १७ ॥
दुर्योधन उवाच
सत्यवाग् भव कल्याण वरो वै मम दीयताम् । सर्वसेनाप्रणेता वै भवान् भवितुमर्हति ॥ १८ ॥ **दुर्योधनने कहा—**कल्याणस्वरूप महानुभाव! आपकी बात सत्य हो। आप मुझे अवश्य वर दीजिये। मैं चाहता हूँ कि आप मेरी सम्पूर्ण सेनाके अधिनायक हो जायँ ॥ १८ ॥
(यथैव पाण्डवास्तुभ्यं तथैव भवते ह्यहम् । अनुमान्यं च पाल्यं च भक्तं च भज मां विभो ॥ आपके लिये जैसे पाण्डव हैं, वैसा ही मैं हूँ। प्रभो! मैं आपका भक्त होनेके कारण आपके द्वारा समादृत और पालित होने योग्य हूँ। अतः मुझे अपनाइये।
शल्य उवाच
एवमेतन्महाराज यथा वदसि पार्थिव । एवं ददामि ते प्रीत एवमेतद् भविष्यति ॥ ) **शल्यने कहा—**महाराज! तुम्हारा कहना ठीक है। भूपाल! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही वर तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक देता हूँ। यह ऐसा ही होगा—मैं तुम्हारी सेनाका अधिनायक
बनूँगा।
वैशम्पायन उवाच
कृतमित्यब्रवीच्छल्यः किमन्यत् क्रियतामिति ।
कृतमित्येव गान्धारिः प्रत्युवाच पुनः पुनः ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस समय शल्यने दुर्योधनसे कहा—'तुम्हारी यह प्रार्थना तो स्वीकार कर ली। अब और कौन-सा कार्य करूँ?' यह सुनकर गान्धारीनन्दन दुर्योधनने बार-बार यही कहा कि मेरा तो सब काम आपने पूरा कर दिया ॥ १९ ॥
शल्य उवाच
गच्छ दुर्योधन पुरं स्वकमेव नरर्षभ ।
अहं गमिष्ये द्रष्टुं वै युधिष्ठिरमरिंदमम् ॥ २० ॥
**शल्य बोले—**नरश्रेष्ठ दुर्योधन! अब तुम अपने नगरको जाओ। मैं शत्रुदमन युधिष्ठिरसे मिलने जाऊँगा ॥
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन् क्षिप्रमेष्ये नराधिप ।
अवश्यं चापि द्रष्टव्यः पाण्डवः पुरुषर्षभः ॥ २१ ॥
नरेश्वर! मैं युधिष्ठिरसे मिलकर शीघ्र ही लौट आऊँगा। पाण्डुपुत्र नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे मिलना भी अत्यन्त आवश्यक है ॥ २१ ॥
दुर्योधन उवाच
क्षिप्रमागम्यतां राजन् पाण्डवं वीक्ष्य पार्थिव । त्वय्यधीनाः स्म राजेन्द्र वरदानं स्मरस्व नः ॥ २२ ॥
दुर्योधनने कहा— राजन्! पृथ्वीपते! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे मिलकर आप शीघ्र चले आइये। राजेन्द्र! हम आपके ही अधीन हैं। आपने हमें जो वरदान दिया है, उसे याद रखियेगा ॥ २२ ॥
शल्य उवाच
क्षिप्रमेष्यामि भद्रं ते गच्छस्व स्वपुरं नृप । परिष्वज्य तथान्योन्यं शल्यदुर्योधनावुभौ ॥ २३ ॥
शल्य बोले— नरेश्वर! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपने नगरको जाओ। मैं शीघ्र आऊँगा। ऐसा कहकर राजा शल्य तथा दुर्योधन दोनों एक-दूसरेसे गले मिलकर विदा हुए ॥ २३ ॥
स तथा शल्यमामन्त्र्य पुनरायात् स्वकं पुरम् । शल्यो जगाम कौन्तेयानाख्यातुं कर्म तस्य तत् ॥ २४ ॥
इस प्रकार शल्यसे आज्ञा लेकर दुर्योधन पुनः अपने नगरको लौट आया और शल्य कुन्तीकुमारोंसे दुर्योधनकी वह करतूत सुनानेके लिये युधिष्ठिरके पास गये ॥ २४ ॥
उपप्लव्यं स गत्वा तु स्कन्धावारं प्रविश्य च । पाण्डवानथ तान् सर्वान् शल्यस्तत्र ददर्श ह ॥ २५ ॥
विराटनगरके उपप्लव्य नामक प्रदेशमें जाकर वे पाण्डवोंकी छावनीमें पहुँचे और वहीं उन सब पाण्डवोंसे मिले ॥ २५ ॥
समेत्य च महाबाहुः शल्यः पाण्डुसुतैस्तदा । पाद्यमर्घ्यं च गां चैव प्रत्यगृह्लाद् यथाविधि ॥ २६ ॥
पाण्डुपुत्रोंसे मिलकर महाबाहु शल्यने उनके द्वारा विधिपूर्वक दिये हुए पाद्य, अर्घ्य और गौको ग्रहण किया ॥
ततः कुशलपूर्वं हि मद्रराजोऽरिसूदनः । प्रीत्या परमया युक्तः समाश्लिष्यद् युधिष्ठिरम् ॥ २७ ॥ तथा भीमार्जुनौ हृष्टौ स्वस्रीयौ च यमावुभौ ।
तत्पश्चात् शत्रुसूदन मद्रराज शल्यने कुशल-प्रश्नके अनन्तर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरको हृदयसे लगाया। इसी प्रकार उन्होंने हर्षमें भरे हुए दोनों भाई भीमसेन और
अर्जुनको तथा अपनी बहिनके दोनों जुड़वे पुत्रों—नकुल-सहदेवको भी गले लगाया।। (द्रौपदी च सुभद्रा च अभिमन्युश्च भारत। समेत्य च महाबाहुं शल्यं पाण्डुसुतस्तदा।। कृताञ्जलिरदीनात्मा धर्मात्मा शल्यमब्रवीत्। भारत! तदनन्तर द्रौपदी, सुभद्रा तथा अभिमन्युने महाबाहु शल्यके पास आकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय उदारचेता धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने दोनों हाथ जोड़कर शल्यसे कहा। युधिष्ठिर उवाच स्वागतं तेऽस्तु वै राजन्नेतदासनमास्यताम्।। युधिष्ठिर बोले—राजन्! आपका स्वागत है। इस आसनपर विराजिये।
वैशम्पायन उवाच ततो न्यषीदच्छल्यश्च काञ्चने परमासने। कुशलं पाण्डवोऽपृच्छच्छल्यं सर्वसुखावहम्।। स तैः परिवृतः सर्वैः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः।) आसने चोपविष्टस्तु शल्यः पार्थमुवाच ह।। २८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब राजा शल्य सुवर्णके श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सबको सुख देनेवाले शल्यसे कुशलसमाचार पूछा। उन समस्त धर्मात्मा पाण्डवोंसे घिरकर आसनपर बैठे हुए राजा शल्य कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले—।। २८ ।। कुशलं राजशार्दूल कच्चित् ते कुरुनन्दन। अरण्यवासाद् दिष्ट्यासि विमुक्तो जयतां वर।। २९ ।। ‘नृपतिश्रेष्ठ कुरुनन्दन! तुम कुशलसे तो हो न? विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम वनवासके कष्टसे छुटकारा पा गये।। २९ ।। सुदुष्करं कृतं राजन् निर्जने वसता त्वया। भ्रातृभिः सह राजेन्द्र कृष्णया चानया सह।। ३० ।। ‘राजन्! तुमने अपने भाइयों तथा इस द्रुपदकुमारी कृष्णाके साथ निर्जन वनमें निवास करके अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है।। ३० ।। अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम्। दुःखमेव कुतः सौख्यं भ्रष्टराज्यस्य भारत।। ३१ ।। ‘भारत! भयंकर अज्ञातवास करके तो तुमलोगोंने और भी दुष्कर कार्य सम्पन्न किया है। जो अपने राज्यसे वंचित हो गया हो, उसे तो कष्ट ही उठाना पड़ता है, सुख कहाँसे मिल सकता है? ।। ३१ ।। दुःखस्यैतस्य महतो धार्तराष्ट्रकृतस्य वै।
अवाप्स्यसि सुखं राजन् हत्वा शत्रून् परंतप ॥ ३२ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! दुर्योधनके दिये हुए इस महान् दुःखके अन्तमें अब तुम शत्रुओंको मारकर सुखके भागी होओगे ॥ ३२ ॥
विदितं ते महाराज लोकतन्त्रं नराधिप ।
तस्माल्लोभकृतं किंचित् तव तात न विद्यते ॥ ३३ ॥
‘महाराज! नरेश्वर! तुम्हें लोकतन्त्रका सम्यक् ज्ञान है। तात! इसीलिये तुममें लोभजनित कोई भी बर्ताव नहीं है ॥
राजर्षीणां पुराणानां मार्गमन्विच्छ भारत ।
दाने तपसि सत्ये च भव तात युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
‘भारत! प्राचीन राजर्षियोंके मार्गका अनुसरण करो। तात युधिष्ठिर! तुम सदा दान, तपस्या और सत्यमें ही संलग्न रहो ॥ ३४ ॥
क्षमा दमश्च सत्यं च अहिंसा च युधिष्ठिर ।
अद्भुतश्च पुनर्लोकस्त्वयि राजन् प्रतिष्ठितः ॥ ३५ ॥
‘राजा युधिष्ठिर! क्षमा, इन्द्रियसंयम, सत्य, अहिंसा तथा अद्भुत लोक—ये सब तुममें प्रतिष्ठित हैं ॥ ३५ ॥
मृदुर्वदान्यो ब्रह्मण्यो दाता धर्मपरायणः ।
धर्मास्ते विदिता राजन् बहवो लोकसाक्षिकाः ॥ ३६ ॥
‘महाराज! तुम कोमल, उदार, ब्राह्मणभक्त, दानी तथा धर्मपरायण हो। संसार जिनका साक्षी है, ऐसे बहुत-से धर्म तुम्हें ज्ञात हैं ॥ ३६ ॥
सर्वं जगदिदं तात विदितं ते परंतप ।
दिष्ट्या कृच्छ्रमिदं राजन् पारितं भरतर्षभ ॥ ३७ ॥
‘तात! परंतप! तुम्हें इस सम्पूर्ण जगत्का तत्त्व ज्ञात है। भरतश्रेष्ठ नरेश! तुम इस महान् संकटसे पार हो गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ३७ ॥
दिष्ट्या पश्यामि राजेन्द्र धर्मात्मानं सहानुगम् ।
निस्तीर्णं दुष्करं राजंस्त्वां धर्मनिचयं प्रभो ॥ ३८ ॥
‘राजेन्द्र! तुम धर्मात्मा एवं धर्मकी निधि हो। राजन्! तुमने भाइयोंसहित अपनी दुष्कर प्रतिज्ञा पूरी कर ली है और इस अवस्थामें मैं तुम्हें देख रहा हूँ; यह मेरा अहोभाग्य है’ ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽस्याकथयद् राजा दुर्योधनसमागमम् ।
तच्च शुश्रूषितं सर्वं वरदानं च भारत ॥ ३९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! तदनन्तर राजा शल्यने दुर्योधनके मिलने, सेवा-शुश्रूषा करने और उसे अपने वरदान देनेकी सारी बातें कह सुनायीं॥ ३९॥
युधिष्ठिर उवाच
सुकृतं ते कृतं राजन् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
दुर्योधनस्य यद् वीर त्वया वाचा प्रतिश्रुतम् ॥ ४० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**वीर महाराज! आपने प्रसन्नचित्त होकर जो दुर्योधनको उसकी सहायताका वचन दे दिया, वह अच्छा ही किया॥ ४०॥
एकं त्विच्छामि भद्रं ते क्रियमाणं महीपते ।
राजनकर्तव्यमपि कर्तुमर्हसि सत्तम ॥ ४१ ॥
ममत्ववेक्षया वीर शृणु विज्ञापयामि ते ।
भवानिह च सारथ्ये वासुदेवसमो युधि ॥ ४२ ॥
परंतु पृथ्वीपते! आपका कल्याण हो। मैं आपके द्वारा अपना भी एक काम कराना चाहता हूँ। साधु शिरोमणे! वह न करने योग्य होनेपर भी मेरी ओर देखते हुए आपको अवश्य करना चाहिये। वीरवर! सुनिये; मैं वह कार्य आपको बता रहा हूँ। महाराज! आप इस भूतलपर संग्राममें सारथिका काम करनेके लिये वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके समान माने ये हैं॥ ४१-४२॥
कर्णार्जुनभ्यां सम्प्राप्ते द्वैरथे राजसत्तम ।
कर्णस्य भवता कार्यं सारथ्यं नात्र संशयः ॥ ४३ ॥
नृपशिरोमणे! जब कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धका अवसर प्राप्त होगा, उस समय आपको ही कर्णके सारथिका काम करना पड़ेगा; इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥
तत्र पाल्योऽर्जुनो राजन् यदि मत्प्रियमिच्छसि ।
तेजोवधश्च ते कार्यः सौतेरस्मज्जय्यावहः ॥ ४४ ॥
अकर्तव्यमपि ह्येतत् कर्तुमर्हसि मातुल ।
राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो उस युद्धमें आपको अर्जुनकी रक्षा करनी होगी। आपका कार्य इतना ही होगा कि आप कर्णका उत्साह भंग करते रहें। वही कर्णसे हमें विजय दिलानेवाला होगा। मामाजी! मेरे लिये यह न करने योग्य कार्य भी करें॥ ४४ १/२ ॥
शल्य उवाच
शृणु पाण्डव ते भद्रं यद् ब्रवीषि महात्मनः ।
तेजोवधनिमित्तं मां सूतपुत्रस्य सङ्गमे ॥ ४५ ॥
अहं तस्य भविष्यामि संग्रामे सारथिर्ध्रुवम् ।
वासुदेवेन हि समं नित्यं मां स हि मन्यते ॥ ४६ ॥