महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दुर्बलोऽहं न मे शक्तिर्भवतां परिपालने ।
बलवाञ्जायते राजा बलं शक्रे हि नित्यदा ॥ ४ ॥
‘मैं तो दुर्बल हूँ, मुझमें आपलोगोंकी रक्षा करनेकी शक्ति नहीं है। बलवान् पुरुष ही राजा होता है। इन्द्रमें ही बलकी नित्य सत्ता है’ ॥ ४ ॥
तमब्रुवन् पुनः सर्वे देवा ऋषिपुरोगमाः ।
अस्माकं तपसा युक्तः पाहि राज्यं त्रिविष्टपे ॥ ५ ॥
परस्परभयं घोरमस्माकं हि न संशयः ।
अभिषिञ्चस्व राजेन्द्र भव राजा त्रिविष्टपे ॥ ६ ॥
यह सुनकर सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि पुनः उनसे बोले—'राजेन्द्र! आप हमारी तपस्यासे संयुक्त हो स्वर्गके राज्यका पालन कीजिये। हमलोगोंमें प्रत्येकको एक-दूसरेसे घोर भय बना रहता है, इसमें संशय नहीं है। अतः आप अपना अभिषेक कराइये और स्वर्गके राजा होइये ॥ ५-६ ॥
देवदानवयक्षाणामृषीणां रक्षसां तथा ।
पितृगन्धर्वभूतानां चक्षुर्विषयवर्तिनाम् ॥ ७ ॥
तेज आदास्यसे पश्यन् बलवांश्च भविष्यसि ।
धर्मं पुरस्कृत्य सदा सर्वलोकाधिपो भव ॥ ८ ॥
'देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत—जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायेंगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान् हो जायेंगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये ।। ७-८ ।। ब्रह्मर्षींश्चापि देवांश्च गोपायस्व त्रिविष्टपे । अभिषिक्तः स राजेन्द्र ततो राजा त्रिविष्टपे ।। ९ ।। 'आप स्वर्गमें रहकर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंका पालन कीजिये।' युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा नहुषका स्वर्गमें इन्द्रके पदपर अभिषेक हुआ ।। ९ ।। धर्मं पुरस्कृत्य तदा सर्वलोकाधिपोऽभवत् । सुदुर्लभं वरं लब्ध्वा प्राप्य राज्यं त्रिविष्टपे ।। १० ।। धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत । धर्मको आगे रखकर उस समय राजा नहुष सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति हो गये। वे परम दुर्लभ वर पाकर स्वर्गके राज्यको हस्तगत करके निरन्तर धर्मपरायण रहते हुए भी कामभोगमें आसक्त हो गये ।। १० १/२ ।। देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च ।। ११ ।। कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते । सह्ये महेन्द्रे मलये समुद्रेषु सरित्सु च ।। १२ ।। अप्सरोभिः परिवृतो देवकन्यासमावृतः । नहुषो देवराजोऽथ क्रीडन् बहुविधं तदा ।। १३ ।। शृण्वन् दिव्या बहुविधाः कथाः श्रुतिमनोहराः । वादित्राणि च सर्वाणि गीतं च मधुरस्वनम् ।। १४ ।। देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सह्य, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे ।। ११—१४ ।। विश्वावसुर्नारदश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः । ऋतवः षट् च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिताः ।। १५ ।। विश्वावसु, नारद, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय तथा छहों ऋतुएँ शरीर धारण करके देवेन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती थीं ।। १५ ।। मारुतः सुरभिर्वाति मनोज्ञः सुखशीतलः । एवं च क्रीडतस्तस्य नहुषस्य दुरात्मनः ।। १६ ।। सम्प्राप्ता दर्शनं देवी शक्रस्य महिषी प्रिया ।
उनके लिये वायु मनोहर, सुखद, शीतल और सुगन्धित होकर बहते थे। इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए दुरात्मा राजा नहुषकी दृष्टि एक दिन देवराज इन्द्रकी प्यारी महारानी शचीपर पड़ी ।। १६ १/२ ।। स तां संदृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वान् सभासदः ॥ १७ ॥ इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति । अहमिन्द्रोऽस्मि देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ १८ ॥ आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा—‘इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें’ ।। १७-१८ १/२ ।। तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह ॥ १९ ॥ रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्त्वामस्मि शरणं गता । सर्वलक्षणसम्पन्नां ब्रह्मंस्त्वं मां प्रभाषसे ॥ २० ॥ देवराजस्य दयितामत्यन्तं सुखभागिनीम् । अवैधव्येन युक्तां चाप्येकपत्नीं पतिव्रताम् ॥ २१ ॥ यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं—‘ब्रह्मन्! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो ।। १९—२१ ।। उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम् । नोक्तपूर्वं च भगवन् वृथा ते किंचिदीश्वर ॥ २२ ॥ तस्मादेतद् भवेत् सत्यं त्वयोक्तं द्विजसत्तम । ‘भगवन्! आपने पहले जो वैसी बातें कही हैं, अपनी उन वाणियोंको सत्य कीजिये। देवगुरो! आपके मुखसे पहले कभी कोई व्यर्थ या असत्य वचन नहीं निकला है, अतः द्विजश्रेष्ठ! आपका यह पूर्वोक्त वचन भी सत्य होना चाहिये’ ।। २२ १/२ ।।
बृहस्पतिरथोवाच शक्राणीं भयमोहिताम् ॥ २३ ॥ यदुक्तासि मया देवि सत्यं तद् भविता ध्रुवम् । द्रक्ष्यसे देवराजानमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम् ॥ २४ ॥ न भेतव्यं च नहुषात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । समानयिष्ये शक्रेण न चिराद् भवतीमहम् ॥ २५ ॥ यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा—‘देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा’ ॥ २३—२५ ॥
अथ शुश्राव नहुषः शक्राणीं शरणं गताम् । बृहस्पतेरङ्गिरसश्चुक्रोध स नृपस्तदा ॥ २६ ॥ जब राजा नहुषने सुना कि इन्द्राणी अंगिराके पुत्र बृहस्पतिकी शरणमें गयी है, तब वे बहुत कुपित हुए ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीभये एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्राणीभयविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना
शल्य उवाच
क्रुद्धं तु नहुषं दृष्ट्वा देवा ऋषिपुरोगमाः ।
अब्रुवन् देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम् ॥ १ ॥
शल्य कहते हैं—युधिष्ठिर! देवराज नहुषको क्रोधमें भरे हुए देख देवतालोग ऋषियोंको आगे करके उनके पास गये। उस समय उनकी दृष्टि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी। देवताओं तथा ऋषियोंने कहा— ॥ १ ॥
देवराज जहि क्रोधं त्वयि क्रुद्धे जगद् विभो ।
त्रस्तं सासुरगन्धर्वं सकिन्नरमहोरगम् ॥ २ ॥
‘देवराज! आप क्रोध छोड़ें। प्रभो! आपके कुपित होनेसे असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागगणोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो उठा है ॥ २ ॥
जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधाः ।
परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर ॥ ३ ॥
‘साधो! आप इस क्रोधको त्याग दीजिये। आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंपर कोप नहीं करते हैं। अतः प्रसन्न होइये। सुरेश्वर! शची देवी दूसरे इन्द्रकी पत्नी हैं ॥ ३ ॥
निवर्तय मनः पापात् परदाराभिमर्शनात् ।
देवराजोऽसि भद्रं ते प्रजा धर्मेण पालय ॥ ४ ॥
‘परायी स्त्रियोंका स्पर्श पापकर्म है। उससे मनको हटा लीजिये। आप देवताओंके राजा हैं। आपका कल्याण हो। आप धर्मपूर्वक प्रजाका पालन कीजिये’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तो न जग्राह तद्वचः काममोहितः ।
अथ देवानुवाचेदमिन्द्रं प्रति सुराधिपः ॥ ५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी काममोहित नहुषने उनकी बात नहीं मानी। उस समय देवेश्वर नहुषने इन्द्रके विषयमें देवताओंसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
अहल्या धर्षिता पूर्वमृषिपत्नी यशस्विनी ।
जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स वः किं न निवारितः ॥ ६ ॥
‘देवताओ! जब इन्द्रने पूर्वकालमें यशस्विनी ऋषि-पत्नी अहल्याका उसके पति गौतमके जीते-जी सतीत्व नष्ट किया था, उस समय आपलोगोंने उन्हें क्यों नहीं
रोका? ।। ६ ।। बहूनि च नृशंसानि कृतानीन्द्रेण वै पुरा । वैधर्म्याण्युपधाश्चैव स वः किं न निवारितः ॥ ७ ॥ ‘प्राचीनकालमें इन्द्रने बहुत-से क्रूरतापूर्ण कर्म किये हैं। अनेक अधार्मिक कृत्य तथा छल-कपट उनके द्वारा हुए हैं। उन्हें आपलोगोंनें क्यों नहीं रोका था? ।। ७ ।। उपतिष्ठतु देवी मामेतदस्या हितं परम् । युष्माकं च सदा देवाः शिवमेवं भविष्यति ॥ ८ ॥ ‘शची देवी मेरी सेवामें उपस्थित हों। इसीमें इनका परम हित है तथा देवताओ! ऐसा होनेपर ही सदा तुम्हारा कल्याण होगा’ ।। ८ ।।
देवा ऊचुः इन्द्राणीमानयिष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते । जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर ॥ ९ ॥ देवता बोले—स्वर्गलोकके स्वामी वीर देवेश्वर! आपकी जैसी इच्छा है, उसके अनुसार हमलोग इन्द्राणीको आपकी सेवामें ले आयेंगे। आप यह क्रोध छोड़िये और प्रसन्न होइये ।। ९ ।।
शल्य उवाच इत्युक्त्वा तं तदा देवा ऋषिभिः सह भारत । जग्मुर्बृहस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वचः ॥ १० ॥ शल्यने कहा—युधिष्ठिर! नहुषसे ऐसा कहकर उस समय सब देवता ऋषियोंके साथ इन्द्राणीसे यह अशुभ वचन कहनेके लिये बृहस्पतिजीके पास गये ।। जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि । दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम ॥ ११ ॥ उन्होंने कहा—‘देवर्षिप्रवर! विप्रेन्द्र! हमें पता लगा है कि इन्द्राणी आपकी शरणमें आयी हैं और आपके ही भवनमें रह रही हैं। आपने उन्हें अभय-दान दे रखा है ।। ११ ।। ते त्वां देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च महाद्युते । प्रसादयन्ति चेन्द्राणी नहुषाय प्रदीयताम् ॥ १२ ॥ ‘महाद्युते! अब ये देवता, गन्धर्व तथा ऋषि आपको इस बातके लिये प्रसन्न करा रहे हैं कि आप इन्द्राणीको राजा नहुषकी सेवामें अर्पण कर दीजिये ।। १२ ।। इन्द्राद् विशिष्टो नहुषो देवराजो महाद्युतिः । वृणोत्विमं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी ॥ १३ ॥ ‘इस समय महातेजस्वी नहुष देवताओंके राजा हैं। अतः इन्द्रसे बढ़कर हैं। सुन्दर रूप-रंगवाली शची इन्हें अपना पति स्वीकार कर लें’ ।। १३ ।।
एवमुक्ता तु सा देवी बाष्पमुत्सृज्य सस्वनम् ।
उवाच रुदती दीना बृहस्पतिमिदं वचः ॥ १४ ॥
देवताओंके यह बात कहनेपर शची देवी आँसू बहाती हुई फूट-फूटकर रोने लगीं और दीन-भावसे बृहस्पतिजीको सम्बोधित करके इस प्रकार बोलीं— ॥ १४ ॥
नाहमिच्छामि नहुषं पतिं देवर्षिसत्तम ।
शरणागतास्मि ते ब्रह्मंस्त्रायस्व महतो भयात् ॥ १५ ॥
‘देवर्षियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! मैं नहुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती; इसीलिये आपकी शरणमें आयी हूँ। आप इस महान् भयसे मेरी रक्षा कीजिये’ ॥ १५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
शरणागतं न त्यजेयमिन्द्राणि मम निश्चयः ।
धर्मज्ञां सत्यशीलां च न त्यजेयमनिन्दिते ॥ १६ ॥
बृहस्पतिने कहा— इन्द्राणी! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा दृढ़ निश्चय है। अनिन्दिते! तुम धर्मज्ञ और सत्यशील हो; अतः मैं तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा ॥ १६ ॥
नाकार्यं कर्तुमिच्छामि ब्राह्मणः सन् विशेषतः ।
श्रुतधर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम् ॥ १७ ॥
नाहमेतत् करिष्यामि गच्छध्वं वै सुरोत्तमाः ।
अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं ब्रह्मणा श्रूयतामिदम् ॥ १८ ॥
विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठगण! आपलोग लौट जायें। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये ॥ १७-१८ ॥
न तस्य बीजं रोहति रोहकाले
न तस्य वर्षं वर्षति वर्षकाले ।
भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे
न स त्रातारं लभते त्राणमिच्छन् ॥ १९ ॥
‘जो भयभीत होकर शरणमें आये हुए प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका बोया हुआ बीज समयपर नहीं जमता है। उसके यहाँ ठीक समयपर वर्षा नहीं होती और वह जब कभी अपनी रक्षा चाहता है, तो उसे कोई रक्षक नहीं मिलता है ॥ १९ ॥
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेताः
स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्टः ।
भीतं प्रपन्नं प्रददाति यो वै
न तस्य हव्यं प्रतिगृह्णन्ति देवाः ॥ २० ॥
‘जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें सौंप देता है, वह दुर्बलचित्त मानव जो अन्न ग्रहण करता है, वह व्यर्थ हो जाता है। उसके सारे उद्यम नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकसे नीचे गिर जाता है। इतना ही नहीं, देवतालोग उसके दिये हुए हविष्यको स्वीकार नहीं करते हैं ।। २० ।।
प्रमीयते चास्य प्रजा ह्यकाले
सदा विवासं पितरोऽस्य कुर्वते ।
भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे
सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥ २१ ॥
‘उसकी संतान अकालमें ही मर जाती है। उसके पितर सदा नरकमें निवास करते हैं। जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें दे देता है, उसपर इन्द्र आदि देवता वज्रका प्रहार करते हैं’ ।। २१ ।।
एतदेवं विजानन् वै न दास्यामि शचीमिमाम् ।
इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रियाम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार शरणागतके त्यागसे होनेवाले अधर्मको मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ; अतः जो सम्पूर्ण विश्वमें इन्द्रकी पत्नी तथा देवराजकी प्यारी पटरानीके रूपमें विख्यात हैं, उन्हीं इन शची देवीको मैं नहुषके हाथमें नहीं दूँगा ।। २२ ।।
अस्या हितं भवेद् यच्च मम चापि हितं भवेत् ।
क्रियतां तत् सुरश्रेष्ठा न हि दास्याम्यहं शचीम् ॥ २३ ॥
श्रेष्ठ देवताओ! जो इनके लिये हितकर हो, जिससे मेरा भी हित हो, वह कार्य आपलोग करें। मैं शचीको कदापि नहीं दूँगा ।। २३ ।।
शल्य उवाच
अथ देवाः सगन्धर्वा गुरुमाहुरिदं वचः ।
कथं सुनीतं नु भवेन्मन्त्रयस्व बृहस्पते ॥ २४ ॥
**शल्य कहते हैं—**राजन्! तब देवताओं तथा गन्धर्वोंने गुरुसे इस प्रकार कहा—‘बृहस्पते! आप ही सलाह दीजिये कि किस उपायका अवलम्बन करनेसे शुभ परिणाम होगा?’ ।। २४ ।।
बृहस्पतिरुवाच
नहुषं याचतां देवी किंचित् कालान्तरं शुभा ।
इन्द्राणी हितमेतद्धि तथास्माकं भविष्यति ॥ २५ ॥
**बृहस्पतिजीने कहा—**देवगण! शुभलक्षणा शची देवी नहुषसे कुछ समयकी अवधि माँगें। इसीसे इनका और हमारा भी हित होगा।। २५ ।। बहुविघ्नः सुराः कालः कालः कालं नयिष्यति । गर्वितो बलवांश्चापि नहुषो वरसंश्रयात् ॥ २६ ॥ देवताओ! समय अनेक प्रकारके विघ्नोंसे भरा होता है। इस समय नहुष आपलोगोंके वरदानके प्रभावसे बलवान् और गर्वीला हो गया है। काल ही उसे कालके गालमें पहुँचा देगा ।। २६ ।।
शल्य उवाच
ततस्तेन तथोक्ते तु प्रीता देवास्तथाब्रुवन् । ब्रह्मन् साध्विदमुक्तं ते हितं सर्वदिवौकसाम् ॥ २७ ॥ **शल्य कहते हैं—**राजन्! उनके इस प्रकार सलाह देनेपर देवता बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! आपने बहुत अच्छी बात कही है। इसीमें सम्पूर्ण देवताओंका हित है ।। २७ ।। एवमेतद् द्विजश्रेष्ठ देवी चेयं प्रसाद्यताम् । ततः समस्ता इन्द्राणीं देवाश्चाग्निपुरोगमाः । ऊचुर्वचनमव्यग्रा लोकानां हितकाम्यया ॥ २८ ॥ 'द्विजश्रेष्ठ! इसी बातके लिये शची देवीको राजी कीजिये।' तदनन्तर अग्नि आदि सब देवता इन्द्राणीके पास जा समस्त लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे इस प्रकार बोले ।। २८ ।।
देवा ऊचुः
त्वया जगदिदं सर्वं धृतं स्थावरजङ्गमम् । एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति ॥ २९ ॥ क्षिप्रं त्वामभिकामश्च विनशिष्यति पापकृत् । नहुषो देवि शक्रश्च सुरैश्वर्यमवाप्स्यति ॥ ३० ॥ **देवता बोले—**देवि! यह समस्त चराचर जगत् तुमने ही धारण कर रखा है, क्योंकि तुम पतिव्रता और सत्यपरायणा हो। अतः तुम नहुषके पास चलो। देवेश्वरि! तुम्हारी कामना करनेके कारण पापी नहुष शीघ्र नष्ट हो जायगा और इन्द्र पुनः अपने देवसाम्राज्यको प्राप्त कर लेंगे ।। एवं विनिश्चयं कृत्वा इन्द्राणी कार्यसिद्धये । अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम् ॥ ३१ ॥ अपनी कार्य-सिद्धिके लिये ऐसा निश्चय करके इन्द्राणी भयंकर दृष्टिवाले नहुषके पास बड़े संकोचके साथ गयी ।। ३१ ।।
दृष्ट्वा तां नहुषश्चापि वयोरूपसमन्विताम् ।
समहृष्यत दुष्टात्मा कामोपहतचेतनः ॥ ३२ ॥
नयी अवस्था और सुन्दर रूपसे सुशोभित इन्द्राणीको देखकर दुष्टात्मा नहुष बहुत प्रसन्न हुआ। कामभावनासे उसकी बुद्धि मारी गयी थी ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीकालावधियाचने
द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्राणीकी नहुषसे समययाचनासे सम्बन्ध रखनेवाला बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः
नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना
शल्य उवाच
अथ तामब्रवीद् दृष्ट्वा नहुषो देवराट् तदा । त्रयाणामपि लोकानामहमिन्द्रः शुचिस्मिते ॥ १ ॥ भजस्व मां वरारोहे पतित्वे वरवर्णिनि । शल्य कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय देवराज नहुषने इन्द्राणीको देखकर कहा—'शुचिस्मिते! मैं तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र हूँ। उत्तम रूप-रंगवाली सुन्दरी! तुम मुझे अपना पति बना लो' ॥ १ १⁄२ ॥
एवमुक्ता तु सा देवी नहुषेण पतिव्रता ॥ २ ॥ प्रावेपत भयोद्विग्ना प्रवाते कदली यथा । प्रणम्य सा हि ब्रह्माणं शिरसा तु कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥ देवराजमथोवाच नहुषं घोरदर्शनम् । कालमिच्छाम्यहं लब्धुं त्वत्तः कंचित् सुरेश्वर ॥ ४ ॥ नहुषके ऐसा कहनेपर पतिव्रता देवी शची भयसे उद्विग्न हो तेज हवामें हिलनेवाले केलेके वृक्षकी भाँति काँपने लगीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और भयंकर दृष्टिवाले देवराज नहुषसे हाथ जोड़कर कहा—'देवेश्वर! मैं आपसे कुछ समयकी अवधि लेना चाहती हूँ ॥ २—४ ॥
न हि विज्ञायते शक्रः किं वा प्राप्तः क्व वा गतः । तत्त्वमेतत् तु विज्ञाय यदि न ज्ञायते प्रभो ॥ ५ ॥ ततोऽहं त्वामुपस्थास्ये सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । एवमुक्तः स इन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत् ॥ ६ ॥ 'अभी यह पता नहीं है कि देवेन्द्र किस अवस्थामें पड़े हैं? अथवा कहाँ चले गये हैं? प्रभो! इसका ठीक-ठीक पता लगानेपर यदि कोई बात मालूम नहीं हो सकी, तो मैं आपकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।' इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५-६ ॥
नहुष उवाच
एवं भवतु सुश्रोणि यथा मामिह भाषसे । ज्ञात्वा चागमनं कार्यं सत्यमेतदनुस्मरेः ॥ ७ ॥
**नहुष बोले—**सुन्दरी! तुम मुझसे यहाँ जैसा कह रही हो ऐसा ही हो। इसके अनुसार पता लगाकर तुम्हें मेरे पास आ जाना चाहिये; इस सत्यको सदा याद रखना ॥
नहुषेण विसृष्टा च निष्चक्राम ततः शुभा ।
बृहस्पतिनिकेतं च सा जगाम यशस्विनी ॥ ८ ॥
नहुषसे विदा लेकर शुभलक्षणा यशस्विनी शची उस स्थानसे निकली और पुनः बृहस्पतिजीके भवनमें चली गयी ॥
तस्याः संश्रुत्य च वचो देवाश्चाग्निपुरोगमाः ।
चिन्तयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं राजसत्तम ॥ ९ ॥
नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीकी बात सुनकर अग्नि आदि सब देवता एकाग्रचित्त होकर इन्द्रकी खोज करनेके लिये आपसमें विचार करने लगे ॥ ९ ॥
देवदेवेन सङ्गम्य विष्णुना प्रभविष्णुना ।
ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः ॥ १० ॥
फिर बातचीतमें कुशल देवगण सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत देवाधिदेव भगवान् विष्णुसे मिले और भयसे उद्विग्न हो उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥
ब्रह्मवध्याभिभूतो वै शक्रः सुरगणेश्वरः ।
गतिश्च नस्त्वं देवेश पूर्वजो जगतः प्रभुः ॥ ११ ॥
‘देवेश्वर! देवसमुदायके स्वामी इन्द्र ब्रह्महत्यासे अभिभूत होकर कहीं छिप गये हैं। भगवन्! आप ही हमारे आश्रय और सम्पूर्ण जगत्के पूर्वज तथा प्रभु हैं ।। रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् । त्वद्वीर्यनिहते वृत्रे वासवो ब्रह्महत्यया ।। १२ ।। वृतः सुरगणश्रेष्ठ मोक्षं तस्य विनिर्दिश । ‘आपने समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये विष्णुरूप धारण किया है। यद्यपि वृत्रासुर आपकी ही शक्तिसे मारा गया है तथापि इन्द्रको ब्रह्महत्याने आक्रान्त कर लिया है। सुरगणश्रेष्ठ! अब आप ही उनके उद्धारका उपाय बताइये’ ।। तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत् ।। १३ ।। मामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि वज्रिणम् । पुण्येन हयमेधेन मामिष्ट्वा पाकशासनः ।। १४ ।। पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः । स्वकर्मभिश्च नहुषो नाशं यास्यति दुर्मतिः ।। १५ ।। किंचित् कालमिदं देवा मर्षयध्वमतन्द्रिताः । देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘इन्द्र यज्ञोंद्वारा केवल मेरी ही आराधना करें, इससे मैं वज्रधारी इन्द्रको पवित्र कर दूँगा। पाकशासन इन्द्र पवित्र अश्वमेध यज्ञके द्वारा मेरी आराधना करके पुनः निर्भय हो देवेन्द्र-पदको प्राप्त कर लेंगे और खोटी बुद्धिवाला नहुष अपने कर्मोंसे ही नष्ट हो जायगा। देवताओ! तुम आलस्य छोड़कर कुछ कालतक और यह कष्ट सहन करो’ ।। १३—१५ १/२ ।। श्रुत्वा विष्णोः शुभां सत्यां वाणीं ताममृतोपमाम् ।। १६ ।। ततः सर्वे सुरगणाः सोपाध्यायाः सहर्षिभिः । यत्र शक्रो भयोद्विग्नस्तं देशमुपचक्रमुः ।। १७ ।। भगवान् विष्णुकी यह शुभ, सत्य तथा अमृतके समान मधुर वाणी सुनकर गुरु तथा महर्षियोंसहित सब देवता उस स्थानपर गये, जहाँ भयसे व्याकुल हुए इन्द्र छिपकर रहते थे ।। १६-१७ ।। तत्राश्वमेधः सुमहान् महेन्द्रस्य महात्मनः । ववृते पावनार्थं वै ब्रह्महत्यापहो नृप ।। १८ ।। नरेश्वर! वहाँ महात्मा महेन्द्रकी शुद्धिके लिये एक महान् अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान हुआ, जो ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला था ।। १८ ।। विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च । पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैव युधिष्ठिर ।। १९ ।। युधिष्ठिर! इन्द्रने वृक्ष, नदी, पर्वत, पृथ्वी और स्त्री-समुदायमें ब्रह्महत्याको बाँट दिया ।। १९ ।।
संविभज्य च भूतेषु विसृज्य च सुरेश्वरः । विज्वरो धूतपाप्मा च वासवोऽभवदात्मवान् ॥ २० ॥ इस प्रकार समस्त भूतोंमें ब्रह्महत्याका विभाजन करके देवेश्वर इन्द्रने उसे त्याग दिया और स्वयं मनको वशमें करके वे निष्पाप तथा निश्चिन्त हो गये ॥ २० ॥
अकम्पन्नहुषं स्थानाद् दृष्ट्वा बलनिषूदनः । तेजोघ्नं सर्वभूतानां वरदानाच्च दुःसहम् ॥ २१ ॥ परंतु बल नामक दानवका नाश करनेवाले इन्द्र जब अपना स्थान ग्रहण करनेके लिये स्वर्गलोकमें आये, तब उन्होंने देखा—नहुष देवताओंके वरदानसे अपनी दृष्टिमात्रसे समस्त प्राणियोंके तेजको नष्ट करनेमें समर्थ और दुःसह हो गया है। यह देखकर वे काँप उठे ॥ २१ ॥
ततः शचीपतिर्देवः पुनरेव व्यनश्यत । अदृश्यः सर्वभूतानां कालाकाङ्क्षी चचार ह ॥ २२ ॥ तदनन्तर शचीपति इन्द्रदेव पुनः सबकी आँखोंसे ओझल हो गये तथा अनुकूल समयकी प्रतीक्षा करते हुए समस्त प्राणियोंसे अदृश्य रहकर विचरने लगे ॥
प्रणष्टे तु ततः शक्रे शची शोकसमन्विता । हा शक्रेति तदा देवी विललाप सुदुःखिता ॥ २३ ॥ इन्द्रके पुनः अदृश्य हो जानेपर शची देवी शोकमें डूब गयीं और अत्यन्त दुःखी हो 'हा इन्द्र! हा इन्द्र' कहती हुई विलाप करने लगीं ॥ २३ ॥
यदि दत्तं यदि हुतं गुरवस्तोषिता यदि । एकभर्तृत्वमेवास्तु सत्यं यद्यस्ति वा मयि ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् वे इस प्रकार बोलीं— 'यदि मैंने दान दिया हो, होम किया हो, गुरुजनोंको संतुष्ट रखा हो तथा मुझमें सत्य विद्यमान हो, तो मेरा पातिव्रत्य सुरक्षित रहे ॥ २४ ॥
पुण्यां चेमामहं दिव्यां प्रवृत्तामुत्तरायणे । देवीं रात्रिं नमस्यामि सिध्यतां मे मनोरथः ॥ २५ ॥ 'उत्तरायणके दिन जो यह पुण्य एवं दिव्य रात्रि आ रही है, उसकी अधिष्ठात्री देवी रात्रिको मैं नमस्कार करती हूँ, मेरा मनोरथ सफल हो' ॥ २५ ॥
प्रयता च निशां देवीमुपातिष्ठत तत्र सा । पतिव्रतात्वात् सत्येन सोपश्रुतिमथाकरोत् ॥ २६ ॥ यत्रास्ते देवराजोऽसौ तं देशं दर्शयस्व मे । इत्याहोपश्रुतिं देवीं सत्यं सत्येन दृश्यते ॥ २७ ॥ ऐसा कहकर शचीने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रात्रि देवीकी उपासना की। पतिव्रता तथा सत्यपरायणा होनेके कारण उन्होंने उपश्रुति नामवाली रात्रिदेवीका आवाहन
किया और उनसे कहा—'देवि! जहाँ देवराज इन्द्र हों, वह स्थान मुझे दिखाइये। सत्यका सत्यसे ही दर्शन होता है' ।। २६-२७ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि उपश्रुतियाचने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें उपश्रुतिसे प्रार्थनाविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
चतुर्दशोऽध्यायः
उपश्रुति देवीकी सहायतासे इन्द्राणीकी इन्द्रसे भेंट
शल्य उवाच
अथैनां रूपिणी साध्वीमुपातिष्ठदुपश्रुतिः ।
तां वयोरूपसम्पन्नां दृष्ट्वा देवीमुपस्थिताम् ।। १ ।।
इन्द्राणी सम्प्रहृष्टात्मा सम्पूज्यैनामथाब्रवीत् ।
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं का त्वं ब्रूहि वरानने ।। २ ।।
**शल्य कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर उपश्रुति देवी मूर्तिमती होकर साध्वी शचीदेवीके पास आयीं। नूतन वय तथा मनोहर रूपसे सुशोभित उपश्रुति देवीको उपस्थित हुई देख इन्द्राणीका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने उनका पूजन करके कहा—‘सुमुखि! मैं आपको जानना चाहती हूँ, बताइये, आप कौन हैं?’ ।। १-२ ।।
उपश्रुतिरुवाच
उपश्रुतिरंहं देवि तवान्तिकमुपागता ।
दर्शनं चैव सम्प्राप्ता तव सत्येन भाविनि ।। ३ ।।
**उपश्रुति बोलीं—**देवि! मैं उपश्रुति हूँ और तुम्हारे पास आयी हूँ। भामिनि! तुम्हारे सत्यसे प्रभावित होकर मैंने तुम्हें दर्शन दिया है ।। ३ ।।
पतिव्रता च युक्ता च यमेन नियमेन च ।
दर्शयिष्यामि ते शक्रं देवं वृत्रनिषूदनम् ।। ४ ।।
तुम पतिव्रता होनेके साथ ही यम और नियमसे संयुक्त हो, अतः मैं तुम्हें वृत्रासुरनिषूदन इन्द्रदेवका दर्शन कराऊँगी ।। ४ ।।
क्षिप्रमन्वेहि भद्रं ते द्रक्ष्यसे सुरसत्तमम् ।
ततस्तां प्रहितां देवीमिन्द्राणी सा समन्वगात् ।। ५ ।।
तुम्हारा कल्याण हो। तुम शीघ्र मेरे पीछे-पीछे चली आओ। तुम्हें सुरश्रेष्ठ देवराजके दर्शन होंगे। ऐसा कहकर उपश्रुति देवी वहाँसे चल दीं; फिर इन्द्राणी भी उनके पीछे हो लीं ।। ५ ।।
देवारण्यान्यतिक्रम्य पर्वतांश्च बहूंस्ततः ।
हिमवन्तमतिक्रम्य उत्तरं पार्श्वमागमत् ।। ६ ।।
समुद्रं च समासाद्य बहुयोजनविस्तृतम् ।
आससाद महाद्वीपं नानाद्रुमलतावृतम् ।। ७ ।।
देवताओंके अनेकानेक वन, बहुतसे पर्वत तथा हिमालयको लाँघकर उपश्रुति देवी उसके उत्तर भागमें जा पहुँचीं। तदनन्तर अनेक योजनोंतक फैले हुए समुद्रके पास पहुँचकर उन्होंने एक महाद्वीपमें प्रवेश किया, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित था ॥ ६-७ ॥
तत्रापश्यत् सरो दिव्यं नानाशकुनिभिर्वृतम् ।
शतयोजनविस्तीर्णं तावदेवायतं शुभम् ॥ ८ ॥
वहाँ एक दिव्य सरोवर दिखायी दिया, जिसमें अनेक प्रकारके जल-पक्षी निवास करते थे। वह सुन्दर सरोवर सौ योजन लंबा और उतना ही चौड़ा था ॥ ८ ॥
तत्र दिव्यानि पद्मानि पञ्चवर्णानि भारत ।
षट्पदैरुपगीतानि प्रफुल्लानि सहस्रशः ॥ ९ ॥
भारत! उसके भीतर सहस्रों कमल खिले हुए थे, जो पाँच रंगके दिखायी देते थे। उनपर मँडराते हुए भौंरे गुनगुना रहे थे ॥ ९ ॥
सरसस्तस्य मध्ये तु पद्मिनी महती शुभा ।
गौरेणोन्नतनालेन पद्मेन महता वृता ॥ १० ॥
उक्त सरोवरके मध्यभागमें एक बहुत बड़ी सुन्दर कमलिनी थी, जिसे एक ऊँची नालवाले गौर वर्णके विशाल कमलने घेर रखा था ॥ १० ॥
पद्मस्य भित्त्वा नालं च विवेश सहिता तया ।
बिसतन्तुप्रविष्टं च तत्रापश्यच्छतक्रतुम् ॥ ११ ॥
उपश्रुति देवीने उस कमलनालको चीरकर इन्द्राणी सहित उस कमलके भीतर प्रवेश किया और वहीं एक तन्तुमें घुसकर छिपे हुए शतक्रतु इन्द्रको देखा ॥ ११ ॥
तं दृष्ट्वा च सुसूक्ष्मेण रूपेणावस्थितं प्रभुम् ।
सूक्ष्मरूपधरा देवी बभूवोपश्रुतिश्च सा ॥ १२ ॥
अत्यन्त सूक्ष्म रूपसे अवस्थित भगवान् इन्द्रको वहाँ देखकर देवी उपश्रुति तथा इन्द्राणीने भी सूक्ष्म रूप धारण कर लिया ॥ १२ ॥
इन्द्रं तुष्टाव चेन्द्राणी विश्रुतैः पूर्वकर्मभिः ।
स्तूयमानस्ततो देवः शचीमाह पुरन्दरः ॥ १३ ॥
इन्द्राणीने पहलेके विख्यात कर्मोंका बखान करके इन्द्रदेवका स्तवन किया। अपनी स्तुति सुनकर इन्द्रदेवने शचीसे कहा— ॥ १३ ॥
किमर्थमसि सम्प्राप्ता विज्ञातश्च कथं त्वहम् ।
ततः सा कथयामास नहुषस्य विचेष्टितम् ॥ १४ ॥
‘देवि! तुम किसलिये यहाँ आयी हो और तुम्हें कैसे मेरा पता लगा है?’ तब इन्द्राणीने नहुषकी कुचेष्टाका वर्णन किया ॥ १४ ॥
इन्द्रत्वं त्रिषु लोकेषु प्राप्य वीर्यसमन्वितः । दर्पाविष्टश्च दुष्टात्मा मामुवाच शतक्रतो ॥ १५ ॥ उपतिष्ठेति स क्रूरः कालं च कृतवान् मम । यदि न त्रास्यसि विभो करिष्यति स मां वशे ॥ १६ ॥
‘शतक्रतो! तीनों लोकोंके इन्द्रका पद पाकर नहुष बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो घमंडमें भर गया है। उस दुष्टात्माने मुझसे भी कहा है कि तू मेरी सेवामें उपस्थित हो। उस क्रूर नरेशने मेरे लिये कुछ समयकी अवधि दी है। प्रभो! यदि आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो वह पापी मुझे अपने वशमें कर लेगा ॥ १५-१६ ॥
एतेन चाहं सम्प्राप्ता द्रुतं शक्र तवान्तिकम् । जहि रौद्रं महाबाहो नहुषं पापनिश्चयम् ॥ १७ ॥
‘महाबाहु इन्द्र! इसी कारण मैं शीघ्रतापूर्वक आपके निकट आयी हूँ। पापपूर्ण विचार रखनेवाले उस भयानक नहुषको आप मार डालिये ॥ १७ ॥
प्रकाशयात्मनाऽऽत्मानं दैत्यदानवसूदन । तेजः समाप्नुहि विभो देवराज्यं प्रशाधि च ॥ १८ ॥
‘दैत्यदानवसूदन प्रभो! अब आप अपने आपको प्रकाशमें लाइये, तेज प्राप्त कीजिये और देवताओंके राज्यका शासन अपने हाथमें लीजिये’।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीन्द्रस्तवे चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्राणीद्वारा इन्द्रका स्तुतिविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।