महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीयते । जितेन्द्रियस्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रवर्तकम् ॥ १४ ॥ तात! तपस्यामें सभीका अधिकार है। जितेन्द्रिय और मनोनिग्रहसम्पन्न हीन वर्णके लिये भी तपका विधान है; क्योंकि तप पुरुषको स्वर्गकी राहपर लानेवाला है ॥ १४ ॥ प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत् तपसा विभुः । क्वचित् क्वचिद् ब्रह्मपरो व्रतान्यास्थाय पार्थिव ॥ १५ ॥ भूपाल! पूर्वकालमें शक्तिशाली प्रजापतिने तपमें स्थित होकर और कभी-कभी ब्रह्मपरायण व्रतमें स्थित होकर संसारकी रचना की थी ॥ १५ ॥ आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः । विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ॥ १६ ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः । संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ॥ १७ ॥ तात! आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार, वायु, विश्वेदेव, साध्य, पितर, मरुद्गण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध तथा अन्य जो स्वर्गवासी देवता हैं, वे सब-के-सब तपस्यासे ही सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ये चादौ ब्राह्मणाः सृष्टा ब्रह्मणा तपसा पुरा । ते भावयन्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ॥ १८ ॥ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन मरीचि आदि ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, वे तपके ही प्रभावसे पृथ्वी और आकाशको पवित्र करते हुए ही विचरते हैं ॥ १८ ॥ मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः । महाकुलेषु दृश्यन्ते तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ १९ ॥ मर्त्यलोकमें भी जो राजे-महाराजे तथा अन्यान्य गृहस्थ महान् कुलोंमें उत्पन्न देखे जाते हैं, वह सब उनकी तपस्याका ही फल है ॥ १९ ॥ कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च । वाहनासनपानानि तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २० ॥ रेशमी वस्त्र, सुन्दर आभूषण, वाहन, आसन और उत्तम खान-पान आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ मनोऽनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः । वासः प्रासादपृष्ठे च तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २१ ॥ मनके अनुकूल चलनेवाली सहस्रों रूपवती युवतियाँ और महलोंका निवास आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ २१ ॥ शयनानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च । अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति शुभकर्मणाम् ॥ २२ ॥
श्रेष्ठ शय्या, भाँति-भाँतिके उत्तम भोजन तथा सभी मनोवांछित पदार्थ पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको ही प्राप्त होते हैं ॥ २२ ॥ नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप । उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥ २३ ॥ परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ॥ २३ ॥ सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् । अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं बुद्ध्या च नृपसत्तम ॥ २४ ॥ नृपश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, मन और बुद्धिसे शास्त्रका तत्त्व समझकर लोभका परित्याग कर दे ॥ २४ ॥ असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियसम्भ्रमः । ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ॥ २५ ॥ असंतोष दुःखका ही कारण है। लोभसे मन और इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, उससे मनुष्यकी बुद्धि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे बिना अभ्यासके विद्या ॥ नष्टप्रज्ञो यदा तु स्यात् तदा न्यायं न पश्यति । तस्मात् सुखक्षये प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ॥ २६ ॥ जब मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, तब वह न्यायको नहीं देख पाता अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर पाता है। इसलिये सुखका क्षय हो जानेपर प्रत्येक पुरुषको घोर तपस्या करनी चाहिये ॥ यदिष्टं तत् सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते । कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ॥ २७ ॥ जो अपनेको प्रिय जान पड़ता है, उसे सुख कहते हैं तथा जो मनके प्रतिकूल होता है, वह दुःख कहलाता है। तपस्या करनेसे सुख और न करनेसे दुःख होता है। इस प्रकार तप करने और न करनेका जैसा फल होता है, उसे तुम भलीभाँति समझ लो ॥ २७ ॥ नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषयांश्चोपभुञ्जते । प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ॥ २८ ॥ मनुष्य पापरहित तपस्या करके सदा अपना कल्याण ही देखते हैं। मनोवांछित विषयोंका उपभोग करते हैं और संसारमें उनकी ख्याति होती है ॥ २८ ॥ अप्रियाण्यवमानांश्च दुःखं बहुविधात्मकम् । फलार्थी तत्फलं त्यक्त्वा प्राप्नोति विषयात्मकम् ॥ २९ ॥ मनके अनुकूल फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सकाम कर्मका अनुष्ठान करके अप्रिय, अपमान और नाना प्रकारके दुःख पाता है, किंतु उस फलका परित्याग करके वह
सम्पूर्ण विषयोंके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जायते ।
स कृत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३० ॥
जिसे धर्म, तपस्या और दानमें संशय उत्पन्न हो जाता है, वह पापकर्म करके नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥
सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम ।
सुवृत्ताद् यो न चलते शास्त्रचक्षुः स मानवः ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, जो सदाचारसे कभी विचलित नहीं होता, वही शास्त्रका ज्ञाता है ॥
इषुप्रापातमात्रं हि स्पर्शयोगे रतिः स्मृता ।
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशाम्पते ॥ ३२ ॥
प्रजानाथ! बाणको धनुषसे छूटकर पृथ्वीपर गिरनेमें जितनी देर लगती है, उतना ही समय स्पर्शेन्द्रिय, रसना, नेत्र, नासिका और कानके विषयोंका सुख अनुभव करनेमें लगता है अर्थात् विषयोंका सुख क्षणिक है ॥
ततोऽस्य जायते तीव्रा वेदना तत्क्षयात् पुनः ।
अबुधा न प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ॥ ३३ ॥
फिर वह सुख जब नष्ट हो जाता है, तब उसके लिये मनमें बड़ी वेदना होती है। इतनेपर भी अज्ञानी पुरुष (विषयोंमें ही लिप्त रहते हैं, वे) सर्वोत्तम मोक्ष-सुखकी प्रशंसा नहीं करते हैं अर्थात् उसे नहीं चाहते ॥ ३३ ॥
ततः फलार्थं सर्वस्य भवन्ति ज्यायसे गुणाः ।
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीयते ॥ ३४ ॥
अतः प्रत्येक विवेकी पुरुषके मनमें श्रेष्ठ मोक्षफलकी प्राप्ति करानेके लिये शम-दम आदि गुणोंकी उत्पत्ति होती है। निरन्तर धर्मका पालन करनेसे मनुष्य कभी धन और भोगोंसे वंचित नहीं रहता ॥ ३४ ॥
अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा ।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥ ३५ ॥
इसलिये गृहस्थ पुरुषको सदा बिना प्रयत्न अपने-आप प्राप्त हुए विषयोंका ही सेवन करना चाहिये और प्रयत्न करके तो अपने धर्मका ही पालन करना चाहिये। यही मेरा मत है ॥ ३५ ॥
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् ।
क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ॥ ३६ ॥
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् ।
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ॥ ३७ ॥
जब उत्तम कुलमें उत्पन्न, सम्मानित तथा शास्त्रके अर्थको जाननेवाले पुरुषोंका और असमर्थताके कारण कर्म-धर्मसे रहित एवं आत्मतत्त्वसे अनभिज्ञ मनुष्योंका भी किया हुआ लौकिक कर्म नष्ट हो ही जाता है, तब यही निष्कर्ष निकलता है कि जगत्में उनके लिये तपके सिवा दूसरा कोई सत्कर्म नहीं है ॥ ३६-३७ ॥
सर्वात्मनानुकुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चयम् ।
दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मे विचरन् नृप ॥ ३८ ॥
नरेश्वर! गृहस्थको सर्वथा अपने कर्तव्यका निश्चय करके स्वधर्मका पालन करते हुए कुशलतापूर्वक यज्ञ तथा श्राद्ध आदि कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ३८ ॥
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ३९ ॥
जैसे सम्पूर्ण नदियाँ और नद समुद्रमें जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थका ही सहारा लेते हैं ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५ ॥
पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर
षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन
जनक उवाच
वर्णो विशेषवर्णानां महर्षे केन जायते ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
जनकने पूछा— वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ब्राह्मण आदि विशेष-विशेष वर्णोंका जो वर्ण है, वह कैसे उत्पन्न होता है? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप इस विषयको बतायें ॥ १ ॥
यदेतज्जायतेऽपत्यं स एवायमिति श्रुतिः ।
कथं ब्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ॥ २ ॥
श्रुति कहती है कि जिससे यह संतान उत्पन्न होती है, तद्रूप ही समझी जाती है अर्थात् संततिके रूपमें जन्मदाता पिता ही नूतन जन्म धारण करता है। ऐसी दशामें प्रारम्भमें ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंसे ही सबका जन्म हुआ है, तब उनकी क्षत्रिय आदि विशेष संज्ञा कैसे हो गयी? ॥ २ ॥
पराशर उवाच
एवमेतन्महाराज येन जातः स एव सः ।
तपसस्त्वपकर्षेण जातिग्रहणतां गतः ॥ ३ ॥
पराशरजीने कहा— महाराज! यह ठीक है कि जिससे जो जन्म लेता है, उसीका वह स्वरूप होता है तथापि तपस्याकी न्यूनताके कारण लोग निकृष्ट जातिको प्राप्त हो गये हैं ॥ ३ ॥
सुक्षेत्राच्च सुबीजाच्च पुण्यो भवति सम्भवः ।
अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जायते ॥ ४ ॥
उत्तम क्षेत्र और उत्तम बीजसे जो जन्म होता है, वह पवित्र ही होता है। यदि क्षेत्र और बीजमेंसे एक भी निम्नकोटिका हो तो उससे निम्न संतानकी ही उत्पत्ति होती है ॥ ४ ॥
वक्त्राद् भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे ।
सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः ॥ ५ ॥
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजी जब मानव-जगत्की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरु और पैर—इन अंगोंसे मनुष्योंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥
मुखजा ब्राह्मणास्तात बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः ।
ऊरुजा धनिनो राजन् पादजाः परिचारकाः ॥ ६ ॥
तात! जो मुखसे उत्पन्न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये। दोनों भुजाओंसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंको क्षत्रिय माना गया। राजन्! जो ऊरुओं (जाँघों) से उत्पन्न हुए, वे धनवान् (वैश्य) कहे गये; जिनकी उत्पत्ति चरणोंसे हुई, वे सेवक या शूद्र कहलाये ॥ ६ ॥
चतुर्णामेव वर्णानामागमः पुरुषर्षभ ।
अतोऽन्ये त्वतिरिक्ता ये ते वै संकरजाः स्मृताः ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर! इस प्रकार ब्रह्माजीके चार अंगोंसे चार वर्णोंकी ही उत्पत्ति हुई। इनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे मनुष्य हैं, वे इन्हीं चार वर्णोंके सम्मिश्रणसे उत्पन्न होनेके कारण वर्णसंकर कहलाते हैं ॥ ७ ॥
क्षत्रियातिरथाम्बष्ठा उग्रा वैदेहकास्तथा ।
श्वपाकाः पुल्कसाः स्तेना निषादाः सूतमागधाः ॥ ८ ॥
अयोगाः करणा व्रात्याश्चाण्डालाश्च नराधिप ।
एते चतुर्भ्यो वर्णेभ्यो जायन्ते वै परस्परात् ॥ ९ ॥
नरेश्वर! क्षत्रिय, अतिरथ, अम्बष्ठ, उग्र, वैदेह, श्वपाक, पुल्कस, स्तेन, निषाद, सूत, मागध, अयोग, करण, व्रात्य और चाण्डाल—ये ब्राह्मण आदि चार वर्णोंसे अनुलोम और विलोम वर्णकी स्त्रियोंके साथ परस्पर संयोग होनेसे उत्पन्न होते हैं ॥ ८-९ ॥
जनक उवाच
ब्रह्मणैकेन जातानां नानात्वं गोत्रतः कथम् ।
बहूनीह हि लोके वै गोत्राणि मुनिसत्तम ॥ १० ॥
**जनकने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! जब सबको एकमात्र ब्रह्माजीने ही जन्म दिया है, तब मनुष्योंके भिन्न-भिन्न गोत्र कैसे हुए? इस जगत्में मनुष्योंके बहुत-से गोत्र सुने जाते हैं ॥ १० ॥
यत्र तत्र कथं जाताः स्वयोनिं मुनयो गताः ।
शुद्धयोनौ समुत्पन्ना वियोनौ च तथा परे ॥ ११ ॥
ऋषि-मुनि जहाँ-तहाँ जन्म ग्रहण करके अर्थात् जो शुद्ध योनिमें और दूसरे जो विपरीत योनिमें उत्पन्न हुए हैं, वे सब ब्राह्मणत्वको कैसे प्राप्त हुए? ॥ ११ ॥
पराशर उवाच
राजन्नेतद् भवेद् ग्राह्यमपकृष्टेन जन्मना ।
महात्मनां समुत्पत्तिस्तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥
**पराशरजीने कहा—**राजन्! तपस्यासे जिनके अन्तःकरण शुद्ध हो गये हैं, उन महात्मा पुरुषोंके द्वारा जिस संतानकी उत्पत्ति होती है, अथवा वे स्वेच्छासे जहाँ-कहीं भी
जन्म ग्रहण करते हैं, वह क्षेत्रकी दृष्टिसे निकृष्ट होनेपर भी उसे उत्कृष्ट ही मानना चाहिये ।। १२ ।।
उत्पाद्य पुत्रान् मुनयो नृपते यत्र तत्र ह ।
स्वेनैव तपसा तेषामृषित्वं विदधुः पुनः ।। १३ ।।
नरेश्वर! मुनियोंने जहाँ-तहाँ कितने ही पुत्र उत्पन्न करके उन सबको अपने ही तपोबलसे ऋषि बना दिया ।। १३ ।।
पितामहश्च मे पूर्वमृष्यशृङ्गश्च काश्यपः ।
वेदस्ताण्ड्यः कृपश्चैव कक्षीवान् कमठादयः ।। १४ ।।
यवक्रीतश्च नृपते द्रोणश्च वदतां वरः ।
आयुर्मतङ्गो दत्तश्च द्रुपदो मत्स्य एव च ।। १५ ।।
एते स्वां प्रकृतिं प्राप्ता वैदेह तपसोऽऽश्रयात् ।
प्रतिष्ठिता वेदविदो दमेन तपसैव हि ।। १६ ।।
विदेहराज! मेरे पितामह वसिष्ठजी, काश्यप-गोत्रीय ऋष्यशृङ्ग, वेद, ताण्ड्य, कृप, कक्षीवान्, कमठ आदि, यवक्रीत, वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतंग, दत्त, द्रुपद तथा मत्स्य—ये सब तपस्याका आश्रय लेनेसे ही अपनी-अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुए थे। इन्द्रियसंयम और तपसे ही वे वेदोंके विद्वान् तथा समाजमें प्रतिष्ठित हुए थे ।।
मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव ।
अङ्गिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च ।। १७ ।।
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव ।
नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम् ।। १८ ।।
पृथ्वीनाथ! पहले अंगिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु—ये ही चार मूल गोत्र प्रकट हुए थे। अन्य गोत्र कर्मके अनुसार पीछे उत्पन्न हुए हैं। वे गोत्र और उनके नाम उन गोत्र-प्रवर्तक महर्षियोंकी तपस्यासे ही साधु-समाजमें सुविख्यात एवं सम्मानित हुए हैं ।। १७-१८ ।।
जनक उवाच
विशेषधर्मान् वर्णानां प्रब्रूहि भगवन् मम ।
ततः सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि ।। १९ ।।
**जनकने पूछा—**भगवन्! आप मुझे सब वर्णोंके विशेष धर्म बताइये, फिर सामान्य धर्मोंका भी वर्णन कीजिये; क्योंकि आप सब विषयोंका प्रतिपादन करनेमें कुशल हैं ।। १९ ।।
पराशर उवाच
प्रतिग्रहो याजनं च तथैवाध्यापनं नृप ।
विशेषधर्मा विप्राणां रक्षा क्षत्रस्य शोभना ।। २० ।।
पराशरजीने कहा—राजन्! दान लेना, यज्ञ कराना तथा विद्या पढ़ाना—ये ब्राह्मणोंके विशेष धर्म हैं (जो उनकी जीविकाके साधन हैं)। प्रजाकी रक्षा करना क्षत्रियके लिये श्रेष्ठ धर्म है॥ २०॥
कृषिश्च पशुपाल्यं च वाणिज्यं च विशामपि।
द्विजानां परिचर्या च शूद्रकर्म नराधिप॥ २१॥
नरेश्वर! कृषि, पशुपालन और व्यापार—ये वैश्योंके कर्म हैं तथा द्विजातियोंकी सेवा शूद्रका धर्म है॥ २१॥
विशेषधर्मा नृपते वर्णानां परिकीर्तिताः।
धर्मान् साधारणांस्तात विस्तरेण शृणुष्व मे॥ २२॥
महाराज! ये वर्णोंके विशेष धर्म बताये गये हैं। तात! अब उनके साधारण धर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन मुझसे सुनो॥ २२॥
आनृशंस्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता।
श्राद्धकर्मातिथेयं च सत्यमक्रोध एव च॥ २३॥
स्वेषु दारेषु संतोषः शौचं नित्यानसूयता।
आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्माः साधारणा नृप॥ २४॥
क्रूरताका अभाव (दया), अहिंसा, अप्रमाद (सावधानी), देवता-पितर आदिको उनके भाग समर्पित करना अथवा दान देना, श्राद्धकर्म, अतिथिसत्कार, सत्य, अक्रोध, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहना, पवित्रता रखना, कभी किसीके दोष न देखना, आत्मज्ञान तथा सहनशीलता—ये सभी वर्णोंके सामान्य धर्म हैं॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः।
अत्र तेषामधीकारो धर्मेषु द्विपदां वर॥ २५॥
नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। उपर्युक्त धर्मोंमें इन्हींका अधिकार है॥
विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ते नृपते त्रयः।
उन्नमन्ति यथासन्तमाश्रित्येह स्वकर्मसु॥ २६॥
नरेश्वर! ये तीन वर्ण विपरीत कर्मोंमें प्रवृत्त होनेपर पतित हो जाते हैं। सत्पुरुषोंका आश्रय ले अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहनेसे जैसे इनकी उन्नति होती है, वैसे ही विपरीत कर्मोंके आचरणसे पतन भी हो जाता है॥ २६॥
न चापि शूद्रः पततीति निश्चयो
न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा।
श्रुतिप्रवृत्तं न च धर्ममाप्नुते
न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं कृतम्॥ २७॥
यह निश्चय है कि शूद्र पतित नहीं होता तथा वह उपनयन आदि संस्कारका भी अधिकारी नहीं है। उसे वैदिक अग्निहोत्र आदि कर्मोंके अनुष्ठानका भी अधिकार नहीं प्राप्त है; परंतु उपर्युक्त सामान्य धर्मोंका उसके लिये निषेध भी नहीं किया गया है ॥ २७ ॥
वैदेह कं शूद्रमुदाहरन्ति
द्विजा महाराज श्रुतोपपन्नाः ।
अहं हि पश्यामि नरेन्द्र देवं
विश्वस्य विष्णुं जगतः प्रधानम् ॥ २८ ॥
महाराज विदेहनरेश! वेद-शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न द्विज शूद्रको प्रजापतिके तुल्य बताते हैं (क्योंकि वह परिचर्याद्वारा समस्त प्रजाका पालन करता है); परंतु नरेन्द्र! मैं तो उसे सम्पूर्ण जगत्के प्रधान रक्षक भगवान् विष्णुके रूपमें देखता हूँ (क्योंकि पालन कर्म विष्णुका ही है और वह अपने उस कर्मद्वारा पालनकर्ता श्रीहरिकी आराधना करके उन्हींको प्राप्त होता है) ॥ २८ ॥
सतां वृत्तमधिष्ठाय निहीना उद्धिधीर्षवः ।
मन्त्रवर्जं न दुष्यन्ति कुर्वाणाः पौष्टिकीः क्रियाः ॥ २९ ॥
हीनवर्णके मनुष्य (शूद्र) यदि अपना उद्धार करना चाहें तो सदाचारका पालन करते हुए आत्माको उन्नत बनानेवाली समस्त क्रियाओंका अनुष्ठान करें; परंतु वैदिक मन्त्रका उच्चारण न करें। ऐसा करनेसे वे दोषके भागी नहीं होते हैं ॥ २९ ॥
यथा यथा हि सद्वृत्तमालम्बन्तीतरे जनाः ।
तथा तथा सुखं प्राप्य प्रेत्य चेह च मोदते ॥ ३० ॥
इतर जातीय मनुष्य भी जैसे-जैसे सदाचारका आश्रय लेते हैं, वैसे-ही-वैसे सुख पाकर इहलोक और परलोकमें भी आनन्द भोगते हैं ॥ ३० ॥
जनक उवाच
किं कर्म दूषयत्येनमथो जातिर्महामुने ।
संदेहो मे समुत्पन्नस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३१ ॥
जनकने पूछा— महामुने! मनुष्यको उसके कर्म दूषित करते हैं या जाति? मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हुआ है, आप इसका विवेचन कीजिये ॥ ३१ ॥
पराशर उवाच
असंशयं महाराज उभयं दोषकारकम् ।
कर्म चैव हि जातिश्च विशेषं तु निशामय ॥ ३२ ॥
पराशरजीने कहा— महाराज! इसमें संदेह नहीं कि कर्म और जाति दोनों ही दोषकारक होते हैं; परंतु इसमें जो विशेष बात है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ३२ ॥
जात्या च कर्मणा चैव दुष्टं कर्म न सेवते ।
जात्या दुष्टश्च यः पापं न करोति स पूरुषः ।। ३३ ।।
जो जाति और कर्म—इन दोनोंसे श्रेष्ठ तथा पापकर्मका सेवन नहीं करता एवं जातिसे दूषित होकर भी जो पापकर्म नहीं करता है, वही पुरुष कहलाने योग्य है ।। ३३ ।।
जात्या प्रधानं पुरुषं कुर्वाणं कर्म धिक्कृतम् ।
कर्म तद् दूषयत्येनं तस्मात् कर्म न शोभनम् ।। ३४ ।।
जातिसे श्रेष्ठ पुरुष भी यदि निन्दित कर्म करता है तो वह कर्म उसे कलंकित कर देता है; इसलिये किसी भी दृष्टिसे बुरा कर्म करना अच्छा नहीं है ।।
जनक उवाच
कानि कर्माणि धर्म्याणि लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम ।
न हिंसन्तीह भूतानि क्रियमाणानि सर्वदा ।। ३५ ।।
जनकने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! इस लोकमें कौन-कौन-से ऐसे धर्मानुकूल कर्म हैं, जिनका अनुष्ठान करते समय कभी किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं होती? ।।
पराशर उवाच
शृणु मेऽत्र महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
यानि कर्माण्यहिंस्राणि नरं त्रायन्ति सर्वदा ।। ३६ ।।
पराशरजीने कहा— महाराज! तुम जिन कर्मोंके विषयमें पूछ रहे हो, उन्हें बताता हूँ, मुझसे सुनो। जो कर्म हिंसासे रहित हैं, वे सदा मनुष्यकी रक्षा करते हैं ।।
संन्यस्याग्नीनुदासीनाः पश्यन्ति विगतज्वराः ।
नैःश्रेयसं कर्मपथं समारुह्य यथाक्रमम् ।। ३७ ।।
प्रश्रिता विनयोपेता दमनित्याः सुसंशिताः ।
प्रयान्ति स्थानमजरं सर्वकर्मविवर्जिताः ।। ३८ ।।
जो लोग (संन्यासकी दीक्षा ले) अग्निहोत्रका त्याग करके उदासीनभावसे सब कुछ देखते रहते हैं और सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित हो क्रमशः कल्याणकारी कर्मके पथपर आरूढ़ होकर नम्रता, विनय और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंको अपनाते तथा तीक्ष्ण व्रतका पालन करते हैं, वे सब कर्मोंसे रहित हो अविनाशी पदको प्राप्त कर लेते हैं ।। ३७-३८ ।।
सर्वे वर्णा धर्मकार्याणि सम्यक्
कृत्वा राजन् सत्यवाक्यानि चोक्त्वा ।
त्यक्त्वाधर्मं दारुणं जीवलोके
यान्ति स्वर्गं नात्र कार्यो विचारः ।। ३९ ।।
राजन्! सभी वर्णोंके लोग इस जीव-जगत्में अपने-अपने धर्मानुसार कर्मका भलीभाँति अनुष्ठान करके, सदा सत्य बोलकर तथा भयानक पापकर्मका सर्वथा परित्याग करके स्वर्गलोकमें जाते हैं। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। ३९ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९६ ॥
पराशरगीता—नाना प्रकारके धर्म और कर्तव्योंका उपदेश
सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पराशरगीता—नाना प्रकारके धर्म और कर्तव्योंका उपदेश
पराशर उवाच
पिता सखायो गुरवः स्त्रियश्च
न निर्गुणानां हि भवन्ति लोके ।
अनन्यभक्ताः प्रियवादिनश्च
हिताश्च वश्याश्च भवन्ति राजन् ॥ १ ॥
राजन्! संसारमें पिता, सखा, गुरुजन और स्त्रियाँ—ये कोई भी उसके नहीं होते, जो सर्वथा गुणहीन हैं; किंतु जो प्रभुके अनन्य भक्त, प्रियवादी, हितैषी और इन्द्रियविजयी हैं, वे ही उसके होते हैं अर्थात् उसका त्याग नहीं करते ॥ १ ॥
पिता परं दैवतं मानवानां
मातुर्विशिष्टं पितरं वदन्ति ।
ज्ञानस्य लाभं परमं वदन्ति
जितेन्द्रियार्थाः परमाप्नुवन्ति ॥ २ ॥
पिता मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ देवता है। कोई-कोई पिताको मातासे भी बढ़कर बताते हैं। श्रेष्ठ पुरुष ज्ञानके लाभको ही परम लाभ कहते हैं। जिन्होंने श्रोत्र आदि इन्द्रियों और शब्द आदि विषयोंपर विजय पा ली है, वे परमपदको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
रणाजिरे यत्र शराग्निसंस्तरे
नृपात्मजो घातमवाप्य दह्यते ।
प्रयाति लोकानमरैः सुदुर्लभान्
निषेवते स्वर्गफलं यथासुखम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियका पुत्र यदि समरांगणमें घायल होकर बाणोंकी चितापर दग्ध होता है तो वह देवदुर्लभ लोकोंमें जाता और वहाँ आनन्दपूर्वक स्वर्गीय-सुख भोगता है ॥ ३ ॥
श्रान्तं भीतं भ्रष्टशस्त्रं रुदन्तं
पराङ्मुखं पारिबर्हेश्च हीनम् ।
अनुद्यन्तं रोगिणं याचमानं
न वै हिंस्याद् बालवृद्धौ च राजन् ॥ ४ ॥
राजन्! जो युद्धमें थका हुआ हो, भयभीत हो, जिसने हथियार नीचे डाल दिया हो, जो रोता हो, पीठ दिखाकर भाग रहा हो, जिसके पास युद्धका कोई भी सामान न रह गया हो, जो युद्धविषयक उद्यम छोड़ चुका हो, रोगी हो और प्राणोंकी भीख माँगता हो तथा जो अवस्थामें बालक या वृद्ध हो, ऐसे शत्रुाका वध नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥
पारिबर्हैः सुसंयुक्तमुद्यतं तुल्यतां गतम् । अतिक्रमेत् तं नृपतिः संग्रामे क्षत्रियात्मजम् ॥ ५ ॥ किंतु जिसके पास युद्धका सामान हो, जो युद्धके लिये तैयार हो और अपने बराबरका हो, संग्रामभूमिमें उस क्षत्रियकुमारको राजा अवश्य जीतनेका प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
तुल्यादिह वधः श्रेयान् विशिष्टाच्चेति निश्चयः । निहीनात् कातराच्चैव कृपणाद् गर्हितो वधः ॥ ६ ॥ अपने समान या अपनी अपेक्षा बड़े वीरके हाथसे वध होना श्रेष्ठ है, ऐसा युद्ध-शास्त्रके ज्ञाताओंका निश्चय है। अपनेसे हीन, कातर तथा दीन पुरुषके हाथसे होनेवाली मृत्यु निन्दित है ॥ ६ ॥
पापात् पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप । पाप एव वधः प्रोक्तो नरकायेति निश्चयः ॥ ७ ॥ नरेश्वर! पापी, पापाचारी और हीन मनुष्यके हाथसे जो वध होता है, वह पापरूप ही बताया गया है तथा वह नरकमें गिरानेवाला है, यही शास्त्रका निश्चय है ॥ ७ ॥
न कश्चित् त्राति वै राजन् दिष्टान्तवशमागतम् । सावशेषायुषं चापि कश्चिन्नैवापकर्षति ॥ ८ ॥ राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए प्राणीको कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे कोई मार भी नहीं सकता ॥ ८ ॥
स्निग्धैश्च क्रियमाणानि कर्माणीह निवर्तयेत् । हिंसात्मकानि सर्वाणि नायुरिच्छेत् परायुषा ॥ ९ ॥ मनुष्यको चाहिये कि उसके प्रियजन यदि कोई हिंसात्मक कर्म उसके लिये करते हों तो वह उन सब कर्मोंको रोक दे। दूसरेकी आयुसे अपनी आयु बढ़ानेकी अर्थात् दूसरोंके प्राण लेकर अपने प्राण बचानेकी इच्छा न करे ॥ ९ ॥
गृहस्थानां तु सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् । निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रियावताम् ॥ १० ॥ तात! मरनेकी इच्छावाले समस्त गृहस्थोंके लिये तो वही मृत्यु सबसे उत्तम मानी गयी है, जो गंगादि पवित्र नदियोंके तटोंपर शुभकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए प्राप्त हो ॥ १० ॥
आयुषि क्षयमापन्ने पञ्चत्वमुपगच्छति । तथा ह्यकारणाद् भवति कारणैरुपपादितम् ॥ ११ ॥ जब आयु समाप्त हो जाती है तभी देहधारी जीव पंचत्वको प्राप्त होता है। यह बिना कारणके भी हो जाता है और कभी विभिन्न कारणोंसे उपपादित होता है ॥ ११ ॥
तथा शरीरं भवति देहाद् येनोपपादितम् । अध्वानं गतकश्चायं प्राप्तश्चायं गृहाद् गृहम् ॥ १२ ॥
जो लोग देहको पाकर हठपूर्वक उसका परित्याग कर देते हैं, उनको पूर्ववत् ही यातनामय शरीरकी प्राप्ति होती है। ऐसे लोग (मोक्षके साधनरूप मनुष्यशरीरको पाकर भी आत्महत्याके कारण उस लाभसे वंचित हो) एक घरसे दूसरे घरमें जानेवाले मनुष्यके समान एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होते हैं ॥ १२ ॥
द्वितीयं कारणं तत्र नान्यत् किंचन विद्यते । तद् देहं देहिनां युक्तं पञ्चभूतेषु वर्तते ॥ १३ ॥ इनकी उस अवस्थाके प्राप्त होनेमें आत्महत्यरूप पापके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं है। उन प्राणियोंको उस शरीरका मिलना उचित ही है, जो कि पंचभूतमय है ॥ १३ ॥
शिरास्नावस्थिसंघातं बीभत्सामेध्यसंकुलम् । भूतानामिन्द्रियाणां च गुणानां च समागमम् ॥ १४ ॥ यह शरीर नस, नाड़ी और हड्डियोंका समूह है। घृणित और अपवित्र मल-मूत्र आदिसे भरा हुआ है। पंचमहाभूतों, श्रोत्र आदि इन्द्रियों तथा गुणों (वासनामय विषयों) का समुदाय है ॥ १४ ॥
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः । गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ॥ १५ ॥ अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि इस शरीरके अन्तमें अर्थात् बाह्यभागमें त्वचा (चमड़ा) मात्र है। यह सौन्दर्य आदि गुणोंसे भी रहित है। इसकी मृत्यु अनिवार्य है ॥ १५ ॥
शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् । भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ॥ १६ ॥ जब जीवात्मा इस देहका परित्याग कर देता है, तब यह देह निश्चेष्ट और चेतनाशून्य हो जाती है एवं इसके पाँच भूत अपनी-अपनी प्रकृतिके साथ मिल जाते हैं। फिर तो यह पृथ्वीमें निमग्न हो जाती है ॥ १६ ॥
भावितं कर्मयोगेन जायते तत्र तत्र ह । इदं शरीरं वैदेह म्रियते यत्र यत्र ह । तत्स्वभावोऽपरो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ॥ १७ ॥ विदेहराज! यह शरीर जिस किसी स्थानमें मृत्युको प्राप्त हो जाता है; फिर प्रारब्धकर्मके योगसे भावित होकर जहाँ-कहीं भी जन्म ले लेता है। कर्मोंका फलस्वरूप यह स्वभावसिद्ध पुनर्जन्म देखा गया है ॥ १७ ॥
न जायते तु नृपते कंचित् कालमयं पुनः । परिभ्रमति भूतात्मा द्यामिवाम्बुधरो महान् ॥ १८ ॥ नरेश्वर! जैसे विशाल मेघ आकाशमें सब ओर भ्रमण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा प्रारब्ध-कर्मके फलसे कुछ कालतक घूमता रहता है, जन्म नहीं लेता है ॥ १८ ॥
स पुनर्जायते राजन् प्राप्येहायतनं नृप ।
मनसः परमो ह्यात्मा इन्द्रियेभ्यः परं मनः ॥ १९ ॥
राजन्! वही यहाँ फिर कोई आधार पाकर पुनः जन्म लेता है। मनसे आत्मा श्रेष्ठ है और इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है ॥ १९ ॥
विविधानां च भूतानां जङ्गमाः परमा नृप ।
जङ्गमानामपि तथा द्विपदाः परमा मताः ॥ २० ॥
महाराज! संसारके विविध प्राणियोंमें चलने-फिरनेवाले जीव श्रेष्ठ माने गये हैं। इन जंगम प्राणियोंमें भी दो पैरवाले जीव (मनुष्य) श्रेष्ठ कहे गये हैं ॥ २० ॥
द्विपदानामपि तथा द्विजा वै परमाः स्मृताः ।
द्विजानामपि राजेन्द्र प्रज्ञावन्तः परा मताः ।
प्राज्ञानामात्मसम्बुद्धाः सम्बुद्धानाममानिनः ॥ २१ ॥
मनुष्योंमें भी द्विज श्रेष्ठ कहे गये हैं। राजेन्द्र! द्विजोंमें बुद्धिमान् और बुद्धिमानोंमें भी आत्मज्ञानी श्रेष्ठ समझे जाते हैं। उनमें भी जो अहंकाररहित हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥ २१ ॥
जातमन्वेति मरणं नृणामिति विनिश्चयः ।
अन्तवन्ति हि कर्माणि सेवन्ते गुणतः प्रजाः ॥ २२ ॥
जन्मके साथ ही मृत्यु मनुष्योंके पीछे लगी रहती है। यह विद्वानोंका निश्चय है। समस्त प्रजा सत्त्व आदि गुणोंसे प्रेरित होकर विनाशशील कर्मोंका आचरण करती है ॥ २२ ॥
आपन्ने तूत्तरां काष्ठां सूर्ये यो निधनं व्रजेत् ।
नक्षत्रे च मुहूर्ते च पुण्ये राजन् स पुण्यकृत् ॥ २३ ॥
राजन्! जो सूर्यके उत्तरायण होनेपर उत्तम नक्षत्र और पवित्र मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, वह पुण्यात्मा है ॥ २३ ॥
अयोजयित्वा क्लेशेन जनं प्लाव्य च दुष्कृतम् ।
मृत्युनाऽऽत्मकृते नेह कर्म कृत्वाऽऽत्मशक्तिभिः ॥ २४ ॥
वह किसीको भी कष्ट न देकर प्रायश्चित्तके द्वारा अपने पापको नष्ट कर डालता है और अपनी शक्तिके अनुसार शुभकर्म करके स्वेच्छासे मृत्युको अंगीकार करता है ॥ २४ ॥
विषमुद्बन्धनं दाहो दस्युहस्तात् तथा वधः ।
दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च प्राकृतो वध उच्यते ॥ २५ ॥
किंतु विष खा लेनेसे, गलेमें फाँसी लगानेसे, आगमें जलनेसे, लुटेरोंके हाथसे तथा दाढ़वाले पशुओंके आघातसे जो वध होता है, वह अधम श्रेणीका माना जाता है ॥ २५ ॥
न चैभिः पुण्यकर्माणो युज्यन्ते चाभिसंधिजैः ।
एवंविधैश्च बहुभिरपरैः प्राकृतैरपि ॥ २६ ॥
पुण्यकर्म करनेवाले मनुष्य इस तरहके उपायोंसे प्राण नहीं देते तथा ऐसे-ऐसे दूसरे अधम उपायोंसे भी उनकी मृत्यु नहीं होती ॥ २६ ॥ ऊर्ध्वं भित्त्वा प्रतिष्ठन्ते प्राणाः पुण्यवतां नृप । मध्यतो मध्यपुण्यानामधो दुष्कृतकर्मणाम् ॥ २७ ॥ राजन्! पुण्यात्मा पुरुषोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्रको भेदकर निकलते हैं। जिनके पुण्यकर्म मध्यम श्रेणीके हैं, उनके प्राण मध्यद्वार (मुख, नेत्र आदि)-से बाहर होते हैं तथा जिन्होंने केवल पाप ही किया है, उनके प्राण नीचेके छिद्र (गुदा या शिश्नद्वार) से निकलते हैं ॥ २७ ॥ एकः शत्रुर्न द्वितीयोऽस्ति शत्रु- रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् । येनावृतः कुरुते सम्प्रयुक्तो घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ॥ २८ ॥ राजन्! पुरुषका एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है। वह है अज्ञान, जिससे आवृत और प्रेरित होकर मनुष्य अत्यन्त घोर और क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है ॥ २८ ॥ प्रबाधनार्थं श्रुतिधर्मयुक्तान् वृद्धानुपास्य प्रभवेत् यस्य । प्रयत्नसाध्यो हि स राजपुत्र प्रज्ञाशरेणोन्मथितः परैति ॥ २९ ॥ राजकुमार! उस शत्रुको पराजित करनेमें वही समर्थ हो सकता है, जो वेदोक्त धर्मसम्पन्न वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करके प्रज्ञा (स्थिरबुद्धि)-को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि अज्ञानमय शत्रुको जीतना महान् प्रयत्नसाध्य कर्म है। वह प्रज्ञारूपी बाणकी चोट खाकर ही नष्ट होता है ॥ २९ ॥ अधीत्य वेदं तपसा ब्रह्मचारी यज्ञान् शक्त्या संनिगृह्येह पञ्च । वनं गच्छेत् पुरुषो धर्मकामः श्रेयः स्थित्वा स्थापयित्वा स्ववंशम् ॥ ३० ॥ द्विजको पहले ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहकर तपस्या-पूर्वक वेदोंका अध्ययन करना चाहिये; फिर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके अपनी शक्तिके अनुसार इन्द्रियसंयमपूर्वक पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने पुत्रको घर-बारकी रक्षामें नियुक्त करके कल्याणमार्गमें स्थित हो केवल धर्मपालनकी इच्छा रखकर उसे वनको प्रस्थान करना चाहिये ॥ ३० ॥ उपभोगैरपि त्यक्तं नात्मानं सादयेन्नरः ।
चण्डालत्वेऽपि मानुष्यं सर्वथा तात शोभनम् ॥ ३१ ॥ तात! उपभोगके साधनोंसे वंचित होनेपर भी मनुष्य अपने-आपको हीन न समझे। चाण्डालकी योनिमें भी यदि मनुष्य-जन्म प्राप्त हो तो वह मानवेतर प्राणियोंकी अपेक्षा सर्वथा उत्तम है ॥ ३१ ॥
इयं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते । आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ॥ ३२ ॥ क्योंकि पृथ्वीनाथ! मनुष्यकी योनि ही वह अद्वितीय योनि है, जिसे पाकर शुभकर्मोंके अनुष्ठानसे आत्माका उद्धार किया जा सकता है ॥ ३२ ॥
कथं न विप्रणश्येम योनितोऽस्या इति प्रभो । कुर्वन्ति धर्मं मनुजाः श्रुतिप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥ 'प्रभो! हम कौन ऐसा उपाय करें, जिससे हमें इस मनुष्य-योनिसे नीचे न गिरना पड़े' यह सोचकर और वैदिक प्रमाणोंपर विचार करके मनुष्य धर्मका अनुष्ठान करते हैं ॥ ३३ ॥
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यं द्विषते नरः । धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ॥ ३४ ॥ जो मानव अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर भी दूसरोंसे द्वेष करता है और धर्मका अनादर करता है तथा मनसे कामनाओंमें आसक्त हो जाता है, वह महान् लाभसे वंचित होता है ॥ ३४ ॥
यस्तु प्रीतिपुरोगेण चक्षुषा तात पश्यति । दीपोपमानि भूतानि यावदर्थान्न पश्यति ॥ ३५ ॥ तात! जो समस्त प्राणियोंको दीपकके समान स्नेहसे संवर्धन करनेयोग्य मानता है और उन्हें स्नेहभरी दृष्टिसे देखता है एवं जो समस्त विषयोंकी ओर कभी दृष्टिपात नहीं करता, वह परलोकमें सम्मानित होता है ॥
सान्त्वेनान्नप्रदानेन प्रियवादेन चाप्युत । समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीयते ॥ ३६ ॥ जो सब लोगोंको सान्त्वना प्रदान करता, भूखोंको भोजन देता और प्रिय वचन बोलकर सबका सत्कार करता है, वह सुख-दुःखमें सम रहकर (इहलोक और) परलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३६ ॥
दानं त्यागः शोभना मूर्तिरद्भ्यो भूतप्लाव्यं तपसा वै शरीरम् । सरस्वतीनैमिषपुष्करेषु ये चाप्यन्ये पुण्यदेशाः पृथिव्याम् ॥ ३७ ॥ राजन्! सरस्वती नदी, नैमिषारण्यक्षेत्र, पुष्करक्षेत्र तथा और भी जो पृथ्वीके पावन तीर्थ हैं, उनमें जाकर दान देना, भोगोंका त्याग करना, शान्तभावसे रहना तथा तपस्या और
तीर्थके जलसे तन-मनको पवित्र करना चाहिये ॥ ३७ ॥
गृहेषु येषामसवः पतन्ति तेषामथो निर्हरणं प्रशस्तम् । यानेन वै प्रापणं च श्मशाने शौचेन नूनं विधिना चैव दाहः ॥ ३८ ॥
घरोंमें जिनके प्राण निकल रहे हों, उन्हें शीघ्र ही घरसे बाहर ले जाना उत्तम है। मृत्युके पश्चात् उन्हें विमानपर सुलाकर श्मशानमें पहुँचाना तथा पवित्रतापूर्वक शास्त्रोक्तविधिसे उनका दाह-संस्कार करना आवश्यक कर्तव्य है ॥ ३८ ॥
इष्टिः पुष्टिर्यजनं याजनं च दानं पुण्यानां कर्मणां च प्रयोगः । शक्त्या पित्र्यं यच्च किंचित् प्रशस्तं सर्वाण्यात्मार्थे मानवोऽयं करोति ॥ ३९ ॥
मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार इष्टि-पुष्टि (शान्तिकर्म), यजन, याजन, दान, पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान तथा श्राद्ध आदि जो भी कुछ उत्तम कार्य करता है, वह सब अपने ही लिये करता है ॥ ३९ ॥
धर्मशास्त्राणि वेदाश्च षडङ्गानि नराधिप । श्रेयसोऽर्थे विधीयन्ते नरस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ४० ॥
नरेश्वर! धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित वेद पुण्यकर्म करनेवाले पुरुषके कल्याणके लिये ही कर्तव्यका विधान करते हैं ॥ ४० ॥
भीष्म उवाच
एतद् वै सर्वमाख्यातं मुनिना सुमहात्मना । विदेहराजाय पुरा श्रेयसोऽर्थे नराधिप ॥ ४१ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! प्राचीनकालमें महात्मा पराशर मुनिने विदेहराज जनकके कल्याणके लिये यह सब उपदेश दिया था ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९७ ॥
पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर
अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पराशरगीताका उपसंहार—राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर
भीष्म उवाच
पुनरेव तु पप्रच्छ जनको मिथिलाधिपः ।
पराशरं महात्मानं धर्मे परमनिश्चयम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर मिथिलानरेश जनकने उन धर्मके विषयमें उत्तम निश्चय रखनेवाले महात्मा पराशर मुनिसे इस प्रकार पूछा ॥ १ ॥
जनक उवाच
किं श्रेयः का गतिर्ब्रह्मन् किं कृतं न विनश्यति ।
क्व गतो न निवर्तेत तन्मे ब्रूहि महामते ॥ २ ॥
जनक बोले— ब्रह्मन्! श्रेयका साधन क्या है? उत्तम गति कौन-सी है? कौन-सा कर्म नष्ट नहीं होता तथा कहाँ गया हुआ जीव फिर इस संसारमें नहीं लौटता? महामते! मेरे इन प्रश्नोंका समाधान कीजिये ॥ २ ॥
पराशर उवाच
असङ्गः श्रेयसो मूलं ज्ञानं चैव परा गतिः ।
चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ॥ ३ ॥
पराशरजीने कहा— राजन्! आसक्तिका अभाव ही श्रेयका मूल कारण है। ज्ञान ही सबसे उत्तम गति है। स्वयं किया हुआ तप तथा सुपात्रको दिया हुआ दान—ये कभी नष्ट नहीं होते ॥ ३ ॥
छित्त्वाऽधर्ममयं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते ।
दत्त्वाऽभयकृतं दानं तदा सिद्धिमवाप्नुते ॥ ४ ॥
जो मनुष्य जब अधर्ममय बन्धनका उच्छेद करके धर्ममें अनुरक्त हो जाता और सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसे उसी समय उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ४ ॥
यो ददाति सहस्राणि गवामश्वशतानि च ।
अभयं सर्वभूतेभ्यः सदा तमभिवर्तते ॥ ५ ॥
जो एक हजार गौ तथा एक सौ घोड़े दान करता है तथा दूसरा जो सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देता है, वह सदा गौ और अश्वदान करनेवालेसे बढ़ा-चढ़ा रहता है ॥
वसन् विषयमध्येऽपि न वसत्येव बुद्धिमान् । संवसत्येव दुर्बुद्धिरसत्सु विषयेष्वपि ॥ ६ ॥ बुद्धिमान् पुरुष विषयोंके बीचमें रहता हुआ भी (असंग होनेके कारण) उनमें नहीं रहनेके बराबर ही है; किंतु जिसकी बुद्धि दूषित होती है, वह विषयोंके निकट न होनेपर भी सदा उन्हींमें रहता है ॥ ६ ॥
नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञं पयः पुष्करपर्णवत् । अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतुकाष्ठवत् ॥ ७ ॥ जैसे पानी कमलके पत्तेको लिपायमान नहीं कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको अधर्म लिप्त नहीं कर सकता; परंतु जैसे लाह काठमें चिपक जाती है, उसी प्रकार पाप अज्ञानी मनुष्यमें अधिक लिप्त हो जाता है ॥ ७ ॥
नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति । कर्ता खलु यथाकालं ततः समभिपद्यते ॥ ८ ॥ अधर्म फल प्रदानके अवसरकी प्रतीक्षा करनेवाला है, अतः वह कर्ताका पीछा नहीं छोड़ता। समय आनेपर उस कर्ताको उस पापका फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ ८ ॥
न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः । बुद्धिकर्मेन्द्रियाणां हि प्रमत्तो यो न बुद्ध्यते । शुभाशुभे प्रसक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद् भयम् ॥ ९ ॥ पवित्र अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानी पुरुष कर्मोंके शुभाशुभ फलोंसे कभी विचलित नहीं होते हैं। जो प्रमादवश ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंद्वारा होनेवाले पापोंपर विचार नहीं करता तथा शुभ एवं अशुभमें आसक्त रहता है, उसे महान् भयकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥
वीतरागो जितक्रोधः सम्यग् भवति यः सदा । विषये वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ॥ १० ॥ परंतु जो वीतराग होकर क्रोधको जीत लेता और नित्य सदाचारका पालन करता है, वह विषयोंमें वर्तमान रहकर भी पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं जोड़ता है ॥ १० ॥
मर्यादायां धर्मसेतुर्निबद्धो नैव सीदति । पुष्टस्रोत इवासक्तः स्फीतो भवति संचयः ॥ ११ ॥ जैसे नदीमें बँधा हुआ मजबूत बाँध टूटता नहीं है और उसके कारण वहाँ जलका स्रोत बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्राचीन मर्यादापर बँधा हुआ धर्मरूपी बाँध नष्ट नहीं होता है तथा उससे आसक्तिरहित संचित तपकी वृद्धि होने लगती है ॥ ११ ॥
यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना । आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ॥ १२ ॥ नृपश्रेष्ठ! जिस प्रकार शुद्ध सूर्यकान्तमणि सूर्यके तेजको ग्रहण कर लेती है, उसी प्रकार योगका साधक समाधिके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको ग्रहण करता है ॥ १२ ॥