महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
हन्त धर्मान् प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम ॥ १ ॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भीष्मका युधिष्ठिरके गुणकथनपूर्वक उनको प्रश्न करनेका आदेश देना, श्रीकृष्णका उनके लज्जित और भयभीत होनेका कारण बताना और भीष्मका आश्वासन पाकर युधिष्ठिरका उनके समीप जाना
वैशम्पायन उवाच
अथाब्रवीन्महातेजा वाक्यं कौरवनन्दनः ।
हन्त धर्मान् प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम ॥ १ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णकी बात सुनकर कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी भीष्मजीने कहा—'गोविन्द! आप सम्पूर्ण भूतोंके सनातन आत्मा हैं। आपके प्रसादसे मेरी वाक्शक्ति सुदृढ़ है और मन भी स्थिर हो गया है; अतः मैं समस्त धर्मोंका प्रवचन करूँगा ।। १ १/२ ।।
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा मां धर्माननुपृच्छतु ।
एवं प्रीतो भविष्यामि धर्मान् वक्ष्यामि चाखिलान् ॥ २ ॥
'धर्मात्मा युधिष्ठिर मुझसे एक-एक करके धर्मोंके विषयमें प्रश्न करें, इससे मुझे प्रसन्नता होगी और मैं सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश कर सकूँगा ।। २ ।।
यस्मिन् राजर्षभे जाते धर्मात्मनि महात्मनि ।
अहृष्यन्नृषयः सर्वे स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ३ ॥
'जिन राजर्षिशिरोमणि धर्मपरायण महात्मा युधिष्ठिरका जन्म होनेपर सभी महर्षि हर्षसे खिल उठे थे, वे ही पाण्डुपुत्र मुझसे प्रश्न करें ।। ३ ।।
सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम् ।
यस्य नास्ति समःकश्चित् स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ४ ॥
'जिनके यशका प्रताप सर्वत्र छा रहा है, उन समस्त धर्मचारी कौरवोंमें जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं है, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।।
धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा ।
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ५ ॥
'जिनमें धैर्य, इन्द्रियसंयम, ब्रह्मचर्य, क्षमा, धर्म, ओज और तेज सदा विद्यमान रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।। ५ ।।
सम्बन्धिनोऽतिथीन् भृत्यान् संश्रितांश्चैव यो भृशम् ।
सम्मानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ६ ॥
‘जो सम्बन्धियों, अतिथियों, भृत्यों तथा शरणागतोंका सदा सत्कारपूर्वक विशेष सम्मान करते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ६ ॥
सत्यं दानं तपः शौर्यं शान्तिर्दाक्ष्यमसम्भ्रमः ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ७ ॥
‘जिनमें सत्य, दान, तप, शूरता, शान्ति, दक्षता तथा असम्भ्रम (स्थिरचित्तता)—ये समस्त सद्गुण सदा मौजूद रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ७ ॥
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात् ।
कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ८ ॥
‘जो न तो कामनासे, न क्रोधसे, न भयसे और न किसी स्वार्थके ही लोभसे अधर्म करते हैं, वे धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ८ ॥
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः ।
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ९ ॥
‘जिनमें सदा ही सत्य, सदा ही क्षमा और सदा ही ज्ञानकी स्थिति है, जो निरन्तर अतिथिसत्कारके प्रेमी हैं और सत्पुरुषोंको सदा दान देते रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ९ ॥
इज्याध्ययननित्यस्य धर्मे च निरतः सदा ।
क्षान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ १० ॥
‘जिन्होंने शास्त्रोंके रहस्यका श्रवण किया है, जो सदा ही यज्ञ, स्वाध्याय और धर्ममें लगे रहनेवाले तथा क्षमाशील हैं, वे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥
वासुदेव उवाच
लज्जया परयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
अभिशापभयाद् भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥ ११ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**प्रजानाथ! धर्मराज युधिष्ठिर बहुत लज्जित हैं, वे शापके भयसे डरे होनेके कारण आपके निकट नहीं आ रहे हैं ॥ ११ ॥
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशाम्पते ।
अभिशापभयाद् भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥ १२ ॥
प्रजापालक भीष्म! ये लोकनाथ युधिष्ठिर जगत्का संहार करके शापके भयसे त्रस्त हो उठे हैं; इसीलिये आपके निकट नहीं आते हैं ॥ १२ ॥
पूज्यान् मान्यांश्च भक्तांश्च गुरून् सम्बन्धिबान्धवान् ।
अर्हार्हानिषुभिर्भित्त्वा भवन्तं नोपसर्पति ॥ १३ ॥
पूजनीय, माननीय गुरुजनों, भक्तों तथा अर्घ्य आदिके द्वारा सत्कार करने योग्य सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंका बाणोंद्वारा भेदन करके भयके मारे ये आपके पास नहीं आ रहे हैं ॥ १३ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः ।
क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम् ॥ १४ ॥
भीष्मजीने कहा— श्रीकृष्ण! जैसे दान, अध्ययन और तप ब्राह्मणोंका धर्म है, उसी प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके शरीरको मार गिराना क्षत्रियोंका धर्म है ॥ १४ ॥
पितॄन् पितामहान् भ्रातॄन् गुरून् सम्बन्धिबान्धवान् ।
मिथ्याप्रवृत्तान् यः संख्ये निहन्याद् धर्म एव सः ॥ १५ ॥
जो असत्यके मार्गपर चलनेवाले पिता (ताऊ-चाचा), बाबा, भाई, गुरुजन, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धवोंको संग्राममें मार डालता है, उसका वह कार्य धर्म ही है ॥ १५ ॥
समयत्यागिनो लुब्धान् गुरून्नपि च केशव ।
निहन्ति समरे पापान् क्षत्रियो यः स धर्मवित् ॥ १६ ॥
केशव! जो क्षत्रिय लोभवश धर्ममर्यादाका उल्लंघन करनेवाले पापाचारी गुरुजनोंका भी समराङ्गणमें वध कर डालता है, वह अवश्य ही धर्मका ज्ञाता है ॥ १६ ॥
यो लोभान्न समीक्षेत धर्मसेतुं सनातनम् ।
निहन्ति यस्तं समरे क्षत्रियो वै स धर्मवित् ॥ १७ ॥
जो लोभवश सनातन धर्ममर्यादाकी ओर दृष्टिपात नहीं करता, उसे जो क्षत्रिय समरभूमिमें मार गिराता है, वह निश्चय ही धर्मज्ञ है ॥ १७ ॥
लोहितोदां केशतृणां गजशैलां ध्वजद्रुमाम् ।
महीं करोति युद्धेषु क्षत्रियो यः स धर्मवित् ॥ १८ ॥
जो क्षत्रिय युद्धभूमिमें रक्तरूपी जल, केशरूपी तृण, हाथीरूपी पर्वत और ध्वजरूपी वृक्षोंसे युक्त खूनकी नदी बहा देता है, वह धर्मका ज्ञाता है ॥ १८ ॥
आहूतेन रणे नित्यं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना ।
धर्म्म्यं स्वर्ग्यं च लोक्यं च युद्धं हि मनुरब्रवीत् ॥ १९ ॥
संग्राममें शत्रुके ललकारनेपर क्षत्रिय-बन्धुको सदा ही युद्धके लिये उद्यत रहना चाहिये। मनुजीने कहा है कि युद्ध क्षत्रियके लिये धर्मका पोषक, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला और लोकमें यश फैलानेवाला है ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु भीष्मेण धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
विनीतवदुपागम्य तस्थौ संदर्शनेऽग्रतः ॥ २० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भीष्मजीके ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिर उनके पास जाकर एक विनीत पुरुषके समान उनकी दृष्टिके सामने खड़े हो गये ॥ २० ॥
अथास्य पादौ जग्राह भीष्मश्चापि ननन्द तम् ।
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय निषीदेत्यब्रवीत् तदा ॥ २१ ॥
फिर उन्होंने भीष्मजीके दोनों चरण पकड़ लिये। तब भीष्मजीने उन्हें आश्वासन देकर प्रसन्न किया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—‘बेटा! बैठ जाओ’ ॥ २१ ॥
तमुवाचाथ गाङ्गेयो वृषभः सर्वधन्विनाम् ।
मां पृच्छ तात विश्रब्धं मा भैस्त्वं कुरुसत्तम ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ गङ्गानन्दन भीष्मजीने उनसे कहा—‘तात! मैं इस समय स्वस्थ हूँ, तुम मुझसे निर्भय होकर प्रश्न करो। कुरुश्रेष्ठ! तुम भय न मानो’ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिराश्वासने
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुता
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष
वैशम्पायन उवाच
प्रणिपत्य हृषीकेशमभिवाद्य पितामहम् ।
अनुमान्य गुरून् सर्वान् पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मको प्रणाम करके युधिष्ठिरने समस्त गुरुजनोंकी अनुमति ले इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
राज्ञां वै परमो धर्म इति धर्मविदो विदुः ।
महान्तमेतं भारं च मन्ये तद् ब्रूहि पार्थिव ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले—पितामह! धर्मज्ञ विद्वानोंकी यह मान्यता है कि राजाओंका धर्म श्रेष्ठ है। मैं इसे बहुत बड़ा भार मानता हूँ, अतः भूपाल! आप मुझे राजधर्मका उपदेश कीजिये ॥ २ ॥
राजधर्मान् विशेषेण कथयस्व पितामह ।
सर्वस्य जीवलोकस्य राजधर्मः परायणम् ॥ ३ ॥
पितामह! राजधर्म सम्पूर्ण जीवजगत्का परम आश्रय है; अतः आप राजधर्मोंका ही विशेषरूपसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
त्रिवर्गो हि समासक्तो राजधर्मेषु कौरव ।
मोक्षधर्मश्च विस्पष्टः सकलोऽत्र समाहितः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन! राजाके धर्मोंमें धर्म, अर्थ और काम तीनोंका समावेश है, और यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण मोक्षधर्म भी राजधर्ममें निहित है ॥ ४ ॥
यथा हि रश्मयोऽश्वस्य द्विरदस्याङ्कुशो यथा ।
नरेन्द्रधर्मो लोकस्य तथा प्रग्रहणं स्मृतम् ॥ ५ ॥
जैसे घोड़ोंको काबूमें रखनेके लिये लगाम और हाथीको वशमें करनेके लिये अंकुश है, उसी प्रकार समस्त संसारको मर्यादाके भीतर रखनेके लिये राजधर्म आवश्यक है; वह उसके लिये प्रग्रह अर्थात् उसको नियन्त्रित करनेमें समर्थ माना गया है ॥ ५ ॥
तत्र चेत् सम्प्रमुह्येत धर्मे राजर्षिसेविते ।
लोकस्य संस्था न भवेत् सर्वं च व्याकुलीभवेत् ॥ ६ ॥
प्राचीन राजर्षियोंद्वारा सेवित उस राजधर्ममें यदि राजा मोहवश प्रमाद कर बैठे तो संसारकी व्यवस्था ही बिगड़ जाय और सब लोग दुखी हो जायँ ॥ ६ ॥
उदयन् हि यथा सूर्यो नाशयत्यशुभं तमः ।
राजधर्मास्तथालोक्यां निक्षिपन्त्यशुभां गतिम् ॥ ७ ॥
जैसे सूर्यदेव उदय होते ही घोर अन्धकारका नाश कर देते हैं, उसी प्रकार राजधर्म मनुष्योंके अशुभ आचरणोंका, जो उन्हें पुण्य लोकोंसे वञ्चित कर देते हैं, निवारण करता है ॥ ७ ॥
तदग्रे राजधर्मान् हि मदर्थे त्वं पितामह ।
प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ त्वं हि धर्मभृतां वरः ॥ ८ ॥
अतः भरतश्रेष्ठ पितामह! आप सबसे पहले मेरे लिये राजधर्मोंका ही वर्णन कीजिये; क्योंकि आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ८ ॥
आगमश्च परस्त्वत्तः सर्वेषां नः परंतप ।
भवन्तं हि परं बुद्धौ वासुदेवोऽभिमन्यते ॥ ९ ॥
परंतप पितामह! हम सब लोगोंको आपसे ही शास्त्रोंके उत्तम सिद्धान्तका ज्ञान हो सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण भी आपको ही बुद्धिमें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा—महान् धर्मको नमस्कार है। विश्वविधाता भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। अब मैं ब्राह्मणोंको नमस्कार करके सनातन धर्मोंका वर्णन आरम्भ करूँगा ॥ १० ॥
शृणु कार्त्स्न्येन मत्तस्त्वं राजधर्मान् युधिष्ठिर ।
निरुच्यमानान् नियतो यच्चान्यदपि वाञ्छसि ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर! अब तुम नियमपूर्वक एकाग्र हो मुझसे सम्पूर्णरूपसे राजधर्मोंका वर्णन सुनो, तथा और भी जो कुछ सुनना चाहते हो, उसका श्रवण करो ॥ ११ ॥
आदावेव कुरुश्रेष्ठ राज्ञा रञ्जनकाम्यया ।
देवतानां द्विजानां च वर्तितव्यं यथाविधि ॥ १२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! राजाको सबसे पहले प्रजाका रञ्जन अर्थात् उसे प्रसन्न रखनेकी इच्छासे देवताओं और ब्राह्मणोंके प्रति शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये (अर्थात् वह देवताओंका विधिपूर्वक पूजन तथा ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करे) ॥ १२ ॥
दैवतान्यर्चयित्वा हि ब्राह्मणांश्च कुरूद्वह । आनृण्यं याति धर्मस्य लोकेन च समर्च्यते ।। १३ ।। कुरुकुलभूषण! देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन करके राजा धर्मके ऋणसे मुक्त होता है और सारा जगत् उसका सम्मान करता है ।। १३ ।।
उत्थानेन सदा पुत्र प्रयतेथा युधिष्ठिर । न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थं प्रसादयेत् ।। १४ ।। बेटा युधिष्ठिर! तुम सदा पुरुषार्थके लिये प्रयत्नशील रहना। पुरुषार्थके बिना केवल प्रारब्ध राजाओंका प्रयोजन नहीं सिद्ध कर सकता ।। १४ ।।
साधारणं द्वयं ह्येतद् दैवमुत्थानमेव च । पौरुषं हि परं मन्ये दैवं निश्चितमुच्यते ।। १५ ।। यद्यपि कार्यकी सिद्धिमें प्रारब्ध और पुरुषार्थ—ये दोनों साधारण कारण माने गये हैं, तथापि मैं पुरुषार्थको ही प्रधान मानता हूँ। प्रारब्ध तो पहलेसे ही निश्चित बताया गया है ।। १५ ।।
विपन्ने च समारम्भे संतापं मा स्म वै कृथाः । घटस्वैव सदाऽऽत्मानं राज्ञामेष परो नयः ।। १६ ।। अतः यदि आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो सके अथवा उसमें बाधा पड़ जाय तो इसके लिये तुम्हें अपने मनमें दुःख नहीं मानना चाहिये। तुम सदा अपने आपको पुरुषार्थमें ही लगाये रखो। यही राजाओंकी सर्वोत्तम नीति है ।। १६ ।।
न हि सत्यादृते किंचिद् राज्ञां वै सिद्धिकारकम् । सत्ये हि राजा निरतः प्रेत्य चेह च नन्दति ।। १७ ।। सत्यके सिवा दूसरी कोई वस्तु राजाओंके लिये सिद्धिकारक नहीं है। सत्यपरायण राजा इहलोक और परलोकमें भी सुख पाता है ।। १७ ।।
ऋषीणामपि राजेन्द्र सत्यमेव परं धनम् । तथा राज्ञां परं सत्यान्नान्यद् विश्वासकारणम् ।। १८ ।। राजेन्द्र! ऋषियोंके लिये भी सत्य ही परम धन है। इसी प्रकार राजाओंके लिये सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा साधन नहीं है, जो प्रजावर्गमें उसके प्रति विश्वास उत्पन्न करा सके ।। १८ ।।
गुणवान् शीलवान् दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रियः । सुदर्शः स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रियः ।। १९ ।। जो राजा गुणवान्, शीलवान्, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, कोमलस्वभाव, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, देखनेमें प्रसन्नमुख और बहुत देनेवाला उदारचित्त है, वह कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।। १९ ।।
आर्जवं सर्वकार्येषु श्रयेथाः कुरुनन्दन ।
पुनर्नयविचारेण त्रयीसंवरणेन च ॥ २० ॥ कुरुनन्दन! तुम सभी कार्योंमें सरलता एवं कोमलताका अवलम्बन करना, परंतु नीतिशास्त्रकी आलोचनासे यह ज्ञात होता है कि अपने छिद्र, अपनी मन्त्रणा तथा अपने कार्य-कौशल—इन तीन बातोंको गुप्त रखनेमें सरलताका अवलम्बन करना उचित नहीं है ॥
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घयो भवति सर्वशः । तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभयमाश्रय ॥ २१ ॥ जो राजा सदा सब प्रकारसे कोमलतापूर्ण बर्ताव करने वाला ही होता है, उसकी आज्ञाका लोग उल्लंघन कर जाते हैं, और केवल कठोर बर्ताव करनेसे भी सब लोग उद्विग्न हो उठते हैं; अतः तुम आवश्यकतानुसार कठोरता और कोमलता दोनोंका अवलम्बन करो ॥ २१ ॥
अदण्ड्याश्चैव ते पुत्र विप्राश्च ददतां वर । भूतमेतत् परं लोके ब्राह्मणो नाम पाण्डव ॥ २२ ॥ दाताओंमें श्रेष्ठ बेटा पाण्डुकुमार युधिष्ठिर! तुम्हें ब्राह्मणोंको कभी दण्ड नहीं देना चाहिये; क्योंकि संसारमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ प्राणी है ॥ २२ ॥
मनुना चैव राजेन्द्र गीतौ श्लोकौ महात्मना । धर्मेषु स्वेषु कौरव्य हृदि तौ कर्तुमर्हसि ॥ २३ ॥ राजेन्द्र! कुरुनन्दन! महात्मा मनुने अपने धर्मशास्त्रोंमें दो श्लोकोंका गान किया है, तुम उन दोनोंको अपने हृदयमें धारण करो ॥ २३ ॥
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ २४ ॥ 'अग्नि जलसे, क्षत्रिय ब्राह्मणसे और लोहा पत्थरसे प्रकट हुआ है। इनका तेज अन्य सब स्थानोंपर तो अपना प्रभाव दिखाता है; परंतु अपनेको उत्पन्न करनेवाले कारणसे टक्कर लेनेपर स्वयं ही शान्त हो जाता है ॥
अयो हन्ति यदाश्मानमग्निना वारि हन्यते । ब्रह्म च क्षत्रियो द्वेष्टि तदा सीदन्ति ते त्रयः ॥ २५ ॥ 'जब लोहा पत्थरपर चोट करता है, आग जलको नष्ट करने लगती है और क्षत्रिय ब्राह्मणसे द्वेष करने लगता है, तब ये तीनों ही दुःख उठाते हैं। अर्थात् ये दुर्बल हो जाते हैं ॥ २५ ॥
एवं कृत्वा महाराज नमस्या एव ते द्विजाः । भौमं ब्रह्म द्विजश्रेष्ठा धारयन्ति समर्चिताः ॥ २६ ॥ महाराज! ऐसा सोचकर तुम्हें ब्राह्मणोंको सदा नमस्कार ही करना चाहिये; क्योंकि वे श्रेष्ठ ब्राह्मण पूजित होनेपर भूतलके ब्रह्मको अर्थात् वेदको धारण करते हैं ॥ २६ ॥
एवं चैव नरव्याघ्र लोकत्रयविघातकाः ।
निग्राह्या एव सततं बाहुभ्यां ये स्युरीदृशाः ॥ २७ ॥
पुरुषसिंह! यद्यपि ऐसी बात है, तथापि यदि ब्राह्मण भी तीनों लोकोंका विनाश करनेके लिये उद्यत हो जायँ तो ऐसे लोगोंको अपने बाहु-बलसे परास्त करके सदा नियन्त्रणमें ही रखना चाहिये ॥ २७ ॥
श्लोकौ चोशनसा गीतौ पुरा तात महर्षिणा ।
तौ निबोध महाराज त्वमेकाग्रमना नृप ॥ २८ ॥
तात! नरेश्वर! इस विषयमें दो श्लोक प्रसिद्ध हैं, जिन्हें पूर्वकालमें महर्षि शुक्राचार्यने गाया था। महाराज! तुम एकाग्रचित्त होकर उन दोनों श्लोकोंको सुनो ॥ २८ ॥
उद्यम्य शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे ।
निगृह्णीयात् स्वधर्मेण धर्मापेक्षी नराधिपः ॥ २९ ॥
'वेदान्तका पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण ही क्यों न हो; यदि वह शस्त्र उठाकर युद्धमें सामना करनेके लिये आ रहा हो तो धर्मपालनकी इच्छा रखनेवाले राजाको अपने धर्मके अनुसार ही युद्ध करके उसे कैद कर लेना चाहिये ॥ २९ ॥
विनश्यमानं धर्मं हि योऽभिरक्षेत् स धर्मवित् ।
न तेन धर्महा स स्यान्मन्युस्तन्मन्युमृच्छति ॥ ३० ॥
'जो राजा उसके द्वारा नष्ट होते हुए धर्मकी रक्षा करता है, वह धर्मज्ञ है। अतः उसे मारनेसे वह धर्मका नाशक नहीं माना जाता। वास्तवमें क्रोध ही उनके क्रोधसे टक्कर लेता है' ॥ ३० ॥
एवं चैव नरश्रेष्ठ रक्ष्या एव द्विजातयः ।
सापराधानपि हि तान् विषयान्ते समुत्सृजेत् ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ! यह सब होनेपर भी ब्राह्मणोंकी तो सदा रक्षा ही करनी चाहिये; यदि उनके द्वारा अपराध बन गये हों तो उन्हें प्राणदण्ड न देकर अपने राज्यकी सीमासे बाहर करके छोड़ देना चाहिये ॥ ३१ ॥
अभिशस्तमपि ह्येषां कृपायीत विशाम्पते ।
ब्रह्मघ्ने गुरुतल्पे च भ्रूणहत्ये तथैव च ॥ ३२ ॥
राजद्विष्टे च विप्रस्य विषयान्ते विसर्जनम् ।
विधीयते न शारीरं दण्डमेषां कदाचन ॥ ३३ ॥
प्रजानाथ! इनमें कोई कलङ्कित हो तो उसपर भी कृपा ही करनी चाहिये। ब्रह्महत्या, गुरुपत्नीगमन, भ्रूणहत्या तथा राजद्रोहका अपराध होनेपर भी ब्राह्मणको देशसे निकाल देनेका ही विधान है—उसे शारीरिक दण्ड कभी नहीं देना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥
दयिताश्च नरास्ते स्युर्भक्तिमन्तो द्विजेषु ये ।
न कोशः परमोऽन्योऽस्ति राज्ञां पुरुषसंचयात् ॥ ३४ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखते हैं, वे सबके प्रिय होते हैं। राजाओंके लिये ब्राह्मणके भक्तोंका संग्रह करनेसे बढ़कर दूसरा कोई कोश नहीं है ॥ ३४ ॥
दुर्गेशु च महाराज षट्सु ये शास्त्रनिश्चिताः ।
सर्वदुर्गेशु मन्यन्ते नरदुर्गं सुदुस्तरम् ॥ ३५ ॥
महाराज! मरु (जलरहित भूमि), जल, पृथ्वी, वन, पर्वत और मनुष्य—इन छः प्रकारके दुर्गोंमें मानवदुर्ग ही प्रधान है। शास्त्रोंके सिद्धान्तको जाननेवाले विद्वान् उक्त सभी दुर्गोंमें मानव दुर्गको ही अत्यन्त दुर्लङ्घ्य मानते हैं ॥ ३५ ॥
तस्मान्नित्यं दया कार्या चातुर्वर्ण्ये विपश्चिता ।
धर्मात्मा सत्यवाक् चैव राजा रञ्जयति प्रजाः ॥ ३६ ॥
अतः विद्वान् राजाको चारों वर्णोंपर सदा दया करनी चाहिये, धर्मात्मा और सत्यवादी नरेश ही प्रजाको प्रसन्न रख पाता है ॥ ३६ ॥
न च क्षान्तेन ते नित्यं भाव्यं पुत्र समन्ततः ।
अधर्मो हि मृदू राजा क्षमावानिव कुञ्जरः ॥ ३७ ॥
बेटा! तुम्हें सदा और सब ओर क्षमाशील ही नहीं बने रहना चाहिये; क्योंकि क्षमाशील हाथीके समान कोमल स्वभाववाला राजा दूसरोंको भयभीत न कर सकनेके कारण अधर्मके प्रसारमें ही सहायक होता है ॥
बार्हस्पत्ये च शास्त्रे च श्लोको निगदितः पुरा ।
अस्मिन्नर्थे महाराज तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३८ ॥
महाराज! इसी बातके समर्थनमें बार्हस्पत्य-शास्त्रका एक प्राचीन श्लोक पढ़ा जाता है। मैं उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३८ ॥
क्षममाणं नृपं नित्यं नीचः परिभवेज्जनः ।
हस्तियन्ता गजस्यैव शिर एवारुरुक्षति ॥ ३९ ॥
‘नीच मनुष्य क्षमाशील राजाका सदा उसी प्रकार तिरस्कार करते रहते हैं, जैसे हाथीका महावत उसके सिरपर ही चढ़े रहना चाहता है’ ॥ ३९ ॥
तस्मान्नैव मृदुर्नित्यं तीक्ष्णो नैव भवेन्नृपः ।
वासन्तार्क इव श्रीमान् न शीतो न च घर्मदः ॥ ४० ॥
जैसे वसन्त ऋतुका तेजस्वी सूर्य न तो अधिक ठंडक पहुँचाता है और न कड़ी धूप ही करता है, उसी प्रकार राजाको भी न तो बहुत कोमल होना चाहिये और न अधिक कठोर ही ॥ ४० ॥
प्रत्यक्षेणानुमानेन तथौपम्यागमैरपि ।
परीक्ष्यास्ते महाराज स्वे परे चैव नित्यशः ॥ ४१ ॥
महाराज! प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और अताम—इन चारों प्रमाणोंके द्वारा सदा अपने-परायेकी पहचान करते रहना चाहिये ॥ ४१ ॥
व्यसनानि च सर्वाणि त्यजेथा भूरिदक्षिण । न चैव न प्रयुञ्जीत सङ्गं तु परिवर्जयेत् ॥ ४२ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले नरेश्वर! तुम्हें सभी प्रकारके व्यसनोंको* त्याग देना चाहिये; परंतु साहस आदिका भी सर्वथा प्रयोग न किया जाय, ऐसी बात नहीं है (क्योंकि शत्रुविजय आदिके लिये उसकी आवश्यकता है); अतः सभी प्रकारके व्यसनोंकी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये ॥ ४२ ॥
लोकस्य व्यसनी नित्यं परिभूतो भवत्युत । उद्वेजयति लोकं च योऽतिद्वेषी महीपतिः ॥ ४३ ॥
व्यसनोंमें आसक्त हुआ राजा सदा सब लोगोंके अनादरका पात्र होता है और जो भूपाल सबके प्रति अत्यन्त द्वेष रखता है, वह सब लोगोंको उद्वेगयुक्त कर देता है ॥ ४३ ॥
भवितव्यं सदा राज्ञा गर्भिणीसहधर्मिणा । कारणं च महाराज शृणु येनेदमिष्यते ॥ ४४ ॥
महाराज! राजाका प्रजाके साथ गर्भिणी स्त्रीका-सा बर्ताव होना चाहिये। किस कारणसे ऐसा होना उचित है, यह बताता हूँ, सुनो ॥ ४४ ॥
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् । गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥ ४५ ॥ वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना । स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥ ४६ ॥
जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने-वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे। कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ॥ ४५-४६ ॥
न संत्याज्यं च ते धैर्यं कदाचिदपि पाण्डव । धीरस्य स्पष्टदण्डस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ४७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हें कभी भी धैर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। जो अपराधियोंको दण्ड देनेमें संकोच नहीं करता और सदा धैर्य रखता है, उस राजाको कभी भय नहीं होता ॥ ४७ ॥
परिहासश्च भृत्यैस्ते नात्यर्थं वदतां वर । कर्तव्यो राजशार्दूल दोषमत्र हि मे शृणु ॥ ४८ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजसिंह! तुम्हें सेवकोंके साथ अधिक हँसी-मजाक नहीं करना चाहिये; इसमें जो दोष है, वह मुझसे सुनो ॥ ४८ ॥
अवमन्यन्ति भर्तारं संघर्षादुपजीविनः । स्वे स्थाने न च तिष्ठन्ति लंघयन्ति च तद्वचः ॥ ४९ ॥
राजासे जीविका चलानेवाले सेवक अधिक मुँहलगे हो जानेपर मालिकका अपमान कर बैठते हैं। वे अपनी मर्यादामें स्थिर नहीं रहते और स्वामीकी आज्ञाका उल्लंघन करने लगते हैं॥ ४९॥ प्रेष्यमाणा विकल्पन्ते गुह्यं चाप्यनुयुञ्जते । अयाच्यं चैव याचन्ते भोज्यान्याहारयन्ति च ॥ ५० ॥ वे जब किसी कार्यके लिये भेजे जाते हैं तो उसकी सिद्धिमें संदेह उत्पन्न कर देते हैं। राजाकी गोपनीय त्रुटियोंको भी सबके सामने ला देते हैं। जो वस्तु नहीं माँगनी चाहिये उसे भी माँग बैठते हैं, तथा राजाके लिये रखे हुए भोज्य पदार्थोंको स्वयं खा लेते हैं॥ ५०॥ क्रुश्यन्ति परिदीप्यन्ति भूमिपायाधितिष्ठते । उत्कोचैर्वञ्चनाभिश्च कार्याण्यनुविहन्ति च ॥ ५१ ॥ राज्यके अधिपति भूपालको कोसते हैं, उनके प्रति क्रोधसे तमतमा उठते हैं; घूस लेकर और धोखा देकर राजाके कार्योंमें विघ्न डालते हैं॥ ५१॥ जर्जरं चास्य विषयं कुर्वन्ति प्रतिरूपकैः । स्त्रीरक्षिभिश्च सज्जन्ते तुल्यवेषा भवन्ति च ॥ ५२ ॥ वे जाली आज्ञापत्र जारी करके राजाके राज्यको जर्जर कर देते हैं। रनवासके रक्षकोंसे मिल जाते हैं अथवा उनके समान ही वेशभूषा धारण करके वहाँ घूमते फिरते हैं॥ ५२॥ वान्तं निष्ठीवनं चैव कुर्वते चास्य संनिधौ । निर्लज्जा राजशार्दूल व्याहरन्ति च तद्वचः ॥ ५३ ॥ राजाके पास ही मुँह बाकर जँभाई लेते और थूकते हैं, नृपश्रेष्ठ! वे मुँहलगे नौकर लाज छोड़कर मनमानी बातें बोलते हैं॥ ५३॥ हयं वा दन्तिनं वापि रथं वा नृपसत्तम । अभिरोहन्त्यनादृत्य हर्षुले पार्थिवे मृदौ ॥ ५४ ॥ नृपशिरोमणे! परिहासशील कोमलस्वभाववाले राजाको पाकर सेवकगण उसकी अवहेलना करते हुए उसके घोड़े, हाथी अथवा रथको अपनी सवारीके काममें लाते हैं॥ ५४॥ इदं ते दुष्करं राजन्निदं ते दुष्टचेष्टितम् । इत्येवं सुहृदो वाचं वदन्ते परिषद्वताः ॥ ५५ ॥ आम दरबारमें बैठकर दोस्तोंकी तरह बराबरीका बर्ताव करते हुए कहते हैं कि 'राजन्! आपसे इस कामका होना कठिन है, आपका यह बर्ताव बहुत बुरा है'॥ क्रुद्धे चास्मिन् हसन्त्येव न च हृष्यन्ति पूजिताः । संघर्षशीलाश्च तदा भवन्त्यन्योन्यकारणात् ॥ ५६ ॥ इस बातसे यदि राजा कुपित हुए तो वे उन्हें देखकर हँस देते हैं और उनके द्वारा सम्मानित होनेपर भी वे धृष्ट सेवक प्रसन्न नहीं होते। इतना ही नहीं, वे सेवक परस्पर स्वार्थ-
साधनके निमित्त राजसभामें ही राजाके साथ विवाद करने लगते हैं।। ५६ ।। विस्रंसयन्ति मन्त्रं च विवृण्वन्ति च दुष्कृतम्। लीलया चैव कुर्वन्ति सावज्ञास्तस्य शासनम्॥ ५७॥ राजकीय गुप्त बातों तथा राजाके दोषोंको भी दूसरों पर प्रकट कर देते हैं। राजाके आदेशकी अवहेलना करके खिलवाड़ करते हुए उसका पालन करते हैं।। ५७ ।। अलंकारे च भोज्ये च तथा स्नानानुलेपने। हेलनानि नरव्याघ्र स्वस्थास्तस्योपशृण्वतः॥ ५८ ॥ पुरुषसिंह! राजा पास ही खड़ा-खड़ा सुनता रहता है निर्भय होकर उसके आभूषण पहनने, खाने, नहाने और चन्दन लगाने आदिका मजाक उड़ाया करते हैं।। ५८ ।। निन्दन्ते स्वानधिकारान् संत्यजन्ते च भारत। न वृत्त्या परितुष्यन्ति राजदेयं हरन्ति च॥ ५९॥ भारत! उनके अधिकारमें जो काम सौंपा जाता है, उसको वे बुरा बताते और छोड़ देते हैं। उन्हें जो वेतन दिया जाता है, उससे वे संतुष्ट नहीं होते हैं और राजकीय धनको हड़पते रहते हैं।। ५९ ।। क्रीडितुं तेन चेच्छन्ति ससूत्रेणेव पक्षिणा। अस्मत्प्रणेयो राजेति लोकांश्चैव वदन्त्युत॥ ६०॥ जैसे लोग डोरेमें बँधी हुई चिड़ियाके साथ खेलते हैं, उसी प्रकार वे भी राजाके साथ खेलना चाहते हैं और साधारण लोगोंसे कहा करते हैं कि 'राजा तो हमारा गुलाम है'।। ६० ।। एते चैवापरे चैव दोषाः प्रादुर्भवन्त्युत। नृपतौ मार्दवोपेते हर्षुले च युधिष्ठिर॥ ६१॥ युधिष्ठिर! राजा जब परिहासशील और कोमल-स्वभावका हो जाता है, तब ये ऊपर बताये हुए तथा दूसरे दोष भी प्रकट होते हैं।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ५६ ।।
* व्यसन अठारह प्रकारके बताये गये हैं। इनमें दस तो कामज हैं, और आठ क्रोधज। शिकार, जूआ, दिनमें सोना, परनिन्दा, स्त्रीसेवन, मद, वाद्य, गीत, नृत्य और मदिरापान—ये दस कामज व्यसन बताये गये हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये आठ क्रोधज व्यसन कहे गये हैं।
राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन
भीष्म उवाच
नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर ।
प्रशस्यते न राजा हि नारीवोद्यमवर्जितः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजाको सदा ही उद्योगशील होना चाहिये। जो उद्योग छोड़कर स्त्रीकी भाँति बेकार बैठा रहता है, उस राजाकी प्रशंसा नहीं होती ॥ १ ॥
भगवानुशना चाह श्लोकमत्र विशाम्पते ।
तदिहैकमना राजन् गदतस्तं निबोध मे ॥ २ ॥
प्रजानाथ! इस विषयमें भगवान् शुक्राचार्यने एक श्लोक कहा है, उसे मैं बता रहा हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर मुझसे उस श्लोकको सुनो ॥ २ ॥
द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ३ ॥
जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहोंको निगल जाता है, उसी प्रकार दूसरोंसे लड़ाई न करनेवाले राजा तथा विद्याध्ययन आदिके लिये घर छोड़कर अन्यत्र न जानेवाले ब्राह्मणको पृथ्वी निगल जाती है (अर्थात् वे पुरुषार्थ-साधन किये बिना ही मर जाते हैं)' ॥ ३ ॥
तदेतन्नरशार्दूल हृदि त्वं कर्तुमर्हसि ।
संधेयानभिसंधत्स्व विरोध्यांश्च विरोधय ॥ ४ ॥
अतः नरश्रेष्ठ! तुम इस बातको अपने हृदयमें धारण कर लो, जो संधि करनेके योग्य हों, उनसे संधि करो और जो विरोधके पात्र हों, उनका डटकर विरोध करो ॥ ४ ॥
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य विपरीतं य आचरेत् ।
गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ॥ ५ ॥
राज्यके सात अङ्ग हैं—राजा, मन्त्री, मित्र, खजाना, देश, दुर्ग और सेना। जो इन सात अङ्गोंसे युक्त राज्यके विपरीत आचरण करे, वह गुरु हो या मित्र, मार डालनेके ही योग्य है ॥ ५ ॥
मरुत्तेन हि राज्ञा वै गीतः श्लोकः पुरातनः ।
राजाधिकारे राजेन्द्र बृहस्पतिमते पुरा ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालमें राजा मरुत्तने एक प्राचीन श्लोकका गान किया था, जो बृहस्पतिके मतानुसार राजाके अधिकारके विषयमें प्रकाश डालता है ॥ ६ ॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शाश्वतः ॥ ७ ॥
'घमण्डमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रखनेवाला तथा कुमार्गपर चलनेवाला मुनष्य यदि अपना गुरु हो तो उसे भी दण्ड देनेका सनातन विधान है' ।। ७ ।।
बाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेण च धीमता । असमञ्जाः सुतो ज्येष्ठस्त्यक्तः पौरहितैषिणा ।। ८ ।। बाहुके पुत्र बुद्धिमान् राजा सगरने तो पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजाका भी त्याग कर दिया था ।। ८ ।।
असमञ्जाः सरय्वां स पौराणां बालकान् नृप । न्यमज्जयदतः पित्रा निर्भर्त्स्य स विवासितः ।। ९ ।। नरेश्वर! असमंजा पुरवासियोंके बालकोंको पकड़कर सरयूनदीमें डुबा दिया करता था; अतः उसके पिताने उसे दुत्कारकर घरसे बाहर निकाल दिया ।। ९ ।।
ऋषिणोद्दालकेनापि श्वेतकेतुर्महातपाः । मिथ्या विप्रानुपचरन् संत्यक्तो दयितः सुतः ।। १० ।। उद्दालक ऋषिने अपने प्रिय पुत्र महातपस्वी श्वेतकेतुको केवल इस अपराधसे त्याग दिया कि वह ब्राह्मणोंके साथ मिथ्या एवं कपटपूर्ण व्यवहार करता था ।। १० ।।
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः । सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ।। ११ ।। अतः इस लोकमें प्रजावर्गको प्रसन्न रखना ही राजाओंका सनातन धर्म है। सत्यकी रक्षा और व्यवहारकी सरलता ही राजोचित कर्तव्य है ।। ११ ।।
न हिंस्यात् परवित्तानि देयं काले च दापयेत् । विक्रान्तः सत्यवाक् क्षान्तो नृपो न चलते पथः ।। १२ ।। दूसरोंके धनका नाश न करे। जिसको जो कुछ देना हो, उसे वह समयपर दिलानेकी व्यवस्था करे। पराक्रमी, सत्यवादी और क्षमाशील बना रहे—ऐसा करनेवाला राजा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता ।। १२ ।।
आत्मवांश्च जितक्रोधः शास्त्रार्थकृतनिश्चयः । धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ।। १३ ।। त्रय्यां संवृतमन्त्रश्च राजा भवितुमर्हति । वृजिनं च नरेन्द्राणां नान्यच्चारक्षणात् परम् ।। १४ ।। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, क्रोधको जीत लिया है तथा शास्त्रोंके सिद्धान्तका निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रयत्नमें निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदोंका ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारोंको दूसरोंपर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजाकी रक्षा न करनेसे बढ़कर राजाओंके लिये दूसरा कोई पाप नहीं है ।। १३-१४ ।।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मांश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।
धर्मसंकररक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः ॥ १५ ॥
राजाको चारों वर्णोंके धर्मोंकी रक्षा करनी चाहिये, प्रजाको धर्मसंकरतासे बचाना राजाओंका सनातन धर्म है ॥ १५ ॥
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं च विश्वसेत् ।
षाड्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं बुद्ध्यावलोकयेत् ॥ १६ ॥
राजा किसीपर भी विश्वास न करे। विश्वसनीय व्यक्तिका भी अत्यन्त विश्वास न करे। राजनीतिके छः गुण होते हैं—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय*। इन सबके गुण-दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे ॥ १६ ॥
द्विच्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते ।
त्रिवर्ग विदितार्थश्च युक्तचारोपधिश्च यः ॥ १७ ॥
शत्रुओंके छिद्र देखनेवाले राजाकी सदा ही प्रशंसा की जाती है। जिसे धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वका ज्ञान है तथा जिसने शत्रुओंकी गुप्त बातोंको जानने और उनके मन्त्री आदिको फोड़नेके लिये गुप्तचर लगा रखा है, वह भी प्रशंसाके ही योग्य है ॥ १७ ॥
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः ।
वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षयात्मनः ॥ १८ ॥
राजाको उचित है कि वह सदा अपने कोषागारको भरा-पूरा रखनेका प्रयत्न करता रहे, उसे न्याय करनेमें यमराज और धन-संग्रह करनेमें कुबेरके समान होना चाहिये। वह स्थान, वृद्धि तथा क्षयके हेतुभूत दस* वर्गोंका सदा ज्ञान रखे ॥ १८ ॥
अभृतानां भवेद् भर्ता भृतानामन्ववेक्षकः ।
नृपतिः सुमुखश्च स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता ॥ १९ ॥
जिनके भरण-पोषणका प्रबन्ध न हो उनका पोषण राजा स्वयं करे और उसके द्वारा जिनका भरण-पोषण चल रहा हो, उन सबकी देखभाल रखे। राजाको सदा प्रसन्नमुख रहना और मुसकराते हुए वार्तालाप करना चाहिये ॥ १९ ॥
उपासिता च वृद्धानां जिततन्द्रिरलोलुपः ।
सतां वृत्ते स्थितमतिः संतोष्यश्चारुदर्शनः ॥ २० ॥
राजाको वृद्ध पुरुषोंकी उपासना (सेवा या संग) करनी चाहिये, वह आलस्यको जीते और लोलुपताका परित्याग करे। सत्पुरुषोंके व्यवहारमें मन लगावे। संतुष्ट होने योग्य स्वभाव बनाये रखे। वेश-भूषा ऐसी रखे, जिससे वह देखनेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़े ॥ २० ॥
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात् कदाचन ।
असदभ्यश्च समादद्यात् सद्भ्यस्तु प्रतिपादयेत् ॥ २१ ॥
साधुपुरुषोंके हाथसे कभी धन न छीने। असाधु पुरुषोंसे दण्डके रूपमें धन लेना चाहिये; साधु पुरुषोंको तो धन देना चाहिये ॥ २१ ॥
स्वयं प्रहर्ता दाता च वश्यात्मा रम्यसाधनः ।
काले दाता च भोक्ता च शुद्धाचारस्तथैव च ॥ २२ ॥
स्वयं दुष्टोंपर प्रहार करे, दानशील बने, मनको वशमें रखे, सुरम्य साधनसे युक्त रहे, समय-समयपर धनका दान और उपभोग भी करे तथा निरन्तर शुद्ध एवं सदाचारी बना रहे ॥ २२ ॥
शूरान् भक्तानसंहार्यान् कुले जातानरोगिणः ।
शिष्टान् शिष्टाभिसम्बन्धान्मानिनोऽनवमानिनः ॥ २३ ॥
विद्याविदो लोकविदः परलोकान्वेक्षकान् ।
धर्मे च निरतान् साधूनचलानचलानिव ॥ २४ ॥
सहायान् सततं कुर्याद् राजा भूतिपुरस्कृतः ।
तैश्च तुल्यो भवेद् भोगैश्छत्रमात्राज्ञयाधिकः ॥ २५ ॥
जो शूरवीर एवं भक्त हों, जिन्हें विपक्षी फोड़ न सकें, जो कुलीन, नीरोग एवं शिष्ट हों तथा शिष्ट पुरुषोंसे सम्बन्ध रखते हों, जो आत्मसम्मानकी रक्षा करते हुए दूसरोंका कभी अपमान न करते हों, धर्मपरायण, विद्वान्, लोकव्यवहारके ज्ञाता और शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखनेवाले हों, जिनमें साधुता भरी हो तथा जो पर्वतोंके समान अटल रहनेवाले हों, ऐसे लोगोंको ही राजा सदा अपना सहायक बनावे और उन्हें ऐश्वर्यका पुरस्कार दे। उन्हें अपने समान ही सुखभोगकी सुविधा प्रदान करे, केवल राजोचित छत्र धारण करना और सबको आज्ञा प्रदान करना—इन दो बातोंमें ही वह उन सहायकोंकी अपेक्षा अधिक रहे ॥ २३—२५ ॥
प्रत्यक्षा च परोक्षा च वृत्तिश्चास्य भवेत् समा ।
एवं कुर्वन् नरेन्द्रोऽपि न खेदमिह विन्दति ॥ २६ ॥
प्रत्यक्ष और परोक्षमें भी उनके साथ राजाका एक-सा ही बर्ताव होना चाहिये। ऐसा करनेवाला नरेश इस जगत्में कभी कष्ट नहीं उठाता ॥ २६ ॥
सर्वाभिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत् ।
स क्षिप्रमनृजुर्लुब्धः स्वजनेनैव बध्यते ॥ २७ ॥
जो राजा सबपर संदेह करता और सबका सर्वस्व हर लेता है, वह लोभी और कुटिल राजा एक दिन अपने ही लोगोंके हाथसे शीघ्र मारा जाता है ॥ २७ ॥
शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकचित्तग्रहे रतः ।
न पतत्यरिभिर्ग्रस्तः पतितश्चावतिष्ठते ॥ २८ ॥
जो भूपाल बाहर-भीतरसे शुद्ध रहकर प्रजाके हृदयको अपनानेका प्रयत्न करता है, वह शत्रुओंका आक्रमण होनेपर भी उनके वशमें नहीं पड़ता, यदि उसका पतन हुआ भी तो
वह सहायकोंको पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है ।। २८ ।। अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः । राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ।। २९ ।। जिसमें क्रोधका अभाव होता है, जो दुर्व्यसनोंसे दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालयके समान सम्पूर्ण प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है ।। २९ ।। प्राज्ञस्त्यागगुणोपेतः पररन्ध्रेषु तत्परः । सुदर्शः सर्ववर्णानां नयापनयवित् तथा ।। ३० ।। क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः । अरोषप्रकृतियुक्तः क्रियावानविकत्थनः ।। ३१ ।। आरब्धान्येव कार्याणि सुपर्यवसितानि च । यस्य सङ्गः प्रदृश्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३२ ।। जो बुद्धिमान्, त्यागी, शत्रुओंकी दुर्बलता जाननेके प्रयत्नमें तत्पर, देखनेमें सुन्दर, सभी वर्णोंके न्याय और अन्यायको समझनेवाला, शीघ्र कार्य करनेमें समर्थ, क्रोधपर विजय पानेवाला, आश्रितोंपर कृपा करनेवाला, महामनस्वी, कोमल स्वभावसे युक्त, उद्योगी, कर्मठ तथा आत्मप्रशंसासे दूर रहनेवाला है, जिस राजाके आरम्भ किये हुए सभी कार्य सुन्दर रूपसे समाप्त होते दिखायी देते हैं, वह समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। पुत्रा इव पितुर्गेहे विषये यस्य मानवाः । निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३३ ।। जैसे पुत्र अपने पिताके घरमें निर्भीक होकर रहते हैं, उसी प्रकार जिस राजाके राज्यमें मनुष्य निर्भय होकर विचरते हैं, वह सब राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३३ ।। अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः । नयापनयवेत्तारः स राजा राजसत्तमः ।। ३४ ।। जिसके राज्य अथवा नगरमें निवास करनेवाले लोग (चोरोंसे भय न होनेके कारण) अपने धनको छिपाकर न रखते हों तथा न्याय और अन्यायको समझते हों, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३४ ।। स्वकर्मनिरता यस्य जना विषयवासिनः । असंघातारता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ।। ३५ ।। वश्या नेया विधेयाश्च न च संघर्षशीलिनः । विषये दानरुचयो नरा यस्य स पार्थिवः ।। ३६ ।। जिसके राज्यमें निवास करनेवाले लोग विधिपूर्वक सुरक्षित एवं पालित होकर अपने-अपने कर्ममें संलग्न, शरीरमें आसक्ति न रखनेवाले और जितेन्द्रिय हों, अपने वशमें रहते
हों, शिक्षा देने और ग्रहण करने योग्य हों, आज्ञा पालन करते हों, कलह और विवादसे दूर रहते हों और दान देनेकी रुचि रखते हों, वह राजा श्रेष्ठ है ।। ३५—३६ ।।
न यस्य कूटं कपटं न माया न च मत्सरः ।
विषये भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ।। ३७ ।।
जिस भूपालके राज्यमें कूटनीति, कपट, माया तथा ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो उसीके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ३७ ।।
यः सत्करोति ज्ञानानि ज्ञेये परहिते रतः ।
सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ।। ३८ ।।
जो ज्ञान एवं ज्ञानियोंका सत्कार करता है, शास्त्रके ज्ञातव्य विषयको समझने तथा परहित-साधन करनेमें संलग्न रहता है, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलानेके योग्य समझा जाता है ।। ३८ ।।
यस्य चाराश्च मन्त्राश्च नित्यं चैव कृताकृताः ।
न ज्ञायन्ते हि रिपुभिः स राजा राज्यमर्हति ।। ३९ ।।
जिसके गुप्तचर, गुप्त विचार, निश्चय किए हुए करने योग्य कर्म और किये हुए कर्म शत्रुओंद्वारा कभी जाने न जा सकें, वही राजा राज्य पानेका अधिकारी है ।।
श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना ।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत ।। ४० ।।
भारत! महात्मा भार्गवने पूर्वकालमें किसी राजाके प्रति राजोचित कर्तव्यका वर्णन करते समय इस श्लोकका गान किया था ।। ४० ।।
राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् ।
राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।। ४१ ।।
‘मनुष्य पहले राजाको प्राप्त करे। उसके बाद पत्नीका परिग्रह और धनका संग्रह करे। लोकरक्षक राजाके न होनेपर कैसे भार्या सुरक्षित रहेगी और किस तरह धनकी रक्षा हो सकेगी?’ ।। ४१ ।।
तद्राज्ये राज्यकामानां नान्यो धर्मः सनातनः ।
ऋते रक्षां तु विस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारिणी ।। ४२ ।।
राज्य चाहनेवाले राजाओंके लिये राज्यमें प्रजाओंकी भलीभाँति रक्षाको छोड़कर और कोई सनातन धर्म नहीं है, रक्षा ही जगत्को धारण करनेवाली है ।। ४२ ।।
प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ ।
राजधर्मेषु राजेन्द्र ताविहैकमनाः शृणु ।। ४३ ।।
राजेन्द्र! प्राचेतस मनुने राजधर्मके विषयमें ये दो श्लोक कहे हैं। तुम एकचित होकर उन दोनों श्लोकोंको यहाँ सुनो ।। ४३ ।।
षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे ।
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥ ४४ ॥
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम् ।
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥ ४५ ॥
‘जैसे समुद्रकी यात्रामें टूटी हुई नौकाका त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यको चाहिये कि वह उपदेश न देनेवाले आचार्य, वेदमन्त्रोंका उच्चारण न करनेवाले ऋत्विज्, रक्षा न कर सकने-वाले राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, गाँवमें रहनेकी इच्छा रखनेवाले ग्वाले और जंगलमें रहनेकी कामना करनेवाले नाई—इन छः व्यक्तियोंका त्याग कर दे’ ॥ ४४-४५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
* यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना ‘सन्धि’ नामक गुण है। यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना ‘विग्रह’ है। यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदिपर जो आक्रमण किया जाता है, उसे ‘यान’ कहते हैं। यदि अपने ऊपर शत्रु की ओरसे आक्रमण हो और शत्रु का पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है, वह ‘आसन’ कहलाता है। यदि चढ़ाई करनेवाला शत्रु मध्यम श्रेणीका हो तो ‘द्वैधीभाव’ का सहारा लिया जाता है। उसमें ऊपरसे दूसरा भाव दिखाया जाता है और भीतर दूसरा ही भाव रखा जाता है। जैसे आधी सेना दुर्गमें रखकर आत्मरक्षा करना और आधीको भेजकर शत्रुओंके अन्न आदि सामग्रीपर कब्जा करना आदि कार्य ‘द्वैधीभाव’ नीतिके अन्तर्गत हैं। आक्रमणकारीसे पीड़ित होनेपर किसी मित्र राजाका सहारा लेकर उसके साथ लड़ाई छेड़ना ‘समाश्रय’ कहलाता है।
* मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग (किला), खजाना और दण्ड—ये पाँच ‘प्रकृति’ कहे गये हैं। ये ही अपने और शत्रुपक्षके मिलाकर ‘दशवर्ग’ कहलाते हैं, यदि दोनोंके मन्त्री आदि समान हों तो ये स्थानके हेतु होते हैं। अर्थात् दोनों पक्षकी स्थिति कायम रहती है, अगर अपने पक्षमें इनकी अधिकता हो तो ये वृद्धिके साधक होते हैं और कमी हो तो क्षयके कारण बनते हैं।