महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआप कभी बैलपर सवार होते हैं और कभी गजराजकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं। आप दुर्गम हैं। आपको नमस्कार है। जो दूसरोंके लिये अगम्य है, वहाँ भी आपकी गति है। आपको नमस्कार है ॥ २९९ ॥
नमोऽस्तु गणगीताय गणवृन्दरताय च ।
गणानुयातमार्गाय गणनित्यव्रताय च ॥ ३०० ॥
प्रमथगण आपकी महिमाका गान करते हैं। आप अपने पार्षदोंकी मण्डलीमें रत रहते हैं। आपके प्रत्येक मार्गपर प्रमथगण आपके पीछे-पीछे चलते हैं। आपकी सेवा ही गणोंका नित्य-व्रत है। आपको नमस्कार है ॥
नमः श्वेताभ्रवर्णाय संध्यारागप्रभाय च ।
अनुद्दिष्टाभिधानाय स्वरूपाय नमोऽस्तु ते ॥ ३०१ ॥
आपकी कान्ति श्वेत बादलोंके समान है। आपकी प्रभा संध्याकालीन अरुणरागके समान है। आपका कोई निश्चित नाम नहीं है। आप सदा स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०१ ॥
नमो रक्ताग्रवासाय रक्तसूत्रधराय च ।
रक्तमालाविचित्राय रक्ताम्बरधराय च ॥ ३०२ ॥
आपका सुन्दर वस्त्र लाल रंगका है। आप लाल सूत्र धारण करते हैं। लाल रंगकी मालासे आपकी विचित्र शोभा होती है। आप रक्त वस्त्रधारी रुद्रदेवको नमस्कार है ॥ ३०२ ॥
मणिभूषितमूर्धाय नमश्चन्द्रार्धभूषिणे ।
विचित्रमणिमूर्धाय कुसुमाष्टधराय च ॥ ३०३ ॥
आपका मस्तक दिव्य मणिसे विभूषित है। आप अपने ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण करते हैं। आपका सिर विचित्र मणिकी प्रभासे प्रकाशमान है और आप आठ पुष्प धारण करते हैं ॥ ३०३ ॥
नमोऽग्निमुखनेत्राय सहस्रशशिलोचने ।
अग्निरूपाय कान्ताय नमोऽस्तु गहनाय च ॥ ३०४ ॥
आपके मुख और नेत्रमें अग्निका निवास है। आपके नेत्र सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित हैं। आप अग्निरूप, कमनीयविग्रह और दुर्गम गहन (वन) रूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०४ ॥
खचराय नमस्तुभ्यं गोचराभिरताय च ।
भूचराय भुवनाय अनन्ताय शिवाय च ॥ ३०५ ॥
चन्द्रमा और सूर्यके रूपमें आप आकाशचारी देवताको नमस्कार है। जहाँ गौएँ चरती हैं उस स्थानसे आप विशेष प्रेम रखते हैं। आप पृथ्वीपर विचरनेवाले और त्रिभुवनरूप हैं। अनन्त एवं शिवस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०५ ॥