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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

आप कभी बैलपर सवार होते हैं और कभी गजराजकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं। आप दुर्गम हैं। आपको नमस्कार है। जो दूसरोंके लिये अगम्य है, वहाँ भी आपकी गति है। आपको नमस्कार है ॥ २९९ ॥

नमोऽस्तु गणगीताय गणवृन्दरताय च ।
गणानुयातमार्गाय गणनित्यव्रताय च ॥ ३०० ॥

प्रमथगण आपकी महिमाका गान करते हैं। आप अपने पार्षदोंकी मण्डलीमें रत रहते हैं। आपके प्रत्येक मार्गपर प्रमथगण आपके पीछे-पीछे चलते हैं। आपकी सेवा ही गणोंका नित्य-व्रत है। आपको नमस्कार है ॥

नमः श्वेताभ्रवर्णाय संध्यारागप्रभाय च ।
अनुद्दिष्टाभिधानाय स्वरूपाय नमोऽस्तु ते ॥ ३०१ ॥

आपकी कान्ति श्वेत बादलोंके समान है। आपकी प्रभा संध्याकालीन अरुणरागके समान है। आपका कोई निश्चित नाम नहीं है। आप सदा स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०१ ॥

नमो रक्ताग्रवासाय रक्तसूत्रधराय च ।
रक्तमालाविचित्राय रक्ताम्बरधराय च ॥ ३०२ ॥

आपका सुन्दर वस्त्र लाल रंगका है। आप लाल सूत्र धारण करते हैं। लाल रंगकी मालासे आपकी विचित्र शोभा होती है। आप रक्त वस्त्रधारी रुद्रदेवको नमस्कार है ॥ ३०२ ॥

मणिभूषितमूर्धाय नमश्चन्द्रार्धभूषिणे ।
विचित्रमणिमूर्धाय कुसुमाष्टधराय च ॥ ३०३ ॥

आपका मस्तक दिव्य मणिसे विभूषित है। आप अपने ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण करते हैं। आपका सिर विचित्र मणिकी प्रभासे प्रकाशमान है और आप आठ पुष्प धारण करते हैं ॥ ३०३ ॥

नमोऽग्निमुखनेत्राय सहस्रशशिलोचने ।
अग्निरूपाय कान्ताय नमोऽस्तु गहनाय च ॥ ३०४ ॥

आपके मुख और नेत्रमें अग्निका निवास है। आपके नेत्र सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित हैं। आप अग्निरूप, कमनीयविग्रह और दुर्गम गहन (वन) रूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०४ ॥

खचराय नमस्तुभ्यं गोचराभिरताय च ।
भूचराय भुवनाय अनन्ताय शिवाय च ॥ ३०५ ॥

चन्द्रमा और सूर्यके रूपमें आप आकाशचारी देवताको नमस्कार है। जहाँ गौएँ चरती हैं उस स्थानसे आप विशेष प्रेम रखते हैं। आप पृथ्वीपर विचरनेवाले और त्रिभुवनरूप हैं। अनन्त एवं शिवस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०५ ॥

नमो दिग्वाससे नित्यमधिवाससुवाससे । नमो जगन्निवासाय प्रतिपत्तिसुखाय च ॥ ३०६ ॥ आप दिगम्बर हैं। आपको नमस्कार है। आप सबके आवास-स्थान और सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत् आपमें ही निवास करता है। आपको सम्पूर्ण सिद्धियोंका सुख सुलभ है। आपको नमस्कार है ॥ ३०६ ॥

नित्यमुद्वद्धमुकुटे महाकेयूरधारिणे । सर्पकण्ठोपहाराय विचित्राभरणाय च ॥ ३०७ ॥ आप मस्तकपर सदा मुकुट बाँधे रहते हैं। भुजाओंमें विशाल केयूर धारण करते हैं। आपके कण्ठमें सर्पोंका हार शोभा पाता है तथा आप विचित्र आभूषणोंसे विभूषित होते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०७ ॥

नमस्त्रिनेत्रनेत्राय सहस्रशतलोचने । स्त्रीपुंसाय नपुंसाय नमः सांख्याय योगिने ॥ ३०८ ॥ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि—ये तीन नेत्ररूप होकर आपको त्रिनेत्रधारी बना देते हैं। आपके लाखों नेत्र हैं। आप स्त्री हैं, पुरुष हैं और नपुंसक हैं। आप ही सांख्यवेत्ता और योगी हैं। आपको नमस्कार है ॥ ३०८ ॥

शंयोरभिस्रवन्ताय अथर्वाय नमो नमः । नमः सर्वार्तिनाशाय नमः शोकहराय च ॥ ३०९ ॥ आप यज्ञपूरक ‘शंयु’ नामक देवताके प्रसादरूप हैं और अथर्ववेदस्वरूप हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। जो सबकी पीड़ाका नाश करनेवाले और शोकहारी हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ३०९ ॥

नमो मेघनिनादाय बहुमायाधराय च । बीजक्षेत्राभिपालाय स्रष्टाराय नमो नमः ॥ ३१० ॥ जो मेघके समान गम्भीर नाद करनेवाले तथा बहुसंख्यक मायाओंके आधार हैं, जो बीज और क्षेत्रका पालन करते हैं और जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है ॥ ३१० ॥

नमः सुरासुरेशाय विश्वेशाय नमो नमः । नमः पवनवेगाय नमः पवनरूपिणे ॥ ३११ ॥ आप देवताओं और असुरोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप वायुके समान वेगशाली तथा वायुरूप हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ३११ ॥

नमः काञ्चनमालाय गिरिमालाय वै नमः । नमः सुरारिमालाय चण्डवेगाय वै नमः ॥ ३१२ ॥

आप सुवर्णमालाधारी तथा पर्वत-मालाओंमें विहार करनेवाले हैं। देवशत्रुओंके मुण्डोंकी माला धारण करनेवाले प्रचण्ड वेगशाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है ।। ३१२ ।।

ब्रह्मशिरोपहर्ताय महिषघ्नाय वै नमः ।
नमः स्त्रीरूपधाराय यज्ञविध्वंसनाय च ।। ३१३ ।।
ब्रह्माजीके मस्तकका उच्छेद और महिषका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप स्त्रीरूप धारण करनेवाले तथा यज्ञके विध्वंसक हैं। आपको नमस्कार है ।। ३१३ ।।

नमस्त्रिपुरहर्ताय यज्ञविध्वंसनाय च ।
नमः कामाङ्गनाशाय कालदण्डधराय च ।। ३१४ ।।
असुरोंके तीनों पुरोंका विनाश और दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है। कामके शरीरका नाश तथा कालदण्डको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ।। ३१४ ।।

नमः स्कन्दविशाखाय ब्रह्मदण्डाय वै नमः ।
नमो भवाय शर्वाय विश्वरूपाय वै नमः ।। ३१५ ।।
स्कन्द और विशाखरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्मदण्डस्वरूप आपको नमस्कार है। भव (उत्पादक) और शर्व (संहारक)-रूप आपको नमस्कार है। विश्वरूपधारी प्रभुको नमस्कार है ।। ३१५ ।।

ईशानाय भवघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ।
नमो विश्वाय मायाय चिन्त्याचिन्त्याय वै नमः ।। ३१६ ।।
आप सबके ईश्वर, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले तथा अन्धकासुरके घातक हैं। आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण मायास्वरूप तथा चिन्त्य और अचिन्त्यरूप हैं। आपको नमस्कार है ।। ३१६ ।।

त्वं नो गतिश्च श्रेष्ठश्च त्वमेव हृदयं तथा ।
त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः ।। ३१७ ।।
आप ही हमारी गति हैं, श्रेष्ठ हैं और आप ही हमारे हृदय हैं। आप सम्पूर्ण देवताओंमें ब्रह्मा तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं ।। ३१७ ।।

आत्मा च सर्वभूतानां सांख्ये पुरुष उच्यते ।
ऋषभस्त्वं पवित्राणां योगिनां निष्कलः शिवः ।। ३१८ ।।
आप समस्त प्राणियोंमें आत्मा और सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहलाते हैं। आप पवित्रोंमें ऋषभ तथा योगियोंमें निष्कल शिवरूप हैं ।। ३१८ ।।

गृहस्थस्त्वमाश्रमिणामीश्वराणां महेश्वरः ।
कुबेरः सर्वयक्षाणां क्रतूनां विष्णुरुच्यते ।। ३१९ ।।

आप आश्रमियोंमें गृहस्थ, ईश्वरोंमें महेश्वर, सम्पूर्ण यक्षोंमें कुबेर तथा यज्ञोंमें विष्णु कहलाते हैं ॥ ३१९ ॥ पर्वतानां भवान् मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः । वसिष्ठस्त्वमृषीणां च ग्रहाणां सूर्य उच्यते ॥ ३२० ॥ पर्वतोंमें आप मेरु हैं। नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं। ऋषियोंमें वसिष्ठ हैं तथा ग्रहोंमें सूर्य कहलाते हैं ॥ ३२० ॥ आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः । ग्राम्याणां गोवृषश्चासि भवाँल्लोकप्रपूजितः ॥ ३२१ ॥ आप जंगली पशुओंमें सिंह हैं। आप ही परमेश्वर हैं। ग्रामीण पशुओंमें आप ही लोकसम्मानित साँड़ हैं ॥ ३२१ ॥ आदित्यानां भवान् विष्णुर्वसूनां चैव पावकः । पक्षिणां वैनतेयस्त्वमनन्तो भुजगेषु च ॥ ३२२ ॥ आप ही आदित्योंमें विष्णु हैं। वसुओंमें अग्नि हैं। पक्षियोंमें आप विनतानन्दन गरुड और सर्पोंमें अनन्त (शेषनाग) हैं ॥ ३२२ ॥ सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रियम् । सनत्कुमारो योगानां सांख्यानां कपिलो ह्यसि ॥ ३२३ ॥ आप वेदोंमें सामवेद, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय, योगियोंमें सनत्कुमार और सांख्यवेत्ताओंमें कपिल हैं ॥ शक्रोऽसि मरुतां देव पितॄणां हव्यवाडसि । ब्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ॥ ३२४ ॥ देव! आप मरुद्गणोंमें इन्द्र, पितरोंमें हव्यवाहन अग्नि, लोकोंमें ब्रह्मलोक और गतियोंमें मोक्ष कहलाते हैं ॥ क्षीरोदः सागराणां च शैलानां हिमवान् गिरिः । वर्णानां ब्राह्मणश्चासि विप्राणां दीक्षितो द्विजः ॥ ३२५ ॥ आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, पर्वतोंमें हिमालय, वर्णोंमें ब्राह्मण और ब्राह्मणोंमें भी दीक्षित ब्राह्मण (यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले) हैं ॥ ३२५ ॥ आदिस्त्वमसि लोकानां संहर्ता काल एव च । यच्चान्यदपि लोके वै सर्व तेजोऽधिकं स्मृतम् ॥ ३२६ ॥ तत् सर्वं भगवानेव इति मे निश्चिता मतिः । आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आदि हैं। आप ही संहार करनेवाले काल हैं। संसारमें और भी जो-जो वस्तुएँ सर्वथा तेजमें बढ़ी-चढ़ी हैं, वे सभी आप भगवान् ही हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है ॥ ३२६ ½ ॥ नमस्ते भगवन् देव नमस्ते भक्तवत्सल ॥ ३२७ ॥

योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव ।
भगवन्! देव! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। योगेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वकी उत्पत्तिके कारण! आपको नमस्कार है ।। ३२७ १/२ ।।
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च ।। ३२८ ।।
अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ।

सनातन परमेश्वर! आप मुझ दीन-दुःखी भक्तपर प्रसन्न होइये। मैं ऐश्वर्यसे रहित हूँ। आप ही मेरे आश्रयदाता हों ।। ३२८ १/२ ।।
यच्चापराधं कृतवानज्ञात्वा परमेश्वर ।। ३२९ ।।
मद्भक्त इति देवेश तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि ।

परमेश्वर देवेश! मैंने अनजानमें जो अपराध किये हों, वह सब यह समझकर क्षमा कीजिये कि यह मेरा अपना ही भक्त है ।। ३२९ १/२ ।।
मोहितश्चास्मि देवेश त्वया रूपविपर्ययात् ।। ३३० ।।
नार्घ्यं ते न मया दत्तं पाद्यं चापि महेश्वर ।

देवेश्वर! आपने अपना रूप बदलकर मुझे मोहमें डाल दिया। महेश्वर! इसीलिये न तो मैंने आपको अर्घ्य दिया और न पाद्य ही समर्पित किया ।। ३३० १/२ ।।
एवं स्तुत्वाहमीशानं पाद्यमर्घ्यं च भक्तितः ।। ३३१ ।।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा सर्वं तस्मै न्यवेदयम् ।

इस प्रकार भगवान् शिवकी स्तुति करके मैंने उन्हें भक्तिभावसे पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ।। ३३१ १/२ ।।
ततः शीताम्बुसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता ।। ३३२ ।।
पुष्पवृष्टिः शुभा तात पपात मम मूर्धनि ।
दुन्दुभिश्च तदा दिव्यस्ताडितो देवकिङ्करैः ।
ववौ च मारुतः पुण्यः शुचिगन्धः सुखावहः ।। ३३३ ।।

तात! तदनन्तर मेरे मस्तकपर शीतल जल और दिव्य सुगन्धसे युक्त फूलोंकी शुभ वृष्टि होने लगी। उसी समय देवकिङ्करोंने दिव्य दुन्दुभि बजाना आरम्भ किया और पवित्र गन्धसे युक्त पुण्यमयी सुखद वायु चलने लगी ।। ३३२-३३३ ।।
ततः प्रीतो महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः ।
अब्रवीत् त्रिदशांस्तत्र हर्षयन्निव मां तदा ।। ३३४ ।।

तब पत्नीसहित प्रसन्न हुए वृषभध्वज महादेवजीने मेरा हर्ष बढ़ाते हुए-से वहाँ सम्पूर्ण देवताओंसे कहा— ।।
पश्यध्वं त्रिदशाः सर्वे उपमन्योर्महात्मनः ।
मयि भक्तिं परां नित्यमेकभावादवस्थिताम् ।। ३३५ ।।

‘देवताओ! तुम सब लोग देखो कि महात्मा उपमन्युकी मुझमें नित्य एकभावसे बनी रहनेवाली कैसी उत्तम भक्ति है’ ।। ३३५ ।।

एवमुक्तास्तदा कृष्ण सुरास्ते शूलपाणिना ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे नमस्कृत्या वृषध्वजम् ।। ३३६ ।।
श्रीकृष्ण! शूलपाणि महादेवजीके ऐसा कहनेपर वे सब देवता हाथ जोड़ उन वृषभध्वज शिवजीको नमस्कार करके बोले— ।। ३३६ ।।

भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते ।
लभतां सर्वकामेभ्यः फलं त्वत्तो द्विजोत्तमः ।। ३३७ ।।
‘भगवन्! देवदेवेश्वर! लोकनाथ! जगत्पते! ये द्विजश्रेष्ठ उपमन्यु आपसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंके अनुसार अभीष्ट फल प्राप्त करें’ ।। ३३७ ।।

एवमुक्तस्ततः शर्वः सुरैर्ब्रह्मादिभिस्तथा ।
आह मां भगवानीशः प्रहसन्निव शंकरः ।। ३३८ ।।
ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवताओंके ऐसा कहनेपर सबके ईश्वर और कल्याणकारी भगवान् शिवने मुझसे हँसते हुए-से कहा ।। ३३८ ।।

श्रीभगवानुवाच

वत्सोपमन्यो तुष्टोऽस्मि पश्य मां मुनिपुङ्गव ।
दृढभक्तोऽसि विप्रर्षे मया जिज्ञासितो ह्यसि ।। ३३९ ।।
**भगवान् शिवजी बोले—**वत्स उपमन्यो! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। मुनिपुङ्गव! तुम मेरी ओर देखो। ब्रह्मर्षे! मुझमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति है। मैंने तुम्हारी परीक्षा कर ली है ।। ३३९ ।।

अनया चैव भक्त्या ते अत्यर्थं प्रीतिमानहम् ।
तस्मात् सर्वान् ददाम्यद्य कामांस्तव यथेप्सितान् ।। ३४० ।।
तुम्हारी इस भक्तिसे मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है, अतः मैं तुम्हें आज तुम्हारी सभी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण किये देता हूँ ।। ३४० ।।

एवमुक्तस्य चैवाथ महादेवेन धीमता ।
हर्षादश्रूण्यवर्तन्त रोमहर्षस्त्वजायत ।। ३४१ ।।
परम बुद्धिमान् महादेवजीके इस प्रकार कहनेपर मेरे नेत्रोंसे हर्षके आँसू बहने लगे और सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया ।। ३४१ ।।

अब्रुवं च तदा देवं हर्षगद्गदया गिरा ।
जानुभ्यामवनीं गत्वा प्रणम्य च पुनः पुनः ।। ३४२ ।।
तब मैंने धरतीपर घुटने टेककर भगवान्‌को बारंबार प्रणाम किया और हर्षगद्गद वाणीद्वारा महादेवजीसे इस प्रकार कहा— ।। ३४२ ।।

अद्य जातो ह्यहं देव सफलं जन्म चाद्य मे । सुरासुरगुरुर्देवो यत् तिष्ठति ममाग्रतः ॥ ३४३ ‘देव! आज ही मैंने वास्तवमें जन्म ग्रहण किया है। आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि इस समय मेरे सामने देवताओं और असुरोंके गुरु आप साक्षात् महादेवजी खड़े हैं ॥ ३४३ ॥

यं न पश्यन्ति चैवाद्धा देवा ह्यमितविक्रमम् । तमहं दृष्टवान् देवं कोऽन्यो धन्यतरो मया ॥ ३४४ ॥ ‘जिन अमित पराक्रमी महादेवजीको देवता भी सुगमतापूर्वक देख नहीं पाते हैं उन्हींका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिला है; अतः मुझसे बढ़कर धन्यवादका भागी दूसरा कौन हो सकता है? ॥ ३४४ ॥

एवं ध्यायन्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् । तद् विशेषमिति ख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम् ॥ ३४५ ॥ ‘अजन्मा, अविनाशी, ज्ञानमय तथा सर्वश्रेष्ठ रूपसे विख्यात जो सनातन परम तत्त्व है, उसका ज्ञानी पुरुष इसी रूपमें ध्यान करते हैं (जैसा कि आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ) ॥ ३४५ ॥

स एष भगवान् देवः सर्वसत्त्वादिरव्ययः । सर्वतत्त्वविधानज्ञः प्रधानपुरुषः परः ॥ ३४६ ॥ 'जो सम्पूर्ण प्राणियोंका आदिकारण, अविनाशी, समस्त तत्त्वोंके विधानका ज्ञाता तथा प्रधान परम पुरुष है, वह ये भगवान् महादेवजी ही हैं ॥ ३४६ ॥

योऽसृजद् दक्षिणादङ्गाद् ब्रह्माणं लोकसम्भवम् । वामपार्श्वात् तथा विष्णुं लोकरक्षार्थमीश्वरः ॥ ३४७ ॥ ‘इन्हीं जगदीश्वरने अपने दाहिने अङ्गसे लोकस्रष्टा ब्रह्माको और बायें अङ्गसे जगत्की रक्षाके लिये विष्णुको उत्पन्न किया है ॥ ३४७ ॥

युगान्ते चैव सम्प्राप्ते रुद्रमीशोऽसृजत् प्रभुः । स रुद्रः संहरन् कृत्स्नं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ३४८ ॥ ‘प्रलयकाल प्राप्त होनेपर इन्हीं भगवान् शिवने रुद्रकी रचना की थी। वे ही रुद्र सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करते हैं ॥ ३४८ ॥

कालो भूत्वा महातेजाः संवर्तक इवानलः । युगान्ते सर्वभूतानि ग्रसन्निव व्यवस्थितः ॥ ३४९ ॥ ‘वे ही महातेजस्वी काल होकर कल्पके अन्तमें समस्त प्राणियोंको अपना ग्रास बनाते हुए-से प्रलयकालीन अग्निके सदृश स्थित होते हैं ॥ ३४९ ॥

एष देवो महादेवो जगत् सृष्ट्वा चराचरम् । कल्पान्ते चैव सर्वेषां स्मृतिमाक्षिप्य तिष्ठति ॥ ३५० ॥

'ये ही देवदेव महादेव चराचर जगत्की सृष्टि करके कल्पान्तमें सबकी स्मृति-शक्तिको मिटाकर स्वयं ही स्थित रहते हैं ॥ ३५० ॥ सर्वगः सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भवः ।
आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्यः सर्वदैवतैः ॥ ३५१ ॥
'ये सर्वत्र गमन करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा तथा समस्त भूतोंके जन्म और वृद्धिके हेतु हैं। ये सर्वव्यापी परमेश्वर सदा सम्पूर्ण देवताओंसे अदृश्य रहते हैं ॥ ३५१ ॥
यदि देयो वरो मह्यं यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो ।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देव सुरेश्वर ॥ ३५२ ॥
'प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे देव! हे सुरेश्वर! मेरी सदा आपमें भक्ति बनी रहे ॥ ३५२ ॥
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च यद् विभो ।
जानीयामिति मे बुद्धिः प्रसादात् सुरसत्तम ॥ ३५३ ॥
'सुरश्रेष्ठ! विभो! आपकी कृपासे मैं भूत, वर्तमान और भविष्यको जान सकूँ; ऐसा मेरा निश्चय है ॥ ३५३ ॥
क्षीरोदनं च भुञ्जीयामक्षयं सह बान्धवैः ।
आश्रमे च सदास्माकं सांनिध्यं परमस्तु ते ॥ ३५४ ॥
'मैं अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सदा अक्षय दूध-भातका भोजन प्राप्त करूँ और हमारे इस आश्रममें सदा आपका निकट निवास रहे' ॥ ३५४ ॥
एवमुक्तः स मां प्राह भगवाँल्लोकपूजितः ।
महेश्वरो महातेजाश्चराचरगुरुः शिवः ॥ ३५५ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर लोकपूजित चराचरगुरु महातेजस्वी महेश्वर भगवान् शिव मुझसे यों बोले— ॥ ३५५ ॥

श्रीभगवानुवाच

अजरश्चामरश्चैव भव त्वं दुःखवर्जितः ।
यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ ३५६ ॥
भगवान् शिवने कहा— ब्रह्मन्! तुम दुःखसे रहित अजर-अमर हो जाओ। यशस्वी, तेजस्वी तथा दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न बने रहो ॥ ३५६ ॥
ऋषीणामभिगम्यश्च मत्प्रसादाद् भविष्यसि ।
शीलवान् गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रियदर्शनः ॥ ३५७ ॥
मेरी कृपासे तुम ऋषियोंके भी दर्शनीय एवं आदरणीय होओगे तथा सदा शीलवान्, गुणवान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बने रहोगे ॥ ३५७ ॥
अक्षयं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् ।

क्षीरोदः सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसि प्रियम् ।। ३५८ ।।
तत्र ते भविता कामं सांनिध्यं पयसो निधेः ।
तुम्हें अक्षय यौवन और अग्निके समान तेज प्राप्त हो। तुम्हारे लिये क्षीरसागर सुलभ हो जायगा। तुम जहाँ-जहाँ प्रिय वस्तुकी इच्छा करोगे वहाँ-वहाँ तुम्हारी सारी कामना सफल होगी; और तुम्हें क्षीरसागरका सान्निध्य प्राप्त होगा ।। ३५८ १/२ ।।
क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम् ।। ३५९ ।।
बन्धुभिः सहितः कल्पं ततो मामुपयास्यसि ।
अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा ।। ३६० ।।
तुम अपने भाई-बन्धुओंके साथ एक कल्पतक अमृतसहित दूध-भातका भोजन पाते रहो। तत्पश्चात् तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे। तुम्हारे बन्धु-बान्धव, कुल तथा गोत्रकी परम्परा सदा अक्षय बनी रहेगी ।।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती ।
सांनिध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ।। ३६१ ।।
द्विजश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी सदा अचल भक्ति होगी तथा द्विजप्रवर! तुम्हारे इस आश्रमके निकट मैं सदा अदृश्य रूपसे निवास करूँगा ।। ३६१ ।।
तिष्ठ वत्स यथाकामं नोत्कण्ठां च करिष्यसि ।
स्मृतस्त्वया पुनर्विप्र करिष्यामि च दर्शनम् ।। ३६२ ।।
बेटा! तुम इच्छानुसार यहाँ रहो। कभी किसी बातके लिये चिन्ता न करना। विप्रवर! तुम्हारे स्मरण करनेपर मैं पुनः तुम्हें दर्शन दूँगा ।। ३६२ ।।
एवमुक्त्वा स भगवान् सूर्यकोटिसमप्रभः ।
ईशानः स वरान् दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ।। ३६३ ।।
ऐसा कहकर वे करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी भगवान् शंकर उपर्युक्त वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये ।। ३६३ ।।
एवं दृष्टो मया कृष्ण देवदेवः समाधिना ।
तदवाप्तं च मे सर्वं यदुक्तं तेन धीमता ।। ३६४ ।।
श्रीकृष्ण! इस प्रकार मैंने समाधिके द्वारा देवाधिदेव भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया। उन बुद्धिमान् महादेवजीने जो कुछ कहा था, वह सब मुझे प्राप्त हो गया है ।। ३६४ ।।
प्रत्यक्षं चैव ते कृष्ण पश्य सिद्धान् व्यवस्थितान् ।
ऋषीन् विद्याधरान् यक्षान् गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।। ३६५ ।।
श्रीकृष्ण! यह सब आप प्रत्यक्ष देख लें। यहाँ सिद्ध महर्षि, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराएँ विद्यमान हैं ।। ३६५ ।।
पश्य वृक्षलतागुल्मान् सर्वपुष्पफलप्रदान् ।

सर्वर्तुकुसुमैर्युक्तान् सुखपत्रान् सुगन्धिनः ॥ ३६६ ॥
देखिये, यहाँके वृक्ष, लता और गुल्म सब प्रकारके फूल और फल देनेवाले हैं। ये सभी ऋतुओंके फूलोंसे युक्त, सुखदायक पल्लवोंसे सम्पन्न और सुगन्धसे परिपूर्ण हैं ॥ ३६६ ॥

सर्वमेतन्महाबाहो दिव्यभावसमन्वितम् ।
प्रसादाद् देवदेवस्य ईश्वरस्य महात्मनः ॥ ३६७ ॥
महाबाहो! देवताओंके भी देवता तथा सबके ईश्वर महात्मा शिवके प्रसादसे ही यहाँ सब कुछ दिव्य भावसे सम्पन्न दिखायी देता है ॥ ३६७ ॥

वासुदेव उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यक्षमिव दर्शनम् ।
विस्मयं परमं गत्वा अब्रुवं तं महामुनिम् ॥ ३६८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! उनकी यह बात सुनकर मानो मुझे भगवान् शिवका प्रत्यक्ष दर्शन हो गया हो, ऐसा प्रतीत हुआ। फिर बड़े विस्मयमें पड़कर मैंने उन महामुनिसे पूछा— ॥ ३६८ ॥

धन्यस्त्वमसि विप्रेन्द्र कस्त्वदन्योऽसि पुण्यकृत् ।
यस्य देवाधिदेवस्ते सांनिध्यं कुरुतेऽऽश्रमे ॥ ३६९ ॥
‘विप्रवर! आप धन्य हैं। आपसे बढ़कर पुण्यात्मा पुरुष दूसरा कौन है? क्योंकि आपके इस आश्रममें साक्षात् देवाधिदेव महादेव निवास करते हैं ॥ ३६९ ॥

अपि तावन्ममाप्येवं दद्यात् स भगवान् शिवः ।
दर्शनं मुनिशार्दूल प्रसादं चापि शंकरः ॥ ३७० ॥
‘मुनिश्रेष्ठ! क्या कल्याणकारी भगवान् शिव मुझे भी इसी प्रकार दर्शन देंगे? मुझपर भी कृपा करेंगे?’ ॥

उपमन्युरुवाच

द्रक्ष्यसे पुण्डरीकाक्ष महादेवं न संशयः ।
अचिरेणैव कालेन यथा दृष्टो मयानघ ॥ ३७१ ॥
उपमन्यु बोले— निष्पाप कमलनयन! जैसे मैंने भगवान्‌का दर्शन किया है, उसी प्रकार आप भी थोड़े ही समयमें महादेवजीका दर्शन प्राप्त करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३७१ ॥

चक्षुषा चैव दिव्येन पश्याम्यमितविक्रमम् ।
षष्ठे मासि महादेवं द्रक्ष्यसे पुरुषोत्तम ॥ ३७२ ॥
पुरुषोत्तम! मैं दिव्य दृष्टिसे देख रहा हूँ। आप आजसे छठे महीनेमें अमित पराक्रमी महादेवजीका दर्शन करेंगे ॥ ३७२ ॥

षोडशाष्टौ वरांश्चापि प्राप्स्यसि त्वं महेश्वरात् ।
सपत्नीकाद् यदुश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७३ ॥

यदुश्रेष्ठ! पत्नीसहित महादेवजीसे आप सोलह और आठ वर प्राप्त करेंगे। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७३ ॥
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च नित्यशः ।
विदितं मे महाबाहो प्रसादात् तस्य धीमतः ॥ ३७४ ॥
महाबाहो! बुद्धिमान् महादेवजीके कृपा-प्रसादसे मुझे सदा ही भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालका ज्ञान प्राप्त है ॥ ३७४ ॥
एतान् सहस्रशश्चान्यान् समनुध्यातवान् हरः ।
कस्मात् प्रसादं भगवान् न कुर्यात् तव माधव ॥ ३७५ ॥
माधव! भगवान् हरने यहाँ रहनेवाले इन सहस्रों मुनियोंको कृपापूर्ण हृदयसे अनुगृहीत किया है। फिर आपपर वे अपना कृपाप्रसाद क्यों नहीं प्रकट करेंगे ॥ ३७५ ॥
त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीयः समागमः ।
ब्रह्मण्येनानृशंसेन श्रद्दधानेन चाप्युत ॥ ३७६ ॥
जप्यं तु ते प्रदास्यामि येन द्रक्ष्यसि शंकरम् ।
आप-जैसे ब्राह्मणभक्त, कोमलस्वभाव और श्रद्धालु पुरुषका समागम देवताओंके लिये भी प्रशंसनीय है। मैं आपको जपनेयोग्य मन्त्र प्रदान करूँगा, जिससे आप भगवान् शंकरका दर्शन करेंगे ॥ ३७६ १/२ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
अब्रुवं तमहं ब्रह्मंस्त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ ३७७ ॥
द्रक्ष्ये दितिजसंघानां मर्दनं त्रिदशेश्वरम् ।
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**तब मैंने उनसे कहा—ब्रह्मन्! महामुने! मैं आपके कृपाप्रसादसे दैत्यदलोंका दलन करनेवाले देवेश्वर महादेवजीका दर्शन अवश्य करूँगा ॥ ३७७ १/२ ॥
एवं कथयतस्तस्य महादेवाश्रितां कथाम् ॥ ३७८ ॥
दिनान्यष्टौ ततो जग्मुर्मुहूर्तमिव भारत ।
दिनेऽष्टमे तु विप्रेण दीक्षितोऽहं यथाविधि ॥ ३७९ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार महादेवजीकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहते हुए उन मुनीश्वरके आठ दिन एक मुहूर्तके समान बीत गये। आठवें दिन विप्रवर उपमन्युने विधिपूर्वक मुझे दीक्षा दी ॥
दण्डी मुण्डी कुशी चीरी घृताक्तो मेखली कृतः ।
मासमेकं फलाहारो द्वितीयं सलिलाशनः ॥ ३८० ॥
उन्होंने मेरा सिर मुड़ा दिया। मेरे शरीरमें घी लगाया तथा मुझसे दण्ड, कुशा, चीर एवं मेखला धारण कराया। मैं एक महीनेतक फलाहार करके रहा और दूसरे महीनेमें केवल जलका आहार किया ॥ ३८० ॥

तृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः । एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्वबाहुरतन्द्रितः ॥ ३८१ ॥ तीसरे, चौथे और पाँचवें महीनेमें मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा रहा। आलस्यको अपने पास नहीं आने दिया। उन दिनों वायुमात्र ही मेरा आहार रहा ॥ ३८१ ॥

तेजः सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत । तस्य मध्यगतं चापि तेजसः पाण्डुनन्दन ॥ ३८२ ॥ इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम् । नीलशैलचयप्रख्यं वलाकाभूषिताम्बरम् ॥ ३८३ ॥ भारत! पाण्डुनन्दन! छठे महीनेमें आकाशके भीतर मुझे सहस्रों सूर्योंका-सा तेज दिखायी दिया। उस तेजके भीतर एक और तेजोमण्डल दृष्टिगोचर हुआ, जिसका सर्वांग इन्द्रधनुषसे परिवेष्टित था। विद्युन्माला उसमें झरोखेके समान प्रतीत होती थी। वह तेज नील पर्वतमालाके समान प्रकाशित होता था। उस द्विविध तेजके कारण वहाँका आकाश बकपंक्यितोंसे विभूषित-सा जान पड़ता था ॥ ३८२-३८३ ॥

तत्र स्थितश्च भगवान् देव्या सह महाद्युतिः । तपसा तेजसा कान्त्या दीप्तया सह भार्यया ॥ ३८४ ॥ उस नील तेजके भीतर महातेजस्वी भगवान् शिव तप, तेज, कान्ति तथा अपनी तेजस्विनी पत्नी उमादेवीके साथ विराजमान थे ॥ ३८४ ॥

रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः । सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ॥ ३८५ ॥ उस नील तेजमें पार्वती देवीके साथ स्थित हुए भगवान् महेश्वर ऐसी शोभा पा रहे थे मानो चन्द्रमाके साथ सूर्य श्याम मेघके भीतर विराज रहे हों ॥ ३८५ ॥

संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अपश्यं देवसंघानां गतिमार्तिहरं हरम् ॥ ३८६ ॥ कुन्तीनन्दन! जो सम्पूर्ण देवसमुदायकी गति हैं तथा सबकी पीड़ा हर लेते हैं, उन भगवान् हरको जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे ॥ ३८६ ॥

किरीटिनं गदिनं शूलपाणिं व्याघ्राजिनं जटिलं दण्डपाणिम् । पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं शुभाङ्गदं व्यालयज्ञोपवीतम् ॥ ३८७ ॥ भगवान्‌के मस्तकपर मुकुट था। उनके हाथमें गदा, त्रिशूल और दण्ड शोभा पाते थे। सिरपर जटा थी। उन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा था। पिनाक और वज्र भी उनकी शोभा

बढ़ा रहे थे। उनकी दाढ़ तीखी थी। उन्होंने सुन्दर बाजूबंद पहनकर सर्पमय यज्ञोपवीत धारण कर रखा था॥ ३८७॥

दिव्यां मालामुरसानेकवर्णां
समुद्वहन्तं गुल्फदेशावलम्बाम्।
चन्द्रं यथा परिविष्टं ससंध्यं
वर्षात्यये तद्वदपश्यमेनम्॥ ३८८॥

वे अपने वक्षःस्थलपर अनेक रंगवाली दिव्य माला धारण किये हुए थे, जो गुल्फदेश (घुटनों)-तक लटक रही थी। जैसे शरद्ऋतुमें संध्याकी लालीसे युक्त और घेरेसे घिरे हुए चन्द्रमाका दर्शन होता हो, उसी प्रकार मैंने मालावेष्टित उन भगवान् महादेवजीका दर्शन किया था॥ ३८८॥

प्रमथानां गणैश्चैव समन्तात् परिवारितम्।
शरदीव सुदुष्प्रेक्ष्यं परिविष्टं दिवाकरम्॥ ३८९॥

प्रमथगणोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए महातेजस्वी महादेव परिधिसे घिरे हुए शरत्कालके सूर्यकी भाँति बड़ी कठिनाईसे देखे जाते थे॥ ३८९॥

एकादशशतान्येवं रुद्राणां वृषवाहनम्।
अस्तुवं नियतात्मानं कर्मभिः शुभकर्मिणम्॥ ३९०॥

इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले और कर्मेन्द्रियोंद्वारा शुभकर्मका ही अनुष्ठान करनेवाले महादेवजीकी, जो ग्यारह सौ रुद्रोंसे घिरे हुए थे, मैंने स्तुति की॥ ३९०॥

आदित्या बसवः साध्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ।
विश्वाभिः स्तुतिभिर्देवं विश्वदेवं समस्तुवन्॥ ३९१॥

बारह आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव तथा अश्विनीकुमार—ये भी सम्पूर्ण स्तुतियोंद्वारा सबके देवता महादेवजीकी स्तुति कर रहे थे॥ ३९१॥

शतक्रतुश्च भगवान् विष्णुश्चादितिनन्दनौ।
ब्रह्मा रथन्तरं साम ईरयन्ति भवान्तिके॥ ३९२॥

इन्द्र तथा वामनरूपधारी भगवान् विष्णु—ये दोनों अदितिकुमार और ब्रह्माजी भगवान् शिवके निकट रथन्तर सामका गान कर रहे थे॥ ३९२॥

योगीश्वराः सुबहवो योगदं पितरं गुरुम्।
ब्रह्मर्षयश्च ससुतास्तथा देवर्षयश्च वै॥ ३९३॥

बहुत-से योगीश्वर, पुत्रोंसहित ब्रह्मर्षि तथा देवर्षिगण भी योगसिद्धि प्रदान करनेवाले, पिता एवं गुरुरूप महादेवजीकी स्तुति करते थे॥ ३९३॥

(महाभूतानि च्छन्दांसि प्रजानां पतयो मखाः।
सरितः सागरा नागा गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥
विद्याधराश्च गीतेन वाद्यनृत्तादिणार्चयन्।

तेजस्विनां मध्यगतं तेजोरार्शिं जगत्पतिम् ।।) महाभूत, छन्द, प्रजापति, यज्ञ, नदी, समुद्र, नाग, गन्धर्व, अप्सरा तथा विद्याधर—ये सब गीत, वाद्य तथा नृत्य आदिके द्वारा तेजस्वियोंके मध्यभागमें विराजमान तेजोरारि जगदीश्वर शिवकी पूजा-अर्चा करते थे ।।

पृथिवी चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।
मासार्धमासा ऋतवो रात्रिः संवत्सराः क्षणाः ।। ३९४ ।।
मुहूर्ताश्च निमेषाश्च तथैव युगपर्ययाः ।
दिव्या राजन् नमस्यन्ति विद्याः सत्त्वविदस्तथा ।। ३९५ ।।
राजन्! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, नक्षत्र, ग्रह, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, संवत्सर, क्षण, मुहूर्त, निमेष, युगचक्र तथा दिव्य विद्याएँ—ये सब (मूर्तिमान होकर) शिवजीको नमस्कार कर रहे थे। वैसे ही सत्त्ववेत्ता पुरुष भी भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ।। ३९४-३९५ ।।

सनत्कुमारो देवाश्च इतिहासास्तथैव च ।
मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।। ३९६ ।।
मनवः सप्त सोमश्च अथर्वा सबृहस्पतिः ।
भृगुर्दक्षः कश्यपश्च वसिष्ठः काश्य एव च ।। ३९७ ।।
छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणाः पावको हविः ।
यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर ।। ३९८ ।।
प्रजानां पालकाः सर्वे सरितः पन्नगा नगाः ।
देवानां मातरः सर्वा देवपत्न्यः सकन्यकाः ।। ३९९ ।।
सहस्राणि मुनीनां च अयुतान्यर्बुदानि च ।
नमस्यन्ति प्रभुं शान्तं पर्वताः सागरा दिशः ।। ४०० ।।
युधिष्ठिर! सनत्कुमार, देवगण, इतिहास, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, सात मनु, सोम, अथर्वा, बृहस्पति, भृगु, दक्ष, कश्यप, वसिष्ठ, काश्य, छन्द, दीक्षा, यज्ञ, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य, यज्ञोपयोगी मूर्तिमान् द्रव्य, समस्त प्रजापालकगण, नदी, नग, नाग, सम्पूर्ण देवमाताएँ, देवपत्नियां, देवकन्याएँ, सहस्रों, लाखों, अरबों महर्षि, पर्वत, समुद्र और दिशाएँ—ये सब-के-सब शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ।। ३९६—४०० ।।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतवादित्रकोविदाः ।
दिव्यतालेषु गायन्तः स्तुवन्ति भवमद्भुतम् ।। ४०१ ।।
गीत और वाद्यकी कलामें कुशल अप्सराएँ तथा गन्धर्व दिव्य तालपर गाते हुए अद्भुत शक्तिशाली भगवान् भवकी स्तुति करते थे ।। ४०१ ।।

विद्याधरा दानवाश्च गुह्यका राक्षसास्तथा ।
सर्वाणि चैव भूतानि स्थावराणि चराणि च ।

नमस्यन्ति महाराज वाङ्मनःकर्मभिर्विभुम् ॥ ४०२ ॥
महाराज! विद्याधर, दानव, गुह्यक, राक्षस तथा समस्त चराचर प्राणी मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ४०२ ॥
पुरस्ताद् धिष्ठितः शर्वो ममासीत् त्रिदशेश्वरः ।
पुरस्ताद् धिष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत ॥ ४०३ ॥
सप्रजापतिशक्रान्तं जगन्मामभ्युदैक्षत ।
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत् तदा ॥ ४०४ ॥
देवेश्वर शिव मेरे सामने खड़े थे। भारत! मेरे सामने महादेवजीको खड़ा देख प्रजापतियोंसे लेकर इन्द्रतक सारा जगत् मेरी ओर देखने लगा। किंतु उस समय महादेवजीको देखनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी थी ॥ ४०३-४०४ ॥
ततो मामब्रवीद् देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ।
त्वया ह्याराधितश्चाहं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४०५ ॥
तब भगवान् शिवने मुझसे कहा—'श्रीकृष्ण! मुझे देखो, मुझसे वार्तालाप करो। तुमने पहले भी सैकड़ों और हजारों बार मेरी आराधना की है ॥ ४०५ ॥
त्वत्समो नास्ति मे कश्चित् त्रिषु लोकेषु वै प्रियः ।
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता ह्युमा तदा ।
ततोऽहमब्रुवं स्थाणुं स्तुतं ब्रह्मादिभिः सुरैः ॥ ४०६ ॥
'तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है।' जब मैंने मस्तक झुकाकर महादेवजीको प्रणाम किया, तब देवी उमाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा प्रशंसित भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा ॥ ४०६ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने
ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति ।
तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च
त्वामेव सत्यं च वदन्ति सन्तः ॥ ४०७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— सबके कारणभूत सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है। ऋषि आपको ब्रह्माजीका भी अधिपति बताते हैं। साधु पुरुष आपको ही तप, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्यस्वरूप कहते हैं ॥ ४०७ ॥
त्वं वै ब्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः ।
धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ॥ ४०८ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, वरुण, अग्नि, मनु, शिव, धाता, विधाता और त्वष्टा हैं। आप ही सब ओर मुखवाले परमेश्वर हैं ॥ ४०८ ॥

त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्वया सृष्टमिदं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ४०९ ॥
समस्त चराचर प्राणी आपहीसे उत्पन्न हुए हैं। आपने ही स्थावर-जंगम प्राणियोंसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है ॥ ४०९ ॥

यानीन्द्रियाणीह मनश्च कृत्स्नं
 ये वायवः सप्त तथैव चाग्नयः ।
ये देवसंस्थास्तवदेवताश्च
 तस्मात् परं त्वामृषयो वदन्ति ॥ ४१० ॥
यहाँ जो-जो इन्द्रियाँ, जो सम्पूर्ण मन, जो समस्त वायु और सात अग्नियाँ* हैं, जो देवसमुदायके अंदर रहनेवाले स्तवनके योग्य देवता हैं, उन सबसे परे आपकी स्थिति है। ऋषिगण आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ४१० ॥

वेदाश्च यज्ञाः सोमश्च दक्षिणा पावको हविः ।
यज्ञोपगं च यत् किंचिद् भगवांस्तदसंशयम् ॥ ४११ ॥
वेद, यज्ञ, सोम, दक्षिणा, अग्नि, हविष्य तथा जो कुछ भी यज्ञोपयोगी सामग्री है, वह सब आप भगवान् ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४११ ॥

इष्टं दत्तमधीतं च व्रतानि नियमाश्च ये ।
ह्रीः कीर्तिः श्रीर्धृतिस्तुष्टिः सिद्धिश्चैव तदर्पणी ॥ ४१२ ॥
यज्ञ, दान, अध्ययन, व्रत और नियम, लज्जा, कीर्ति, श्री, धृति, तुष्टि तथा सिद्धि—ये सब आपके स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाले हैं ॥ ४१२ ॥

कामः क्रोधो भयं लोभो मदः स्तम्भोऽथ मत्सरः ।
आधयो व्याधयश्चैव भगवंस्तनवस्तव ॥ ४१३ ॥
भगवन्! काम, क्रोध, भय, लोभ, मद, स्तब्धता, मात्सर्य, आधि और व्याधि—ये सब आपके ही शरीर हैं ॥

कृतिर्विकारः प्रणयः प्रधानं बीजमव्ययम् ।
मनसः परमा योनिः प्रभावश्चापि शाश्वतः ॥ ४१४ ॥
क्रिया, विकार, प्रणय, प्रधान, अविनाशी बीज, मनका परम कारण और सनातन प्रभाव—ये भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ ४१४ ॥

अव्यक्तः पावनोऽचिन्त्यः सहस्रांशुर्हिरण्मयः ।
आदिर्गणानां सर्वेषां भवान् वै जीविताश्रयः ॥ ४१५ ॥
अव्यक्त, पावन, अचिन्त्य, हिरण्मय सूर्यस्वरूप आप ही समस्त गणोंके आदिकारण तथा जीवनके आश्रय हैं ॥ ४१५ ॥

महानात्मा मतिर्ब्रह्मा विश्वः शम्भुः स्वयम्भुवः ।
बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च संवित् ख्यातिर्धृतिःस्मृतिः ॥ ४१६ ॥

पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । त्वां बुद्ध्वा ब्राह्मणो वेदात् प्रमोहं विनियच्छति ॥ ४१७ ॥ महान्, आत्मा, मति, ब्रह्मा, विश्व, शम्भु, स्वयम्भू, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति—इन चौदह पर्यायवाची शब्दोंद्वारा आप परमात्मा ही प्रकाशित होते हैं। वेदसे आपका बोध प्राप्त करके ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण मोहका सर्वथा नाश कर देता है ॥

हृदयं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिस्तुतः । सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥ ४१८ ॥ ऋषियोंद्वारा प्रशंसित आप ही सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें स्थित क्षेत्रज्ञ हैं। आपके सब ओर हाथ-पैर हैं। सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ४१८ ॥

सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि । फलं त्वमसि तिग्मांशोर्निमेषादिषु कर्मसु ॥ ४१९ ॥ आपके सब ओर कान हैं और जगत्में आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। जीवके आँख मीजने और खोलनेसे लेकर जितने कर्म हैं, उनके फल आप ही हैं ॥ ४१९ ॥

त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संश्रितः । अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ४२० ॥ आप अविनाशी परमेश्वर ही सूर्यकी प्रभा और अग्निकी ज्वाला हैं। आप ही सबके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं। अणिमा, महिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ तथा ज्योति भी आप ही हैं ॥ ४२० ॥

त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥ ४२१ ॥ आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है। जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ॥ ४२१ ॥

यस्त्वां ध्रुवं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं पुरुषं च विग्रहम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ ४२२ ॥ जो आपको अपनी हृदयगुहामें स्थित आत्मा, प्रभु, पुराण-पुरुष, मूर्तिमान् परब्रह्म, हिरण्मय पुरुष और बुद्धिमानोंकी परम गतिरूपमें निश्चित भावसे जानता है, वही बुद्धिमान् लौकिक बुद्धिका उल्लंघन करके परमात्म-भावमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४२२ ॥

विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं त्वां च मूर्तितः । प्रधानविधियोगस्थस्त्वामेव विशते बुधः ॥ ४२३ ॥

विद्वान् पुरुष महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा—इन सात सूक्ष्म तत्त्वोंको जानकर आपके स्वरूपभूत छः* अंगोंका बोध प्राप्त करके प्रमुख विधियोंका आश्रय ले आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। ४२३ ।।

एवमुक्ते मया पार्थ भवे चार्तिविनाशने ।
चराचरं जगत् सर्वं सिंहनादं तदाकरोत् ।। ४२४ ।।
कुन्तीनन्दन! जब मैंने सबकी पीड़ाका नाश करनेवाले महादेवजीकी इस प्रकार स्तुति की, तब यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सिंहनाद कर उठा ।। ४२४ ।।

तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च
नागाः पिशाचाः पितरो वयांसि ।
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे
महर्षयश्चैव तदा प्रणेमुः ।। ४२५ ।।
ब्राह्मणोंके समुदाय, देवता, असुर, नाग, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षसगण, समस्त भूतगण तथा महर्षि भी उस समय भगवान् शिवको प्रणाम करने लगे ।। ४२५ ।।

मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् ।
राशयो निपतन्ति स्म वायुश्च सुसुखो ववौ ।। ४२६ ।।
मेरे मस्तकपर ढेर-के-ढेर दिव्य सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी तथा अत्यन्त सुखदायक हवा चलने लगी ।। ४२६ ।।

निरीक्ष्य भगवान् देवीं ह्युमां मां च जगद्धितः ।
शतक्रतुं चाभिवीक्ष्य स्वयं मामाह शङ्करः ।। ४२७ ।।
जगत्के हितैषी भगवान् शंकरने उमादेवीकी ओर देखकर मेरी ओर देखा और फिर इन्द्रपर दृष्टिपात करके स्वयं मुझसे कहा— ।। ४२७ ।।

विदुः कृष्ण परां भक्तिमस्मासु तव शत्रुहन् ।
क्रियतामात्मनः श्रेयः प्रीतिर्हि त्वयि मे परा ।। ४२८ ।।
‘शत्रुहन् श्रीकृष्ण! मुझमें जो तुम्हारी पराभक्ति है, उसे सब लोग जानते हैं, अब तुम अपना कल्याण करो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा विशेष प्रेम है ।। ४२८ ।।

वृणीष्वाष्टौ वरान् कृष्ण दातास्मि तव सत्तम ।
ब्रूहि यादवशार्दूल यानिच्छसि सुदुर्लभान् ।। ४२९ ।।
‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! यदुकुलसिंह श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें आठ वर देता हूँ। तुम जिन परम दुर्लभ वरोंको पाना चाहते हो, उन्हें बताओ’ ।। ४२९ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने
चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वका
आख्यानविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।
(दाक्षिणात्य पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं)


* गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य—ये पाँच वैदिक अग्नियाँ हैं। स्मार्त छठी और लौकिक सातवीं अग्नि है।
* सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति और अनन्त शक्ति—ये महेश्वरके स्वरूपभूत छः अङ्ग बताये गये हैं।

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चदशोऽध्यायः

शिव और पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान और उपमन्युके द्वारा महादेवजीकी महिमा

श्रीकृष्ण उवाच

मूर्ध्ना निपत्य नियतस्तेजःसंनिचये ततः ।
परमं हर्षमागत्य भगवन्तमथाब्रुवम् ॥ १ ॥
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**भारत! तदनन्तर मनको वशमें करके तेजोराशिमें स्थित महादेवजीको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बड़े हर्षमें भरकर मैंने उन भगवान् शिवसे कहा— ॥ १ ॥

धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातं
यशस्तथाग्र्यं परमं बलं च ।
योगप्रियत्वं तव संनिकर्षं
वृणे सुतानां च शतं शतानि ॥ २ ॥
'धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिति, युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेकी क्षमता, श्रेष्ठ यश, उत्तम बल, योगबल, सबका प्रिय होना, आपका सांनिध्य तथा दस हजार पुत्र—ये ही आठ वर मैं माँग रहा हूँ' ॥ २ ॥

एवमस्त्विति तद्वाक्यं मयोक्तः प्राह शङ्करः ।
ततो मां जगतो माता धारिणी सर्वपावनी ॥ ३ ॥
उवाचोमा प्रणिहिता शर्वाणी तपसां निधिः ।
दत्तो भगवता पुत्रः साम्बो नाम तवानघ ॥ ४ ॥
मेरे इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकरने कहा, 'एवमस्तु—ऐसा ही हो।' तब सबका धारण-पोषण करनेवाली सर्वपावनी तपोनिधि रुद्रपत्नी जगदम्बा उमादेवी एकाग्रचित्त होकर बोलीं—'निष्पाप श्यामसुन्दर! भगवान्‌ने तुम्हें साम्ब नामक पुत्र दिया है ॥ ३-४ ॥

मत्तोऽप्यष्टौ वरानिष्टान् गृहाण त्वं ददामि ते ।
प्रणम्य शिरसा सा च मयोक्ता पाण्डुनन्दन ॥ ५ ॥
'अब मुझसे भी अभीष्ट आठ वर माँग लो। मैं तुम्हें वे वर प्रदान करती हूँ।' पाण्डुनन्दन! तब मैंने जगदम्बाके चरणोंमें सिरसे प्रणाम करके उनसे कहा— ॥ ५ ॥

द्विजेष्वकोपं पितृतः प्रसादं
शतं सुतानां परमं च भोगम् ।
कुले प्रीतिं मातृतश्च प्रसादं