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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रका रूप धारण करके पदार्पण किया। उस समय उनके सहस्र नेत्र शोभा पा रहे थे। उन महायशस्वी इन्द्रके हाथमें वज्र प्रकाशित हो रहा था॥ १७२ ॥

सुधावदातं रक्ताक्षं स्तब्धकर्णं मदोत्कटम्।
आवेष्टितकरं घोरं चतुर्दंष्ट्रं महाग़जम्॥ १७३॥
समास्थितः स भगवान् दीप्यमानः स्वतेजसा।
आजगाम किरीटी तु हारकेयूरभूषितः॥ १७४॥

वे भगवान् इन्द्र लाल नेत्र और खड़े कानवाले, सुधाके समान उज्ज्वल, मुड़ी हुई सूँड़से सुशोभित, चार दाँतोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर मदसे उन्मत्त महान् गजराज ऐरावतकी पीठपर बैठकर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ पधारे। उनके मस्तकपर मुकुट, गलेमें हार और भुजाओंमें केयूर शोभा दे रहे थे॥ १७३-१७४॥

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि।
सेव्यमानोऽप्सरोभिश्च दिव्यगन्धर्वनादितैः॥ १७५॥

सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था। अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं और दिव्य गन्धर्वोंके संगीतकी मनोरम ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी॥ १७५॥

ततो मामाह देवेन्द्रस्तुष्टस्तेऽहं द्विजोत्तम।
वरं वृणीष्व मत्तःस्त्वं यत् ते मनसि वर्तते॥ १७६॥
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम्।
अब्रुवंश्च तदा हृष्टो देवराजमिदं वचः॥ १७७॥

उस समय देवराज इन्द्रने मुझसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो वर लेनेकी इच्छा हो, वही मुझसे माँग लो।' इन्द्रकी बात सुनकर मेरा मन प्रसन्न नहीं हुआ। मैंने ऊपरसे हर्ष प्रकट करते हुए देवराजसे यह कहा— ॥ १७६-१७७॥

नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात्।
महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ १७८॥

'सौम्य! मैं महादेवजीके सिवा तुमसे या दूसरे किसी देवतासे वर लेना नहीं चाहता। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ॥ १७८॥

सत्यं सत्यं हि नः शक्र वाक्यमेतत् सुनिश्चितम्।
न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते॥ १७९॥

'इन्द्र! हमारा यह कथन सत्य है, सत्य है और सुनिश्चित है। मुझे महादेवजीको छोड़कर और कोई बात अच्छी ही नहीं लगती है॥ १७९॥

पशुपतिवचनाद् भवामि सद्यः
कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाखः।
अपशुपतिवरप्रसादजा मे

त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ॥ १८० ॥ 'मैं भगवान् पशुपतिके कहनेसे तत्काल प्रसन्नतापूर्वक कीट अथवा अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्ष भी हो सकता हूँ; परंतु भगवान् शिवसे भिन्न दूसरे किसीके वर-प्रसादसे मुझे त्रिभुवनका राज्यवैभव प्राप्त हो रहा हो तो वह भी अभीष्ट नहीं है ॥ १८० ॥

जन्म श्वपाकमध्येऽपि मेऽस्तु हरचरणवन्दनरतस्य । मा वानीश्वरभक्तो भवानि भवनेऽपि शक्रस्य ॥ १८१ ॥ 'यदि मुझे भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंकी वन्दनामें तत्पर रहनेका अवसर मिले तो मेरा जन्म चाण्डालोंमें भी हो जाय तो यह मुझे सहर्ष स्वीकार है। परंतु भगवान् शिवकी अनन्यभक्तिसे रहित होकर मैं इन्द्रके भवनमें भी स्थान पाना नहीं चाहता ॥ १८१ ॥

वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य । भवति हि सुरासुरगुरौ यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥ १८२ ॥ 'कोई जल या हवा पीकर ही रहनेवाला क्यों न हो, जिसकी सुरासुरगुरु भगवान् विश्वनाथमें भक्ति न हो, उसके दुःखोंका नाश कैसे हो सकता है? ॥ १८२ ॥

अलमन्याभिस्तेषां कथाभिरप्यन्यधर्मयुक्ताभिः । येषां न क्षणमपि रुचितो हरचरणस्मरणविच्छेदः ॥ १८३ ॥ 'जिन्हें क्षणभरके लिये भी भगवान् शिवके चरणारविन्दोंके स्मरणका वियोग अच्छा नहीं लगता, उन पुरुषोंके लिये अन्यान्य धर्मोंसे युक्त दूसरी-दूसरी सारी कथाएँ व्यर्थ हैं ॥ १८३ ॥

हरचरणनिरतमतिना भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य । संसारभयं न भवति हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥ १८४ ॥ 'कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये। शिव-भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ॥ १८४ ॥

दिवसं दिवसार्धं वा मुहूर्तं वा क्षणं लवम् । न ह्यलब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शङ्करे ॥ १८५ ॥

‘जिसपर भगवान् शिवकी कृपा नहीं है, उस मनुष्यकी एक दिन, आधे दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण या एक लवके लिये भी भगवान् शंकरमें भक्ति नहीं होती है ॥ १८५ ॥ अपि कीटः पतङ्गो वा भवेयं शङ्कराज्ञया । न तु शक्र त्वया दत्तं त्रैलोक्यमपि कामये ॥ १८६ ॥ श्वापि महेश्वरवचनाद् भवामि स हि नः परः कामः । त्रिदशगणराज्यमपि खलु नेच्छाम्यमहेश्वरैराज्ञप्तम् ॥ १८७ ॥ ‘शक्र! मैं भगवान् शंकरकी आज्ञासे कीट या पतंग भी हो सकता हूँ, परंतु तुम्हारा दिया हुआ त्रिलोकीका राज्य भी नहीं लेना चाहता। महेश्वरके कहनेसे यदि मैं कुत्ता भी हो जाऊँ तो उसे मैं सर्वोत्तम मनोरथकी पूर्ति समझूँगा; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरे किसीसे प्राप्त हुए देवताओंके राज्यको लेनेकी भी मुझे इच्छा नहीं है ॥ १८६-१८७ ॥ न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं न ब्रह्मलोकं न च निष्कलत्वम् । न सर्वकामानखिलान् वृणोमि हरस्य दासत्वमहं वृणोमि ॥ १८८ ॥ ‘न तो मैं स्वर्गलोक चाहता हूँ, न देवताओंका राज्य पानेकी अभिलाषा रखता हूँ। न ब्रह्मलोककी इच्छा करता हूँ और न निर्गुण ब्रह्मका सायुज्य ही प्राप्त करना चाहता हूँ। भूमण्डलकी समस्त कामनाओंको भी पानेकी मेरी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल भगवान् शिवकी दासताका ही वरण करता हूँ ॥ १८८ ॥ यावच्छशाङ्कधवलामलबद्धमौलि- र्न प्रीयते पशुपतिर्भगवान् म्मेशः । तावज्जरामरणजन्मशताभिघातै- र्दुःखानि देहविहितानि समुद्वहामि ॥ १८९ ॥ ‘जिनके मस्तकपर अर्द्धचन्द्रमय उज्ज्वल एवं निर्मल मुकुट बँधा हुआ है, वे मेरे स्वामी भगवान् पशुपति जबतक प्रसन्न नहीं होते हैं, तबतक मैं जरा-मृत्यु और जन्मके सैकड़ों आघातोंसे प्राप्त होनेवाले दैहिक दुःखोंका भार ढोता रहूँगा ॥ १८९ ॥ दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं त्रिभुवनसारमसारमाद्यमेकम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥ १९० ॥ ‘जो अपने नेत्रभूत सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी प्रभासे उद्भासित होते हैं, त्रिभुवनके साररूप हैं, जिनसे बढ़कर सारतत्त्व दूसरा नहीं है, जो जगत्‌के आदिकारण, अद्वितीय तथा

अजर-अमर हैं, उन भगवान् रुद्रको भक्तिभावसे प्रसन्न किये बिना कौन पुरुष इस संसारमें शान्ति पा सकता है ॥ १९० ॥ यदि नाम जन्म भूयो भवति मदीयैः पुनर्दोषैः । तस्मिंस्तस्मिञ्जन्मनि भवे भवेन्मेऽक्षया भक्तिः ॥ १९१ ॥ 'यदि मेरे दोषोंसे मुझे बारंबार इस जगत्में जन्म लेना पड़े तो मेरी यही इच्छा है कि उस-उस प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिवमें मेरी अक्षय भक्ति हो' ॥ १९१ ॥

शक्र उवाच

कः पुनर्भवने हेतुरीशे कारणकारणे । येन शर्वाद्दृतेऽन्यस्मात् प्रसादं नाभिकाङ्क्षसि ॥ १९२ ॥ इन्द्रने पूछा— ब्रह्मन्! कारणके भी कारण जगदीश्वर शिवकी सत्तामें क्या प्रमाण है, जिससे तुम शिवके अतिरिक्त दूसरे किसी देवताका कृपा-प्रसाद ग्रहण करना नहीं चाहते? ॥ १९२ ॥

उपमन्युरुवाच

सदसद् व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः । नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९३ ॥ उपमन्युने कहा— देवराज! ब्रह्मवादी महात्मा जिन्हें विभिन्न मतोंके अनुसार सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त, नित्य, एक और अनेक कहते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वर माँगेंगे ॥ १९३ ॥

अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम् । आत्मानं परमं यस्माद् वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९४ ॥ जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, ज्ञान ही जिनका ऐश्वर्य है तथा जो चित्तकी चिन्तनशक्तिसे भी परे हैं और इन्हीं कारणोंसे जिन्हें परमात्मा कहा जाता है, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करेंगे ॥ १९४ ॥

ऐश्वर्यं सकलं यस्मादनुत्पादितमव्ययम् । अबीजाद् बीजसम्भूतं वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९५ ॥ योगीलोग महादेवजीके समस्त ऐश्वर्यको ही नित्य सिद्ध और अविनाशी बताते हैं। वे कारणरहित हैं और उन्हींसे समस्त कारणोंकी उत्पत्ति हुई है। अतः महादेवजीकी ऐसी महिमा है, इसलिये हम उन्हींसे वर माँगते हैं ॥ १९५ ॥

तमसः परमं ज्योतिस्तपस्तद्वृत्तिनां परम् । यं ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९६ ॥

जो अज्ञानान्धकारसे परे चिन्मय परमज्योतिःस्वरूप हैं, तपस्वीजनोंके परम तप हैं तथा जिनका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं, उन्हीं भगवान् शिवसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ।। १९६ ।। भूतभावनभावज्ञं सर्वभूताभिभावनम् । सर्वगं सर्वदं देवं पूजयामि पुरन्दर ।। १९७ ।। पुरंदर! जो सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक तथा उनके मनोभावोंको जाननेवाले हैं, समस्त प्राणियोंके पराभव (विलय)-के भी जो एकमात्र स्थान हैं तथा जो सर्वव्यापी और सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, उन्हीं महादेवजीकी मैं पूजा करता हूँ ।। १९७ ।। हेतुवादैर्विनिर्मुक्तं सांख्ययोगार्थदं परम् । यमुपासन्ति तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणीमहे ।। १९८ ।। जो युक्तिवादसे दूर हैं, जो अपने भक्तोंको सांख्य और योगका परम प्रयोजन (आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति और ब्रह्मसाक्षात्कार) प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञ पुरुष जिनकी सदा उपासना करते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वरके लिये प्रार्थना करते हैं ।। १९८ ।। मघवन् मधवात्मानं यं वदन्ति सुरेश्वरम् । सर्वभूतगुरुं देवं वरं तस्माद् वृणीमहे ।। १९९ ।। मघवन्! ज्ञानी पुरुष जिन्हें देवेश्वर इन्द्ररूप तथा सम्पूर्ण भूतोंके गुरुदेव बताते हैं, उन्हींसे हम वर लेना चाहते हैं ।। १९९ ।। यः पूर्वमसृजद् देवं ब्रह्माणं लोकभावनम् । अण्डमाकाशमापूर्य वरं तस्माद् वृणीमहे ।। २०० ।। जिन्होंने पूर्वकालमें आकाशव्यापी ब्रह्माण्ड एवं लोकस्रष्टा देवेश्वर ब्रह्माको उत्पन्न किया, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ।। २०० ।। अग्निरापोऽनिलः पृथ्वी खं बुद्धिश्च मनो महान् । स्रष्टा चैषां भवेद् योऽन्यो ब्रूहि कः परमेश्वरात् ।। २०१ ।। देवराज! जो अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—इन सबका स्रष्टा हो, वह परमेश्वरसे भिन्न दूसरा कौन पुरुष है? यह बताओ ।। मनो मतिरहंकारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । ब्रूहि चैषां भवेच्छक्र कोऽन्योऽस्ति परं शिवात् ।। २०२ ।। शक्र! जो मन, बुद्धि, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा और दस इन्द्रिय—इन सबकी सृष्टि कर सके, ऐसा कौन पुरुष है जो भगवान् शिवसे भिन्न अथवा उत्कृष्ट हो? यह बताओ ।। २०२ ।। स्रष्टारं भुवनस्येह वदन्तीह पितामहम् । आराध्य स तु देवेशमश्नुते महतीं श्रियम् ।। २०३ ।।

ज्ञानी महात्मा ब्रह्माजीको ही सम्पूर्ण विश्वका स्रष्टा बताते हैं। परंतु वे देवेश्वर

महादेवजीकी आराधना करके ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं ॥ २०३ ॥

भगवत्युत्तमैश्वर्यं ब्रह्मविष्णुपुरोगमम् ।

विद्यते वै महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०४ ॥

जिस भगवान्‌में ब्रह्मा और विष्णुसे भी उत्तम ऐश्वर्य है, वह परमेश्वर महादेवके सिवा

दूसरा कौन है? यह बताओ तो सही ॥ २०४ ॥

दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनात् ।

कोऽन्यः शक्नोति देवेशाद् दितेः सम्पादितुं सुतान् ॥ २०५ ॥

दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर हिरण्यकशिपु आदिमें जो तीनों लोकोंपर आधिपत्य

स्थापित करने और अपने शत्रुओंको कुचल देनेकी शक्ति सुनी गयी है, उसपर दृष्टिपात

करके मैं यह पूछ रहा हूँ कि देवेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो दितिके पुत्रोंको

इस प्रकार अनुपम ऐश्वर्यसे सम्पन्न कर सके? ॥

दिक्कालसूर्यतेजांसि ग्रहवाग्विन्दुतारकाः ।

विद्धि त्वेते महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०६ ॥

दिशा, काल, सूर्य, अग्नि, अन्य ग्रह, वायु, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये महादेवजीकी

कृपासे ही ऐसे प्रभावशाली हुए हैं। इस बातको तुम जानते हो, अतः तुम्हीं बताओ, परमेश्वर

महादेवजीके सिवा दूसरा कौन ऐसी अचिन्त्य शक्तिसे सम्पन्न है? ॥ २०६ ॥

अथोत्पत्तिविनाशे वा यज्ञस्य त्रिपुरस्य वा ।

दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनः ॥ २०७ ॥

यज्ञकी उत्पत्ति और त्रिपुरका विनाश भी उन्हींके द्वारा सम्पन्न हुआ है। प्रधान-प्रधान

दैत्यों और दानवोंको आधिपत्य प्रदान करने और शत्रुमर्दनाकी शक्ति देनेवाले भी वे ही

हैं ॥ २०७ ॥

किं चात्र बहुभिः सूक्तैर्हेतुवादैः पुरंदर ।

सहस्रनयनं दृष्ट्वा त्वामेव सुरसत्तम ॥ २०८ ॥

पूजितं सिद्धगन्धर्वैर्देवैश्च ऋषिभिस्तथा ।

देवदेवप्रसादेन तत् सर्वं कुशिकोत्तम ॥ २०९ ॥

सुरश्रेष्ठ पुरंदर! कौशिकवंशावतंस इन्द्र! यहाँ बहुत-सी युक्तियुक्त सूक्तियोंको सुनानेसे

क्या लाभ? आप जो सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित हैं तथा आपको देखकर सिद्ध, गन्धर्व, देवता

और ऋषि जो सम्मान प्रदर्शित करते हैं, वह सब देवाधिदेव महादेवके प्रसादसे ही सम्भव

हुआ है ॥ २०८-२०९ ॥

अव्यक्तमुक्तकेशाय सर्वगस्येदमात्मकम् ।

चेतनाचेतनाद्येषु शक्र विद्धि महेश्वरात् ॥ २१० ॥

इन्द्र! चेतन और अचेतन आदि समस्त पदार्थोंमें 'यह ऐसा है' इस प्रकारका जो लक्षण देखा जाता है, वह सब अव्यक्त, मुक्तकेश एवं सर्वव्यापी महादेवजीके ही प्रभावसे प्रकट है; अतएव सब कुछ महेश्वरसे ही उत्पन्न हुआ है—ऐसा समझो ॥ २१० ॥

भुवाद्येषु महान्तेषु लोकालोकान्तरेषु च । द्वीपस्थानेषु मेरोश्च विभवेष्वन्तरेषु च ॥ २११ ॥ भगवन् मघवन् देवं वदन्ते तत्त्वदर्शिनः ।

भगवान् देवराज! भूलोकसे लेकर महर्लोकतक समस्त लोक-लोकान्तरोंमें, पर्वतके मध्यभागमें, सम्पूर्ण द्वीपस्थानोंमें, मेरु पर्वतके वैभवपूर्ण प्रान्तोंमें सर्वत्र ही तत्त्वदर्शी पुरुष महादेवजीकी स्थिति बताते हैं ॥ २११ १/२ ॥

यदि देवाः सुराः शक्र पश्यन्त्यन्यां भवाद् गतिम् ॥ २१२ ॥ किं न गच्छन्ति शरणं मर्दिताश्चासुरैः सुराः ।

शक्र! यदि तेजस्वी देवगण महादेवजीके सिवा दूसरा कोई सहारा देखते हैं तो असुरोंद्वारा कुचले जानेपर वे उसीकी शरणमें क्यों नहीं जाते हैं? ॥ २१२ १/२ ॥

अभिघातेषु देवानां सयक्षोरगरक्षसाम् ॥ २१३ ॥ परस्परविनाशेषु स्वस्थानैश्वर्यदो भवः ।

देवता, यक्ष, नाग और राक्षस—इनमें जब संघर्ष होता और परस्पर एक-दूसरेसे विनाशका अवसर उपस्थित होता है तब उन्हें अपने स्थान और ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिव ही हैं ॥ २१३ १/२ ॥

अन्धकस्याथ शुक्रस्य दुन्दुभेर्महिषस्य च ॥ २१४ ॥ यक्षेन्द्रबलरक्षःसु निवातकवचेषु च । वरदानावघाताय ब्रूहि कोऽन्यो महेश्वरात् ॥ २१५ ॥

बताओ तो सही, अन्धकको, शुक्रको, दुन्दुभिको, महिषको, यक्षराज कुबेरकी सेनाके राक्षसोंको तथा निवातकवच नामक दानवोंको वरदान देने और उनका विनाश करनेमें भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरा कौन समर्थ है? ॥ २१४-२१५ ॥

सुरासुरगुरोर्वक्त्रे कस्य रेत: पुरा हुतम् । कस्य वान्यस्य रेतस्तद् येन हैमो गिरिः कृतः ॥ २१६ ॥

पूर्वकालमें महादेवजीके सिवा दूसरे किस देवताके वीर्यकी देवासुरगुरु अग्निके मुखमें आहुति दी गयी थी? जिसके द्वारा सुवर्णमय मेरुगिरिका निर्माण हुआ, वह भगवान् शिवके सिवा और किस देवताका वीर्य था? ॥ २१६ ॥

दिग्वासाः कीर्त्यते कोऽन्यो लोके कश्चोध्वरेतसः । कस्य चार्धे स्थिता कान्ता अनङ्गः केन निर्जितः ॥ २१७ ॥

दूसरा कौन दिगम्बर कहलाता है? संसारमें दूसरा कौन ऊर्ध्वरेता है? किसके आधे शरीरमें धर्मपत्नी स्थित रहती है तथा किसने कामदेवको परास्त किया है? ॥

ब्रूहीन्द्र परमं स्थानं कस्य देवैः प्रशस्यते ।

श्मशाने कस्य क्रीडार्थं नृत्ते वा कोऽभिभाष्यते ॥ २१८ ॥ इन्द्र! बताओ तो सही, किसके उत्कृष्ट स्थानकी देवताओंद्वारा प्रशंसा की जाती है? किसकी क्रीड़ाके लिये श्मशानभूमिमें स्थान नियत किया गया है? तथा ताण्डव-नृत्यमें कौन सर्वोपरि बताया जाता है ॥ २१८ ॥

कस्यैश्वर्यं समानं च भूतैः को वापि क्रीडते । कस्य तुल्यबला देव गणाश्चैश्वर्यदर्पिताः ॥ २१९ ॥ भगवान् शंकरके समान दूसरे किसका ऐश्वर्य है? कौन भूतोंके साथ क्रीड़ा करता है? देव! किसके पार्षदगण स्वामीके समान ही बलवान् और ऐश्वर्यपर अभिमान करनेवाले हैं? ॥ २१९ ॥

घुष्यते ह्यचलं स्थानं कस्य त्रैलोक्यपूजितम् । वर्षते तपते कोऽन्यो ज्वलते तेजसा च कः ॥ २२० ॥ किसका स्थान तीनों लोकोंमें पूजित और अविचल बताया जाता है। भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन वर्षा करता है? कौन तपता है? और कौन अपने तेजसे प्रज्वलित होता है? ॥ २२० ॥

कस्मादोषधिसम्पत्तिः को वा धारयते वसु । प्रकामं क्रीडते को वा त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ २२१ ॥ किससे ओषधियाँ—खेती-बारी या शस्य-सम्पत्ति बढ़ती है? कौन धनका धारण-पोषण करता है? कौन चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें इच्छानुसार क्रीड़ा करता है? ॥ २२१ ॥

ज्ञानसिद्धिक्रियायोगैः सेव्यमानश्च योगिभिः । ऋषिगन्धर्वसिद्धैश्च विहितं कारणं परम् ॥ २२२ ॥ योगीजन ज्ञान, सिद्धि और क्रिया-योगद्वारा भगवान् शिवकी ही सेवा करते हैं तथा ऋषि, गन्धर्व और सिद्धगण उन्हें ही परम कारण मानकर उनका आश्रय लेते हैं ॥ २२२ ॥

कर्मयज्ञक्रियायोगैः सेव्यमानः सुरासुरैः । नित्यं कर्मफलैर्हीनं तमहं कारणं वदे ॥ २२३ ॥ देवता और असुर सब लोग कर्म, यज्ञ और क्रिया-योगद्वारा सदा जिनकी सेवा करते हैं, उन कर्मफलरहित महादेवजीको मैं सबका कारण कहता हूँ ॥ २२३ ॥

स्थूलं सूक्ष्ममनौपम्यमग्राह्यं गुणगोचरम् । गुणहीनं गुणाध्यक्षं परं माहेश्वरं पदम् ॥ २२४ ॥ महादेवजीका परमपद स्थूल, सूक्ष्म, उपमा-रहित, इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य, सगुण, निर्गुण तथा गुणोंका नियामक है ॥ २२४ ॥

विश्वेशं कारणगुरुं लोकालोकान्तकारणम् । भूताभूतभविष्यच्च जनकं सर्वकारणम् ॥ २२५ ॥ अक्षरक्षरमव्यक्तं विद्याविद्ये कृताकृते ।

धर्माधर्मौ यतः शक्र तमहं कारणं ब्रुवे ॥ २२६ ॥ इन्द्र! जो सम्पूर्ण विश्वके अधीश्वर, प्रकृतिके भी नियामक, लोक (जगत्की सृष्टि) तथा सम्पूर्ण लोकोंके संहारके भी कारण हैं, भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों काल जिनके ही स्वरूप हैं, जो सबके उत्पादक एवं कारण हैं, क्षर-अक्षर, अव्यक्त, विद्या-अविद्या, कृत-अकृत तथा धर्म और अधर्म जिनसे ही प्रकट हुए हैं, उन महादेवजीको ही मैं सबका परम कारण बताता हूँ ॥ २२५-२२६ ॥

प्रत्यक्षमिह देवेन्द्र पश्य लिङ्गं भगाङ्कितम् । देवदेवेन रुद्रेण सृष्टिसंहारहेतुना ॥ २२७ ॥ देवेन्द्र! सृष्टि और संहारके कारणभूत देवाधिदेव भगवान् रुद्रने जो भगचिह्नित लिङ्गमूर्ति धारण की है, उसे आप यहाँ प्रत्यक्ष देख लें। यह उनके कारण-स्वरूपका परिचायक है ॥ २२७ ॥

मात्रा पूर्वं ममाख्यातं कारणं लोकलक्षणम् । नास्ति चेशात् परं शक्र तं प्रपद्य यदिच्छसि ॥ २२८ ॥ इन्द्र! मेरी माताने पहले कहा था कि महादेवजीके अतिरिक्त अथवा उनसे बढ़कर कोई लोकरूपी कार्यका कारण नहीं है; अतः यदि किसी अभीष्ट वस्तुके पानेकी तुम्हारी इच्छा हो तो भगवान् शंकरकी ही शरण लो ॥ २२८ ॥

प्रत्यक्षं ननु ते सुरेश विदितं संयोगलिङ्गोद्भवं त्रैलोक्यं सविकारनिर्गुणं गणं ब्रह्मादिरेतोद्भवम् । यद्ब्रह्मेन्द्रहुताशविष्णुसहिता देवाश्च दैत्येश्वरा नान्यत् कामसहस्रकल्पितधियः शंसन्ति ईशात् परम् । तं देवं सचराचरस्य जगतो व्याख्यातवेद्योत्तमं कामार्थी वरयामि संयतमना मोक्षाय सद्यः शिवम् ॥ २२९ ॥ सुरेश्वर! तुम्हें प्रत्यक्ष विदित है कि ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके संकल्पसे उत्पन्न हुआ यह बद्ध और मुक्त जीवोंसे युक्त त्रिभुवन भग और लिङ्गसे प्रकट हुआ है तथा सहस्रों कामनाओंसे युक्त बुद्धिवाले तथा ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि एवं विष्णुसहित सम्पूर्ण देवता और दैत्यराज महादेवजीसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं बताते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर जगत्के लिये वेद-विख्यात सर्वोत्तम जाननेयोग्य तत्त्व हैं, उन्हीं कल्याणमय देव भगवान् शंकरका कामनापूर्तिके लिये वरण करता हूँ तथा संयतचित्त होकर सद्यःमुक्तिके लिये भी उन्हींसे प्रार्थना करता हूँ ॥ २२९ ॥

हेतुभिर्वा किमन्यैस्तैरीशः कारणकारणम् । न शुश्रुम यदन्यस्य लिङ्गमभ्यर्चितं सुरैः ॥ २३० ॥ दूसरे-दूसरे कारणोंको बतलानेसे क्या लाभ? भगवान् शंकर इसलिये भी समस्त कारणोंके भी कारण सिद्ध होते हैं कि हमने देवताओंद्वारा दूसरे किसीके लिंगको पूजित

होते नहीं सुना है ॥ २३० ॥ कस्याप्यन्यस्य सुरैः सर्वैर्लिङ्गं मुक्त्वा महेश्वरम् । अर्च्यतेऽर्चितपूर्वं वा ब्रूहि यद्यस्ति ते श्रुतिः ॥ २३१ ॥ भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरे किसके लिंगकी सम्पूर्ण देवता पूजा करते हैं अथवा पहले कभी उन्होंने पूजा की है? यदि तुम्हारे सुननेमें आया हो तो बताओ ॥ २३१ ॥ यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सह देवतैः । अर्चयध्वं सदा लिङ्गं तस्मात् श्रेष्ठतमो हि सः ॥ २३२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु तथा सम्पूर्ण देवताओंसहित तुम सदा ही शिवलिंगकी पूजा करते आये हो; इसलिये भगवान् शिव ही सबसे श्रेष्ठतम देवता हैं ॥ २३२ ॥ न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजाः । लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ॥ २३३ ॥ प्रजाओंके शरीरमें न तो पद्मका चिह्न है, न चक्रका चिह्न है और न वज्रका ही चिह्न उपलक्षित होता है। सभी प्रजा लिंग और भगके चिह्नसे युक्त हैं, इसलिये यह सिद्ध है कि सम्पूर्ण प्रजा माहेश्वरी है (महादेवजीसे ही उत्पन्न हुई है) ॥ २३३ ॥ देव्याः कारणरूपभावजनिताः सर्वा भगाङ्काः स्त्रियो लिंगेनापि हरस्य सर्वपुरुषाः प्रत्यक्षचिह्नीकृताः । योऽन्यत्कारणमीश्वरात् प्रवदते देव्या च यन्नाङ्कितं त्रैलोक्ये सचराचरे स तु पुमान् बाह्यो भवेद् दुर्मतिः ॥ २३४ ॥ देवी पार्वतीके कारणस्वरूप भावसे संसारकी समस्त स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं; इसलिये भगके चिह्नसे अंकित हैं और भगवान् शिवसे उत्पन्न होनेके कारण सभी पुरुष लिंगके चिह्नसे चिह्नित हैं—यह सबको प्रत्यक्ष है; ऐसी दशामें जो शिव और पार्वतीके अतिरिक्त अन्य किसीको कारण बताता है, जिससे कि प्रजा चिह्नित नहीं है, वह अन्य कारणवादी दुर्बुद्धि पुरुष चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंसे बाहर कर देने योग्य है ॥ २३४ ॥ पुंल्लिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं विद्धि चाप्युमाम् । द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ॥ २३५ ॥ जितना भी पुँल्लिंग है, वह सब शिवस्वरूप है और जो भी स्त्रीलिंग है उसे उमा समझो। महेश्वर और उमा—इन दो शरीरोंसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है ॥ २३५ ॥ (दिवसकरशशाङ्कवह्निनेत्रं

त्रिभुवनसारमपारमीशमाद्यम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥) सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके नेत्र हैं, जो त्रिभुवनके सारतत्त्व, अपार, ईश्वर, सबके आदिकारण तथा अजर-अमर हैं, उन रुद्रदेवको प्रसन्न किये बिना इस संसारमें कौन पुरुष शान्ति पा सकता है ।।

तस्माद् वरमहं काङ्क्षे निधनं वापि कौशिक । गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं बलसूदन ॥ २३६ ॥ अतः कौशिक! मैं भगवान् शंकरसे ही वर अथवा मृत्यु पानेकी इच्छा रखता हूँ। बलसूदन इन्द्र! तुम जाओ या खड़े रहो, जैसी इच्छा हो करो ॥ २३६ ॥

काममेष वरो मेऽस्तु शापो वाथ महेश्वरात् । न चान्यां देवतां काङ्क्षे सर्वकामफलामपि ॥ २३७ ॥ मुझे महेश्वरसे चाहे वर मिले, चाहे शाप प्राप्त हो, स्वीकार है, परंतु दूसरा देवता यदि सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाला हो तो भी मैं उसे नहीं चाहता ॥ २३७ ॥

एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखदाकुलितेन्द्रियः । न प्रसीदति मे देवः किमेतदिति चिन्तयन् ॥ २३८ ॥ देवराज इन्द्रसे ऐसा कहकर मेरी इन्द्रियाँ दुःखसे व्याकुल हो उठीं और मैं सोचने लगा कि यह क्या कारण हो गया कि महादेवजी मुझपर प्रसन्न नहीं हो रहे हैं ॥ २३८ ॥

अथापश्यं क्षणेनैव तमैवैरावतं पुनः । हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालरजतप्रभम् ॥ २३९ ॥ वृषरूपधरं साक्षात् क्षीरोदमिव सागरम् । कृष्णपुच्छं महाकायं मधुपिङ्गललोचनम् ॥ २४० ॥ तदनन्तर एक ही क्षणमें मैंने देखा कि वही ऐरावत हाथी अब वृषभरूप धारण करके स्थित है। उसका वर्ण हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत है। उसकी अंगकान्ति मृणालके समान उज्ज्वल और चाँदीके समान चमकीली है। जान पड़ता था साक्षात् क्षीरसागर ही वृषभरूप धारण करके खड़ा हो। काली पूँछ, विशाल शरीर और मधुके समान पिंगल वर्णवाले नेत्र शोभा पा रहे थे ॥ २३९-२४० ॥

वज्रसारमयैः शृङ्गैरैर्निष्टप्तकनकप्रभैः । सुतीक्ष्णैर्मृदुरक्ताग्रैरुत्किरन्तमिवावनिम् ॥ २४१ ॥ उसके सींग ऐसे जान पड़ते थे मानो वज्रके सारतत्त्वसे बने हों। उनसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी प्रभा फैल रही थी। उन सींगोंके अग्रभाग अत्यन्त तीखे, कोमल तथा लाल रंगके थे। ऐसा लगता था मानो उन सींगोंके द्वारा वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेगा ॥ २४१ ॥

जाम्बूनदेन दाम्ना च सर्वतः समलंकृतम् । सुवक्त्रखुरनासं च सुकर्णं सुकटीतटम् ॥ २४२ ॥ उसके शरीरको सब ओरसे जाम्बूनद नामक सुवर्णकी लड़ियोंसे सजाया गया था। उसके मुख, खुर, नासिका (नथुने), कान और कटीप्रदेश—सभी बड़े सुन्दर थे ॥ २४२ ॥

सुपार्श्वं विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् । ककुदं तस्य चाभाति स्कन्धमापूर्य धिष्ठितम् ॥ २४३ ॥ उसके अगल-बगलका भाग भी बड़ा मनोहर था। कंधे चौड़े और रूप सुन्दर था। वह देखनेमें बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका ककुद् समूचे कंधेको घेरकर ऊँचे उठा था। उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २४३ ॥

तुषारगिरिकूटाभं सिताभ्रशिखरोपमम् । तमास्थितश्च भगवान् देवदेवः सहोमया ॥ २४४ ॥ अशोभत महादेवः पौर्णमास्यामिवोडुराट् । हिमालय पर्वतके शिखर अथवा श्वेत बादलोंके विशाल खण्डके समान प्रतीत होनेवाले उस नन्दिकेश्वरपर देवाधिदेव भगवान् महादेव भगवती उमाके साथ आरूढ़ हो पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २४४ १/२ ॥

तस्य तेजोभवो वह्निः समेघः स्तनयित्नुमान् ॥ २४५ ॥ सहस्रमिव सूर्याणां सर्वमापूर्य धिष्ठितः । उनके तेजसे प्रकट हुई अग्निकी-सी प्रभा गर्जना करनेवाले मेघोंसहित सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करके सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ २४५ १/२ ॥

ईश्वरः सुमहातेजाः संवर्तक इवानलः ॥ २४६ ॥ युगान्ते सर्वभूतानां दिधक्षुरिव चोद्यतः । वे महातेजस्वी महेश्वर ऐसे दिखायी देते थे मानो कल्पान्तके समय सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देनेकी इच्छासे उद्यत हुई प्रलयकालीन अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २४६ १/२ ॥

तेजसा तु तदा व्याप्तं दुर्निरीक्ष्यं समन्ततः ॥ २४७ ॥ पुनरुद्विग्नहृदयः किमेतदिति चिन्तयन् । वे अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहे थे, अतः उनकी ओर देखना कठिन था। तब मैं उद्विग्नचित्त होकर फिर इस चिन्तामें पड़ गया कि यह क्या है? ॥ २४७ १/२ ॥

मुहूर्तमिव तत् तेजो व्याप्य सर्वा दिशो दश ॥ २४८ ॥ प्रशान्तं दिक्षु सर्वासु देवदेवस्य मायया । इतनेहीमें एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह तेज सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर देवाधिदेव महादेवजीकी मायासे सब ओर शान्त हो गया ॥ २४८ १/२ ॥

अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम् ॥ २४९ ॥

नीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम् । अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम् ॥ २५० ॥ तत्पश्चात् मैंने देखा, भगवान् महेश्वर स्थिर भावसे खड़े हैं। उनके कण्ठमें नील चिह्न शोभा पा रहा था। वे महात्मा कहीं भी आसक्त नहीं थे। वे तेजकी निधि जान पड़ते थे। उनके अठारह भुजाएँ थीं। वे भगवान् स्थाणु समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे ॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लमाल्यानुलेपनम् । शुक्लध्वजमनाधृष्यं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ २५१ ॥ महादेवजीने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था। उनके श्रीअंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था। उनकी ध्वजा भी श्वेत वर्णकी ही थी। वे श्वेत रंगका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और अजेय थे ॥ २५१ ॥

गायद्भिर्नृत्यमानैश्च वादयद्भिश्च सर्वशः । वृतं पार्श्वचरैर्दिव्यैरात्मतुल्यपराक्रमैः ॥ २५२ ॥ वे अपने ही समान पराक्रमी दिव्य पार्षदोंसे घिरे हुए थे। उनके वे पार्षद सब ओर गाते, नाचते और बाजे बजाते थे ॥ २५२ ॥

बालेन्दुमुकुटं पाण्डुं शरच्चन्द्रमिवोदितम् । त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतं त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥ २५३ ॥ भगवान् शिवके मस्तकपर बाल चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था। उनकी अंग-कान्ति श्वेतवर्णकी थी। वे शरद्-ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान उदित हुए थे। उनके तीनों नेत्रोंसे ऐसा प्रकाश-पुञ्ज छा रहा था मानो तीन सूर्य उदित हुए हों ॥ २५३ ॥

(सर्वविद्याधिपं देवं शरच्चन्द्रसमप्रभम् । नयनाह्लादसौभाग्यमपश्यं परमेश्वरम् ॥) जो सम्पूर्ण विद्याओंके अधिपति, शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति कान्तिमान् तथा नेत्रोंके लिये परमानन्द-दायक सौभाग्य प्रदान करनेवाले थे। इस प्रकार मैंने परमेश्वर महादेवजीके मनोहर रूपको देखा ॥

अशोभतास्य देवस्य माला गात्रे सितप्रभे । जातरूपमयैः पद्मैर्ग्रथिता रत्नभूषिता ॥ २५४ ॥ भगवान्‌के उज्ज्वल प्रभाववाले गौर विग्रहपर सुवर्णमय कमलोंसे गुँथी हुई रत्नभूषित माला बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २५४ ॥

मूर्तिमन्ति तथास्त्राणि सर्वतेजोमयानि च । मया दृष्टानि गोविन्द भवस्यामिततेजसः ॥ २५५ ॥ गोविन्द! मैंने अमित तेजस्वी महादेवजीके सम्पूर्ण तेजोमय आयुधोंको मूर्तिमान् होकर उनकी सेवामें उपस्थित देखा था ॥ २५५ ॥

इन्द्रायुधसवर्णाभं धनुस्तस्य महात्मनः ।

पिनाकमिति विख्यातमभवत् पन्नगो महान् ॥ २५६ ॥ उन महात्मा रुद्रदेवका इन्द्रधनुषके समान रंगवाला जो पिनाक नामसे विख्यात धनुष है, वह विशाल सर्पके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २५६ ॥ सप्तशीर्षो महाकायस्तीक्ष्णदंष्ट्रो विषोल्बणः । ज्यावेष्टितमहाग्रीवः स्थितः पुरुषविग्रहः ॥ २५७ ॥ उसके सात फन थे। उसका डीलडौल भी विशाल था। तीखी दाढ़ें दिखायी देती थीं। वह अपने प्रचण्ड विषके कारण मतवाला हो रहा था। उसकी विशाल ग्रीवा प्रत्यञ्चासे आवेष्टित थी। वह पुरुष-शरीर धारण करके खड़ा था ॥ २५७ ॥ शरश्च सूर्यसंकाशः कालानलसमद्युतिः । एतदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत् ॥ २५८ ॥ भगवान्का जो बाण था वह सूर्य और प्रलयकालीन अग्निके समान प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होता था। यही अत्यन्त भयंकर एवं महान् दिव्य पाशुपत अस्त्र था ॥ २५८ ॥ अद्वितीयमनिर्देश्यं सर्वभूतभयावहम् । सस्फुलिङ्गं महाकायं विसृजन्तमिवानलम् ॥ २५९ ॥ उसके जोड़का दूसरा अस्त्र नहीं था। समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला वह विशालकाय अस्त्र अनिर्वचनीय जान पड़ता था और अपने मुखसे चिनगारियोंसहित अग्निकी वर्षा कर रहा था ॥ २५९ ॥ एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम् । सहस्रभुजजिह्वाक्षमुद्गिरन्तमिवानलम् ॥ २६० ॥ वह भी सर्पके ही आकारमें दृष्टिगोचर होता था। उसके एक पैर, बहुत बड़ी दाढ़ें, सहस्रों सिर, सहस्रों पेट, सहस्रों भुजा, सहस्रों जिह्वा और सहस्रों नेत्र थे। वह आग-सा उगल रहा था ॥ २६० ॥ ब्राह्मान्नारायणाच्चैन्द्रादाग्नेयादपि वारुणात् । यद् विशिष्टं महाबाहो सर्वशस्त्रविघातनम् ॥ २६१ ॥ महाबाहो! सम्पूर्ण शस्त्रोंका विनाश करनेवाला वह पाशुपत अस्त्र ब्राह्म, नारायण, ऐन्द्र, आग्नेय और वारुण अस्त्रसे भी बढ़कर शक्तिशाली था ॥ २६१ ॥ येन तत् त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद् भस्मीकृतं पुरा । शरेणैकेन गोविन्द महादेवेन लीलया ॥ २६२ ॥ गोविन्द! उसीके द्वारा महादेवजीने लीलापूर्वक एक ही बाण मारकर क्षणभरमें दैत्योंके तीनों पुरोंको जलाकर भस्म कर दिया था ॥ २६२ ॥ निर्दहेत च यत् कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् । महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशयः ॥ २६३ ॥

भगवान् महेश्वरकी भुजाओंसे छूटनेपर वह अस्त्र चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण

त्रिलोकीको आधे निमेषमें ही भस्म कर देता है—इसमें संशय नहीं है ।। २६३ ।।

नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन् ब्रह्मविष्णुसुरेष्वपि ।

तदहं दृष्टवांस्तत्र आश्चर्यमिदमुत्तमम् ।। २६४ ।।

गुह्यमस्त्रवरं नान्यत् तत्तुल्यमधिकं हि वा ।

इस लोकमें जिस अस्त्रके लिये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंमेंसे भी कोई अवध्य नहीं

है, उस परम उत्तम आश्चर्यमय पाशुपतास्त्रको मैंने यहाँ प्रत्यक्ष देखा था। वह श्रेष्ठ अस्त्र

परम गोपनीय है। उसके समान अथवा उससे बढ़कर भी दूसरा कोई श्रेष्ठ अस्त्र नहीं

है ।। २६४ १/२ ।।

यत् तच्छूलमिति ख्यातं सर्वलोकेषु शूलिनः ।। २६५ ।।

दारयेद् यां महीं कृत्स्नां शोषयेद् वा महोदधिम् ।

संहरेद् वा जगत् कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ।। २६६ ।।

त्रिशूलधारी भगवान् शंकरका सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात जो वह त्रिशूल नामक अस्त्र है

वह शूलपाणि शंकरके द्वारा छोड़े जानेपर इस सारी पृथिवीको विदीर्ण कर सकता है,

महासागरको सुखा सकता है अथवा समस्त संसारका संहार कर सकता

है ।। २६५-२६६ ।।

यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सबलः पुरा ।

चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजयी नृपः ।। २६७ ।।

महाबलो महावीर्यः शक्रतुल्यपराक्रमः ।

करस्थेनैव गोविन्द लवणस्येह रक्षसः ।। २६८ ।।

श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी, महातेजस्वी, महाबली, महान् वीर्यशाली,

इन्द्रतुल्य पराक्रमी चक्रवर्ती राजा मान्धाता लवणासुरके द्वारा प्रयुक्त हुए उस शूलसे ही

सेनासहित नष्ट हो गये थे। अभी वह अस्त्र उस असुरके हाथसे छूटने भी नहीं पाया था कि

राजाका सर्वनाश हो गया ।। २६७-२६८ ।।

तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं लोमहर्षणम् ।

त्रिशिखां भुकुटिं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम् ।। २६९ ।।

उस शूलका अग्रभाग अत्यन्त तीक्ष्ण है। वह बहुत ही भयंकर और रोमाञ्चकारी है,

मानो वह अपनी भौंहें तीन जगहसे टेढ़ी करके विरोधीको डाँट बता रहा हो, ऐसा जान

पड़ता है ।। २६९ ।।

विधूमं सार्चिषं कृष्णं कालसूर्यमिवोदितम् ।

सर्पहस्तमनिर्देश्यं पाशहस्तमिवान्तकम् ।। २७० ।।

दृष्टवानस्मि गोविन्द तदस्त्रं रुद्रसंनिधौ ।

गोविन्द! धूमरहित आगकी ज्वालाओंसहित वह काला त्रिशूल प्रलयकालके सूर्यके समान उदित हुआ था; और हाथमें सर्प लिये अवर्णनीय शक्तिशाली पाशधारी यमराजके समान जान पड़ता था। भगवान् रुद्रके निकट मैंने उसका भी दर्शन किया था ॥ २७० १/२ ॥
परशुस्तीक्ष्णधारश्च दत्तो रामस्य यः पुरा ॥ २७१ ॥
महादेवेन तुष्टेन क्षत्रियाणां क्षयंकरः ।
कार्तवीर्यो हतो येन चक्रवर्ती महामृधे ॥ २७२ ॥
पूर्वकालमें महादेवजीने संतुष्ट होकर परशुरामको जिसका दान किया था और जिसके द्वारा महासमरमें चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य अर्जुन मारा गया था, क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला वह तीखी धारसे युक्त परशु मुझे भगवान् रुद्रके निकट दिखायी दिया था ॥ २७१-२७२ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी येन निःक्षत्रिया कृता ।
जामदग्न्येन गोविन्द रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ २७३ ॥
गोविन्द! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले जमदग्निनन्दन परशुरामने उसी परशुके द्वारा इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ॥ २७३ ॥
दीप्तधारः सुरौद्रास्यः सर्पकण्ठाग्रधिष्ठितः ।
अभवच्छूलिनोऽभ्याशे दीप्तवह्निशतोपमः ॥ २७४ ॥
उसकी धार चमक रही थी, उसका मुखभाग बड़ा भयंकर जान पड़ता था। वह सर्पयुक्त कण्ठवाले महादेवजीके कण्ठके अग्रभागमें स्थित था। इस प्रकार शूलधारी भगवान् शिवके समीप वह परशु सैकड़ों प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान होता था ॥ २७४ ॥
असंख्येयानि चास्त्राणि तस्य दिव्यानि धीमतः ।
प्राधान्यतो मयैतानि कीर्तितानि तवानघ ॥ २७५ ॥
निष्पाप श्रीकृष्ण! बुद्धिमान् भगवान् शिवके असंख्य दिव्यास्त्र हैं। मैंने यहाँ आपके सामने इन प्रमुख अस्त्रोंका वर्णन किया है ॥ २७५ ॥
सव्यदेशे तु देवस्य ब्रह्मा लोकपितामहः ।
दिव्यं विमानमास्थाय हंसयुक्तं मनोजवम् ॥ २७६ ॥
वामपार्श्वगतश्चापि तथा नारायणः स्थितः ।
वैनतेयं समारुह्य शंखचक्रगदाधरः ॥ २७७ ॥
उस समय महादेवजीके दाहिने भागमें लोकपितामह ब्रह्मा मनके समान वेगशाली हंसयुक्त दिव्य विमानपर बैठे हुए शोभा पा रहे थे और बायें भागमें शंख, चक्र और गदा धारण किये भगवान् नारायण गरुडपर विराजमान थे ॥ २७६-२७७ ॥
स्कन्दो मयूरमास्थाय स्थितो देव्याः समीपतः ।
शक्तिघण्टे समादाय द्वितीय इव पावकः ॥ २७८ ॥

कुमार स्कन्द मोरपर चढ़कर हाथमें शक्ति और घंटा लिये पार्वतीदेवीके पास ही खड़े थे। वे दूसरे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे।। २७८।।

पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम्।
शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीयमिव शंकरम्।। २७९।।
महादेवजीके आगे मैंने नन्दीको उपस्थित देखा, जो शूल उठाये दूसरे शंकरके समान खड़े थे।। २७९।।

स्वायम्भुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषयस्तथा।
शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः।। २८०।।
स्वायम्भुव आदि मनु, भृगु आदि ऋषि तथा इन्द्र आदि देवता—ये सभी वहाँ पधारे थे।। २८०।।

सर्वभूतगणाश्चैव मातरो विविधाः स्थिताः।
तेऽभिवाद्य महात्मानं परिवार्य समन्ततः।। २८१।।
अस्तुवन् विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं सुरास्तदा।
समस्त भूतगण और नाना प्रकारकी मातृकाएँ उपस्थित थीं। वे सब देवता महात्मा महादेवजीको चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे।। २८१ १/२।।

ब्रह्मा भवं तदास्तौषीद् रथन्तरमुदीरयन्।। २८२।।
ज्येष्ठसाम्ना च देवेशं जगौ नारायणस्तदा।। २८३।।
ब्रह्माजीने रथन्तर सामका उच्चारण करके उस समय भगवान् शंकरकी स्तुति की। नारायणने ज्येष्ठसामद्वारा देवेश्वर शिवकी महिमाका गान किया।।

गृणन् ब्रह्म परं शक्रः शतरुद्रियमुत्तमम्।
ब्रह्मा नारायणश्चैव देवराजश्च कौशिकः।। २८४।।
अशोभन्त महात्मानस्त्रयस्त्रय इवाग्नयः।
इन्द्रने उत्तम शतरुद्रियका सस्वर पाठ करते हुए परब्रह्म शिवका स्तवन किया। ब्रह्मा, नारायण और देवराज इन्द्र—ये तीनों महात्मा तीन अग्नियोंके समान शोभा पा रहे थे।। २८४ १/२।।

तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवान् शिवः।। २८५।।
शरदभ्रविनिर्मुक्तः परिधिस्थ इवांशुमान्।
इन तीनोंके बीचमें विराजमान भगवान् शिव शरद्-ऋतुके बादलोंके आवरणसे मुक्त हो परिधि (घेरे)-में स्थित हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहे थे।। २८५ १/२।।

अयुतानि च चन्द्रार्कानपश्यं दिवि केशव।। २८६।।
ततोऽहमस्तुवं देवं विश्वस्य जगतः पतिम्।

केशव! उस समय मैंने आकाशमें सहस्रों चन्द्रमा और सूर्य देखे। तदनन्तर मैं सम्पूर्ण जगत्के पालक महादेवजीकी स्तुति करने लगा ॥ २८६ १/२ ॥

उपमन्युरुवाच

नमो देवाधिदेवाय महादेवाय ते नमः ॥ २८७ ॥
शक्ररूपाय शक्राय शक्रवेषधराय च ।
नमस्ते वज्रहस्ताय पिङ्गलायारुणाय च ॥ २८८ ॥
उपमन्यु बोले—प्रभो! आप देवताओंके भी अधिदेवता हैं। आपको नमस्कार है। आप ही महान् देवता हैं, आपको नमस्कार है। इन्द्र आपके ही रूप हैं। आप ही साक्षात् इन्द्र हैं तथा आप इन्द्रका-सा वेश धारण करनेवाले हैं। इन्द्रके रूपमें आप ही अपने हाथमें वज्र लिये रहते हैं। आपका वर्ण पिंगल और अरुण है, आपको नमस्कार है ॥ २८७-२८८ ॥
पिनाकपाणये नित्यं शङ्खशूलधराय च ।
नमस्ते कृष्णवासाय कृष्णकुञ्चितमूर्धजे ॥ २८९ ॥
आपके हाथमें पिनाक शोभा पाता है। आप सदा शंख और त्रिशूल धारण करते हैं। आपके वस्त्र काले हैं तथा आप मस्तकपर काले घुँघराले केश धारण करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ २८९ ॥
कृष्णाजिनोत्तरीयाय कृष्णाष्टमिरताय च ।
शुक्लवर्णाय शुक्लाय शुक्लाम्बरधराय च ॥ २९० ॥
काला मृगचर्म आपका दुपट्टा है। आप श्रीकृष्णमाष्टमीव्रतमें तत्पर रहते हैं। आपका वर्ण शुक्ल है। आप स्वरूपसे भी शुक्ल (शुद्ध) हैं तथा आप श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ॥ २९० ॥
शुक्लभस्मावलिप्ताय शुक्लकर्मरताय च ।
नमोऽस्तु रक्तवर्णाय रक्ताम्बरधराय च ॥ २९१ ॥
आप अपने सारे अंगोंमें श्वेत भस्म लपेटे रहते हैं। विशुद्ध कर्ममें अनुरक्त हैं। कभी-कभी आप रक्त वर्णके हो जाते हैं और लाल वस्त्र ही धारण कर लेते हैं। आपको नमस्कार है ॥ २९१ ॥
रक्तध्वजपताकाय रक्तस्रगनुलेपिने ।
नमोऽस्तु पीतवर्णाय पीताम्बरधराय च ॥ २९२ ॥
रक्ताम्बरधारी होनेपर आप अपनी ध्वजा-पताका भी लाल ही रखते हैं। लाल फूलोंकी माला पहनकर अपने श्रीअंगोंमें लाल चन्दनका ही लेप लगाते हैं। किसी समय आपकी अंगकान्ति पीले रंगकी हो जाती है। ऐसे समयमें आप पीताम्बर धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ॥ २९२ ॥
नमोऽस्तूच्छ्रितच्छत्राय किरीटवरधारिणे ।

अर्धहारार्धकेयूर अर्धकुण्डलकर्णिने ।। २९३ ।। आपके मस्तकपर ऊँचा छत्र तना है। आप सुन्दर किरीट धारण करते हैं। अर्द्धनारीश्वररूपमें आपके आधे अंगमें ही हार, आधेमें ही केयूर और आधे अंगके ही कानमें कुण्डल शोभा पाता है। आपको नमस्कार है ।। २९३ ।।

नमः पवनवेगाय नमो देवाय वै नमः । सुरेन्द्राय मुनीन्द्राय महेन्द्राय नमोऽस्तु ते ।। २९४ ।। आप वायुके समान वेगशाली हैं। आपको नमस्कार है। आप ही मेरे आराध्यदेव हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और महेन्द्र हैं। आपको नमस्कार है ।। २९४ ।।

नमः पद्मार्धमालाय उत्पलैर्मिश्रिताय च । अर्धचन्दनलिप्ताय अर्धस्रगनुलेपिने ।। २९५ ।। आप अपने आधे अंगको कमलोंकी मालासे अलंकृत करते हैं और आधेमें उत्पलोंसे विभूषित होते हैं। आधे अंगमें चन्दनका लेप लगाते हैं तो आधे शरीरमें फूलोंका गजरा और सुगन्धित अंगराग धारण करते हैं। ऐसे अर्द्धनारीश्वररूपमें आपको नमस्कार है ।। २९५ ।।

नम आदित्यवक्त्राय आदित्यनयनाय च । नम आदित्यवर्णाय आदित्यप्रतिमाय च ।। २९६ ।। आपके मुख सूर्यके समान तेजस्वी हैं। सूर्य आपके नेत्र हैं। आपकी अंगकान्ति भी सूर्यके ही समान है तथा आप अधिक सादृश्यके कारण सूर्यकी प्रतिमा-से जान पड़ते हैं ।। २९६ ।।

नमः सोमाय सौम्याय सौम्यवक्त्रधराय च । सौम्यरूपाय मुख्याय सौम्यदंष्ट्राविभूषिणे ।। २९७ ।। आप सोमस्वरूप हैं। आपकी आकृति बड़ी सौम्य है। आप सौम्य मुख धारण करते हैं। आपका रूप भी सौम्य है। आप प्रमुख देवता हैं और सौम्य दन्तावलीसे विभूषित होते हैं। आपको नमस्कार है ।। २९७ ।।

नमः श्यामाय गौराय अर्धपीतार्धपाण्डवे । नारीनरशरीराय स्त्रीपुंसाय नमोऽस्तु ते ।। २९८ ।। आप हरिहररूप होनेके कारण आधे शरीरसे साँवले और आधेसे गोरे हैं। आधे शरीरमें पीताम्बर धारण करते हैं और आधेमें श्वेत वस्त्र पहनते हैं। आपको नमस्कार है। आपके आधे शरीरमें नारीके अवयव हैं और आधेमें नरके। आप स्त्री-पुरुषरूप हैं। आपको नमस्कार है ।। २९८ ।।

नमो वृषभवाहाय गजेन्द्रगमनाय च । दुर्गमाय नमस्तुभ्यमगम्यगमनाय च ।। २९९ ।।