महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 248, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंघोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः ।
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः ॥ ५१ ॥
१७४ घोरः—भयंकर रूपधारी, १७५ महातपाः—महान् तप करनेवाले, १७६ पाशः—अपनी मायारूपी पाशसे बाँधनेवाले, १७७ नित्यः—विनाशरहित, १७८ गिरिरुहः—पर्वतपर आरूढ़—कैलाशवासी, १७९ नभः—आकाशके समान असङ्ग, १८० सहस्रहस्तः—हजारों हाथोंवाले, १८१ विजयः—विजेता, १८२ व्यवसायः—दृढ़निश्चयी, १८३ अतन्द्रितः—आलस्यरहित ॥ ५१ ॥
अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः ।
दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥ ५२ ॥
१८४ अधर्षणः—अजेय, १८५ धर्षणात्मा—भयरूप, १८६ यज्ञहा—दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, १८७ कामनाशकः—कामदेवको नष्ट करनेवाले, १८८ दक्षयागापहारी—दक्षके यज्ञका अपहरण करनेवाले, १८९—सुसहः—अति सहनशील, १९० मध्यमः—मध्यस्थ ॥ ५२ ॥
तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितोऽवरः ।
गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः ॥ ५३ ॥
१९१ तेजोपहारी—दूसरोंके तेजको हर लेनेवाले, १९२ बलहा—बलनामक दैत्यका वध करनेवाले, १९३ मुदितः—आनन्दस्वरूप, १९४ अर्थः—अर्थस्वरूप, १९५ अजितः—अपराजित, १९६ अवरः—जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है वे भगवान् शिव, १९७ गम्भीरघोषः—गम्भीर घोष करनेवाले, १९८ गम्भीरः—गाम्भीर्ययुक्त, १९९ गम्भीरबलवाहनः—अगाध बलशाली वृषभपर सवारी करनेवाले ॥ ५३ ॥
न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः ।
सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥ ५४ ॥
२०० न्यग्रोधरूपः—वटवृक्षस्वरूप, २०१ न्यग्रोधः—वटनिकटनिवासी, २०२ वृक्षकर्णस्थितिः—वटवृक्षके पत्तेपर शयन करनेवाले बालमुकुन्दरूप, २०३ विभुः—विविध रूपोंसे प्रकट होनेवाले, २०४ सुतीक्ष्णदशनः—अत्यन्त तीखे दाँतवाले, २०५ महाकायः—बड़े डीलडौलवाले, २०६ महाननः—विशाल मुखवाले ॥ ५४ ॥
विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः ।
तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥ ५५ ॥
२०७ विष्वक्सेनः—दैत्योंकी सेनाको सब ओर भगा देनेवाले, २०८ हरिः—आपत्तियोंको हर लेनेवाले, २०९ यज्ञः—यज्ञरूप, २१० संयुगापीडवाहनः—युद्धमें पीड़ारहित वाहनवाले, २११ तीक्ष्णतापः—दुःसह तापरूप सूर्य, २१२ हर्यश्वः—हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त, २१३ सहायः—जीवमात्रके सखा, २१४ कर्मकालवित्—कर्मोंके कालको ठीक-ठीक जाननेवाले ॥ ५५ ॥