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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः ।
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः ॥ ५१ ॥
१७४ घोरः—भयंकर रूपधारी, १७५ महातपाः—महान् तप करनेवाले, १७६ पाशः—अपनी मायारूपी पाशसे बाँधनेवाले, १७७ नित्यः—विनाशरहित, १७८ गिरिरुहः—पर्वतपर आरूढ़—कैलाशवासी, १७९ नभः—आकाशके समान असङ्ग, १८० सहस्रहस्तः—हजारों हाथोंवाले, १८१ विजयः—विजेता, १८२ व्यवसायः—दृढ़निश्चयी, १८३ अतन्द्रितः—आलस्यरहित ॥ ५१ ॥

अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः ।
दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥ ५२ ॥
१८४ अधर्षणः—अजेय, १८५ धर्षणात्मा—भयरूप, १८६ यज्ञहा—दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, १८७ कामनाशकः—कामदेवको नष्ट करनेवाले, १८८ दक्षयागापहारी—दक्षके यज्ञका अपहरण करनेवाले, १८९—सुसहः—अति सहनशील, १९० मध्यमः—मध्यस्थ ॥ ५२ ॥

तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितोऽवरः ।
गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः ॥ ५३ ॥
१९१ तेजोपहारी—दूसरोंके तेजको हर लेनेवाले, १९२ बलहा—बलनामक दैत्यका वध करनेवाले, १९३ मुदितः—आनन्दस्वरूप, १९४ अर्थः—अर्थस्वरूप, १९५ अजितः—अपराजित, १९६ अवरः—जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है वे भगवान् शिव, १९७ गम्भीरघोषः—गम्भीर घोष करनेवाले, १९८ गम्भीरः—गाम्भीर्ययुक्त, १९९ गम्भीरबलवाहनः—अगाध बलशाली वृषभपर सवारी करनेवाले ॥ ५३ ॥

न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः ।
सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥ ५४ ॥
२०० न्यग्रोधरूपः—वटवृक्षस्वरूप, २०१ न्यग्रोधः—वटनिकटनिवासी, २०२ वृक्षकर्णस्थितिः—वटवृक्षके पत्तेपर शयन करनेवाले बालमुकुन्दरूप, २०३ विभुः—विविध रूपोंसे प्रकट होनेवाले, २०४ सुतीक्ष्णदशनः—अत्यन्त तीखे दाँतवाले, २०५ महाकायः—बड़े डीलडौलवाले, २०६ महाननः—विशाल मुखवाले ॥ ५४ ॥

विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः ।
तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥ ५५ ॥
२०७ विष्वक्सेनः—दैत्योंकी सेनाको सब ओर भगा देनेवाले, २०८ हरिः—आपत्तियोंको हर लेनेवाले, २०९ यज्ञः—यज्ञरूप, २१० संयुगापीडवाहनः—युद्धमें पीड़ारहित वाहनवाले, २११ तीक्ष्णतापः—दुःसह तापरूप सूर्य, २१२ हर्यश्वः—हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त, २१३ सहायः—जीवमात्रके सखा, २१४ कर्मकालवित्—कर्मोंके कालको ठीक-ठीक जाननेवाले ॥ ५५ ॥

विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः । हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥ ५६ ॥ २१५ विष्णुप्रसादितः—भगवान् विष्णुने जिन्हें आराधना करके प्रसन्न किया था वे शिव, २१६ यज्ञः—विष्णुस्वरूप (यज्ञो वै विष्णुः), २१७ समुद्रः—महासागररूप, २१८ वडवामुखः—समुद्रमें स्थित बड़वानलरूप, २१९ हुताशनसहायः—अग्निके सखा वायुरूप, २२० प्रशान्तात्मा—शान्तचित्त, २२१ हुताशनः—अग्नि ।। ५६ ।।

उग्रतेजा महातेजा जन्यो विजयकालवित् । ज्योतिषामयनं सिद्धिः सर्वविग्रह एव च ॥ ५७ ॥ २२२ उग्रतेजाः—भयंकर तेजवाले, २२३ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, २२४ जन्यः—संसारके जन्मदाता, २२५ विजयकालवित्—विजयके समयका ज्ञान रखनेवाले, २२६ ज्योतिषामयनम्—ज्योतिषोंका स्थान, २२७ सिद्धिः—सिद्धिस্বরূপ, २२८ सर्वविग्रहः—सर्वस्वरूप ।। ५७ ।।

शिखी मुण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्द्धगो बली । वेणवी पणवी ताली खली कालकटंकटः ॥ ५८ ॥ २२९ शिखी—शिखाधारी गृहस्थस्वरूप, २३० मुण्डी—शिखारहित संन्यासी, २३१ जटी—जटाधारी वानप्रस्थ, २३२ ज्वाली—अग्निकी प्रज्वलित ज्वालामें समिधाकी आहुति देनेवाले ब्रह्मचारी, २३३ मूर्तिजः—शरीर रूपसे प्रकट होनेवाले, २३४ मूर्द्धगः—मूर्द्धा—सहस्रार चक्रमें ध्येय रूपसे विद्यमान, २३५ बली—बलिष्ठ, २३६ वेणवी—वंशी बजानेवाले श्रीकृष्ण, २३७ पणवी—पणव नामक वाद्य बजानेवाले, २३८ ताली—ताल देनेवाले, २३९ खली—खलिहानके स्वामी, २४० काल-कटंकटः—यमराजके मायाको आवृत्त करनेवाले ।। ५८ ।।

नक्षत्रविग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः । प्रजापतिर्विश्वबाहुर्विभागः सर्वगोऽमुखः ॥ ५९ ॥ २४१ नक्षत्रविग्रहमतिः—नक्षत्र—ग्रह-तारा आदिकी गतिको जाननेवाले, २४२ गुणबुद्धिः—गुणोंमें बुद्धि लगानेवाले, २४३ लयः—प्रलयके स्थान, २४४ अगमः—जाननेमें न आनेवाला, २४५ प्रजापतिः—प्रजाके स्वामी, २४६ विश्वबाहुः—सब ओर भुजावाले, २४७ विभागः—विभागस्वरूप, २४८ सर्वगः—सर्वव्यापी, २४९ अमुखः—बिना मुखवाला ।। ५९ ।।

विमोचनः सुसरणो हिरण्यकवचोद्भवः । मेढ्रजो बलचारी च महीचारी सुतस्तथा ॥ ६० ॥ २५० विमोचनः—संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाले, २५१ सुसरणः—श्रेष्ठ आश्रय, २५२ हिरण्य-कवचोद्भवः—हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिका स्थान, २५३ मेढ्रजः—, २५४ बलचारी

—बलका संचार करनेवाले, २५५ महीचारी—सारी पृथ्वीपर विचरनेवाले, २५६ स्रुतः—सर्वत्र पहुँचे हुए ।। ६० ।।

सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः ।
व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित् ॥ ६१ ॥
२५७ सर्वतूर्यनिनादी—सब प्रकारके बाजे बजानेवाले, २५८ सर्वातोद्यपरिग्रहः—सम्पूर्ण वाद्योंका संग्रह करनेवाले, २५९ व्यालरूपः—शेषनागस्वरूप, २६० गुहावासी—सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले, २६१ गुहः—कार्तिकेयस्वरूप, २६२ माली—मालाधारी, २६३ तरङ्गवित्—क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके ज्ञाता साक्षी ।। ६१ ।।

त्रिदशस्त्रिकालधृक् कर्मसर्वबन्धविमोचनः ।
बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥ ६२ ॥
२६४ त्रिदशः—प्राणियोंकी तीन दशाओं—जन्म, स्थिति और विनाशके हेतुभूत, २६५ त्रिकालधृक्—भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंको धारण करनेवाले, २६६ कर्मसर्वबन्धविमोचनः—कर्मोंके समस्त बन्धनोंको काटनेवाले, २६७ असुरेन्द्राणां बन्धनः—बलि आदि असुरपतियोंको बाँध लेनेवाले, २६८ युधिशत्रुविनाशनः—युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले ।। ६२ ।।

सांख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः ।
प्रस्कन्दनो विभागज्ञोऽतुल्यो यज्ञविभागवित् ॥ ६३ ॥
२६९ सांख्यप्रसादः—आत्मा और अनात्माके विवेकरूप सांख्यज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, २७० दुर्वासाः—अत्रि और अनसूयाके पुत्र रुद्रावतार दुर्वासा मुनि, २७१ सर्वसाधुनिषेवितः—समस्त साधुपुरुषोंद्वारा सेवित, २७२ प्रस्कन्दनः—ब्रह्मादिको भी स्थानभ्रष्ट करनेवाले, २७३ विभागज्ञः—प्राणियोंके कर्म और फलोंके विभागको यथोचितरूपसे जाननेवाले, २७४ अतुल्यः—तुलनारहित, २७५ यज्ञविभागवित्—यज्ञसम्बन्धी हविष्यके विभिन्न भागोंका ज्ञान रखनेवाले ।। ६३ ।।

सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः ।
हैमो हेमकरोऽयज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥ ६४ ॥
२७६ सर्ववासः—सर्वत्र निवास करनेवाले, २७७ सर्वचारी—सर्वत्र विचरनेवाले, २७८ दुर्वासाः—अनन्त और अपार होनेके कारण जिनको वस्त्रसे आच्छादित करना दुर्लभ है, २७९ वासवः—इन्द्रस्वरूप, २८० अमरः—अविनाशी, २८१ हैमः—हिमसमूह—हिमालयस्वरूप, २८२ हेमकरः—सुवर्णके उत्पादक, २८३ अयज्ञः—कर्मरहित, २८४ सर्वधारी—सबको धारण करनेवाले, २८५ धरोत्तमः—धारण करनेवालोंमें सबसे उत्तम—अखिल ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले ।। ६४ ।।

लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः ।
संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥ ६५ ॥

२८६ लोहिताक्षः—रक्तनेत्र, २८७ महाक्षः—बड़े नेत्रवाले, २८८ विजयाक्षः—विजयशील रथवाले, २८९ विशारदः—विद्वान्, २९० संग्रहः—संग्रह करनेवाले, २९१ निग्रहः—उद्दण्डोंको दण्ड देनेवाले, २९२ कर्ता—सबके उत्पादक, २९३ सर्पचीर-निवासनः—सर्पमय चीर धारण करनेवाले ।। ६५ ।।
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः ।
सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक् ।। ६६ ।।
सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः ।
आकाशनिर्विरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः ।। ६७ ।।
२९४ मुख्यः—सर्वश्रेष्ठ, २९५ अमुख्यः—जिससे बढ़कर मुख्य दूसरा कोई न हो वह, २९६ देहः—देहस्वरूप, २९७ काहलिः—काहल नामक वाद्यविशेषको बजानेवाले, २९८ सर्वकामदः—सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, २९९ सर्वकालप्रसादः—सर्वदा कृपा करनेवाले, ३०० सुबलः—उत्तम बलसे सम्पन्न, ३०१ बलरूपधृक्—बल और रूपके आधार, ३०२ सर्वकामवरः—सम्पूर्ण कमनीय पदार्थोंमें श्रेष्ठ—मोक्षस्वरूप, ३०३ सर्वदः—सब कुछ देनेवाले, ३०४ सर्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले, ३०५ आकाशनिर्विरूपः—आकाशकी भाँति जिनसे नाना प्रकारके रूप प्रकट होते हैं वे, ३०६ निपाती—पापियोंको नरकमें गिरानेवाले, ३०७ अवशः—जिनके ऊपर किसीका वश नहीं चलता वे, ३०८ खगः—आकाशगामी ।। ६६-६७ ।।
रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी ।
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ।। ६८ ।।
३०९ रौद्ररूपः—भयंकर रूपधारी, ३१० अंशुः—किरणस्वरूप, ३११ आदित्यः—अदितिपुत्र, ३१२ बहुरश्मिः—असंख्य किरणोंवाले, सूर्यरूप, ३१३ सुवर्चसी—उत्तम तेजसे सम्पन्न, ३१४ वसुवेगः—वायुके समान वेगवाले, ३१५ महावेगः—वायुसे भी अधिक वेगशाली, ३१६ मनोवेगः—मनके समान वेगवाले, ३१७ निशाचरः—रात्रिमें विचरनेवाले ।। ६८ ।।
सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः ।
मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः ।। ६९ ।।
३१८ सर्ववासी—सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मरूपसे निवास करनेवाले, ३१९ श्रियावासी—लक्ष्मीके साथ निवास करनेवाले विष्णुरूप, ३२० उपदेशकरः—जिज्ञासुओंको तत्त्वका और काशीमें मरे हुए जीवोंको तारकमन्त्रका उपदेश करनेवाले, ३२१ अकरः—कर्तृत्वके अभिमानसे रहित, ३२२ मुनिः—मननशील, ३२३ आत्मनिरालोकः—देह आदिकी उपाधिसे अलग होकर आलोचना करनेवाले, ३२४ सम्भग्नः—सम्यक् रूपसे सेवित, ३२५ सहस्रदः—हजारोंका दान करनेवाले ।। ६९ ।।
पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशाम्पतिः ।

उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः ॥ ७० ॥ ३२६ पक्षी—गरुड़रूपधारी, ३२७ पक्षरूपः—शुक्लपक्षस्वरूप, ३२८ अतिदीप्तः—अत्यन्त तेजस्वी, ३२९ विशाम्पतिः—प्रजाओंके स्वामी, ३३० उन्मादः—प्रेममें उन्मत्त, ३३१ मदनः—कामदेवरूप, ३३२ कामः—कमनीय विषय, ३३३ अश्वत्थः—संसार-वृक्षरूप, ३३४ अर्थकरः—धन आदि देनेवाले, ३३५ यशः—यशस्वरूप ॥ ७० ॥

वामदेवश्च वामश्च प्राग् दक्षिणश्च वामनः । सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः ॥ ७१ ॥ ३३६ वामदेवः—वामदेव ऋषिस्वरूप, ३३७ वामः—पापियोंके प्रतिकूल, ३३८ प्राक्—सबके आदि, ३३९ दक्षिणः—कुशल, ३४० वामनः—बलिको बाँधनेवाले वामन रूपधारी, ३४१ सिद्धयोगी—सनत्कुमार आदि सिद्ध महात्मा, ३४२ महर्षिः—वसिष्ठ आदि, ३४३ सिद्धार्थः—आप्तकाम, ३४४ सिद्धसाधकः—सिद्ध और साधकरूप ॥ ७१ ॥

भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः । महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः ॥ ७२ ॥ ३४५ भिक्षुः—संन्यासी, ३४६ भिक्षुरूपः—श्रीराम-कृष्ण आदिकी बालछविका दर्शन करनेके लिये भिक्षुरूप धारण करनेवाले, ३४७ विपणः—व्यवहारसे अतीत, ३४८ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ३४९ अव्ययः—अविनाशी, ३५० महासेनः—देव-सेनापति कार्तिकेयरूप, ३५१ विशाखः—कार्तिकेयके सहायक, ३५२ षष्टिभागः—प्रभव आदि साठ भागोंमें विभक्त संवत्सररूप, ३५३ गवाम्पतिः—इन्द्रियोंके स्वामी ॥ ७२ ॥

वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च । वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः ॥ ७३ ॥ ३५४ वज्रहस्तः—हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्ररूप, ३५५ विष्कम्भी—विस्तारयुक्त, ३५६ चमूस्तम्भनः—दैत्यसेनाको स्तब्ध करनेवाले, ३५७ वृत्तावृत्तकरः—युद्धमें रथके द्वारा मण्डल बनाना वृत्त कहलाता है और शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अक्षत शरीरसे लौट आना आवृत्त कहलाता है। इन दोनोंको कुशलतापूर्वक करनेवाले, ३५८ तालः—संसारसागरके तल प्रदेश—आधार-स्थान अर्थात् शुद्ध ब्रह्मको जाननेवाले, ३५९ मधुः—वसन्त ऋतुरूप, ३६० मधुकलोचनः—मधुके समान पिंगल नेत्रवाले ॥ ७३ ॥

वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः । ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित् ॥ ७४ ॥ ३६१ वाचस्पत्यः—पुरोहितका काम करनेवाले, ३६२ वाजसनः—शुक्ल यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखाके प्रवर्तक, ३६३ नित्यमाश्रमपूजितः—सदा आश्रमोंद्वारा पूजित होनेवाले, ३६४ ब्रह्मचारी—ब्रह्मनिष्ठ, ३६५ लोकचारी—सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, ३६६ सर्वचारी—सर्वत्र गमन करनेवाले, ३६७ विचारवित्—विचारोंके ज्ञाता ॥ ७४ ॥

ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकवान् । निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥ ७५ ॥ ३६८ ईशानः—नियन्ता, ३६९ ईश्वरः—सबके शासक, ३७० कालः—कालस्वरूप, ३७१ निशाचारी—प्रलयकालकी रातमें विचरनेवाले, ३७२ पिनाकवान्—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ३७३ निमित्तस्थः—अन्तर्यामी, ३७४ निमित्तम्—निमित्त कारणरूप, ३७५ नन्दिः—ज्ञानसम्पत्तिरूप, ३७६ नन्दिकरः—ज्ञानरूपसम्पत्ति देनेवाले, ३७७ हरिः—विष्णुस्वरूप ॥

नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्द्धनः । भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः ॥ ७६ ॥ ३७८ नन्दीश्वरः—नन्दी नामक पार्षदके स्वामी, ३७९ नन्दी—नन्दी नामक गणरूप, ३८० नन्दनः—परम आनन्द प्रदान करनेवाले, ३८१ नन्दिवर्द्धनः—समृद्धि बढ़ानेवाले, ३८२ भगहारी—ऐश्वर्यका अपहरण करनेवाले, ३८३ निहन्ता—मृत्युरूपसे सबको मारनेवाले, ३८४ कालः—चौंसठ कलाओंके निवासस्थान, ३८५ ब्रह्मा—लोकस्रष्टा ब्रह्मा, ३८६ पितामहः—प्रजापतिके भी पिता ॥ ७६ ॥

चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च । लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः ॥ ७७ ॥ ३८७ चतुर्मुखः—चार मुखवाले, ३८८ महालिङ्गः—महालिङ्गस्वरूप, ३८९ चारुलिङ्गः—रमणीय वेषधारी, ३९० लिङ्गाध्यक्षः—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके अध्यक्ष, ३९१ सुराध्यक्षः—देवताओंके अधिपति, ३९२ योगाध्यक्षः—योगके अध्यक्ष, ३९३ युगावहः—चारों युगोंके निर्वाहक ॥ ७७ ॥

बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः । इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः ॥ ७८ ॥ ३९४ बीजाध्यक्षः—कारणोंके अध्यक्ष, ३९५ बीजकर्ता—कारणोंके उत्पादक, ३९६ अध्यात्मानुगतः—अध्यात्मशास्त्रका अनुसरण करनेवाले, ३९७ बलः—बलवान्, ३९८ इतिहासः—महाभारत आदि इतिहासरूप, ३९९ सकल्पः—कल्प—यज्ञोंके प्रयोग और विधिके विचारके साथ मीमांसा और न्यायका समूह, ४०० गौतमः—तर्कशास्त्रके प्रणेता मुनिस्वरूप, ४०१ निशाकरः—चन्द्रमारूप ॥ ७८ ॥

दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः । लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः ॥ ७९ ॥ ४०२ दम्भः—शत्रुओंका दमन करनेवाले, ४०३ अदम्भः—दम्भरहित, ४०४ वैदम्भः—दम्भरहित पुरुषोंके आत्मीय, ४०५ वश्यः—भक्तपराधीन, ४०६ वशकरः—दूसरोंको वशमें करनेकी शक्ति रखनेवाले, ४०७ कलिः—कलि नामक युग, ४०८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ४०९ पशुपतिः—पशुओं—जीवोंके स्वामी, ४१० महाकर्ता—

पञ्च महाभूतादि सृष्टिकी रचना करनेवाले, ४११ अनौषधः—अन्न आदि ओषधियोंके सेवनसे रहित ॥ ७९ ॥

अक्षरं परमं ब्रह्म बलवच्छक्र एव च । नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो गतागतः ॥ ८० ॥

४१२ अक्षरम्—अविनाशी ब्रह्म, ४१३ परमं ब्रह्म—सर्वोत्कृष्ट परमात्मा, ४१४ बलवत्—शक्तिशाली, ४१५ शक्रः—इन्द्र, ४१६ नीतिः—न्यायस्वरूप, ४१७ अनीतिः—साम, दाम, दण्ड, भेदसे रहित, ४१८ शुद्धात्मा—शुद्धस्वरूप, ४१९ शुद्धः—परम पवित्र, ४२० मान्यः—सम्मानके योग्य, ४२१ गतागतः—गमनागमनशील संसारस्वरूप ॥ ८० ॥

बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् । वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ॥ ८१ ॥

४२२ बहुप्रसादः—भक्तोंपर अधिक कृपा करनेवाले, ४२३ सुस्वप्नः—सुन्दर स्वप्नवाले, ४२४ दर्पणः—दर्पणके समान स्वच्छ, ४२५ अमित्रजित्—बाहर-भीतरके शत्रुओंको जीतनेवाले, ४२६ वेदकारः—वेदोंका कर्ता, ४२७ मन्त्रकारः—मन्त्रोंका आविष्कार करनेवाले, ४२८ विद्वान्—सर्वज्ञ, ४२९ समरमर्दनः—समरांगणमें शत्रुओंका संहार करनेवाले ॥ ८१ ॥

महामेघनिवासी च महाघोरो वशी करः । अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥ ८२ ॥

४३० महामेघनिवासी—प्रलयकालिक महामेघोंमें निवास करनेवाले, ४३१ महाघोरः—प्रलय करनेवाले, ४३२ वशी—सबको वशमें रखनेवाले, ४३३ करः—संहारकारी, ४३४ अग्निज्वालः—अग्निकी ज्वालाके समान तेजवाले, ४३५ महाज्वालः—अग्निसे भी महान् तेजवाले, ४३६ अतिधूम्रः—कालाग्निरूपसे सबके दाहकालमें अत्यन्त धूम्र वर्णवाले, ४३७ हुतः—आहुति पाकर प्रसन्न होनेवाले अग्निरूप, ४३८ हविः—घी-दूध आदि हवनीय पदार्थरूप ॥ ८२ ॥

वृषणः शङ्करो नित्यं वर्चस्वी धूमकेतनः । नीलस्तथाङ्ग्लुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥ ८३ ॥

४३९ वृषणः—कर्मफलकी वर्षा करनेवाले धर्मस्वरूप, ४४० शङ्करः—कल्याणकारी, ४४१ नित्यं वर्चस्वी—सदा तेजसे जगमगाते रहनेवाले, ४४२ धूमकेतनः—अग्निस্বরূপ, ४४३ नीलः—श्यामवर्ण श्रीहरि, ४४४ अङ्ग्लुब्धः—अपने श्रीअङ्गके सौन्दर्यपर स्वयं ही लुभाये रहनेवाले, ४४५ शोभनः—शोभाशाली, ४४६ निरवग्रहः—प्रतिबन्धरहित ॥ ८३ ॥

स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः । उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भपरायणः ॥ ८४ ॥

४४७ स्वस्तिदः—कल्याणदायक, ४४८ स्वस्तिभावः—कल्याणमयी सत्ता, ४४९ भागी—यज्ञमें भाग लेनेवाले, ४५० भागकरः—यज्ञके हविष्यका विभाजन करनेवाले, ४५१ लघुः—शीघ्रकारी, ४५२ उत्सङ्गः—संगरहित, ४५३ महाङ्गः—महान् अंगवाले, ४५४ महागर्भपरायणः—हिरण्यगर्भके परम आश्रय ।। ८४ ।। कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियं सर्वदेहिनाम् । महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ।। ८५ ।। ४५५ कृष्णवर्णः—श्यामवर्ण विष्णुस्वरूप, ४५६ सुवर्णः—उत्तम वर्णवाले, ४५७ सर्वदेहिनाम् इन्द्रियम्—समस्त देहधारियोंके इन्द्रियसमुदायरूप, ४५८ महापादः—लंबे पैरोंवाले त्रिविक्रमस्वरूप, ४५९ महाहस्तः—लंबे हाथवाले, ४६० महाकायः—विश्वरूप, ४६१ महायशाः—महान् सुयशवाले ।। ८५ ।। महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो निशालयः । महान्तको महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः ।। ८६ ।। ४६२ महामूर्धा—महान् मस्तकवाले, ४६३ महामात्रः—विशाल नापवाले, ४६४ महानेत्रः—विशाल नेत्रोंवाले, ४६५ निशालयः—निशा अर्थात् अविद्याके लयस्थान, ४६६ महान्तकः—मृत्युकी भी मृत्यु, ४६७ महाकर्णः—बड़े-बड़े कानवाले, ४६८ महोष्ठः—लंबे ओठवाले, ४६९ महाहनुः—पुष्ट एवं बड़ी ठोड़ीवाले ।। ८६ ।। महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानभाक् । महावक्षा महोरस्को ह्यन्तरात्मा मृगालयः ।। ८७ ।। ४७० महानासः—बड़ी नासिकावाले, ४७१ महाकम्बुः—बड़े कण्ठवाले, ४७२ महाग्रीवः—विशाल ग्रीवासे युक्त, ४७३ श्मशानभाक्—श्मशान भूमिमें क्रीडा करनेवाले ४७४ महावक्षाः—विशाल वक्षःस्थलवाले, ४७५ महोरस्कः—चौड़ी छातीवाले, ४७६ अन्तरात्मा—सबके अन्तरात्मा, ४७७ मृगालयः—मृग-शिशुको अपनी गोदमें लिये रहनेवाले ।। ८७ ।। लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः । महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ।। ८८ ।। ४७८ लम्बनः—अनेक ब्रह्माण्डोंके आश्रय, ४७९ लम्बितोष्ठः—प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपना ग्रास बनानेके लिये ओठोंको फैलाये रखनेवाले, ४८० महामायः—महामायावी, ४८१ पयोनिधिः—क्षीरसागररूप, ४८२ महादन्तः—बड़े-बड़े दाँतवाले, ४८३ महादंष्ट्रः—बड़ी-बड़ी दाढ़वाले, ४८४ महाजिह्वः—विशाल जिह्वावाले, ४८५ महामुखः—बहुत बड़े मुखवाले ।। ८८ ।। महानखो महारोमा महाकोशो महाजटः । प्रसन्नश्च प्रसादश्च प्रत्ययो गिरिसाधनः ।। ८९ ।।

४८६ महानखः—बड़े-बड़े नखवाले नृसिंह, ४८७ महारोमा—विशाल रोमवाले वराहरूप, ४८८ महाकोशः—बहुत बड़े पेटवाले, ४८९ महाजटः—बड़ी-बड़ी जटावाले, ४९० प्रसन्नः—आनन्दमग्न, ४९१ प्रसादः—प्रसन्नताकी मूर्ति, ४९२ प्रत्ययः—ज्ञानस्वरूप, ४९३ गिरिसाधनः—पर्वतको युद्धका साधन बनानेवाले ॥ ८९ ॥ स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः । वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः ॥ ९० ॥ ४९४ स्नेहनः—प्रजाओंके प्रति पिताकी भाँति स्नेह रखनेवाले, ४९५ अस्नेहनः—आसक्तिसे रहित, ४९६ अजितः—किसीसे पराजित न होनेवाले, ४९७ महामुनिः—अत्यन्त मननशील, ४९८ वृक्षाकारः—संसारवृक्षस्वरूप, ४९९ वृक्षकेतुः—वृक्षके समान ऊँची ध्वजावाले, ५०० अनलः—अग्निस्वरूप, ५०१ वायुवाहनः—वायुका वाहनके रूपमें उपयोग करनेवाले ॥ ९० ॥ गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च । अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥ ९१ ॥ ५०२ गण्डली—पहाड़ोंकी गुफाओंमें छिपकर रहनेवाले, ५०३ मेरुधामा—मेरु-पर्वतको अपना निवासस्थान बनानेवाले, ५०४ देवाधिपतिः—देवताओंके स्वामी, ५०५ अथर्वशीर्षः—अथर्ववेद जिनका मस्तक है वे, ५०६ सामास्यः—सामवेद जिनका मुख है वे, ५०७ ऋक्सहस्रामितेक्षणः—सहस्रों ऋचाएँ जिनके नेत्र हैं ॥ ९१ ॥ यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा । अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ॥ ९२ ॥ ५०८ यजुःपादभुजः—यजुर्वेद जिनके हाथ-पैर हैं, ५०९ गुह्यः—गोपनीयस्वरूप, ५१० प्रकाशः—भक्तोंपर कृपा करके स्वयं ही उनके समक्ष अपनेको प्रकाशित कर देनेवाले, ५११ जङ्गमः—चलने-फिरनेवाले, ५१२ अमोघार्थः—किसी वस्तुके लिये याचना करनेपर उसे अवश्य सफल बनानेवाले, ५१३ प्रसादः—दया करके शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, ५१४ अभिगम्यः—सुगमतासे प्राप्त होने योग्य, ५१५ सुदर्शनः—सुन्दर दर्शनवाले ॥ ९२ ॥ उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः । नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥ ९३ ॥ ५१६ उपकारः—उपकार करनेवाले, ५१७ प्रियः—भक्तोंके प्रेमास्पद, ५१८ सर्वः—सर्वस्वरूप, ५१९ कनकः—सुवर्णस्वरूप, ५२० काञ्चनच्छविः—काञ्चनके समान कमनीय कान्तिवाले, ५२१ नाभिः—समस्त भुवनका मध्यदेशरूप, ५२२ नन्दिकरः—आनन्द देनेवाले, ५२३ भावः—श्रद्धा-भक्तिस्वरूप, ५२४ पुष्करस्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी पुष्करका निर्माण करनेवाले, ५२५ स्थिरः—स्थिरस्वरूप ॥ द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः ।

नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥ ९४ ॥ ५२६ द्वादशः—ग्यारह रुद्रोंसे श्रेष्ठ बारहवें रुद्र, ५२७ त्रासनः—संहारकारी होनेके कारण भयानक, ५२८ आद्यः—सबके आदि कारण, ५२९ यज्ञः—यज्ञपुरुष, ५३० यज्ञसमाहितः—यज्ञमें उपस्थित रहनेवाले, ५३१ नक्तम्—प्रलयकालकी रात्रिस্বরূপ, ५३२ कलिः—कलिके स्वरूप, ५३३ कालः—सबको अपना ग्रास बनानेवाले कालरूप, ५३४ मकरः—मकराकार शिशुमार चक्र, ५३५ कालपूजितः—काल अर्थात् मृत्युके द्वारा पूजित ॥ ९४ ॥

सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः । भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरूर्गणः ॥ ९५ ॥ ५३६ सगणः—प्रमथ आदि गणोंसे युक्त, ५३७ गणकारः—बाणासुर आदि भक्तोंको अपने गणमें सम्मिलित करनेवाले, ५३८ भूतवाहनसारथिः—त्रिपुर-विनाशके लिये समस्त प्राणियोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले ब्रह्माजीको सारथि बनानेवाले, ५३९ भस्मशयः—भस्मपर शयन करनेवाले, ५४० भस्मगोप्ता—भस्मद्वारा रक्षा करनेवाले, ५४१ भस्मभूतः—भस्मस्वरूप, ५४२ तरुः—कल्पवृक्षस्वरूप, ५४३ गणः—भृंगिरिटि और नन्दिकेश्वर आदि पार्षदरूप ॥ ९५ ॥

लोकपालस्तथालोको महात्मा सर्वपूजितः । शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥ ९६ ॥ ५४४ लोकपालः—चतुर्दश भुवनोंका पालन करनेवाले, ५४५ अलोकः—लोकातीत, ५४६ महात्मा—, ५४७ सर्वपूजितः—सबके द्वारा पूजित, ५४८ शुक्लः—शुद्धस्वरूप, ५४९ त्रिशुक्लः—मन, वाणी और शरीर ये तीनों, ५५० सम्पन्नः—सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त, ५५१ शुचिः—परम पवित्र, ५५२ भूतनिषेवितः—समस्त प्राणियोंद्वारा सेवित ॥ ९६ ॥

आश्रमस्थः क्रियावस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः । विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः ॥ ९७ ॥ ५५३ आश्रमस्थः—चारों आश्रमोंमें धर्मरूपसे स्थित रहनेवाले, ५५४ क्रियावस्थः—यज्ञादि क्रियाओंमें संलग्न, ५५५ विश्वकर्ममतिः—संसारकी रचनारूप कर्ममें कुशल, ५५६ वरः—सर्वश्रेष्ठ, ५५७ विशालशाखः—लंबी भुजाओंवाले, ५५८ ताम्रोष्ठः—लाल-लाल ओठवाले, ५५९ अम्बुजालः—जलसमूह—सागररूप, ५६० सुनिश्चलः—सर्वथा निश्चलरूप ॥ ९७ ॥

कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोऽपरः । गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः ॥ ९८ ॥ ५६१ कपिलः—कपिल वर्ण, ५६२ कपिशः—पीले वर्णवाले, ५६३ शुक्लः—श्वेत वर्णवाले, ५६४ आयुः—जीवनरूप, ५६५ परः—प्राचीन, ५६६ अपरः—अर्वाचीन, ५६७

गन्धर्वः—चित्ररथ आदि गन्धर्वरूप, ५६८ अदितिः—देवमाता आदितिरूप, ५६९ तार्क्ष्यः—विनतानन्दन गरुडरूप, ५७० सुविज्ञेयः—सुगमतापूर्वक जानने योग्य, ५७१ सुशारदः—उत्तम वाणी बोलनेवाले ॥ ९८ ॥ परश्वधायुधो देवो अनुकारी सुबान्धवः । तुम्बवीणो महाक्रोध ऊर्ध्वरेता जलेशयः ॥ ९९ ॥ ५७२ परश्वधायुधः—फरसेका आयुधके रूपमें उपयोग करनेवाले परशुरामरूप, ५७३ देवः—महादेवस्वरूप, ५७४ अनुकारी—भक्तोंका अनुकरण करनेवाले, ५७५ सुबान्धवः—उत्तम बान्धवरूप, ५७६ तुम्बवीणः—तूँबीकी वीणा बजानेवाले, ५७७ महाक्रोधः—प्रलयकालमें महान् क्रोध प्रकट करनेवाले, ५७८ ऊर्ध्वरेताः—अस्खलितवीर्य, ५७९ जलेशयः—विष्णुरूपसे जलमें शयन करनेवाले ॥ ९९ ॥ उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः । सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥ १०० ॥ ५८० उग्रः—प्रलयकालमें भयंकर रूप धारण करनेवाले, ५८१ वंशकरः—वंशप्रवर्तक, ५८२ वंशः—वंशस्वरूप, ५८३ वंशनादः—श्रीकृष्णरूपसे वंशी बजानेवाले, ५८४ अनिन्दितः—निन्दारहित, ५८५ सर्वाङ्गरूपः—सर्वांग पूर्णरूपवाले, ५८६ मायावी—, ५८७ सुहृदः—हेतुरहित दयालु, ५८८ अनिलः—वायुस्वरूप, ५८९ अनलः—अग्निस्वरूप ॥ १०० ॥ बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः । सयज्ञारिः सकामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः ॥ १०१ ॥ ५९० बन्धनः—स्नेहबन्धनमें बाँधनेवाले, ५९१ बन्धकर्ता—बन्धनरूप संसारके निर्माता, ५९२ सुबन्धनविमोचनः—मायाके सुदृढ़ बन्धनसे छुड़ानेवाले, ५९३ सयज्ञारिः—दक्षयज्ञ-शत्रुओंके साथी, ५९४ सकामारिः—कामविजयी योगियोंके साथी, ५९५ महादंष्ट्रः—बड़ी-बड़ी दाढ़वाले नरसिंहरूप, ५९६ महायुधः—विशाल आयुधधारी ॥ १०१ ॥ बहुधा निन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः । अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥ १०२ ॥ ५९७ बहुधा निन्दितः—दक्ष और उनके समर्थकोंद्वारा अनेक प्रकारसे निन्दित, ५९८ शर्वः—प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले, ५९९ शङ्करः—कल्याणकारी, ६०० शङ्करः—भक्तोंको आनन्द देनेवाले, ६०१ अधनः—सांसारिक धनसे रहित, ६०२ अमरेशः—देवताओंके भी ईश्वर, ६०३ महादेवः—देवताओंके भी पूजनीय, ६०४ विश्वदेवः—सम्पूर्ण विश्वके आराध्यदेव, ६०५ सुरारिहा—देवशत्रुओंका वध करनेवाले ॥ १०२ ॥ अहिर्बुध्योऽनिलाभश्च चेकितानो हविस्तथा ।

अजैकपाच्च कापाली त्रिशंकुरजितः शिवः ॥ १०३ ॥ ६०६ अहिर्बुध्न्यः—शेषनागस्वरूप, ६०७ अनिलाभः—वायुके समान वेगवान्, ६०८ चेकितानः—अतिशय ज्ञानसम्पन्न, ६०९ हविः—हविष्यरूप, ६१० अजैकपाद्—ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक, ६११ कापाली—दो कपालोंसे निर्मित कपालरूप अखिल ब्रह्माण्डके अधीश्वर, ६१२ त्रिशंकुः—त्रिशंकुरूप, ६१३ अजितः—किसीके द्वारा पराजित न होनेवाले, ६१४ शिवः—कल्याणस्वरूप ॥ १०३ ॥ धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा । धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ॥ १०४ ॥ ६१५ धन्वन्तरिः—महावैद्य धन्वन्तरिरूप, ६१६ धूमकेतुः—अग्निस্বরূপ, ६१७ स्कन्दः—स्वामी कार्तिकेयस्वरूप, ६१८ वैश्रवणः—कुबेरस्वरूप, ६१९ धाता—सबको धारण करनेवाले, ६२० शक्रः—इन्द्रस्वरूप, ६२१ विष्णुः—सर्वव्यापी नारायणदेव, ६२२ मित्रः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ६२३ त्वष्टा—प्रजापति विश्वकर्मा, ६२४ ध्रुवः—नित्यस्वरूप, ६२५ धरः—आठ वसुओंमेंसे एक वसु धरस्वरूप ॥ प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः । उषङ्गुश्च विधाता च मान्धाता भूतभावनः ॥ १०५ ॥ ६२६ प्रभावः—उत्कृष्टभावसे सम्पन्न, ६२७ सर्वगो वायुः—सर्वव्यापी वायु—सूत्रात्मा, ६२८ अर्यमा—बारह आदित्योंमें एक आदित्य अर्यमारूप, ६२९ सविता—सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति करनेवाले, ६३० रविः—सूर्य, ६३१ उषङ्गुः—सर्वदाहक किरणोंवाले सूर्यरूप, ६३२ विधाता—प्रजाका विशेषरूपसे धारण-पोषण करनेवाले, ६३३ मान्धाता—जीवको तृप्ति प्रदान करनेवाले, ६३४ भूतभावनः—समस्त प्राणियोंके उत्पादक ॥ १०५ ॥ विभुर्वर्णविभावी च सर्वकामगुणावहः । पद्मनाभो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोऽनिलोऽनलः ॥ १०६ ॥ ६३५ विभुः—विविधरूपसे विद्यमान, ६३६ वर्णविभावी—श्वेत-पीत आदि वर्णोंको विविधरूपसे व्यक्त करनेवाले, ६३७ सर्वकाम-गुणावहः—समस्त भोगों और गुणोंकी प्राप्ति करानेवाले ६३८ पद्मनाभः—अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले विष्णुरूप, ६३९ महागर्भः—विशाल ब्रह्माण्डको उदरमें धारण करनेवाले, ६४० चन्द्रवक्त्रः—चन्द्रमा-जैसे मनोहर मुखवाले, ६४१ अनिलः—वायुदेव, ६४२ अनलः—अग्निदेव ॥ १०६ ॥ बलवांश्रोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचञ्चुरी । कुरुकर्ता कुरुवासी कुरुभूतो गुणौषधः ॥ १०७ ॥ ६४३ बलवान्—शक्तिशाली, ६४४ उपशान्तः—शान्तस्वरूप, ६४५ पुराणः—पुराणपुरुष, ६४६ पुण्यचञ्चुः—पुण्यके द्वारा जाननेमें आनेवाले, ६४७ ई—दयास্বরূপ, ६४८ कुरुकर्ता—कुरुक्षेत्रके निर्माता, ६४९ कुरुवासी—कुरुक्षेत्रनिवासी, ६५० कुरुभूतः

—कुरुक्षेत्रस्वरूप, ६५१ गुणौषधः—गुणोंको उत्पन्न करनेवाली ओषधिके समान ज्ञान, वैराग्य आदि गुणोंके उत्पादक ।। १०७ ।।

सर्वाशयो दर्भचारी सर्वेषां प्राणिनां पतिः ।
देवदेवः सुखासक्तः सदसत्सर्वरत्नवित् ।। १०८ ।।
६५२ सर्वाशयः—सबके आश्रय, ६५३ दर्भचारी—वेदीपर बिछे हुए—कुशोंपर रखे हुए हविष्यको भक्षण करनेवाले, ६५४ सर्वेषां प्राणिनां पतिः—समस्त प्राणियोंके स्वामी, ६५५ देवदेवः—देवताओंके भी देवता, ६५६ सुखासक्तः—अपने परमानन्दमय स्वरूपमें ही रत रहनेवाले, ६५७ सत्—सत्स्वरूप, ६५८ असत्—असत्स्वरूप, ६५९ सर्वरत्नवित्—सम्पूर्ण रत्नोंके ज्ञाता ।। १०८ ।।

कैलासगिरिवासी च हिमवद्गिरिसंश्रयः ।
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ।। १०९ ।।
६६० कैलासगिरिवासी—कैलास पर्वतपर निवास करनेवाले, ६६१ हिमवद्गिरिसंश्रयः—हिमालयपर्वतके निवासी, ६६२ कूलहारी—प्रबल प्रवाहरूपसे नदियोंके तटोंका अपहरण करनेवाले, ६६३ कूलकर्ता—पुष्कर आदि बड़े-बड़े सरोवरोंका निर्माण करनेवाले, ६६४ बहुविद्यः—बहुत-सी विद्याओंके ज्ञाता, ६६५ बहुप्रदः—बहुत अधिक देनेवाले ।। १०९ ।।

वणिजो वर्धकी वृक्षो बकुलश्चन्दनश्छदः ।
सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः ।। ११० ।।
६६६ वणिजो—वैश्यरूप, ६६७ वर्धकी—संसाररूपी वृक्षको काटनेवाले बढ़ई, ६६८ वृक्षः—संसाररूप वृक्षस्वरूप, ६६९ बकुलः—मौलसिरी वृक्षस्वरूप, ६७० चन्दनः—चन्दन वृक्षस्वरूप, ६७१ छदः—छितवन वृक्षस्वरूप, ६७२ सारग्रीवः—सुदृढ़ कण्ठवाले, ६७३ महाजत्रुः—बहुत बड़ी हँसुलीवाले, ६७४ अलोलः—अचंचल, ६७५ महौषधः—महान् औषधस्वरूप ।। ११० ।।

सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छन्दोव्याकरणोत्तरः ।
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ।। १११ ।।
६७६ सिद्धार्थकारी—आश्रितजनोंको सफलमनोरथ करनेवाले, ६७७ सिद्धार्थः—वेदकी व्याख्यासे निर्णीत उत्कृष्ट सिद्धान्तस्वरूप, ६७८ सिंहनादः—सिंहके समान गर्जना करनेवाले, ६७९ सिंहदंष्ट्रः—सिंहके समान दाढ़वाले, ६८० सिंहगः—सिंहपर आरूढ़ होकर चलनेवाले, ६८१ सिंहवाहनः—सिंहपर सवारी करनेवाले ।। १११ ।।

प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः ।
सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः ।। ११२ ।।
६८२ प्रभावात्मा—उत्कृष्ट सत्तास्वरूप, ६८३ जगत्कालस्थालः—प्रलयकालमें जगत्का संहार करनेवाले कालके स्थान, ६८४ लोकहितः—लोकहितैषी, ६८५ तरुः

तारनेवाले, ६८६ सारङ्गः—चातकस्वरूप, ६८७ नवचक्राङ्गः—नूतन हंसरूप, ६८८ केतुमाली—ध्वजा-पताकाओंकी मालाओंसे अलंकृत, ६८९ सभावानः—धर्मस्थानकी रक्षा करनेवाले ।।

भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः ।। ११३ ।।

६९० भूतालयः—सम्पूर्ण भूतोंके घर, ६९१ भूतपतिः—सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी, ६९२ अहोरात्रम्—दिन-रात्रिस্বরূপ, ६९३ अनिन्दितः—निन्दारहित ।। ११३ ।।

वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः । अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ।। ११४ ।।

६९४ सर्वभूतानां वाहिता—सम्पूर्ण भूतोंका भार वहन करनेवाले, ६९५ सर्वभूतानां निलयः—समस्त प्राणियोंके निवासस्थान, ६९६ विभुः—सर्वव्यापी, ६९७ भवः—सत्तारूप, ६९८ अमोघः—कभी असफल न होनेवाले, ६९९ संयतः—संयमशील, ७०० अश्वः—उच्चैःश्रवा आदि उत्तम अश्वरूप, ७०१ भोजनः—अन्नदाता, ७०२ प्राणधारणः—सबके प्राणोंकी रक्षा करनेवाले ।। ११४ ।।

धृतिमान् मतिमान् दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः । गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरिः ।। ११५ ।।

७०३ धृतिमान्—धैर्यशाली, ७०४ मतिमान्—बुद्धिमान्, ७०५ दक्षः—चतुर, ७०६ सत्कृतः—सबके द्वारा सम्मानित, ७०७ युगाधिपः—युगके स्वामी, ७०८ गोपालिः—इन्द्रियोंके पालक, ७०९ गोपतिः—गौओंके स्वामी, ७१० ग्रामः—समूहरूप, ७११ गोचर्मवसनः—गोचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले, ७१२ हरिः—भक्तोंका दुःख हर लेनेवाले ।। ११५ ।।

हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम् । प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ।। ११६ ।।

७१३ हिरण्यबाहुः—सुनहरी कान्तिवाली सुन्दर भुजाओंसे सुशोभित, ७१४ गुहापालः प्रवेशिनाम्—गुफाके भीतर प्रवेश करनेवाले योगियोंकी गुफाके रक्षक, ७१५ प्रकृष्टारिः—काम, क्रोध आदि शत्रुओंको क्षीण कर देनेवाले, ७१६ महाहर्षः—परमानन्दस्वरूप, ७१७ जितकामः—कामविजयी, ७१८ जितेन्द्रियः—इन्द्रियविजयी ।। ११६ ।।

गान्धारश्च सुवासश्च तपःसक्तो रतिर्नरः । महागीतो महानृत्यो ह्यप्सरोगणसेवितः ।। ११७ ।।

७१९ गान्धारः—गान्धार नामक स्वररूप, ७२० सुवासः—कैलास नामक सुन्दर स्थानमें वास करनेवाले, ७२१ तपःसक्तः—तपस्यामें संलग्न, ७२२ रतिः—प्रीतिरूप, ७२३ नरः—विराट् पुरुष, ७२४ महागीतः—जिनके माहात्म्यका वेद-शास्त्रोंद्वारा गान किया गया है ऐसे महान् देव, ७२५ महानृत्यः—प्रकाण्ड ताण्डव करनेवाले, ७२६ अप्सरोगणसेवितः—अप्सराओंके समुदायसे सेवित ।। ११७ ।।

महाकेतुर्महाधातुर्नैकसानुचरश्चलः । आवेदनीय आदेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥ ११८ ॥ ७२७ महाकेतुः—धर्मरूप महान् ध्वजावाले, ७२८ महाधातुः—सुवर्णस्वरूप, ७२९ नैकसानुचरः—मेरुगिरिके अनेक शिखरोंपर विचरण करनेवाले, ७३० चलः—किसीकी पकड़में नहीं आनेवाले, ७३१ आवेदनीयः—प्रार्थना करनेयोग्य, ७३२ आदेशः—आज्ञा प्रदान करनेवाले, ७३३ सर्वगन्धसुखावहः—सम्पूर्ण गन्धादि विषयोंके सुखकी प्राप्ति करानेवाले ॥

तोरणस्तारणो वातः परिधी पतिकेचरः । संयोगो वर्धनो वृद्धो अतिवृद्धो गुणाधिकः ॥ ११९ ॥ ७३४ तोरणः—मुक्तिद्वारस्वरूप, ७३५ तारणः—तारनेवाले, ७३६ वातः—वायुरूप, ७३७ परिधीः—ब्रह्माण्डका घेरारूप, ७३८ पतिकेचरः—आकाशचारीका स्वामी, ७३९ वर्धनः संयोगः—वृद्धिका हेतुभूत स्त्री-पुरुषका संयोग, ७४० वृद्धः—गुणोंमें बढ़ा-चढ़ा, ७४१ अतिवृद्धः—सबसे पुरातन होनेके कारण अतिवृद्ध, ७४२ गुणाधिकः—ज्ञान-ऐश्वर्य आदि गुणोंके द्वारा सबसे अधिकतर ॥ ११९ ॥

नित्य आत्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः । युक्तश्च युक्तबाहुश्च देवो दिविसुपर्वणः ॥ १२० ॥ ७४३ नित्य आत्मसहायः—आत्माकी सदा सहायता करनेवाले, ७४४ देवासुरपतिः—देवताओं और असुरोंके स्वामी, ७४५ पतिः—सबके स्वामी, ७४६ युक्तः—भक्तोंके उद्धारके लिये सदा उद्यत रहनेवाले, ७४७ युक्तबाहुः—सबकी रक्षाके लिये उपयुक्त भुजाओंवाले, ७४८ देवो दिविसुपर्वणः—स्वर्गमें जो महान् देवता इन्द्र हैं, उनके भी आराध्यदेव ॥

आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हरः । वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥ १२१ ॥ ७४९ आषाढः—भक्तोंको सब कुछ सहन करनेकी शक्ति देनेवाले, ७५० सुषाढः—उत्तम सहनशील, ७५१ ध्रुवः—अविचलस्वरूप, ७५२ हरिणः—शुद्धस्वरूप, ७५३ हरः—पापहारी, ७५४ आवर्तमानेभ्यो वपुः—स्वर्गलोकसे लौटनेवालेको नूतन शरीर देनेवाले, ७५५ वसुश्रेष्ठः—श्रेष्ठ धनस्वरूप अर्थात् मुक्तिस्वरूप, ७५६ महापथः—सर्वोत्तम मार्गस्वरूप ॥ १२१ ॥

शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षितः । अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबलः ॥ १२२ ॥ ७५७ विमर्शः शिरोहारी—विवेकपूर्वक दुष्टोंका शिरश्छेद करनेवाले, ७५८ सर्वलक्षणलक्षितः—समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, ७५९ अक्षः रथयोगी—रथसे सम्बन्ध

रखनेवाला धुरीस्वरूप, ७६० सर्वयोगी—सभी समयमें योगयुक्त, ७६१ महाबलः—अनन्त शक्तिसे सम्पन्न ॥ १२२ ॥

समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः ।
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः ॥ १२३ ॥

७६२ समाम्नायः—वेदस्वरूप, ७६३ असमाम्नायः—वेदभिन्न स्मृति, इतिहास, पुराण और आगमरूप, ७६४ तीर्थदेवः—सम्पूर्ण तीर्थोंके देवस्वरूप, ७६५ महारथः—त्रिपुरदाहके समय पृथिवीरूपी विशाल रथपर आरूढ़ होनेवाले, ७६६ निर्जीवः—जड-प्रपञ्चस्वरूप, ७६७ जीवनः—जीवनदाता, ७६८ मन्त्रः—प्रणव आदि मन्त्रस्वरूप, ७६९ शुभाक्षः—मंगलमयी दृष्टिवाले, ७७० बहुकर्कशः—संहारकालमें अत्यन्त कठोर स्वभाववाले ॥ १२३ ॥

रत्नप्रभूतो रत्नाङ्गो महार्णवनिपानवित् ।
मूलं विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः ॥ १२४ ॥

७७१ रत्नप्रभूतः—अनेक रत्नोंके भण्डाररूप, ७७२ रत्नाङ्गः—रत्नमय अंगवाले, ७७३ महार्णव-निपानवित्—महासागररूपी निपानों (हौजों)-को जाननेवाले, ७७४ मूलम्—संसाररूपी वृक्षके कारण, ७७५ विशालः—अत्यन्त शोभायमान, ७७६ अमृतः—अमृतस्वरूप, मुक्तिस्वरूप, ७७७ व्यक्ताव्यक्तः—साकार-निराकार स्वरूप, ७७८ तपोनिधिः—तपस्याके भण्डार ॥ १२४ ॥

आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महायशाः ।
सेनाकल्पो महाकल्पो योगो युगकरो हरिः ॥ १२५ ॥

७७९ आरोहणः—परम पदपर आरूढ़ होनेके द्वारस्वरूप, ७८० अधिरोहः—परम पदपर आरूढ़, ७८१ शीलधारी—सुशीलसम्पन्न, ७८२ महायशाः—महान् यशसे सम्पन्न, ७८३ सेनाकल्पः—सेनाके आभूषणरूप, ७८४ महाकल्पः—बहुमूल्य अलंकारोंसे अलंकृत, ७८५ योगः—चित्तवृत्तियोंके निरोधस्वरूप, ७८६ युगकरः—युगप्रवर्तक, ७८७ हरिः—भक्तोंका दुःख हर लेनेवाले ॥ १२५ ॥

युगरूपो महारूपो महानागहनोऽवधः ।
न्यायनिर्वपणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः ॥ १२६ ॥

७८८ युगरूपः—युगस्वरूप, ७८९ महारूपः—महान्‌रूपवाले, ७९० महानागहनः—विशालकाय गजासुरका वध करनेवाले, ७९१ अवधः—मृत्युरहित, ७९२ न्यायनिर्वपणः—न्यायोचित दान करनेवाले, ७९३ पादः—शरण लेनेयोग्य (पद्यते भक्तैः इति पादः), ७९४ पण्डितः—ज्ञानी, ७९५ अचलोपमः—पर्वतके समान अविचल ॥ १२६ ॥

बहुमालो महामालः शशी हरसुलोचनः ।
विस्तारो लवणः कूपस्त्रियुगः सफलोदयः ॥ १२७ ॥

७९६ बहुमालः—बहुत-सी मालाएँ धारण करनेवाले, ७९७ महामालः—महती—पैरोंतक लटकनेवाली माला धारण करनेवाले, ७९८ शशी हरसुलोचनः—चन्द्रमाके समान सौम्य दृष्टियुक्त महादेव, ७९९ विस्तारो लवणः कूपः—विस्तृत क्षारसमुद्रस्वरूप, ८०० त्रियुगः—सत्ययुग, त्रेता और द्वापर त्रिविध युगस्वरूप, ८०१ सफलोदयः—जिसका अवताररूपमें प्रकट होना सफल है ॥ १२७ ॥

त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधरः ।
बिन्दुर्विसर्गः सुमुखः शरः सर्वायुधः सहः ॥ १२८ ॥
८०२ त्रिलोचनः—त्रिनेत्रधारी, ८०३ विषण्णाङ्गः—अंगरहित अर्थात् सर्वथा निराकार, ८०४ मणिविद्धः—मणिका कुण्डल पहननेके लिये छिदे हुए कर्णवाले, ८०५ जटाधरः—जटाधारी, ८०६ बिन्दुः—अनुस्वाररूप, ८०७ विसर्गः—विसर्जनीयस्वरूप, ८०८ सुमुखः—सुन्दर मुखवाले, ८०९ शरः—बाणस्वरूप, ८१० सर्वायुधः—सम्पूर्ण आयुधोंसे युक्त, ८११ सहः—सहनशील ॥ १२८ ॥

निवेदनः सुखाजातः सुगन्धारो महाधनुः ।
गन्धपाली च भगवानुत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥ १२९ ॥
८१२ निवेदनः—सब प्रकारकी वृत्तिसे रहित ज्ञानवाले, ८१३ सुखाजातः—सब वृत्तियोंका लय होनेपर सुखरूपसे प्रकट होनेवाले, ८१४ सुगन्धारः—उत्तम गन्धसे युक्त, ८१५ महाधनुः—पिनाक नामक विशाल धनुष धारण करनेवाले, ८१६ भगवान् गन्धपाली—उत्तम गन्धकी रक्षा करनेवाले भगवान्, ८१७ सर्वकर्मणामुत्थानः—समस्त कर्मोंके उत्थानस्थान ॥ १२९ ॥

मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः ।
तलस्तालः करस्थाली ऊर्ध्वसंहननो महान् ॥ १३० ॥
८१८ मन्थानो बहुलो वायुः—विश्वको मथ डालनेमें समर्थ प्रलयकालकी महान् वायुस्वरूप, ८१९ सकलः—सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, ८२० सर्वलोचनः—सबके द्रष्टा, ८२१ तलस्तालः—हाथपर ही ताल देनेवाले, ८२२ करस्थाली—हाथोंसे ही भोजनपात्रका काम लेनेवाले, ८२३ ऊर्ध्वसंहननः—सुदृढ़ शरीरवाले, ८२४ महान्—श्रेष्ठतम ॥ १३० ॥

छत्रं सुच्छत्रो विख्यातो लोकः सर्वाश्रयः क्रमः ।
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः ॥ १३१ ॥
८२५ छत्रम्—छत्रके समान पाप-तापसे सुरक्षित रखनेवाले, ८२६ सुच्छत्रः—उत्तम छत्रस्वरूप, ८२७ विख्यातो लोकः—सुप्रसिद्ध लोकस्वरूप, ८२८ सर्वाश्रयः क्रमः—सबके आधारभूत गति, ८२९ मुण्डः—मुण्डित-मस्तक, ८३० विरूपः—विकट रूपवाले, ८३१ विकृतः—सम्पूर्ण विपरीत क्रियाओंको धारण करनेवाले, ८३२ दण्डी—दण्डधारी, ८३३ कुण्डी—खप्परधारी, ८३४ विकुर्वणः—क्रियाद्वारा अलभ्य ॥ १३१ ॥

हर्यक्षः ककुभो वज्री शतजिह्वः सहस्रपात् ।

सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥ १३२ ॥ ८३५ हर्यक्षः—सिंहस्वरूप, ८३६ ककुभः—सम्पूर्ण दिशास्वरूप, ८३७ वज्री—वज्रधारी, ८३८ शतजिह्वः—सैकड़ों जिह्वावाले, ८३९ सहस्रपात् सहस्रमूर्धा—सहस्रों पैर और मस्तकवाले, ८४० देवेन्द्रः—देवताओंके राजा, ८४१ सर्वदेवमयः—सम्पूर्ण देवस्वरूप, ८४२ गुरुः—सबके ज्ञानदाता ॥ १३२ ॥ सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत् । पवित्रं त्रिककुन्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः ॥ १३३ ॥ ८४३ सहस्रबाहुः—सहस्रों भुजाओंवाले, ८४४ सर्वाङ्गः—समस्त अंगोंसे सम्पन्न, ८४५ शरण्यः—शरण लेनेके योग्य, ८४६ सर्वलोककृत्—सम्पूर्ण लोकोंके उत्पन्न करनेवाले, ८४७ पवित्रम्—परम पावन, ८४८ त्रिककुन्मन्त्रः—त्रिपदा गायत्रीरूप, ८४९ कनिष्ठः—अदितिके पुत्रोंमें छोटे, वामनरूपधारी विष्णु, ८५० कृष्णपिङ्गलः—श्याम-गौर हरि-हर-मूर्ति ॥ १३३ ॥ ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान् । पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥ १३४ ॥ ८५१ ब्रह्मदण्डविनिर्माता—ब्रह्मदण्डका निर्माण करनेवाले, ८५२ शतघ्नीपाशशक्तिमान्—शतघ्नी, पाश और शक्तिसे युक्त, ८५३ पद्मगर्भः—ब्रह्मास्वरूप, ८५४ महागर्भः—जगत्रूप गर्भको धारण करनेवाले होनेसे महागर्भ, ८५५ ब्रह्मगर्भः—वेदको उदरमें धारण करनेवाले, ८५६ जलोद्भवः—एकार्णवके जलमें प्रकट होनेवाले ॥ १३४ ॥ गभस्तिर्ब्रह्मकृद् ब्रह्मी ब्रह्मविद् ब्राह्मणो गतिः । अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः ॥ १३५ ॥ ८५७ गभस्तिः—सूर्यस्वरूप, ८५८ ब्रह्मकृत्—वेदोंका आविष्कार करनेवाले, ८५९ ब्रह्मी—वेदाध्यायी, ८६० ब्रह्मवित्—वेदार्थवेत्ता, ८६१ ब्राह्मणः—ब्रह्मनिष्ठ, ८६२ गतिः—ब्रह्मनिष्ठोंकी परमगति, ८६३ अनन्तरूपः—अनन्त रूपवाले, ८६४ नैकात्मा—अनेक शरीरधारी, ८६५ तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः—ब्रह्माजीकी अपेक्षा प्रचण्ड तेजस्वी ॥ १३५ ॥ ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः । चन्दनी पद्मनालाग्रः सुरभ्युत्तरणो नरः ॥ १३६ ॥ ८६६ ऊर्ध्वगात्मा—देश-काल-वस्तुकृत उपाधिसे अतीत स्वरूपवाले, ८६७ पशुपतिः—जीवोंके स्वामी, ८६८ वातरंहाः—वायुके समान वेगशाली, ८६९ मनोजवः—मनके समान वेगशाली, ८७० चन्दनी—चन्दनचर्चित अंगवाले, ८७१ पद्मनालाग्रः—पद्मनालके मूल विष्णुस्वरूप, ८७२ सुरभ्युत्तरणः—सुरभिको नीचे उतारनेवाले, ८७३ नरः—पुरुषरूप ॥ १३६ ॥ कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृत् ।

उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृदुमाधवः ।। १३७ ।। ८७४ कर्णिकारमहास्रग्वी—कनेरकी बहुत बड़ी माला धारण करनेवाले, ८७५ नीलमौलिः—मस्तकपर नीलमणिमय मुकुट धारण करनेवाले, ८७६ पिनाकधृत्—पिनाक धनुषको धारण करनेवाले, ८७७ उमापतिः—उमा—ब्रह्मविद्याके स्वामी, ८७८ उमाकान्तः—पार्वतीके प्राण-प्रियतम, ८७९ जाह्नवीधृत्—गंगाको मस्तकपर धारण करनेवाले, ८८० उमाधवः—पार्वतीपति ।। १३७ ।।

वरो वराहो वरदो वरेण्यः सुमहास्वनः । महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः ।। १३८ ।। ८८१ वरो वराहः—श्रेष्ठ वराहरूपधारी भगवान्, ८८२ वरदः—वरदाता, ८८३ वरेण्यः—स्वामी बनाने योग्य, ८८४ सुमहास्वनः—महान् गर्जना करनेवाले, ८८५ महाप्रसादः—भक्तोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले, ८८६ दमनः—दुष्टोंका दमन करनेवाले, ८८७ शत्रुहा—शत्रुनाशक, ८८८ श्वेतपिङ्गलः—अर्धनारीनेश्वर वेशमें श्वेत-पिंगल वर्णवाले ।। १३८ ।।

पीतात्मा परमात्मा च प्रयतात्मा प्रधानधृत् । सर्वपार्श्वमुखस्त्र्यक्षो धर्मसाधारणो वरः ।। १३९ ।। ८८९ पीतात्मा—हिरण्मय पुरुष, ८९० परमात्मा—परब्रह्म परमेश्वर, ८९१ प्रयतात्मा—विशुद्धचित्त, ८९२ प्रधानधृत्—जगत्के कारणभूत त्रिगुणमय प्रधानके अधिष्ठानस्वरूप, ८९३ सर्वपार्श्वमुखः—सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर मुखवाले, ८९४ त्र्यक्षः—त्रिनेत्रधारी, ८९५ धर्मसाधारणो वरः—धर्म-पालनके अनुसार वर देनेवाले ।। १३९ ।।

चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वरः । साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सवितामृतः ।। १४० ।। ८९६ चराचरात्मा—चराचर प्राणियोंके आत्मा, ८९७ सूक्ष्मात्मा—अति सूक्ष्मस्वरूप, ८९८ अमृतो गोवृषेश्वरः—निष्काम धर्मके स्वामी, ८९९ साध्यर्षिः—साध्य देवताओंके आचार्य, ९०० आदित्यो वसुः—अदितिकुमार वसु, ९०१ विवस्वान् सवितामृतः—किरणोंसे सुशोभित एवं जगत्को उत्पन्न करनेवाले अमृतस्वरूप सूर्य ।। १४० ।।

व्यासः सर्गः सुसंक्षेपो विस्तरः पर्ययो नरः । ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः संख्यासमापनः ।। १४१ ।। ९०२ व्यासः—पुराण-इतिहास आदिके स्रष्टा वेदव्यासस्वरूप, ९०३ सर्गःसुसंक्षेपो विस्तरः—संक्षिप्त और विस्तृत सृष्टिस্বরূপ, ९०४ पर्ययो नरः—सब ओरसे व्याप्त करनेवाले वैश्वानरस्वरूप, ९०५ ऋतुः—ऋतुरूप, ९०६ संवत्सरः—संवत्सररूप, ९०७ मासः—मासरूप, ९०८ पक्षः—पक्षरूप, ९०९ संख्यासमापनः—पूर्वोक्त ऋतु आदिकी संख्या समाप्त करनेवाले पर्व (संक्रान्ति, दर्श, पूर्णमासादि) रूप ।। १४१ ।।

कलाः काष्ठा लवा मात्रा मुहूर्ताहःक्षपाः क्षणाः ।

विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्गमः ॥ १४२ ॥ ९१० कलाः, ९११ काष्ठाः, ९१२ लवाः, ९१३ मात्राः—(इत्यादि कालावयवस्वरूप), ९१४ मुहूर्ताहःक्षपाः—मुहूर्त, दिन और रात्रिरूप, ९१५ क्षणाः—क्षणरूप, ९१६ विश्वक्षेत्रम्—ब्रह्माण्डरूपी वृक्षके आधार, ९१७ प्रजाबीजम्—प्रजाओंके कारणरूप, ९१८ लिङ्गम्—महत्तत्त्वस्वरूप, ९१९ आद्यो निर्गमः—सबसे पहले प्रकट होनेवाले ॥ १४२ ॥

सदसद् व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः । स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ १४३ ॥ ९२० सत्—सत्स्वरूप, ९२१ असत्—असत्स्वरूप, ९२२ व्यक्तम्—साकाररूप, ९२३ अव्यक्तम्—निराकाररूप, ९२४ पिता, ९२५ माता, ९२६ पितामहः, ९२७ स्वर्गद्वारम्—स्वर्गके साधनस्वरूप, ९२८ प्रजाद्वारम्—प्रजाके कारण, ९२९ मोक्षद्वारम्—मोक्षके साधनस्वरूप, ९३० त्रिविष्टपम्—स्वर्गके साधनस्वरूप ॥ १४३ ॥

निर्वाणं ह्लादनश्चैव ब्रह्मलोकः परा गतिः । देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः ॥ १४४ ॥ ९३१ निर्वाणम्—मोक्षरूप, ९३२ ह्लादनः—आनन्द प्रदान करनेवाले, ९३३ ब्रह्मलोकः—ब्रह्मलोकस्वरूप, ९३४ परा गतिः—सर्वोत्कृष्ट गतिस्वरूप, ९३५ देवासुरविनिर्माता—देवताओं तथा असुरोंके जन्मदाता, ९३६ देवासुरपरायणः—देवताओं तथा असुरोंके परम आश्रय ॥ १४४ ॥

देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः । देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः ॥ १४५ ॥ ९३७ देवासुरगुरुः—देवताओं और असुरोंके गुरु, ९३८ देवः—परम देवस्वरूप, ९३९ देवासुरनमस्कृतः—देवताओं और असुरोंसे वन्दित, ९४० देवासुरमहामात्रः—देवताओं और असुरोंसे अत्यन्त श्रेष्ठ, ९४१ देवासुरगणाश्रयः—देवताओं तथा असुरगणोंके आश्रय लेने योग्य ॥ १४५ ॥

देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः । देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः ॥ १४६ ॥ ९४२ देवासुरगणाध्यक्षः—देवताओं तथा असुरगणोंके अध्यक्ष, ९४३ देवासुरगणाग्रणीः—देवताओं तथा असुरोंके अगुआ, ९४४ देवातिदेवः—देवताओंसे बढ़कर महादेव, ९४५ देवर्षिः—नारदस्वरूप, ९४६ देवासुरवरप्रदः—देवताओं और असुरोंको भी वरदान देनेवाले ॥ १४६ ॥

देवासुरेश्वरो विश्वो देवासुरमहेश्वरः । सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्माऽऽत्मसम्भवः ॥ १४७ ॥