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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

उपमन्युरुवाच
नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः।
नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे ।। ११ ।।
उपमन्यु बोले— महादेवजीके समान कोई देवता नहीं है। महादेवजीके समान कोई गति नहीं है। दानमें शिवजीकी समानता करनेवाला कोई नहीं है तथा युद्धमें भी भगवान् शंकरके समान दूसरा कोई वीर नहीं है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने
पञ्चदशोऽध्यायः ।। १५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहन (इन्द्ररूपधारी महादेव)-की महिमाके प्रतिपादक पर्वकी कथामें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।


* यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं 'भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात् पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं। इनमें 'अमरप्रभाव' इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है। 'मैं कभी झूठ नहीं बोलती' इस कथनके द्वारा 'तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे' यह दूसरा वर सूचित होता है। सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है। उनका प्रिय होना चौथा वर है। अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है। बान्धवोंकी प्रीति छठा, शरीरकी कमनीयता सातवाँ और सात हजार अतिथियोंका भोजन आठवाँ वर है। इससे पहले जो सोलह और आठ वरके प्राप्त होनेकी बात कही गयी थी, उसकी संगति लग जाती है।

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षोडशोऽध्यायः

उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल

उपमन्युरुवाच

ऋषिरासीत् कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुतः ।
दशवर्षसहस्राणि तेन देवः समाधिना ।। १ ।।
आराधितोऽभूद् भक्तेन तस्योदर्कं निशामय ।
स दृष्टवान् महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम् ।। २ ।।

उपमन्यु कहते हैं—तात! सत्ययुगमें तण्डि नामसे विख्यात एक ऋषि थे जिन्होंने भक्तिभावसे ध्यानके द्वारा दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की थी। उन्हें जो फल प्राप्त हुआ था, उसे बता रहा हूँ, सुनिये। उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया और स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुकी स्तुति की ।। १-२ ।।

इति तण्डिस्तपोयोगात् परमात्मानमव्ययम् ।
चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मितः ।। ३ ।।

इस तरह तण्डिने तपस्यामें संलग्न होकर अविनाशी परमात्मा महामना शिवका चिन्तन करके अत्यन्त विस्मित हो इस प्रकार कहा था— ।। ३ ।।

यं पठन्ति सदा सांख्याश्चिन्तयन्ति च योगिनः ।
परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमीश्वरम् ।। ४ ।।
उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधाः ।
देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते ।। ५ ।।
अजं तमहमीशानमनादिनिधनं प्रभुम् ।
अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे ।। ६ ।।

‘सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्‌की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ' ।। ४—६ ।।

एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम् ।
तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम् ।। ७ ।।
निष्कलं सकलं ब्रह्म निर्गुणं गुणगोचरम् ।

योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम् ॥ ८ ॥ इतना कहते ही तण्डिने उन तपोनिधि, अविकारी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल, सकल, निर्गुण एवं सगुण ब्रह्मका दर्शन प्राप्त किया, जो योगियोंके परमानन्द, अविनाशी एवं मोक्षस्वरूप हैं ॥ ७-८ ॥ मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् । अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥ ९ ॥ वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं। मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता। वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ॥ ९ ॥ दुर्विज्ञेयमसंख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः । योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् ॥ १० ॥ उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। वे अप्रमेय हैं। जिन्होंने अपने अन्तःकरणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं। अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं ॥ १० ॥ यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मनः । तं देवं दर्शनाकाङ्क्षी बहून् वर्षगणानृषिः ॥ ११ ॥ तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्ट्वा तुष्टाव चेश्वरम् ॥ जो देवता अपनेको प्राणवान्—जीवस्वरूप बनाकर उसमें मनोमय ज्योति बनकर स्थित हुए थे, उन्हींके दर्शनकी अभिलाषासे तण्डि मुनि बहुत वर्षोंतक उग्र तपस्यामें लगे रहे। जब उनका दर्शन प्राप्त कर लिया तब उन मुनीश्वरने जगदीश्वर शिवकी इस प्रकार स्तुति की ॥ ११ १/२ ॥

तण्डिरुवाच

पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर ॥ १२ ॥ अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तपः । **तण्डिने कहा—**सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर! आप पवित्रोंमें भी परम पवित्र तथा गतिशील प्राणियोंकी उत्तम गति हैं। तेजोंमें अत्यन्त उग्र तेज और तपस्याओंमें उत्कृष्ट तप हैं ॥ १२ १/२ ॥ विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत ॥ १३ ॥ भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोऽस्तु ते । गन्धर्वराज विश्वावसु, दैत्यराज हिरण्याक्ष और देवराज इन्द्र भी आपकी वन्दना करते हैं। सबको महान् कल्याण प्रदान करनेवाले प्रभो! आप परम सत्य हैं। आपको नमस्कार है ॥ १३ १/२ ॥

जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो ॥ १४ ॥
निर्वाणद सहस्रांशो नमस्तेऽस्तु सुखाश्रय ।
विभो! जो जन्म-मरणसे भयभीत हो संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं, उन यतियोंको निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाले आप ही हैं। आप ही सहस्रों किरणोंवाले सूर्य होकर तप रहे हैं। सुखके आश्रयरूप महेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ १४½ ॥

ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः ॥ १५ ॥
न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वयम् ।
त्वत्तः प्रवर्तते सर्वं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १६ ॥
ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव तथा महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं। फिर हम कैसे जान सकते हैं। आपसे ही सबकी उत्पत्ति होती है तथा आपमें ही यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है ॥ १५-१६ ॥

कालाख्यः पुरुषाख्यश्च ब्रह्माख्यश्च त्वमेव हि ।
तनवस्ते स्मृतास्तिस्रः पुराणज्ञैः सुरर्षिभिः ॥ १७ ॥
काल, पुरुष और ब्रह्म—इन तीन नामोंद्वारा आप ही प्रतिपादित होते हैं। पुराणवेत्ता देवर्षियोंने आपके ये तीन रूप बताये हैं ॥ १७ ॥

अधिपौरुषमध्यात्ममधिभूताधिदैवतम् ।
अधिलोकाधिविज्ञानमधियज्ञस्त्वमेव हि ॥ १८ ॥
अधिपौरुष, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, अधिलोक, अधिविज्ञान और अधियज्ञ आप ही हैं ॥ १८ ॥

त्वां विदित्वात्मदेहस्थं दुर्विदं दैवतैरपि ।
विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ताः परं भावमनामयम् ॥ १९ ॥
आप देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय हैं। विद्वान् पुरुष आपको अपने ही शरीरमें स्थित अन्तर्यामी आत्माके रूपमें जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो रोग-शोकसे रहित परमभावको प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥

अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकतः ।
द्वारं तु स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च ॥ २० ॥
प्रभो! यदि आप स्वयं ही कृपा करके जीवका उद्धार करना न चाहें तो उसके बारंबार जन्म और मृत्यु होते रहते हैं। आप ही स्वर्ग और मोक्षके द्वार हैं। आप ही उनकी प्राप्तिमें बाधा डालनेवाले हैं तथा आप ही ये दोनों वस्तुएँ प्रदान करते हैं ॥ २० ॥

त्वं वै स्वर्गश्च मोक्षश्च कामः क्रोधस्त्वमेव च ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव अधश्चोर्ध्वं त्वमेव हि ॥ २१ ॥
आप ही स्वर्ग और मोक्ष हैं। आप ही काम और क्रोध हैं तथा आप ही सत्त्व, रज, तम, अधोलोक और ऊर्ध्वलोक हैं ॥ २१ ॥

ब्रह्मा भवश्च विष्णुश्च स्कन्देन्द्रौ सविता यमः । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वरः ॥ २२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, इन्द्र, सूर्य, यम, वरुण, चन्द्रमा, मनु, धाता, विधाता और धनाध्यक्ष कुबेर भी आप ही हैं ॥ २२ ॥ भूर्वायुः सलिलाग्निश्च खं वाग्बुद्धिः स्थितिर्मतिः । कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च ॥ २३ ॥ पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वाणी, बुद्धि, स्थिति, मति, कर्म, सत्य, असत्य तथा अस्ति और नास्ति भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च प्रकृतिभ्यः परं ध्रुवम् । विश्वाविश्वपरोभावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि ॥ २४ ॥ आप ही इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय हैं। आप ही प्रकृतिसे परे निश्चल एवं अविनाशी तत्त्व हैं। आप ही विश्व और अविश्व—दोनोंसे परे विलक्षण भाव हैं तथा आप ही चिन्त्य और अचिन्त्य हैं ॥ २४ ॥ यच्चैतत् परमं ब्रह्म यच्च तत् परमं पदम् । या गतिः सांख्ययोगानां स भवान् नात्र संशयः ॥ २५ ॥ जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परमपद है तथा जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंकी गति है, वह आप ही हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥ नूनमद्य कृतार्थाः स्म नूनं प्राप्ताः सतां गतिम् । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः ॥ २६ ॥ ज्ञानसे निर्मल बुद्धिवाले ज्ञानी पुरुष यहाँ जिस गतिको प्राप्त करना चाहते हैं, सत्पुरुषोंकी उसी गतिको निश्चित रूपसे हम प्राप्त हो गये हैं; अतः आज हम निश्चय ही कृतार्थ हो गये ॥ २६ ॥ अहो मूढाः स्म सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्मः परं देवं शाश्वतं यं विदुर्बुधाः ॥ २७ ॥ अहो, हम अज्ञानवश इतने दीर्घकालतक मोहमें पड़े रहे हैं, क्योंकि जिन्हें विद्वान् पुरुष जानते हैं, उन्हीं सनातन परमदेवको हम अबतक नहीं जान सके थे ॥ २७ ॥ सेयमासादिता साक्षात् त्वद्भक्तिर्जन्मभिर्मया । भक्तानुग्रहकृद् देवो यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ २८ ॥ अब अनेक जन्मोंके प्रयत्नसे मैंने यह साक्षात् आपकी भक्ति प्राप्त की है। आप ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले महान् देवता हैं, जिन्हें जानकर ज्ञानी पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥ २८ ॥ देवासुरमुनीनां तु यच्च गुह्यं सनातनम् । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि ॥ २९ ॥

स एष भगवान् देवः सर्वकृत् सर्वतोमुखः । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वगः सर्ववेदिता ॥ ३० ॥ जो सनातन ब्रह्म देवताओं, असुरों और मुनियोंके लिये भी गुह्य है, जो हृदयगुहामें स्थित रहकर मननशील मुनिके लिये भी दुर्विज्ञेय बने हुए हैं, वही ये भगवान् हैं। ये ही सबकी सृष्टि करनेवाले देवता हैं। इनके सब ओर मुख हैं। ये सर्वात्मा, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं ॥ २९-३० ॥ देहकृद् देहभृद् देही देहभुग्देहिनां गतिः । प्राणकृत् प्राणभृत् प्राणी प्राणदः प्राणिनां गतिः ॥ ३१ ॥ आप शरीरके निर्माता और शरीरधारी हैं, इसीलिये देही कहलाते हैं। देहके भोक्ता और देहधारियोंकी परम गति हैं। आप ही प्राणोंके उत्पादक, प्राणधारी, प्राणी, प्राणदाता तथा प्राणियोंकी गति हैं ॥ ३१ ॥ अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् । अपुनर्भवकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः ॥ ३२ ॥ ध्यान करनेवाले प्रियभक्तोंकी जो अध्यात्मगति हैं तथा पुनर्जन्मकी इच्छा न रखनेवाले आत्मज्ञानी पुरुषोंकी जो गति बतायी गयी है, वह ये ईश्वर ही हैं ॥ ३२ ॥ अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रदः । अयं च जन्ममरणे विदध्यात् सर्वजन्तुषु ॥ ३३ ॥ ये ही समस्त प्राणियोंको शुभ और अशुभ गति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही समस्त प्राणियोंको जन्म और मृत्यु प्रदान करते हैं ॥ ३३ ॥ अयं संसिद्धिकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः । भूराद्यान् सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकसः । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभिर्यो बिभर्ति च ॥ ३४ ॥ संसिद्धि (मुक्ति)-की इच्छा रखनेवाले पुरुषोंकी जो परम गति है, वह ये ईश्वर ही हैं। देवताओंसहित भू आदि समस्त लोकोंको उत्पन्न करके ये महादेव ही (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान—इन) अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा उनका धारण और पोषण करते हैं ॥ ३४ ॥ अतः प्रवर्तते सर्वमस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । अस्मिंश्च प्रलयं याति अयमेकः सनातनः ॥ ३५ ॥ इन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है और इन्हींमें सारा जगत् प्रतिष्ठित है और इन्हींमें सबका लय होता है। ये ही एक सनातन पुरुष हैं ॥ ३५ ॥ अयं स सत्यकामानां सत्यलोकः परं सताम् । अपवर्गश्च मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम् ॥ ३६ ॥

ये ही सत्यकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिये सर्वोत्तम सत्यलोक हैं। ये ही मुक्त पुरुषोंके अपवर्ग (मोक्ष) और आत्मज्ञानियोंके कैवल्य हैं॥ ३६॥

अयं ब्रह्मादिभिः सिद्धैर्गुहायां गोपितः प्रभुः।
देवासुरमनुष्याणामप्रकाशो भवेदिति ॥ ३७ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंको इनका पता न लगने पाये, मानो इसीलिये ब्रह्मा आदि सिद्ध पुरुषोंने इन परमेश्वरको अपनी हृदयगुफामें छिपा रखा है॥ ३७॥

तं त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम्।
मोहिताः खल्वनेनैव हृदिस्थेनाप्रकाशिना ॥ ३८ ॥
हृदयमन्दिरमें गूढ़भावसे रहकर प्रकाशित न होनेवाले इन परमात्मदेवने सबको अपनी मायासे मोहित कर रखा है। इसीलिये देवता, असुर और मनुष्य आप महादेवको यथार्थ रूपसे नहीं जान पाते हैं॥ ३८॥

ये चैनं प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविताः।
तेषामेवात्मनाऽऽत्मानं दर्शयत्येष हृच्छयः ॥ ३९ ॥
जो लोग भक्तियोगसे भावित होकर उन परमेश्वरकी शरण लेते हैं, उन्हींको यह हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले भगवान् स्वयं अपना दर्शन देते हैं॥ ३९॥

यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते।
यं विदित्वा परं वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते ॥ ४० ॥
यं लब्ध्वा परमं लाभं नाधिकं मन्यते बुधः।
यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम् ॥ ४१ ॥
यं सांख्या गुणतत्त्वज्ञाः सांख्यशास्त्रविशारदाः।
सूक्ष्मज्ञानतराः सूक्ष्मं ज्ञात्वा मुच्यन्ति बन्धनैः ॥ ४२ ॥
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम्।
प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च ॥ ४३ ॥
ओंकाररथमारुह्य ते विशन्ति महेश्वरम्।
अयं स देवयानानामादित्यो द्वारमुच्यते ॥ ४४ ॥
जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत्त्वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य ह्रास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्त्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और

उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। ॐकाररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं ॥ ४०—४४ ॥

अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते ।
एष काष्ठा दिशश्चैव संवत्सरयुगादि च ॥ ४५ ॥
दिव्यादिव्यः परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे ।
ये ही पितृयान-मार्गके द्वार चन्द्रमा कहलाते हैं। काष्ठा, दिशा, संवत्सर और युग आदि भी ये ही हैं। दिव्य लाभ (देवलोकका सुख), अदिव्य लाभ (इस लोकका सुख), परम लाभ (मोक्ष), उत्तरायण और दक्षिणायन भी ये ही हैं ॥ ४५ १/२ ॥

एनं प्रजापतिः पूर्वमाराध्य बहुभिः स्तवैः ॥ ४६ ॥
प्रजार्थं वरयामास नीललोहितसंज्ञितम् ।
पूर्वकालमें प्रजापतिने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा इन्हीं नीललोहित नामवाले भगवान्‌की आराधना करके प्रजाकी सृष्टिके लिये वर प्राप्त किया था ॥ ४६ १/२ ॥

ऋग्भिर्मनुशासन्ति तत्त्वे कर्मणि बह्वृचाः ॥ ४७ ॥
यजुर्भिर्यत्त्रिधा वेद्यं जुह्वत्यध्वर्यवोऽध्वरे ।
सामभिर्यं च गायन्ति सामगाः शुद्धबुद्धयः ॥ ४८ ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म स्तुवन्त्याथर्वणा द्विजाः ।
यज्ञस्य परमा योनिः पतिश्चायं परः स्मृतः ॥ ४९ ॥
ऋग्वेदके विद्वान् तात्त्विक यज्ञकर्ममें ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमाका गान करते हैं, यजुर्वेदके ज्ञाता द्विज यज्ञमें यजुर्मन्त्रोंद्वारा दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय—इन त्रिविध रूपोंसे जाननेयोग्य जिन महादेवजीके उद्देश्यसे आहुति देते हैं तथा शुद्ध बुद्धिसे युक्त सामवेदके गानेवाले विद्वान् साममन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति गाते हैं, अथर्ववेदी ब्राह्मण ऋत, सत्य एवं परब्रह्मनामसे जिनकी स्तुति करते हैं, जो यज्ञके परम कारण हैं, वे ही ये परमेश्वर समस्त यज्ञोंके परमपति माने गये हैं ॥ ४७—४९ ॥

रात्र्यहःश्रोत्रनयनः पक्षमासशिरोभुजः ।
ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो ह्यब्दगुह्योरुपादवान् ॥ ५० ॥
रात और दिन इनके कान और नेत्र हैं, पक्ष और मास इनके मस्तक और भुजाएँ हैं, ऋतु वीर्य है, तपस्या धैर्य है तथा वर्ष गुह्य-इन्द्रिय, ऊरु और पैर हैं ॥ ५० ॥

मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् ।
कालस्य परमा योनिः कालश्चायं सनातनः ॥ ५१ ॥
मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी—ये महादेव ही हैं ॥ ५१ ॥

चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्च सह वायुना ।
ध्रुवः सप्तर्षयश्चैव भुवनाः सप्त एव च ॥ ५२ ॥

प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम् ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत् ॥ ५३ ॥
अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्च यः परः ।
चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, वायु, ध्रुव, सप्तर्षि, सात भुवन, मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, विकारोंके सहित विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्व, ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, भूतादि, सत् और असत् आठ प्रकृतियाँ तथा प्रकृतिसे परे जो पुरुष है, इन सबके रूपमें ये महादेवजी ही विराजमान हैं ॥ ५२-५३ १/२ ॥
अस्य देवस्य यद् भागं कृत्स्नं सम्परिवर्तते ॥ ५४ ॥
एतत् परम्मानन्दं यत् तच्छाश्वतमेव च ।
एषा गतिर्विरक्तानामेष भावः परः सताम् ॥ ५५ ॥
इन महादेवजीका अंशभूत जो सम्पूर्ण जगत् चक्रकी भाँति निरन्तर चलता रहता है, वह भी ये ही हैं। ये परमानन्दस्वरूप हैं। जो शाश्वत ब्रह्म है, वह भी ये ही हैं। ये ही विरक्तोंकी गति हैं और ये ही सत्पुरुषोंके परमभाव हैं ॥ ५४-५५ ॥
एतत् पदमनुद्विग्नमेतद् ब्रह्म सनातनम् ।
शास्त्रवेदाङ्गविदुषामेतद् ध्यानं परं पदम् ॥ ५६ ॥
ये ही उद्वेगरहित परमपद हैं। ये ही सनातन ब्रह्म हैं। शास्त्रों और वेदाङ्गोंके ज्ञाता पुरुषोंके लिये ये ही ध्यान करनेके योग्य परमपद हैं ॥ ५६ ॥
इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला ।
इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गतिः ॥ ५७ ॥
इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वृतिः परा ।
यं प्राप्य कृतकृत्याः स्म इत्यमन्यन्त योगिनः ॥ ५८ ॥
यही वह पराकाष्ठा, यही वह परम कला, यही वह परम सिद्धि और यही वह परम गति हैं एवं यही वह परम शान्ति और वह परम आनन्द भी हैं, जिसको पाकर योगीजन अपनेको कृतकृत्य मानते हैं ॥
इयं तुष्टिरियं सिद्धिरियं श्रुतिरियं स्मृतिः ।
अध्यात्मगतिरिष्टानां विदुषां प्राप्तिरव्यया ॥ ५९ ॥
यह तुष्टि, यह सिद्धि, यह श्रुति, यह स्मृति, भक्तोंकी यह अध्यात्मगति तथा ज्ञानी पुरुषोंकी यह अक्षय प्राप्ति (पुनरावृत्तिरहित मोक्षलाभ) आप ही हैं ॥ ५९ ॥
यजतां कामयानानां मखैर्विपुलदक्षिणैः ।
या गतिर्यज्ञशीलानां सा गतिस्त्वं न संशयः ॥ ६० ॥
प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा सकाम भावसे यजन करनेवाले यजमानोंकी जो गति होती है, वह गति आप ही हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ६० ॥
सम्यग् योगजपैः शान्तिर्नियमैर्देहतापनैः ।

तप्यतां या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥ ६१ ॥ देव! उत्तम योग-जप तथा शरीरको सुखा देनेवाले नियमोंद्वारा जो शान्ति मिलती है और तपस्या करनेवाले पुरुषोंको जो दिव्य गति प्राप्त होती है, वह परम गति आप ही हैं ॥ ६१ ॥

कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्ततः । या गतिर्ब्रह्मसदने सा गतिस्त्वं सनातन ॥ ६२ ॥ सनातन देव! कर्म-संन्यासियोंको और विरक्तोंको ब्रह्मलोकमें जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं ॥ ६२ ॥

अपुनर्भवकामानां वैराग्ये वर्ततां च या । प्रकृतीनां लयानां च सा गतिस्त्वं सनातन ॥ ६३ ॥ सनातन परमेश्वर! जो मोक्षकी इच्छा रखकर वैराग्यके मार्गपर चलते हैं उन्हें, और जो प्रकृतिमें लयको प्राप्त होते हैं उन्हें, जो गति उपलब्ध होती है, वह आप ही हैं ॥ ६३ ॥

ज्ञानविज्ञानयुक्तानां निरुपाख्या निरञ्जना । कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥ ६४ ॥ देव! ज्ञान और विज्ञानसे युक्त पुरुषोंको जो सारूप्य आदि नामसे रहित, निरञ्जन एवं कैवल्यरूप परमगति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं ॥ ६४ ॥

वेदशास्त्रपुराणोक्ताः पञ्चैता गतयः स्मृताः । त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेऽन्यथा विभो ॥ ६५ ॥ प्रभो! वेद-शास्त्र और पुराणोंमें जो ये पाँच गतियाँ बतायी गयी हैं, ये आपकी कृपासे ही प्राप्त होती हैं, अन्यथा नहीं ॥ ६५ ॥

इति तण्डिस्तपोराशिस्तुष्टावेशानमात्मना । जगौ च परमं ब्रह्म यत् पुरा लोककृज्जगौ ॥ ६६ ॥ इस प्रकार तपस्याकी निधिरूप तण्डिने अपने मनसे महादेवजीकी स्तुति की और पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिस परम ब्रह्मस्वरूप स्तोत्रका गान किया था, उसीका स्वयं भी गान किया ॥ ६६ ॥

उपमन्युरुवाच

एवं स्तुतो महादेवस्तण्डिना ब्रह्मवादिना । उवाच भगवान् देव उमया सहितः प्रभुः ॥ ६७ ॥ उपमन्यु कहते हैं—ब्रह्मवादी तण्डिके इस प्रकार स्तुति करनेपर पार्वतीसहित प्रभावशाली भगवान् महादेव उनसे बोले— ॥ ६७ ॥

ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः । न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्टः प्रोवाच तं शिवः ॥ ६८ ॥

तण्डिने स्तुति करते हुए यह बात कही थी कि 'ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव और महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं', इससे भगवान् शंकर बहुत संतुष्ट हुए और बोले — ॥ ६८ ॥

श्रीभगवानुवाच

अक्षयश्चाव्ययश्चैव भविता दुःखवर्जितः । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ ६९ ॥ भगवान् श्रीशिवने कहा— ब्रह्मन्! तुम अक्षय, अविकारी, दुःखरहित, यशस्वी, तेजस्वी एवं दिव्यज्ञानसे सम्पन्न होओगे ॥ ६९ ॥

ऋषीणामभिगम्यश्च सूत्रकर्ता सुतस्तव । मत्प्रसादाद् द्विजश्रेष्ठ भविष्यति न संशयः ॥ ७० ॥ कं वा कामं ददाम्यद्य ब्रूहि यद् वत्स काङ्क्षसे । द्विजश्रेष्ठ! मेरी कृपासे तुम्हें एक विद्वान् पुत्र प्राप्त होगा, जिसके पास ऋषिलोग भी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये जायँगे। वह कल्पसूत्रका निर्माण करेगा, इसमें संशय नहीं है। वत्स! बोलो, तुम क्या चाहते हो? अब मैं तुम्हें कौन-सा मनोवांछित वर प्रदान करूँ? ॥ ७० ॥

प्राञ्जलिः स उवाचेदं त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे ॥ ७१ ॥ तब तण्डिने हाथ जोड़कर कहा—'प्रभो! आपके चरणारविन्दमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो' ॥ ७१ ॥

उपमन्युरुवाच

एतान् दत्त्वा वरान् देवो वन्द्यमानः सुरर्षिभिः । स्तूयमानश्च विबुधैस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७२ ॥ उपमन्युने कहा— देवर्षियोंद्वारा वन्दित और देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हुए महादेवजी इन वरोंको देकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ७२ ॥

अन्तर्हिते भगवति सानुगे यादवेश्वर । ऋषिराश्रममागम्य ममैतत् प्रोक्तवानिह ॥ ७३ ॥ यादवेश्वर! जब पार्षदोंसहित भगवान् अन्तर्धान हो गये, तब ऋषिने मेरे आश्रमपर आकर यहाँ मुझसे ये सब बातें बतायीं ॥ ७३ ॥

यानि च प्रथितान्यादौ तण्डिराख्यातवान् मम । नामानि मानवश्रेष्ठ तानि त्वं शृणु सिद्धये ॥ ७४ ॥ मानवश्रेष्ठ! तण्डिमुनिने जिन आदिकालके प्रसिद्ध नामोंका मेरे सामने वर्णन किया, उन्हें आप भी सुनिये। वे सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं ॥ ७४ ॥

दशनामसहस्राणि देवेष्वाह पितामहः ।

शर्वस्य शास्त्रेषु तथा दशनामशतानि च ॥ ७५ ॥ पितामह ब्रह्माने पूर्वकालमें देवताओंके निकट महादेवजीके दस हजार नाम बताये थे और शास्त्रोंमें भी उनके सहस्र नाम वर्णित हैं ॥ ७५ ॥ गुह्यानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतोऽच्युत । देवप्रसादाद् देवेशः पुरा प्राह महात्मने ॥ ७६ ॥ अच्युत! पहले देवेश्वर ब्रह्माजीने महादेवजीकी कृपासे महात्मा तण्डिके निकट जिन नामोंका वर्णन किया था, महर्षि तण्डिने भगवान् महादेवके उन्हीं समस्त गोपनीय नामोंका मेरे समक्ष प्रतिपादन किया था ॥ ७६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वकी कथाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

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सप्तदशोऽध्यायः

शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल

वासुदेव उवाच

ततः स प्रयतो भूत्वा मम तात युधिष्ठिर ।
प्राञ्जलिः प्राह विप्रर्षिर्नामसंग्रहमादितः ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—तात युधिष्ठिर! तदनन्तर ब्रह्मर्षि उपमन्युने मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके पवित्र हो हाथ जोड़ मेरे समक्ष वह नाम-संग्रह आदिसे ही कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥

उपमन्युरुवाच

ब्रह्मप्रोक्तैर्ऋषिप्रोक्तैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः ।
सर्वलोकेषु विख्यातं स्तुत्यं स्तोष्यामि नामभिः ॥ २ ॥

उपमन्यु बोले—मैं ब्रह्माजीके कहे हुए, ऋषियोंके बताये हुए तथा वेद-वेदाङ्गोंसे प्रकट हुए नामोंद्वारा सर्वलोकविख्यात एवं स्तुतिके योग्य भगवान्‌की स्तुति करूँगा ॥ २ ॥

महद्भिर्विहितैः सत्यैः सिद्धैः सर्वार्थसाधकैः ।
ऋषिणा तण्डिना भक्त्या कृतैर्वेदकृतात्मना ॥ ३ ॥
यथोक्तैः साधुभिः ख्यातैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
प्रवरं प्रथमं स्वर्ग्यं सर्वभूतहितं शुभम् ॥ ४ ॥
श्रुतैः सर्वत्र जगति ब्रह्मलोकावतारितैः ।
सत्यैस्तत् परमं ब्रह्म ब्रह्मप्रोक्तं सनातनम् ॥ ५ ॥
वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम ।
वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम् ॥ ६ ॥

इन सब नामोंका आविष्कार महापुरुषोंने किया है तथा वेदोंमें दत्तचित्त रहनेवाले महर्षि तण्डिने भक्तिपूर्वक इनका संग्रह किया है। इसलिये ये सभी नाम सत्य, सिद्ध तथा सम्पूर्ण मनोरथोंके साधक हैं। विख्यात श्रेष्ठ पुरुषों तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने इन सभी नामोंका यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है। महर्षि तण्डिने ब्रह्मलोकसे मर्त्यलोकमें इन नामोंको उतारा है; इसलिये ये सत्यनाम सम्पूर्ण जगत्‌में आदरपूर्वक सुने गये हैं। यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! यह ब्रह्माजीका कहा हुआ सनातन शिव-स्तोत्र अन्य स्तोत्रोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है और उत्तम वेदमय है। सब स्तोत्रोंमें इसका प्रथम स्थान है। यह स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकर एवं शुभकारक है। इसका मैं आपसे वर्णन करूँगा। आप

सावधान होकर मेरे मुखसे इसका श्रवण करें। आप परमेश्वर महादेवजीके भक्त हैं; अतः इस शिवस्वरूप स्तोत्रका वरण करें॥ ३—६॥

तेन ते श्रावयिष्यामि यत् तद् ब्रह्म सनातनम् । न शक्यं विस्तरात् कृत्स्नं वक्तुं सर्वस्य केनचित् ॥ ७ ॥ युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि । यस्यादिर्मध्यमन्तं च सुरैरपि न गम्यते ॥ ८ ॥ कस्तस्य शक्नुयाद् वक्तुं गुणान् कात्स्न्र्येन माधव ।

शिवभक्त होनेके ही कारण मैं यह सनातन वेदस्वरूप स्तोत्र आपको सुनाता हूँ। महादेवजीके इस सम्पूर्ण नामसमूहका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता। कोई व्यक्ति योगयुक्त होनेपर भी भगवान् शिवकी विभूतियोंका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं कर सकता। माधव! जिनके आदि, मध्य और अन्तका पता देवता भी नहीं पाते हैं, उनके गुणोंका पूर्णरूपसे वर्णन कौन कर सकता है? ॥ ७-८½ ॥

किं तु देवस्य महतः संक्षिप्तार्थपदाक्षरम् ॥ ९ ॥ शक्तितश्चरितं वक्ष्ये प्रसादात् तस्य धीमतः । अप्राप्य तु ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः ॥ १० ॥

परंतु मैं अपनी शक्तिके अनुसार उन बुद्धिमान् महादेवजीकी ही कृपासे संक्षिप्त अर्थ, पद और अक्षरोंसे युक्त उनके चरित्र एवं स्तोत्रका वर्णन करूँगा। उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना उन महेश्वरकी स्तुति नहीं की जा सकती है ॥ ९-१० ॥

यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुतो वै स तदा मया । अनादिनिधनस्याहं जगद्योनेर्महात्मनः ॥ ११ ॥ नाम्नां कंचित् समुद्देशं वक्ष्याम्यव्यक्तयोनिनः ।

जब उनकी आज्ञा प्राप्त हुई है, तभी मैंने उनकी स्तुति की है। आदि-अन्तसे रहित तथा जगत्के कारणभूत अव्यक्तयोनि महात्मा शिवके नामोंका कुछ संक्षिप्त संग्रह मैं बता रहा हूँ ॥ ११½ ॥

वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः ॥ १२ ॥ शृणु नाम्नां च यं कृष्ण यदुक्तं पद्मयोनिना ।

श्रीकृष्ण! जो वरदायक, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), विश्वरूप और बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् शिवका पद्मयोनि ब्रह्माजीके द्वारा वर्णित नाम-संग्रह श्रवण करो ॥

दशनामसहस्राणि यान्याह प्रपितामहः ॥ १३ ॥ तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।

प्रपितामह ब्रह्माजीने जो दस हजार नाम बताये थे, उन्हींको मनरूपी मथानीसे मथकर मथे हुए दहीसे घीकी भाँति यह सहस्रनामस्तोत्र निकाला गया है ॥

गिरेः सारं यथा हेम पुष्पसारं यथा मधु ॥ १४ ॥

घृतात् सारं यथा मण्डस्तथैतत् सारमुद्धृतम् । जैसे पर्वतका सार सुवर्ण, फूलका सार मधु और घीका सार मण्ड है, उसी प्रकार यह दस हजार नामोंका सार उद्धृत किया गया है ॥ १४ १/२ ॥ सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम् ॥ १५ ॥ प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना । माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत् ॥ १६ ॥ यह सहस्रनाम सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला और चारों वेदोंके समन्वयसे युक्त है। मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्त करे और सदा अपने मनमें इसको धारण करे। यह मङ्गलजनक, पुष्टिकारक, राक्षसोंका विनाशक तथा परम पावन है ॥ इदं भक्ताय दातव्यं श्रद्दधानास्तिकाय च । नाश्रद्दधानरूपाय नास्तिकायाजितात्मने ॥ १७ ॥ जो भक्त हो, श्रद्धालु और आस्तिक हो, उसीको इसका उपदेश देना चाहिये। अश्रद्धालु, नास्तिक और अजितात्मा पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ यश्चाभ्यसूयते देवं कारणात्मानमीश्वरम् । स कृष्ण नरकं याति सह पूर्वैः सहात्मजैः ॥ १८ ॥ श्रीकृष्ण! जो जगत्के कारणरूप ईश्वर महादेवके प्रति दोषदृष्टि रखता है, वह पूर्वजों और अपनी संतानके सहित नरकमें पड़ता है ॥ १८ ॥ इदं ध्यानमिदं योगमिदं ध्येयमनुत्तमम् । इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम् ॥ १९ ॥ यह सहस्रनामस्तोत्र ध्यान है, यह योग है, यह सर्वोत्तम ध्येय है, यह जपनीय मन्त्र है, यह ज्ञान है और यह उत्तम रहस्य है ॥ १९ ॥ यं ज्ञात्वा अन्तकालेऽपि गच्छेत परमां गतिम् । पवित्रं मङ्गलं मेध्यं कल्याणमिदमुत्तमम् ॥ २० ॥ इदं ब्रह्मा पुरा कृत्वा सर्वलोकपितामहः । सर्वस्तवानां राजत्वे दिव्यानां समकल्पयत् ॥ २१ ॥ तदाप्रभृति चैवायमीश्वरस्य महात्मनः । स्तवराज इति ख्यातो जगत्यमरपूजितः ॥ २२ ॥ जिसको अन्तकालमें भी जान लेनेपर मनुष्य परमगतिको पा लेता है, वह यह सहस्रनामस्तोत्र परम पवित्र, मङ्गलकारक, बुद्धिवर्द्धक, कल्याणमय तथा उत्तम है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने पूर्वकालमें इस स्तोत्रका आविष्कार करके इसे समस्त दिव्यस्तोत्रोंके राजाके पदपर प्रतिष्ठित किया था। तबसे महात्मा ईश्वर महादेवका यह देवपूजित स्तोत्र संसारमें 'स्तवराज' के नामसे विख्यात हुआ ॥ २०—२२ ॥ ब्रह्मलोकादयं स्वर्गे स्तवराजोऽवतारितः ।

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कारण भयंकर, ५ प्रवरः—सर्वश्रेष्ठ, ६ वरदः—अभीष्ट वर देनेवाले, ७ वरः—वरण करने योग्य, वरस्वरूप, ८ सर्वात्मा—सबके आत्मा, ९ सर्वविख्यातः—सर्वत्र प्रसिद्ध, १० सर्वः—विश्वात्मा होनेके कारण सर्वस्वरूप, ११ सर्वकरः—सम्पूर्ण जगत्‌के स्रष्टा, १२ भवः—सबकी उत्पत्तिके स्थान ॥ ३१ ॥

जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः ।
हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥ ३२ ॥

१३ जटी—जटाधारी, १४ चर्मी—व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, १५ शिखण्डी—शिखाधारी, १६ सर्वाङ्गः—सम्पूर्ण अंगोंसे सम्पन्न, १७ सर्वभावनः—सबके उत्पादक, १८ हरः—पापहारी, १९ हरिणाक्षः—मृगके समान विशाल नेत्रवाले, २० सर्वभूतहरः—सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाले, २१ प्रभुः—स्वामी ॥

प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः ।
श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः ॥ ३३ ॥

२२ प्रवृत्तिः—प्रवृत्तिमार्ग, २३ निवृत्तिः—निवृत्तिमार्ग, २४ नियतः—नियमपरायण, २५ शाश्वतः—नित्य, २६ ध्रुवः—अचल, २७ श्मशानवासी—श्मशानभूमिमें निवास करनेवाले, २८ भगवान्—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, ज्ञान, यज्ञ, श्री, वैराग्य और धर्मसे सम्पन्न, २९ खचरः—आकाशमें विचरनेवाले, ३० गोचरः—पृथ्वीपर विचरनेवाले, ३१ अर्दनः—पापियोंको पीड़ा देनेवाले ॥ ३३ ॥

अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः ।
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥ ३४ ॥

३२ अभिवाद्यः—नमस्कारके योग्य, ३३ महाकर्मा—महान् कर्म करनेवाले, ३४ तपस्वी—तपस्यामें संलग्न, ३५ भूतभावनः—संकल्पमात्रसे आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, ३६ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः—उन्मत्त वेषमें छिपे रहनेवाले, ३७ सर्वलोकप्रजापतिः—सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाओंके पालक ॥ ३४ ॥

महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः ।
महात्मा सर्वभूतात्मा विश्वरूपो महानुः ॥ ३५ ॥

३८ महारूपः—महान् रूपवाले, ३९ महाकायः—विराट्रूप, ४० वृषरूपः—धर्मस्वरूप, ४१ महायशाः—महान् यशस्वी, ४२ महात्मा—, ४३ सर्वभूतात्मा—सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ४४ विश्वरूपः—सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है वे, ४५ महाहनुः—विशाल ठोढ़ीवाले ॥ ३५ ॥

लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः ।
पवित्रं च महांश्चैव नियमो नियमाश्रितः ॥ ३६ ॥

४६ लोकपालः—लोकरक्षक, ४७ अन्तर्हितात्मा—अदृश्य स्वरूपवाले, ४८ प्रसादः—प्रसन्नतासे परिपूर्ण, ४९ हयगर्दभिः—खच्चर जुते रथपर चलनेवाले, ५० पवित्रम्

शुद्ध वस्तुरूप, ५१ महान्—पूजनीय, ५२ नियमः—शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनसे प्राप्त होने योग्य, ५३ नियमाश्रितः—नियमोंके आश्रयभूत ॥ ३६ ॥
सर्वकर्मा स्वयम्भूत आदिरादिकरो निधिः ।
सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥ ३७ ॥
५४ सर्वकर्मा—सारा जगत् जिनका कर्म है वे, ५५ स्वयम्भूतः—नित्यसिद्ध, ५६ आदिः—सबसे प्रथम, ५७ आदिकरः—आदि पुरुष हिरण्यगर्भकी सृष्टि करनेवाले, ५८ निधिः—अक्षय ऐश्वर्यके भण्डार, ५९ सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रवाले, ६० विशालाक्षः—विशाल नेत्रवाले, ६१ सोमः—चन्द्रस्वरूप, ६२ नक्षत्रसाधकः—नक्षत्रोंके साधक ॥ ३७ ॥
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः ।
अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ ३८ ॥
६३ चन्द्रः—चन्द्रमारूपसे आह्लादकारी, ६४ सूर्यः—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, ६५ शनिः—, ६६ केतुः—, ६७ ग्रहः—चन्द्रमा और सूर्यपर ग्रहण लगानेवाला राहु, ६८ ग्रहपतिः—ग्रहोंके पालक, ६९ वरः—वरणीय, ७० अत्रिः—अत्रि ऋषिस्वरूप, ७१ अत्र्या नमस्कर्ता—अत्रिपत्नी अनसूयाको दुर्वासारूपसे नमस्कार करनेवाले, ७२ मृगबाणार्पणः—मृगरूपधारी यज्ञपर बाण चलानेवाले, ७३ अनघः—पापरहित ॥ ३८ ॥
महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः ।
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥ ३९ ॥
७४ महातपाः—महान् तपस्वी, ७५ घोरतपाः—भयंकर तपस्या करनेवाले, ७६ अदीनः—उदार, ७७ दीनसाधकः—शरणमें आये हुए दीन-दुखियोंका मनोरथ सिद्ध करनेवाले, ७८ संवत्सरकरः—संवत्सरका निर्माता, ७९ मन्त्रः—प्रणव आदि मन्त्ररूप, ८० प्रमाणम्—प्रमाणस्वरूप, ८१ परमं तपः—उत्कृष्ट तपःस्वरूप ॥ ३९ ॥
योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः ।
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः ॥ ४० ॥
८२ योगी—योगनिष्ठ, ८३ योज्यः—मनोयोगके आश्रय, ८४ महाबीजः—महान् कारणरूप, ८५ महारेताः—महावीर्यशाली, ८६ महाबलः—महान् शक्तिसे सम्पन्न, ८७ सुवर्णरेताः—अग्निरूप, ८८ सर्वज्ञः—सब कुछ जाननेवाले, ८९ सुबीजः—उत्तम बीजरूप, ९० बीजवाहनः—जीवोंके संस्काररूप बीजको वहन करनेवाले ॥ ४० ॥
दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलो गणः ॥ ४१ ॥
९१ दशबाहुः—दस भुजाओंसे युक्त, ९२ अनिमिषः—कभी पलक न गिरानेवाले, ९३ नीलकण्ठः—जगत्की रक्षाके लिये हालाहल विषका पान करके उसके नील चिह्नको कण्ठमें धारण करनेवाले, ९४ उमापतिः—गिरिराजकुमारी उमाके पतिदेव, ९५ विश्वरूपः

—जगतस्वरूप, ९६ स्वयं श्रेष्ठः—स्वतःसिद्ध श्रेष्ठतासे सम्पन्न, ९७ बलवीरः—बलके द्वारा वीरता प्रकट करनेवाले, ९८ अबलो गणः—निर्बल समुदायस्वरूप ।। ४१ ।।

गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च ।
मन्त्रवित् परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ।। ४२ ।।

९९ गणकर्ता—अपने पार्षदगणोंका संघटन करनेवाले, १०० गणपतिः—प्रमथगणोंके स्वामी, १०१ दिग्वासाः—दिगम्बर, १०२ कामः—कमनीय, १०३ मन्त्रवित्—मन्त्रवेत्ता, १०४ परमो मन्त्रः—उत्कृष्ट मन्त्ररूप, १०५ सर्वभावकरः—समस्त पदार्थोंकी सृष्टि करनेवाले, १०६ हरः—दुःख हरण करनेवाले ।। ४२ ।।

कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् ।
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ।। ४३ ।।

१०७ कमण्डलुधरः—एक हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाले, १०८ धन्वी—दूसरे हाथमें धनुष धारण करनेवाले, १०९ बाणहस्तः—तीसरे हाथमें बाण लिये रहनेवाले, ११० कपालवान्—चौथे हाथमें कपालधारी, १११ अशनी—पाँचवें हाथमें वज्र धारण करनेवाले, ११२ शतघ्नी—छठे हाथमें शतघ्नी रखनेवाले, ११३ खड्गी—सातवेंमें खड्गधारी, ११४ पट्टिशी—आठवेंमें पट्टिश धारण करनेवाले, ११५ आयुधी—नवें हाथमें अपने सामान्य आयुध त्रिशूलको लिये रहनेवाले, ११६ महान्—सर्वश्रेष्ठ ।। ४३ ।।

सुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः ।
उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ।। ४४ ।।

११७ सुवहस्तः—दसवें हाथमें सुवा धारण करनेवाले, ११८ सुरूपः—सुन्दर रूपवाले, ११९ तेजः—तेजस्वी, १२० तेजस्करो निधिः—भक्तोंके तेजकी वृद्धि करनेवाले निधिरूप, १२१ उष्णीषी—सिरपर साफा धारण करनेवाले, १२२ सुवक्त्रः—सुन्दर मुखवाले, १२३ उदग्रः—ओजस्वी, १२४ विनतः—विनयशील ।। ४४ ।।

दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च ।
शृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः ।। ४५ ।।

१२५ दीर्घः—ऊँचे कदवाले, १२६ हरिकेशः—ब्रह्मा, विष्णु, महेशस्वरूप, १२७ सुतीर्थः—उत्तम तीर्थस्वरूप, १२८ कृष्णः—सच्चिदानन्दस्वरूप, १२९ शृगालरूपः—सियारका रूप धारण करनेवाले, १३० सिद्धार्थः—जिनके सभी प्रयोजन सिद्ध हैं, १३१ मुण्डः—मूँड़ मुड़ाये हुए, भिक्षुस्वरूप, १३२ सर्वशुभंकरः—समस्त प्राणियोंका हित करनेवाले ।। ४५ ।।

अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि ।
ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः ।। ४६ ।।

१३३ अजः—अजन्मा, १३४ बहुरूपः—बहुत-से रूप धारण करनेवाले, १३५ गन्धधारी—कुंकुम और कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ धारण करनेवाले, १३६ कपर्दी

जटाजूटधारी, १३७ ऊर्ध्वरेताः—अखण्डित ब्रह्मचर्यवाले, १३८ ऊर्ध्वलिङ्गः—, १३९ ऊर्ध्वशायी—आकाशमें शयन करनेवाले, १४० नभः स्थलः—आकाश जिनका वासस्थान है वे ।।

त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः । अहश्चरो नक्तंचरस्तिग्ममन्युः सुवर्चसः ।। ४७ ।।

१४१ त्रिजटी—तीन जटा धारण करनेवाले, १४२ चीरवासाः—वल्कल वस्त्र पहननेवाले, १४३ रुद्रः—दुःखको दूर भगानेवाले, १४४ सेनापतिः—सेनानायक, १४५ विभुः—सर्वव्यापी, १४६ अहश्चरः—दिनमें विचरनेवाले, १४७ नक्तंचरः—रातमें विचरनेवाले, १४८ तिग्ममन्युः—तीखे क्रोधवाले, १४९ सुवर्चसः—सुन्दर तेजवाले ।। ४७ ।।

गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः । सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः ।। ४८ ।।

१५० गजहा—गजरूपधारी महान् असुरको मारनेवाले, १५१ दैत्यहा—अन्धक आदि दैत्योंका वध करनेवाले, १५२ कालः—मृत्यु अथवा संवत्सर आदि समय, १५३ लोकधाता—समस्त जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, १५४ गुणाकरः—सद्गुणोंकी खान, १५५ सिंहशार्दूलरूपः—सिंह-व्याघ्र आदिका रूप धारण करनेवाले, १५६ आर्द्रचर्माम्बरावृतः—गजासुरके गीले चर्मको ही वस्त्र बनाकर उससे अपने-आपको आच्छादित करनेवाले ।। ४८ ।।

कालयोगी महानादः सर्वकामश्चतुष्पथः । निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ।। ४९ ।।

१५७ कालयोगी—कालको भी योगबलसे जीतनेवाले, १५८ महानादः—अनाहत ध्वनिरूप, १५९ सर्वकामः—सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न, १६० चतुष्पथः—जिनकी प्राप्तिके ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और अष्टाङ्गयोग—ये चार मार्ग हैं वे महादेव, १६१ निशाचरः—रात्रिके समय विचरनेवाले, १६२ प्रेतचारी—प्रेतोंके साथ विचरण करनेवाले, १६३ भूतचारी—भूतोंके साथ विचरनेवाले, १६४ महेश्वरः—इन्द्र आदि लोकेश्वरोंसे भी महान् ।।

बहुभूतो बहुधरः स्वर्भानुरमितो गतिः । नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलालसः ।। ५० ।।

१६५ बहुभूतः—सृष्टिकालमें एकसे अनेक होनेवाले, १६६ बहुधरः—बहुतोंको धारण करनेवाले, १६७ स्वर्भानुः—, १६८ अमितः—अनन्त, १६९ गतिः—भक्तों और मुक्तात्माओंके प्राप्त होने योग्य, १७० नृत्यप्रियः—ताण्डव नृत्य जिन्हें प्रिय है वे शिव, १७१ नित्यनर्तः—निरन्तर नृत्य करनेवाले, १७२ नर्तकः—नाचने-नचानेवाले, १७३ सर्वलालसः—सबपर प्रेम रखनेवाले ।। ५० ।।