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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः ॥ ७ ॥ दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः । ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि स गर्भश्चेतनान्वितः ॥ ८ ॥ वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं। वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान—वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है। तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है ॥ ७-८ ॥

यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम् । उपैति तद् विजानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम् ॥ ९ ॥ जैसे तपाये हुए लोहेका द्रव जैसे साँचेमें ढाला जाता है उसीका रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है, ऐसा समझो (अर्थात् जीव जिस प्रकारकी योनिमें प्रविष्ट होता है, उसी रूपमें उसका शरीर बन जाता है) ॥ ९ ॥

लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापयेत् । तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम् ॥ १० ॥ जैसे आग लोहपिण्डमें प्रविष्ट होकर उसे बहुत तपा देती है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है और वह उसमें चेतनता ला देता है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १० ॥

यथा च दीपः शरणे दीप्यमानः प्रकाशते । एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना ॥ ११ ॥ जिस प्रकार जलता हुआ दीपक समूचे घरमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीवकी चैतन्य शक्ति शरीरके सब अवयवोंको प्रकाशित करती है ॥ ११ ॥

यद् यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् । पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते ॥ १२ ॥ मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो-जो कर्म करता है, पूर्व-जन्मके शरीरसे किये गये उन सब कर्मोंका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है ॥ १२ ॥

ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत् प्रचीयते । यावत् तन्मोक्षयोगस्थं धर्मं नैवावबुध्यते ॥ १३ ॥ उपभोगसे प्राचीन कर्मका तो क्षय होता है और फिर दूसरे नये-नये कर्मोंका संचय बढ़ जाता है। जबतक मोक्षकी प्राप्तिमें सहायक धर्मका उसे ज्ञान नहीं होता, तबतक यह कर्मोंकी परम्परा नहीं टूटती है ॥ १३ ॥

तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै । आवर्तमानो जातीषु यथान्योन्यासु सत्तम ॥ १४ ॥

साधुशिरोमणे! इस प्रकार भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेवाला जीव जिनके अनुष्ठानसे सुखी होता है, उन कर्मोंका वर्णन सुनो ॥ १४ ॥ दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् । दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥ १५ ॥ संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥ १६ ॥ मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् । गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥ १७ ॥ प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते । ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥ १८ ॥

दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना—यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है ॥ १५—१८ ॥

एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः । आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिताः ॥ १९ ॥ सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है। उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है। सदाचार ही धर्मका परिचय देता है। शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ॥ १९ ॥

तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः । यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥ उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोंकी स्थिति है। वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती है ॥ २० ॥

अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु । यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥ २१ ॥ इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है। जो योगी और मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है ॥ २१ ॥

वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा । संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥ २२ ॥

जो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे-धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार-सागरसे तर जाता है ।।

एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते ।
सर्वं तत्कारणं येन विकृतोऽयमिहागतः ॥ २३ ॥
इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुए कर्मोंका फल भोगता है। यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत्में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है ।। २३ ।।

शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम् ।
इत्येवं संशयो लोके तच्च वक्ष्याम्यतः परम् ॥ २४ ॥
आत्माके शरीर धारण करनेकी प्रथा सबसे पहले किसने चलायी है, इस प्रकारका संदेह प्रायः लोगोंके मनमें उठा करता है, अतः उसीका उत्तर दे रहा हूँ ।। २४ ।।

शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः ।
त्रैलोक्यमसृजद् ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥
सम्पूर्ण जगत्के पितामह ब्रह्माजीने सबसे पहले स्वयं ही शरीर धारण करके स्थावर-जंगमरूप समस्त त्रिलोकीकी (कर्मानुसार) रचना की ।। २५ ।।

ततः प्रधानमसृजत् प्रकृतिं स शरीरिणाम् ।
यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः ॥ २६ ॥
उन्होंने प्रधान नामक तत्त्वकी उत्पत्ति की, जो देहधारी जीवोंकी प्रकृति कहलाती है। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा लोकमें जिसे मूल प्रकृतिके नामसे जानते हैं ।। २६ ।।

इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम् ।
त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक् पृथक् ॥ २७ ॥
यह प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है, इससे भिन्न अविनाशी जीवात्माको अक्षर कहते हैं। (इनसे विलक्षण शुद्ध परब्रह्म हैं)—इन तीनोंमेंसे जो दो तत्त्व—क्षर और अक्षर हैं, वे सब प्रत्येक जीवके लिये पृथक्-पृथक् होते हैं ।।

असृजत् सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः ।
स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः ॥ २८ ॥
श्रुतिमें जो सृष्टिके आरम्भमें सत्रूपसे निर्दिष्ट हुए हैं, उन प्रजापतिने समस्त स्थावर भूतों और जंगम प्राणियोंकी सृष्टि की है, यह पुरातन श्रुति है ।। २८ ।।

तस्य कालपरीमाणमकरोत् स पितामहः ।
भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ॥ २९ ॥

पितामहने जीवके लिये नियत समयतक शरीर धारण किये रहनेकी, भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेकी और परलोकसे लौटकर फिर इस लोकमें जन्म लेने आदिकी भी व्यवस्था की है॥ २९॥

यथात्र कश्चिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि।
यत् प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं यथावदुपपद्यते॥ ३०॥
जिसने पूर्वजन्ममें अपने आत्माका साक्षात्कार कर लिया हो, ऐसा कोई मेधावी अधिकारी पुरुष संसारकी अनित्यताके विषयमें जैसी बात कह सकता है, वैसी ही मैं भी कहूँगा। मेरी कही हुई सारी बातें यथार्थ और संगत होंगी॥ ३०॥

सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति।
कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम्॥ ३१॥
यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन्।
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम्॥ ३२॥
जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जो कुछ भी है वह सब दुःख-ही-दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा॥ ३१-३२॥

जातीमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित्।
चेतनावत्सु चैतन्यं समं भूतेषु पश्यति॥ ३३॥
निर्विद्यते ततः कृत्स्नं मार्गमाणः परं पदम्।
तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम॥ ३४॥
जन्म, मृत्यु एवं रोगोंसे घिरा हुआ जो पुरुष प्रधान तत्त्व (प्रकृति)-को जानता है और समस्त चेतन प्राणियोंमें चैतन्यको समानरूपसे व्याप्त देखता है, वह पूर्ण परमपदके अनुसंधानमें संलग्न हो जगत्के भोगोंसे विरक्त हो जाता है। साधुशिरोमणे! उस वैराग्यवान् पुरुषके लिये जो हितकर उपदेश है, उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा॥

शाश्वतस्याव्ययस्याथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम्।
प्रोच्यमानं मया विप्र निबोधेदमशेषतः॥ ३५॥
उसके लिये जो सनातन अविनाशी परमात्माका उत्तम ज्ञान अभीष्ट है, उसका मैं वर्णन करता हूँ। विप्रवर! तुम सारी बातोंको ध्यान देकर सुनो॥ ३५॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अट्ठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८॥

गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन

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एकोनविंशोऽध्यायः

गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन

ब्राह्मण उवाच

यः स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किंचिदचिन्तयन् ।
पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद् भवेत् ॥ १ ॥
सिद्ध ब्राह्मणने कहा— काश्यप! जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंमेंसे क्रमशः) पूर्व-पूर्वका अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौनभावसे रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान—परब्रह्म परमात्मामें लीन रहता है, वही संसार-बन्धनसे मुक्त होता है ॥ १ ॥

सर्वमित्रः सर्वसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः ।
व्यपेतभयमन्युश्च आत्मवान् मुच्यते नरः ॥ २ ॥
जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, मनोनिग्रहमें तत्पर, जितेन्द्रिय, भय और क्रोधसे रहित तथा आत्मवान् है, वह मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥

आत्मवत् सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः ।
अमानी निरभीमानः सर्वतो मुक्त एव सः ॥ ३ ॥
जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियोंके प्रति अपने-जैसा बर्ताव करता है, जिसके भीतर सम्मान पानेकी इच्छा नहीं है तथा जो अभिमानसे दूर रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है ॥ ३ ॥

जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च ।
लाभालाभे प्रियद्वेष्ये यः समः स च मुच्यते ॥ ४ ॥
जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय-अप्रिय आदि द्वन्द्वोंको समभावसे देखता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

न कस्यचित् स्पृहयते नावजानाति किंचन ।
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ५ ॥
जो किसीके द्रव्यका लोभ नहीं रखता, किसीकी अवहेलना नहीं करता, जिसके मनपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता और जिसके चित्तकी आसक्ति दूर हो गयी है, वह सर्वथा मुक्त ही है ॥ ५ ॥

अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित् ।
त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी च मुच्यते ॥ ६ ॥
जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या संतान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो

जाता है ॥ ६ ॥ नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायकः । धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते ॥ ७ ॥ जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसंचित कर्मोंको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥ अकर्मवान् विकाङ्क्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम् । अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम् ॥ ८ ॥ वैराग्यबुद्धिः सततमात्मदोषव्यपेक्षकः । आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव ॥ ९ ॥ जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्‌को अश्वत्थके समान अनित्य—कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है ॥ ८-९ ॥ अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम् । अरूपमनभिज्ञेयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते ॥ १० ॥ जो आत्माको गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, परिग्रह, रूपसे रहित तथा अज्ञेय मानता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥ पञ्चभूतगुणैर्हीनममूर्तिमदहेतुकम् । अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते ॥ ११ ॥ जिसकी दृष्टिमें आत्मा पाञ्चभौतिक गुणोंसे हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्गुण होते हुए भी (मायाके सम्बन्धसे) गुणोंका भोक्ता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ११ ॥ विहाय सर्वसंकल्पान् बुद्ध्या शारीरमानसान् । शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ जो बुद्धिसे विचार करके शारीरिक और मानसिक सब संकल्पोंका त्याग कर देता है, वह बिना ईंधनकी आगके समान धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥ सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । तपसा इन्द्रियग्रामं यश्चरेन्मुक्त एव सः ॥ १३ ॥ जो सब प्रकारके संस्कारोंसे रहित, द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित हो गया है तथा जो तपस्याके द्वारा इन्द्रिय-समूहको अपने वशमें करके (अनासक्त) भावसे विचरता है, वह मुक्त ही है ॥ १३ ॥ विमुक्तः सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्म सनातनम् ।

परमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम् ॥ १४ ॥ जो सब प्रकारके संस्कारोंसे मुक्त होता है, वह मनुष्य शान्त, अचल, नित्य, अविनाशी एवं सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् । युञ्जन्तः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिनः ॥ १५ ॥ अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्रका वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग-साधन करनेवाले योगी पुरुष अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ १५ ॥

तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत् तन्निबोध मे । यैर्द्वारैश्चारयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १६ ॥ मैं उसका यथावत् उपदेश करता हूँ। मनोनिग्रहके जिन उपायोंद्वारा चित्तको इस शरीरके भीतर ही वशीभूत एवं अन्तर्मुख करके योगी अपने नित्य आत्माका दर्शन करता है, उन्हें मुझसे श्रवण करो ॥ १६ ॥

इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत् । तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत् ॥ १७ ॥ इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर मनमें और मनको आत्मामें स्थापित करे। इस प्रकार पहले तीव्र तपस्या करके फिर मोक्षोपयोगी उपायका अवलम्बन करना चाहिये ॥ १७ ॥

तपस्वी सततं युक्तो योगशास्त्रमथाचरेत् । मनीषी मनसा विप्रः पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ १८ ॥ मनीषी ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा तपस्यामें प्रवृत्त एवं यत्नशील होकर योगशास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करे। इससे वह मनके द्वारा अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार करता है ॥ १८ ॥

स चेच्छक्नोत्ययं साधुर्युक्तुमात्मानमात्मनि । तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १९ ॥ एकान्तमें रहनेवाला साधक पुरुष यदि अपने मनको आत्मामें लगाये रखनेमें सफल हो जाता है तो वह अवश्य ही अपनेमें आत्माका दर्शन करता है ॥ १९ ॥

संयतः सततं युक्त आत्मवान् विजितेन्द्रियः । तथा य आत्मनाऽऽत्मानं सम्प्रयुक्तः प्रपश्यति ॥ २० ॥ जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मनको वशमें करनेवाला और जितेन्द्रिय है, वही आत्मासे प्रेरित होकर बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार कर सकता है ॥

यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति । तथा रूपमिवात्मानं साधुयुक्तः प्रपश्यति ॥ २१ ॥

जैसे मनुष्य सपनेमें किसी अपरिचित पुरुषको देखकर जब पुनः उसे जाग्रत् अवस्थामें देखता है, तब तुरंत पहचान लेता है कि 'यह वही है।' उसी प्रकार साधन-परायण योगी समाधि-अवस्थामें आत्माको जिस रूपमें देखता है, उसी रूपमें उसके बाद भी देखता रहता है ॥

इषीकां च यथा मुञ्जात् कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत् । योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः ॥ २२ ॥ जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींकको अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्माको इस देहसे पृथक् करके देखता है ॥ २२ ॥

मुञ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम् ॥ २३ ॥ यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींक। योगवेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है ॥ २३ ॥

यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभृत् । न तस्येहेश्वरः कश्चित् त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः ॥ २४ ॥ देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थ-रूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता ॥ २४ ॥

अन्यान्य़ांश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते । विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति ॥ २५ ॥ वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष ॥ २५ ॥

देवानापि देवत्वं युक्तः कारयते वशी । ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ॥ २६ ॥ अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है। वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते । क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ॥ २७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता ॥ २७ ॥

दुःखशोकमयैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः । न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः ॥ २८ ॥ शान्तचित्त एवं निःस्पृह योगी आसक्ति और स्नेहसे प्राप्त होनेवाले भयंकर दुःख-शोक तथा भयसे विचलित नहीं होता ॥ २८ ॥

नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते ।

नातः सुखतरं किंचिल्लोके क्वचन दृश्यते ॥ २९ ॥ उसे शस्त्र नहीं बींध सकते, मृत्यु उसके पास नहीं पहुँच पाती, संसारमें उससे बढ़कर सुखी कहीं कोई नहीं दिखायी देता ॥ २९ ॥ सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते । विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः ॥ ३० ॥ वह मनको आत्मामें लीन करके उसीमें स्थित हो जाता है तथा बुढ़ापाके दुःखोंसे छुटकारा पाकर सुखसे सोता—अक्षय आनन्दका अनुभव करता है ॥ ३० ॥ देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम् । निर्वैदस्तुन कर्तव्यो भुञ्जानेन कथंचन ॥ ३१ ॥ वह इस मानव-शरीरका त्याग करके इच्छानुसार दूसरे बहुत-से शरीर धारण करता है। योगजनित ऐश्वर्यका उपभोग करनेवाले योगीको योगसे किसी तरह विरक्त नहीं होना चाहिये ॥ ३१ ॥ सम्यग्युक्तो यदाऽऽत्मानमात्मन्येव प्रपश्यति । तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः ॥ ३२ ॥ अच्छी तरह योगका अभ्यास करके जब योगी अपनेमें ही आत्माका साक्षात्कार करने लगता है, उस समय वह साक्षात् इन्द्रके पदको भी पानेकी इच्छा नहीं करता है ॥ ३२ ॥ योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु । दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन् संनिवसेत् पुरे ॥ ३३ ॥ पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाह्यतः। एकान्तमें ध्यान करनेवाले पुरुषको जिस प्रकार योगकी प्राप्ति होती है, वह सुनो—जो उपदेश पहले श्रुतिमें देखा गया है, उसका चिन्तन करके जिस भागमें जीवका निवास माना गया है, उसीमें मनको भी स्थापित करे। उसके बाहर कदापि न जाने दे ॥ ३३१/२॥ पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत् । तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मनः ॥ ३४ ॥ शरीरके भीतर रहते हुए वह आत्मा जिस आश्रयमें स्थित होता है, उसीमें बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसहित मनको धारण करे ॥ ३४ ॥ प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन् काले स पश्यति । तस्मिन् काले मनश्चास्य न च किंचन बाह्यतः ॥ ३५ ॥ मूलाधार आदि किसी आश्रयमें चिन्तन करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है, उस समय उसका मन प्रत्यक्स्वरूप आत्मासे भिन्न कोई 'बाह्य' वस्तु नहीं रह जाता ॥ ३५ ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने । कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

निर्जन वनमें इन्द्रिय-समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे ॥ ३६ ॥

दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम् ॥ ३७ ॥

दन्त, तालु, जिह्वा, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ीमार्ग)-को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे ॥ ३७ ॥

इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन । पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम् ॥ ३८ ॥

मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा— ॥ ३८ ॥

भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते । कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः ॥ ३९ ॥

‘यह बारंबार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है? ॥ ३९ ॥

तथा मांसं च मेदश्च स्नाय्वस्थीनि च योषिति । कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् ॥ ४० ॥ वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् । निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक् पृथक् ॥ ४१ ॥

‘स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हड्डियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्-पृथक् निःसारण कैसे होता है? ॥ ४०-४१ ॥

कुतो वायं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः । कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि ॥ ४२ ॥

‘यह जीव कैसे साँस लेता, कैसे उच्छ्वास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है? ॥ ४२ ॥

जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम् । किं वर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै पुनः ॥ ४३ ॥ याथातथ्येन भगवन् वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।

‘चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है? फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है। निष्पाप भगवन्! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये’ ॥ ४३ ½ ॥

इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥ ४४ ॥ प्रत्यब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम ।

शत्रुदमन महाबाहु माधव! उस ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर मैंने जैसा सुना था वैसा ही उसे बताया ।। ४४ १/२ ।।
यथा स्वकोठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत् ।। ४५ ।।
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलैः ।
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत् ।। ४६ ।।
जैसे घरका सामान अपने कोठेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे ।। ४५-४६ ।।
एवं सततमुद्युक्तः प्रीतात्मा नचिरादिव ।
आसादयति तद् ब्रह्म यद् दृष्ट्वा स्यात् प्रधानवित् ।। ४७ ।।
इस प्रकार सदा ध्यानके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, जिसका साक्षात्कार करके मनुष्य प्रकृति एवं उसके विकारोंको स्वतः जान लेता है ।। ४७ ।।
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः ।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते ।। ४८ ।।
उस परमात्माका इन चर्म-चक्षुओंसे दर्शन नहीं हो सकता, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी उसको ग्रहण नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे ही उस महान् आत्माका दर्शन होता है ।। ४८ ।।
सर्वतःपाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ।
सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।। ४९ ।।
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ।। ४९ ।।
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति ।
स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम् ।। ५० ।।
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव ।
तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि ।। ५१ ।।
तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे—उसकी पृथक्ताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है) ।। ५०-५१ ।।

इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्तं द्विजोत्तम । आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम् ॥ ५२ ॥ द्विजश्रेष्ठ! यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब मैं जानेकी अनुमति चाहता हूँ। विप्रवर! तुम भी सुखपूर्वक अपने स्थानको लौट जाओ ॥ ५२ ॥

इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः । अगच्छत यथाकामं ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ५३ ॥ श्रीकृष्ण! मेरे इस प्रकार कहनेपर वह कठोर व्रतका पालन करनेवाला मेरा महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण काश्यप इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चला गया ॥ ५३ ॥

वासुदेव उवाच इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तमः । मोक्षधर्माश्रितः सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—अर्जुन! मोक्षधर्मका आश्रय लेनेवाले वे सिद्धमहात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५४ ॥

कच्चिदेतत् त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा । तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि ॥ ५५ ॥ पार्थ! क्या तुमने मेरे बताये हुए इस उपदेशको एकाग्रचित्त होकर सुना है? उस युद्धके समय भी तुमने रथपर बैठे-बैठे इसी तत्त्वको सुना था ॥ ५५ ॥

नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः । नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ ५६ ॥ कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है ॥ ५६ ॥

सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ । कच्चिन्नैदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित् ॥ ५७ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह मैंने देवताओंका परम गोपनीय रहस्य बताया है। पार्थ! इस जगत्में कभी किसी भी मनुष्यने इस रहस्यका श्रवण नहीं किया है ॥ ५७ ॥

न ह्येतच्छ्रोतुमर्होऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ । नैतदद्य सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना ॥ ५८ ॥ अनघ! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य इसे सुननेका अधिकारी भी नहीं है। जिसका चित्त दुविधामें पड़ा हुआ है, वह इस समय इसे अच्छी तरह नहीं समझ सकता ॥ ५८ ॥

क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः समावृतः । न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यरूपनिवर्तनम् ॥ ५९ ॥

कुन्तीकुमार! क्रियावान् पुरुषोंसे देवलोक भरा पड़ा है। देवताओंको यह अभीष्ट नहीं है कि मनुष्यके मर्त्यरूपकी निवृत्ति हो ॥ ५९ ॥

परा हि सा गतिः पार्थ यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।
यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा देहं सदा सुखी ॥ ६० ॥
पार्थ! जो सनातन ब्रह्म है, वही जीवकी परम-गति है। ज्ञानी मनुष्य देहको त्यागकर उस ब्रह्ममें ही अमृतत्त्वको प्राप्त होता है और सदाके लिये सुखी हो जाता है ॥ ६० ॥

इमं धर्मं समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ६१ ॥
इस आत्मदर्शनरूप धर्मका आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा जो पापयोनिके मनुष्य हैं, वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६१ ॥

किं पुनर्ब्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुताः ।
स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणाः ॥ ६२ ॥
पार्थ! फिर जो अपने धर्ममें प्रेम रखते और सदा ब्रह्मलोककी प्राप्तिके साधनमें लगे रहते हैं, उन बहुश्रुत ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी तो बात ही क्या है ॥ ६२ ॥

हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपायाश्चास्य साधने ।
सिद्धिं फलं च मोक्षश्च दुःखस्य च विनिर्णयः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार मैंने तुम्हें मोक्षधर्मका युक्तियुक्त उपदेश किया है। उसके साधनके उपाय भी बतलाये हैं और सिद्धि, फल, मोक्ष तथा दुःखके स्वरूपका भी निर्णय किया है ॥ ६३ ॥

नातः परं सुखं त्वन्यत् किंचित् स्याद् भरतर्षभ ।
बुद्धिमान् श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥ ६४ ॥
यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत् ।
एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते ॥ ६५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान्, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ६४-६५ ॥

एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयोऽस्ति किंचन ।
षण्मासान् नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते ॥ ६६ ॥
पार्थ! इतना ही कहनेयोग्य विषय है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। जो छः महीनेतक निरन्तर योगका अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध हो जाता है ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना

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विंशोऽध्यायः

ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना

वासुदेव उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
दम्पत्योः पार्थ संवादो योऽभवद् भरतर्षभ ॥ १ ॥

**श्रीकृष्ण कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति-पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥ २ ॥
कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता ।
न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम् ॥ ३ ॥
भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् ।
त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥ ४ ॥

एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली—‘प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी’ ॥ २—४ ॥

एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव । सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे ॥ ५ ॥ पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए-से बोले—'सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा नहीं मानता ॥ ५ ॥

ग्राह्यं दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते । एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः ॥ ६ ॥ 'संसारमें जो ग्रहण करनेयोग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखोंसे दिखायी देनेवाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है। कर्मठ लोग ऐसे ही कर्मको कर्मके नामसे पुकारते हैं ॥ ६ ॥

मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः । नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तंमपि लभ्यते ॥ ७ ॥ 'किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं। इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ॥ ७ ॥

कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाशुभम् । जन्मादिमूर्तिभेदान्तं कर्म भूतेषु वर्तते ॥ ८ ॥

मनसे, वाणीसे तथा क्रियाद्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियोंमें विद्यमान हैं ॥ ८ ॥

रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु । आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया ॥ ९ ॥ ‘जब राक्षसों—दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म-मार्गोंका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा ॥ ९ ॥

यत्र तद् ब्रह्म निर्द्वन्द्वं यत्र सोमः सहाग्निना । व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन् ॥ १० ॥ ‘जहाँ द्वन्द्वोंसे रहित वह परब्रह्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतोंको धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है ॥ १० ॥

यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते । विद्वांसः सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ११ ॥ ‘जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान् योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्मकी उपासना करते हैं ॥ ११ ॥

घ्राणेन न तदाघ्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्वया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते ॥ १२ ॥ ‘वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रियसे सूँघने और जिह्वाद्वारा आस्वादन करनेयोग्य नहीं है। स्पर्शनेन्द्रिय—त्वचाद्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है ॥ १२ ॥

चक्षुषामविषह्यं च यत् किंचिच्छ्रवणात् परम् । अगन्धरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम् ॥ १३ ॥ ‘वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता। वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है। गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है ॥ १३ ॥

यतः प्रवर्तते तन्त्रं यत्र च प्रतितिष्ठति । प्राणोऽपानः समानश्च व्यानश्चोदान एव च ॥ १४ ॥ तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च । ‘उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसीमें उसकी स्थिति है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—से उसीसे प्रकट होते और फिर उसीमें प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ॥

समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः ॥ १५ ॥

तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च।
अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति।
तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ न मुञ्चतः॥ १६॥
'समान और व्यान—इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं॥ १५-१६॥
प्राणानामायतत्वेन तमुदानं प्रचक्षते।
तस्मात् तपो व्यवस्यन्ति मद्गतं ब्रह्मवादिनः॥ १७॥
'प्राणोंका आयतन (आधार) होनेके कारण उसे विद्वान् पुरुष उदान कहते हैं। इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तपका निश्चय करते हैं॥ १७॥
तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम्।
अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेऽन्तरा॥ १८॥
'एक दूसरेके सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरोंमें संचार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओंके मध्यभागमें जो समान वायुका स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीचमें स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपोंमें प्रकाशमान है॥ १८॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम्।
मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः॥ १९॥
घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च।
मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम॥ २०॥
'घ्राण (नासिका), जिह्वा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि—ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय—ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं॥ १९-२०॥
घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पञ्चमः।
मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विजः॥ २१॥
'सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने-वाला, पाँचवाँ श्रवण करनेवाला एवं मनन करनेवाला और समझनेवाला—ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज् हैं॥ २१॥
घ्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च।
मन्तव्येऽप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा॥ २२॥
'सुभगे! सूँघनेयोग्य, पीनेयोग्य, देखनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, सुनने, मनन करने तथा समझनेयोग्य विषय—इन सबके ऊपर तुम सदा दृष्टिपात करो (इनमें हविष्य-बुद्धि करो)॥ २२॥

हवींष्यग्निषु होतारः सप्तधा सप्त सप्तसु ।
सम्यक् प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु ॥ २३ ॥
‘पूर्वोक्त सात होता उक्त सात हविष्योंका सात रूपोंमें विभक्त हुए वैश्वानरमें भलीभाँति हवन करके (अर्थात् विषयोंकी ओरसे आसक्ति हटाकर) विद्वान् पुरुष अपने तन्मात्रा आदि योनियोंमें शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं’ ॥ २३ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैता योनिरित्येव शब्दिताः ॥ २४ ॥
‘पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन और बुद्धि—ये सात योनि कहलाते हैं’ ॥ २४ ॥
हविर्भूता गुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं गुणम् ।
अन्तर्वासमुषित्वा च जायन्ते स्वासु योनिषु ॥ २५ ॥
‘इनके जो समस्त गुण हैं, वे हविष्यरूप हैं। जो अग्निजनित गुण (बुद्धिवृत्ति)-में प्रवेश करते हैं। वे अन्तःकरणमें संस्काररूपसे रहकर अपनी योनियोंमें जन्म लेते हैं’ ॥ २५ ॥
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने ।
ततः संजायते गन्धस्ततः संजायते रसः ॥ २६ ॥
‘वे प्रलयकालमें अन्तःकरणमें ही अवरुद्ध रहते और भूतोंकी सृष्टिके समय वहींसे प्रकट होते हैं। वहींसे गन्ध और वहींसे रसकी उत्पत्ति होती है’ ॥ २६ ॥
ततः संजायते रूपं ततः स्पर्शोऽभिजायते ।
ततः संजायते शब्दः संशयस्तत्र जायते ।
ततः संजायते निष्ठा जन्मैतत् सप्तधा विदुः ॥ २७ ॥
‘वहींसे रूप, स्पर्श और शब्दका प्राकट्य होता है। संशयका जन्म भी वहीं होता है और निश्चयात्मिका बुद्धि भी वहीं पैदा होती है। यह सात प्रकारका जन्म माना गया है’ ॥ २७ ॥
अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनैः ।
पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्त्रिभिः पूर्यन्ति तेजसा ॥ २८ ॥
‘इसी प्रकारसे पुरातन ऋषियोंने श्रुतिके अनुसार घ्राण आदिका रूप ग्रहण किया है। ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय—इन तीन आहुतियोंसे समस्त लोक परिपूर्ण हैं। वे सभी लोक आत्मज्योतिसे परिपूर्ण होते हैं’ ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्रह्मगीतासु विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन

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एकविंशोऽध्यायः

दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निबोध दशहोतॄणां विधानमथ यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मण कहते हैं— प्रिये! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो ॥ १ ॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चरणौ करौ ।
उपस्थं वायुरिति वा होतॄणि दश भामिनि ॥ २ ॥
भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा (वाक् और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा—ये दस होता हैं ॥ २ ॥

शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धो वाक्यं क्रिया गतिः ।
रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागो दश हवींषि च ॥ ३ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्रका त्याग और मल-त्याग—ये दस विषय ही दस हविष्य हैं ॥ ३ ॥

दिशो वायू रविश्चन्द्रः पृथ्व्यग्नी विष्णुरेव च ।
इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रमग्नयो दश भामिनि ॥ ४ ॥
भामिनि! दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र—ये दस देवता अग्नि हैं ॥ ४ ॥

दशेन्द्रियाणि होतॄणि हवींषि दश भाविनि ।
विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु ॥ ५ ॥
भाविनि! दस इन्द्रियरूपी होता दस देवतारूपी अग्निमें दस विषयरूपी हविष्य एवं समिधाओंका हवन करते हैं (इस प्रकार मेरे अन्तरमें निरन्तर यज्ञ हो रहा है; फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ?) ॥ ५ ॥

चित्तं स्रुवश्च वित्तं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ।
सुविभक्तमिदं सर्वं जगदासीदिति श्रुतम् ॥ ६ ॥
इस यज्ञमें चित्त ही स्रुवा तथा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है। यह सम्पूर्ण जगत् पहले भलीभाँति विभक्त था—ऐसा सुना गया है ॥ ६ ॥

सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानमवेक्षते ।