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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

चौदहवां उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १२५ पुण्य एक व्यक्ति को 'कौल' बनाने से मिलता है (१८८) । भू-मण्डल में जो-जो वर्ण हैं और जितने धर्मावलम्बी लोग हैं, उनमें से जो 'कौल' होते हैं, वे ही पाश-मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करते हैं (१८६) । शिवोक्त धर्माव- लम्बी 'कौल'-गण साक्षात् शिव-स्वरूप और तीर्थ-स्वरूप हैं। स्नेह, श्रद्धा और प्रेम द्वारा वे एक दूसरे का पूजन और सम्मान करते हैं (१६०) । मैं अधिक क्या कहूँ, तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस संसार-सागर को पार करने के लिए 'कुल-धर्म' ही सेतु के समान है । उसके सिवा संसार-सागर से पार करानेवाला अन्य कोई उपाय नहीं है । 'कुल-धर्म' के सेवन से सभी संशय कट जाते हैं, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और कर्म-समूह जल जाते हैं (१६१- ६२) । जो सत्य-व्रती और ब्रह्म-निष्ठ हैं, वे कृपा-वश मनुष्यों को बुलाकर 'कुलाचार' से पवित्र करते हैं । वे ही सब महात्मा श्रेष्ठ 'कौलिक' माने जाते हैं (१६३) । हे देवि ! यह मैंने तुम्हें लोक-पावन, सर्व-धर्म-निर्णायक 'महा-निर्वाण-तन्त्र' का पूर्वार्द्ध सुनाया है (१८४) । जो इसे ध्यान से सुनता है या मनुष्यों को सुनाता है, वह सभी पापों से छूटकर अन्त में 'मोक्ष'-पद को पाता है (१८६५) । सभी आगमों और तन्त्रों में परात्पर व सारात्सार इस तन्त्र-राज को जानकर मनुष्य सब शास्त्रों का ज्ञाता होता है (१८६) । जिसे यह 'महा-निर्वाण-तन्त्र' ज्ञात है, उसे तीर्थ-भ्रमण, यज्ञ, जप, साधना करने की आवश्यकता नहीं । वह केवल 'महा-निर्वाण-तन्त्र' के ज्ञान द्वारा कर्मों के पाश से मुक्ति पा जाता है (१९७) । हे कालिके ! जो इस 'मह -निर्वाण-तन्त्र' को जानता है, वह सब शास्त्रों का ज्ञाता है, वही समस्त धर्मज्ञ लोगों के बीच श्रेष्ठ है; वही साधु, ज्ञानी और ब्रह्मज्ञ है (१९८) । वेद, पुराण, स्मृति, संहिता आदि और अन्यान्य बहुत तन्त्रों के जानने की क्या आवश्यकता ? केवल इसी 'महा-निर्वाण-तन्त्र' के ज्ञात होने से वह सर्वज्ञ हो जाता है (१८६) । जो सारे साधन और उत्तम ज्ञान अत्यन्त गोपनीय थे, उन्हें मैंने तुम्हारे प्रश्नों के अनुसार इस 'महा-निर्वाण-तन्त्र' में सुन्दर रूप से प्रकाशित कर दिया है (२००) । हे सुव्रते ! तुम जैसे ब्रह्म- शक्ति हो व मेरे लिए प्राणों से भी अधिक हो, इसी प्रकार इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' को भी प्राणों से अधिक जाने (२०१) । जैसे सभी पर्वतों में हिमालय, नक्षत्रों में चन्द्र, तेजवाले पदार्थों में सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही तन्त्रों में यह तन्त्रराज श्रेष्ठ है (२०२) । यह तन्त्र सर्व-धर्म-मय और ब्रह्म-ज्ञान का एकमात्र साधक है, जो इस साधन को करता या कराता है, वह ब्रह्म-ज्ञानी होता (२०३) । हे देवेशि ! सभी तन्त्रों की अपेक्षा श्रेष्ठतम यह तन्त्र जिसके घर में रहता है, उसके वंश में कभी कोई 'पशु' नहीं होता (२०४) । जो अज्ञान से अन्धा, मूर्ख, क्रम- साधन के विषय में जड़ है, वह भी यदि इस तन्त्र को सुनता है, तो वह कर्म-पाश से छूट जाता है (२०५) । हे परमेश्वरि ! इस महा-तन्त्र का पाठ, श्रवण, पूजन या वन्दन मनुष्य के लिए कैवल्य-दायक है (२०६) । एक-एक आख्यान से युक्त अनेक तन्त्र कहे हैं और सब धर्मों से युक्त तन्त्र मेरे द्वारा कहे गये हैं किन्तु इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ अन्य कोई तन्त्र नहीं है (२०७) । इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' के उत्तरार्ध में 'पाताल-चक्र' और 'ज्योतिष्चक्र' से समन्वित 'भू-चक्र' दिया है। जिसे वह उत्तरार्द्ध ज्ञात है, वह सर्वज्ञ होता है, इसमें सन्देह नहीं (२०८)। जो मनुष्य परार्द्ध-सहित इस तन्त्र को जानता है, वह त्रि-काल-वार्त्ता और त्रैलोक्य-वृत्तान्त का वर्णन करने में समर्थ होता है (२०६) । अनेक प्रकार के तन्त्र हैं, बहुत प्रकार के शास्त्र भी हैं, परन्तु कोई भी शास्त्र या तन्त्र इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' के सोलह अंशों में से एक अंश के भी समकक्ष नहीं है (२१०) । मैं इस तन्त्र के माहात्म्य का वर्णन क्या करूँ, इस महा-तन्त्र का ज्ञान होने से 'ब्रह्म-निर्वाण' प्राप्त होता है (२११) ।

परिशिष्ट महा-निर्वाण तन्त्र के तीन अनूठे उद्धरण वङ्ग प्रदेश के मेहार-पीठ (जिला टिपरा, बांग्लादेश) के दश-महाविद्या-सिद्ध श्री सर्वानन्द-नाथ १६वीं शती में प्रसिद्ध तांत्रिक सिद्ध महापुरुष हो गए हैं। आपकी कृति 'सर्वोल्लास-तन्त्र' एक संग्रहणीय साधकोपयोगी संग्रह-ग्रन्थ है। इसमें 'महा-निर्वाण-तंत्र' के तीन उद्धरण मिलते हैं, जो प्रचलित संस्करणों में उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें यहाँ पहले-पहल उद्धृत किया जा रहा है— (१) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के छठे उल्लास (लय-प्रकरणं) में— श्रीशिव उव. - महा-काली परात्मा च चणकाकार-रूपिणी । मायाच्छादितात्मानं तन्मध्ये सम-भावतः ॥ महा-रुद्रः स एवात्मा महा-विष्णुः स एव हि । महा-ब्रह्मा स एवात्मा नाम-मात्र-विभेदकः ॥ एक-मूर्तिस्त्रि-नामानि ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । नाना-भाव-मनो यस्य तस्य मुक्तिर्न विद्यते ॥ ब्रह्माण्डास्तत्र जायन्ते लक्ष लक्षं सुलोचने ! तत्र ब्रह्मा तत्र विष्णुस्तत्र रुद्रः प्रविन्धसेत् ॥ केचिद् वदन्ति स ब्रह्मा केचिद् विष्णुः प्रकथ्यते । केचिद् वदन्ति रुद्रः स एको देवो निरंजनः ॥ आद्या-शक्ति-युतो देवश्चणकाकार-रूपकः । आनन्द-घन-संयुक्तः प्रभुः प्रकृति-रूप-धृक् ॥ निर्गुणस्यालयः साक्षान्महा-काल्यालयः प्रिये ! तत्रैव वर्तते नित्यश्चणकाकार-रूपकः ।' तस्य रूप-परं नित्यं परानन्द-परात्परं । नित्यानन्द-करा देवि ! कालिका दक्षिणे स्थिता ॥ आद्या-शक्तिर्महा-माया देव-निर्माण-कारिणी । जायते च क्षितौ वृक्षो यथा पृथ्व्यां प्रलीयते ॥ तोयात् तु बुद्बुदं जातं यथा तोये प्रलीयतें । जलदे तड़िदुत्पत्तिर्यथा मेघे प्रलीयमते ॥ तथा ब्रह्मादयो देवाः कालिकायां प्रजायते । प्रलय-काले तु पुनस्तस्यां प्रलीयते ॥ शक्ति-ज्ञानं विना देवि ! मुक्तिर्हास्याय कल्प्यते । एकांशेन भवेद् ब्रह्मा एकांशेन जनार्दनः ॥ एकांशेन भवेच्छम्भुः कालिकायाः सुलोचने ! अपरा सा महा-काली नद्यादीनां समुद्र-वत् ॥ गोष्पदे च यथा तोयं ब्रह्माद्या देवतास्तथा । गोष्पदे किं विजानीयात् समुद्रस्य जलं शिवे ॥ तेन ब्रह्मा न जानाति विष्णुः किं वेत्ति शङ्करः । सृष्टि-कर्त्या यदा काल्या पाल्यन्ते च सुरादयः ॥ तदा प्रलय-काले तु पुनस्तस्यां प्रलीयते । अतो निर्वाणदा काली पुरुषस्य च शर्मदा ॥ चणकाकार-रूपेण प्रकाशं च मनोमयं । यथा सूर्यो जगद् भाति ज्ञेयं च चणकं तथा ॥ [ १२६ ]

महा-निर्वाण तन्त्र के तीन अनूठे उद्धरण । १२७ एका शक्तिद्विधा भूत्वा मध्ये पुरुष-भाषितं । पुनः प्रलीन-कालेऽपि द्विधैकं पुंस-गोपितं ॥ नित्यानित्य-द्विधैकात्मा द्विधा भावाश्रिताः पुमान् । नित्यानित्यं यदैकात्मा तदैकं ब्रह्म-विग्रहं ॥ (२) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के ५८वें उल्लास (हंस-बीज-माहात्म्यं) में— श्रीदेव्युवाच-- देवेश ! प्राण-नाथेश ! त्रिगुण ! त्रिगुणात्मक ! अधुना हंस-बीजस्य माहात्म्यं कथय प्रिय ॥ श्रीशिव उवाच— हंस-बीजस्य माहात्म्यं गदितुं नैव शक्यते । तव स्नेहेन बद्धोऽहं किञ्चिद्-भावं प्रकाशितं ॥ देवालयं भवेद् देहं हंसेन मनुना शिवे ! हंस-बीजं समाश्रित्य देही देहे सदा स्थितः ॥ हकारः शङ्करश्चैव सकारः शक्तिरीरितः । शिव-शक्त्यात्मकं मन्त्रमजपेति प्रकीर्त्तितं ॥ षट्-शतानि दिवा-रात्रौ सहस्राण्येक-विंशतिः । अजपा नाम गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥ श्रीपार्वत्युवाच— शिव-शक्त्यात्मकं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । प्रजपेत् केन मूलं च सोऽहं केन विचिन्तयेत् ॥ श्रीशिव उवाच— कुम्भकं स्याद् 'हं'-कारेण 'सः'-कारेणापि रेचनं । कुम्भकेऽपि जपेन्मन्त्रं प्रत्येके प्रत्येकाक्षरं ॥ (३) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के ५६वें उल्लास (ध्यान-त्रयस्य माहात्म्यं) में— श्रीशिव उवाच— स्व-देहे पूजयेद् देवं नान्य-देहे कदाचन । स्व-गेहे पायसं त्यक्त्वा भिक्षामटति दुर्मतिः ॥ स्थूल-ध्यानान्महा-देवस्तेजो-ध्यानाद्वि शङ्करी । सूक्ष्म-ध्यानाद् भवेन्मुक्तिराङ्कारं तत्र संभवं ॥ भिन्न-देहं शिवं शक्ति तेजोध्यानमभेदकं । शिव-शक्त्यात्मकं सूक्ष्मं ॐ तत् सद् व्यापितं जगत् ॥ विन्दु-त्रयं नाद-युग्मं विन्दु-युग्मं च नादकं । विन्दुमेकं नाद-युग्मं ॐकारं ब्रह्म-बोधकं ॥ कुण्डलिन्यंकुशाकारा विन्दु-रूपः सदाशिवः । अङ्क-मात्रं महादेवि ! शिव-शक्ति-प्रबोधकं ॥ विन्दु-द्वयं विना देवि ! किञ्चिन्मात्रं न जायते । वामे च परमा शक्तिर्दक्षिणे परमः शिवः ॥ शिव-शक्त्यात्मकं ब्रह्मवाचातीतं सुनिर्मलं । तकारं शङ्करं ज्ञेयं तकारं पुंस्त्व-विग्रहं ॥ ब्रह्म-बोध-मयं देवि ! तत् शब्दं शक्ति-गोपितं । विन्दु-युग्मं नादमेकं तकारं ब्रह्म-बोधकं ॥ तत्-शब्दं परमेशानि ! ॐकारस्यापि बोधकं । बिना स्वरेण देवेशि ! व्यञ्जनं नैव तिष्ठति ॥

१२८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तद्-वर्णं सकलं बोधं भाव-रूपं प्रकाशितं । सकारः शङ्करी ज्ञेया तकारो नाद-रूपकः ॥ शक्ति-ब्रह्म-मयं ज्ञानं सत् शब्दं भाव-बोधकं । व्यञ्जनं पुरुषं ज्ञेयं स्वरं ज्ञेयं च शङ्करीं ॥ शिव-शक्त्यात्मकं ब्रह्म सत्-शब्देनापि भाषितं । सकारं च तकारं च पुरुषं परमेश्वरि ॥ शक्ति-ज्ञानं मध्य-लुप्तं अकारं शब्द-बोधकं । पञ्च-नादं सप्त-विन्दुमेकाङ्कं परमेश्वरि ॥ एतैर्युक्तं सकारं हि त्रि-वकारं प्रकाशितं । सत्वं रजस्तमश्चैव त्रि-वकारेण भाषितं ॥ पञ्च-नादं पञ्च-तत्त्वं विन्दु-स्वर्गं विभूषितं । त्रिगुणाक्तं त्रिकोणं च प्रति-कोणं त्रयान्वितं ॥ काण-मात्रे विन्दु-मात्रं मध्ये नादं महेश्वरि ! सर्व-वर्ण-क्रममिदमङ्कं ज्ञेयं शिवोपरि ॥ विन्दु-द्वयं विना भद्रे अङ्क-मात्रं न जायते । नाद-विन्द्वङ्क-युक्त-वर्णं ब्रह्म-ज्ञानस्य कारणं ॥ तत्-शब्दं ज्ञेयं सत्-शब्दं सर्व-भाव-प्रकाशितं । तत्-सत् ज्ञेयं ब्रह्म-वोजं ॐकारेऽभूत् प्रकाशितं ॥ ॐकाराद् जायते सर्वं ॐकारे च प्रतीयते । सृष्टि-वोजं हि ॐकारं लय-वोजं त्रिलोचने ॥ हंस-वीजात् समुद्भूतं भावं भावातीतं ध्रुवं । दक्षिणानां च वामानां सिद्धान्तानां महेश्वरि ॥ हंसः सोऽहं च नाहं च भेदाभेदात्मनात्मकं । कौलानां चैव दिव्यानां भावातीतं हि केवलं ॥ प्रथम उद्धरण में आद्या-शक्ति 'महा-काली' के विराट् स्वरूप का भव्य वर्णन किया गया है। द्वितीय उद्धरण में 'हंस-बीज' की महिमा बताई है कि 'हकार' शिव-स्वरूप है और 'सकार' शक्ति-स्वरूप । इस प्रकार यह 'शिव-शक्त्यात्मक बीज-मन्त्र' है, जिसे जीव निरन्तर श्वास-निश्वास के साथ 'अजपा-रूप' से जपता रहता है। तृतीय उद्धरण में १. स्थूल-ध्यान, २. तेजो-ध्यान ओर ३. सूक्ष्म-ध्यान—इन तोन प्रकार के ध्यानों का वर्णन करते हुए 'ॐतत् सत्' मन्त्र का अर्थ समझाया गया है।

वन्दे गुरोर्मण्डलम् हे शिवे! तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो। यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है। हे भद्रे! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल-सूक्ष्म सारा स्थावर- जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है। सारा जगत् तुम्हारे अधीन है। तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो। सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो। तुम्हें कोई नहीं जान सकता। तुम काली हो, तुम तारिणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम षोडशी हो, तुम भुवनेश्वरी हो, तुम धूमावती हो, तुम बगला हो, तुम भैरवी हो, तुम छिन्न- मस्ता हो। महा-निर्वाण तन्त्र प्रकाशक : परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान श्रीचण्डी-धाम, अलोपी-देवी मार्ग, प्रयाग-२११००६