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भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय। ४४१

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ग्यारहवां अध्याय। ४४१

मास तक भीख मांगकर निर्वाह करे। द्विज, 'देवकृतस्य०'
इत्यादि शाकल होम के मन्त्रों से, एक वर्ष तक घी का होम करे
अथवा 'नम इन्द्रश्च०' इत्यादि मन्त्रका एक वर्षतक पाठ करे
तो महापाप से भी छूट जाता है। महापातकी एक वर्षतक भीख
मांगकर खाय, सावधानी से नित्य गौओं के पीछे फिरे। और
पवमान देवता के सूक्तों का पाठ करे तो शुद्ध होता है। तीन
पराक व्रतों से शुद्ध, जितेन्द्रिय होकर, वन में वेदसंहिता का
तीन बार पाठ करे तो सब पापों से छूटता है। तीन दिन उप-
वास करे, तीनों समय में स्नान करे और अघमर्षण-सूक्त का पाठ
करे तो सब पापों से छूट जाता है ॥ २५५-२६०॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनम्।
तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ २६१ ॥
हत्वा लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः ।
ऋग्वेदं धारयन् विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ॥ २६२॥
ऋक्संहितां त्रिश्भ्यस्य यजुषां वा समाहितः ।
साम्नां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६३ ॥
यथा महाह्रदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्ठं विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति ॥ २६४ ॥
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।
एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २६५ ॥
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
५६

४४२ मनुस्मृति ।
जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे
अघमर्षण-सूक्त सब पापों का नाशक है। ऋग्वेद को धारण करने
वाला ब्राह्मण चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने
भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता। जो द्विज, साव-
धानी से, ऋक्संहिता या यजुःसंहिता अथवा सामसंहिता की
ब्राह्मण-उपनिषदों के सहित तीन बार आवृत्ति करे तो सब
पापों से मुक्त होजाता है। जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ ढेला
गल जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं।
ऋक्, यजु और साम वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद
जानना चाहिए। जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है। सब वेदों में
प्रधान तीन अक्षर का-जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय
प्रणव 'ओं' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है। जो उसके स्वरूप और
अर्थ को जानता है वह वेदविशारद है॥ २६१-२६६॥
: ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।

अथ द्वादशोऽध्यायः।
चातुर्वर्ण्यस्य कृत्स्नोऽयमुक्तो धर्मस्त्वयानघ ।
कर्मणां फलनिर्वृत्तिं शंस नस्तत्त्वतः पराम् ॥ १ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम् ॥ २ ॥
शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसम्भवम् ।
कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ३ ॥
तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ ४ ॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ५ ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ६ ॥
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ ७ ॥
बारहवां अध्याय।
कर्मफल-निर्णय।
हे पापरहित ! यह चारों वर्णों का संपूर्ण धर्म तुमने कहा। अब
शुभाशुभ कर्मों के दूसरे जन्म में होनेवाले फलों को यथार्थरूप
से हम से कहिये। इस प्रकार महर्षियोंने भृगु से पूँछा। यह सुनकर

४४४ मनुस्मृति ।
मनुपुत्र-धर्मात्मा भृगुने ऋषियों से कहा, इस सम्पूर्ण कर्मयोग के
निर्णय को सुनो:-मन, वाणी और शरीर से होनेवाला कर्म शुभ,
अशुभ फल देता है और उसी कर्म के अनुसार मनुष्यों का उ-
त्तम-मध्यम और अधम योनि में जन्म होता है। उस देही के
उत्तम-मध्यम-अधम और मन-वाणी-शरीर के आश्रित फल देने
वाले तीन प्रकार के दश लक्षणयुक्त धर्म का मनप्रवर्तक-चलाने
वाला है। अन्याय से परधन हरने का विचार, दूसरे का अनभल
चाहना और परलोक में अश्रद्धा ये तीन प्रकार के मानस पाप-
कर्म हैं। कठोर वचन कहना, झूठ बोलना, सब भांति की चुगली
और व्यर्थ बकवाद करना ये चार वाणी के पापकर्म हैं । बिना
दी हुई वस्तु लेना, शास्त्रविरुद्ध हिंसा और परस्त्री-गमन ये तीन
शरीर के पापकर्म हैं ॥ १-७ ॥
मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् ।
वाचावाचाकृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ ८ ॥
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ ६ ॥
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च ।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ १० ॥
त्रिदण्डमेतान्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः ।
कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ११ ॥
योऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते ।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ १२ ॥
जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।
येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १३ ॥

बारहवां अध्याय । ४५५

बारहवां अध्याय । ४५५
तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च ।
उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १४ ॥
मनुष्य मन से किए शुभाशुभ कर्मफल को मन से ही, वाणी से
किये, वाणी ही और शरीर से किए कर्म का शरीर से ही फल भो-
गता है। मनुष्य शारीरक कर्मदोषों से वृक्षादियोनि, वाणी के
कर्मदोषों से पक्षी और मृग की योनि और मानसिक कर्मदोषों
से चाण्डाल आदि हीनयोनि में जन्म पाता है। वाणी को नियम
में रखना वाग्दण्ड, मन को वश में रखना मनोदण्ड और शरीर
को वश में रखना कायदण्ड ये तीनों जिसकी बुद्धि में स्थित हैं
वह पुरुष 'त्रिदण्डी' कहाजाता है। मनुष्य संपूर्ण जीवों पर इन
तीनों दण्डों को स्थापित करने और काम-क्रोध को वश में रखने
से, सिद्धि-कृतार्थता को पाता है। जो इस शरीर को कर्म में प्रे-
रित करता है उसको 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। और जो कर्म करता है
उसे 'भूतात्मा' कहते हैं। जीव नामक दूसरा अन्तरात्मा (सूक्ष्म श-
रीर) सब शरीरधारी क्षेत्रज्ञों के साथ पैदा होता है। जिससे
जन्मों में सम्पूर्ण सुख-दुःख जाना जाता है। वे दोनों महान्-सूक्ष्म
शरीर और क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा पञ्चभूतों के साथ मिलकर ऊंचे-नीचे
प्राणियों में स्थित होकर परमात्मा के आश्रय से रहते हैं ॥ ८-१४ ॥
असंख्या मूर्त्तयस्तस्य निष्पतन्ति शरीरतः ।
उच्चावचानि भूतानि सततं चेष्टयन्ति याः ॥ १५ ॥
पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनां नृणाम् ।
शरीरं यातनार्थीयमन्यदुत्पद्यते ध्रुवम् ॥ १६ ॥
तेनानुभूय ता यामीः शरीरेणेह यातनाः ।
तास्वेव भूतमात्रासु प्रलीयन्ते विभागशः ॥ १७ ॥
सोऽनुभूयासुखोदर्कान् दोषान् विषयसङ्गजान् ।

४४६ : मनुस्मृति ।
व्यपेत कल्मषोऽभ्येति तावेवोभौ महौजसौ ॥ १८ ॥
तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह ।
याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ॥ १९ ॥
यद्याचरति धर्म स प्रायशो धर्ममल्पशः ।
तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ॥ २० ॥
यदि तु प्रायशो धर्मं सेवते धर्ममल्पशः ।
तैर्भूतैः स परित्यक्तो यामीः प्राप्नोति यातनाः ॥ २१ ॥
यामीस्ता यातनाः प्राप्य स जीवो वीतकल्मषः ।
तान्येव पञ्चभूतानि पुनरप्येति भागशः॥ २२ ॥
उस परमात्मा के शरीर से क्षेत्रज्ञ नामक असंख्य जीव उत्पन्न
होते हैं। जो उत्तम-अधम प्राणियों से निरन्तर कर्म कराते हैं।
पापीमनुष्यों का शरीर यमयातना के लिए दूसरा सूक्ष्म-पञ्चत-
न्मात्रा से उत्पन्न होता है। वह पापी उस शरीर से यमयातना
को भोगकर फिर उन पञ्चभूतों की मात्राओं में विभाग के अनु-
सार लीन होजाता है। वह सूक्ष्मशरीरी जीव, दुःखों को भोग
चुकने पर पापरहित होकर महान् और क्षेत्रज्ञ का आश्रय क-
रता है। वे महान् और क्षेत्रज्ञ साथ में उस प्राणी के पुण्य-पाप
का विचार करते हैं, जिनसे मिला हुआ यहां और परलोक
में सुख-दुःख भोगता है। मनुष्यजन्म में यदि वह धर्म अधिक
और अधर्म थोड़ा किए रहता है तो उन्हीं पञ्चभूतों से युक्त
होकर स्वर्ग में सुख भोगता है। यदि अधर्म अधिक रहता है तो
मरकर यमयातना भोगता है । उन यातनाओं को भोगने के
बाद निष्पाप होकर वह जीव फिर विभाग के अनुसार पञ्चभूतों
का आश्रय लेकर जन्म लेता है ॥ १८-२२ ॥
एता दृष्ट्वास्य जीवस्य गतीः स्वेनैव चेतसा ।

बारहवां अध्याय। ४४७

बारहवां अध्याय। ४४७
धर्मतोऽधर्मतश्चैव धर्मे दध्यात्सदा मनः ॥ २३ ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन् विद्यादात्मनो गुणान् ।
यैर्व्याप्येमान् स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषतः ॥ २४॥
यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते ।
स तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ॥ २५ ॥
सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रागद्वेषौ रजः स्मृतम् ।
एतद्व्याप्तिमदे तेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ॥ २६ ॥
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षयेत् ।
प्रशान्तमिव शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २७ ॥
यत्तु दुःखसमायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
तद्रजोऽप्रतिघं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ॥ २८ ॥
यत्तु स्यान्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयात्मकम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ २९ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां यः फलोदयः ।
अग्र्यो मध्यो जघन्यश्च तं प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ३० ॥
गुणों का प्रभाव ।
इन जीवगतियों का जोकि धर्म-अधर्म से होनेवाली हैं अपने
मन से विचार करके पुरुष को सदा धर्म में मन टिकाना चा-
हिए। सत्त्व, रज और तम ये तीनों आत्मा प्रकृति के गुण हैं।
इन्हीं गुणों से व्याप्त महत्तत्त्व, सारे विश्व में स्थित है। इन गुणों
में जो गुण जब देह में अधिक होता है तब उस प्राणी को
अपने भाव का कर डालता है। वस्तु का वास्तविक ज्ञान सत्त्व-
गुण का उलटा ज्ञान तमोगुण का और राग-द्वेष रजोगुण का लक्षण

४४८ मनुस्मृति ।
है। सब प्राणियों के शरीर इन्हीं के प्रभावों से व्याप्त हो रहे हैं।
जिस से आत्मा को सुख का ज्ञान हो शान्त शुद्ध और प्रकाश-
भाव पैदा हो वह सत्त्वगुण है। आत्मा को अप्रीतिकर दुःख से
मिला विषयों में खींचनेवाला रजोगुण होता है। जो मोह-
युक्त हो प्रकट न हो विषयी हो और तर्क या बुद्धि से न जाना
जाय वह तमोगुण है। इन तीनों गुणों का जो उत्तम-मध्यम-अ-
धम फल होता है वह सब आगे कहा जाता है ॥ २३-३० ॥
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धर्मक्रियात्मचिन्ता च सात्त्विकं गुणलक्षणम् ॥ ३१ ॥
आरम्भरुचिताऽधैर्यमसत्कार्यपरिग्रहः ।
विषयोपसेवा चाजस्रं राजसं गुणलक्षणम् ॥ ३२ ॥
लोभः स्वप्नोऽधृतिः क्रौर्यं नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता ।
याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३३ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां त्रिषु तिष्ठताम् ।
इदं सामासिकं ज्ञेयं क्रमशो गुणलक्षणम् ॥ ३४ ॥
यत्कर्म कृत्वा कुर्वंश्च करिष्यंश्चैव लज्जति ।
तज्ज्ञेयं विदुषा सर्वं तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३५ ॥
येनास्मिन्कर्मणा लोके ख्यातिमिच्छति पुष्कलाम् ।
न च शोचत्यसंपत्तौ तद्विज्ञेयं तु राजसम् ॥ ३६ ॥
यत्सर्वेणेच्छति ज्ञातुं यन्न लज्जति चाचरन् ।
येन तुष्यति चात्मास्य तत्सत्त्वगुणलक्षणम् ॥ ३७ ॥
तमसो लक्षणं कामो रजसस्त्वर्थ उच्यते ।
सत्त्वस्य लक्षणं धर्मः श्रैष्ठ्यमेषां यथोत्तरम् ॥ ३८ ॥

बारहवां अध्याय। ४४६

बारहवां अध्याय। ४४६
वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, शौच, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म-
कर्म और आत्मचिन्तन ये सब सत्त्वगुण के काम हैं। आरम्भ
में रुचि होना, फिर अधैर्य, बुरे कामों में फँसना और विषय-
भोग ये रजोगुण के काम हैं। लोभ, नींद, अधीरता, क्रूरता,
नास्तिकता, अनाचार, मांगने की आदत और प्रमाद ये तमो-
गुण के काम हैं। इन तीनों गुणों का संक्षेप से लक्षण यों हैः-
जिस कर्म को करके करते हुए या आगे करने में लज्जा आती
है वह तमोगुण का लक्षण है। जिस कर्म से लोक में प्रसिद्धि
चाहे, पर फल न होने पर शोक न पैदा हो, वह रजोगुण का
लक्षण है। जिससे ज्ञान प्राप्त करना चाहे, जिसको करने में
लज्जा न आवे और जिस कर्म से मन प्रसन्न सन्तुष्ट रहे, उसको
सत्त्वगुण का लक्षण जानना चाहिए। तम का काम, रज का
अर्थ और सत्त्व का धर्म ये मुख्य लक्षण हैं। इनमें क्रम से अगला
अगला श्रेष्ठ माना जाता है॥ ३१-३८॥
येन यस्तु गुणेनैषां संसारान् प्रतिपद्यते ।
तान् समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम् ॥३६॥
देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः ।
तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषां त्रिविधा गतिः ॥ ४० ॥
त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः ।
अधमा मध्यमाग्र्या च कर्मविद्याविशेषतः ॥ ४१ ॥
स्थावराः क्रमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः ।
पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ ४२ ॥
हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः ।
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥४३॥
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः ।
५७

४५० मनुस्मृति ।
रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥
झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः ।
द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५ ॥
राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः ।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥
इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता
है, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं-सात्त्विक गुणवाले देव-
भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते हैं-
यह तीन प्रकार की गति है। सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों
से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार, उत्तम-मध्यम-अ-
धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क-
छुवा, पशु और मृग, ये तमोगुणी अधम गति है। हाथी, घोड़ा,
शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शूकर ये तमोगुणी मध्यमगति
है। चारण-भाँट, गरुड़ादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि-
शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए। झल्ल, मल्ल,
नट, शस्त्र से जीनेवाले, जुआ-मद्यपान में आसक्त पुरुष ये रजो-
गुण की अधमगति हैं । राजा, क्षत्रिय, राजपुरोहित, विवाद
करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥
गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये ।
तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥
तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः ।
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥ ४८ ॥
यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः ।
पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥

बारहवां अध्याय। ४५१

बारहवां अध्याय। ४५१
ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च ।
उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥
एष सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिप्रकारस्य कर्मणः ।
त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५१ ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च ।
पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥
यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा ।
क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥
बहून् वर्षगणान् घोरान् नरकान् प्राप्य तत्क्षयात् ।
संसारान् प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥

गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष, विद्याधर और अप्सरा ये रजोगुणी
उत्तमगति है। वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानचारी देवता;
नक्षत्र और दैत्य ये सत्त्वगुण की अधमगति है। यजमान, ऋषि,
देवता, वेद, ज्योति, वर्ष, पितर और साध्यदेव यह सत्त्वगुण
की मध्यमगति है। ब्रह्मा, प्रजापति, धर्म, महत्तत्त्व और प्रधान
इसको सत्त्वगुण की उत्तमगति विद्वान् लोग कहते हैं। इस
प्रकार मन, वाणी और शरीर के तीन प्रकार के कर्मों से होने
वाली, त्रिगुणमयी, उत्तम-मध्यम-अधम तीन प्रकार की सब प्रा-
णियों की गति कही गई है। इन्द्रियों में आसक्ति और धर्माचरण
न करने से मूर्ख-अधम मनुष्य पापयोनि को प्राप्त होते हैं। इस
लोक में यह जीव जिस जिस कर्म से जिस जिस योनि में
जन्म लेता है, उन सब को क्रम से सुनो—महापातकी पुरुष बहुत
वर्षों तक भयानक नरकों में पड़कर, पाप कट जाने पर बांकी
भोग भोगने के लिए इन नीच योनियों में जन्मता है ॥ ४७-५४ ॥

श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।

४५२ मनुस्मृति ।
चाण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ५५ ॥
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम् ।
हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ ५६ ॥
लूताऽहि सरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम् ।
हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ॥ ५७ ॥
तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि ।
क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ॥ ५८ ॥
हिंस्रा भवन्ति क्रव्यादः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः ।
परस्परादिनः स्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः ॥ ५९ ॥
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् ।
अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ ६० ॥
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः ।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥ ६१ ॥
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं प्लवः ।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम् ॥ ६२ ॥
ब्रह्महत्या करनेवाला, कुत्ता, सुअर, गधा, ऊँट, बैल, बकरा,
मेंढ़ा, मृग, पक्षी, चाण्डाल और पुक्कस की जाति में जन्मता है।
मद्यपान करनेवाला ब्राह्मण कृमि, कीड़ा, पतंग, मैला खानेवाले
पक्षी और हिंसक प्राणियों की जाति में जन्मता है । सोना
चुरानेवाला ब्राह्मण मकड़ी, सांप, गिरगट, जलचर पक्षी, हिंसक
जीव और पिशाच की योनि में जन्मता है । गुरुपत्नी-गामी पुरुष
सैकड़ों बार घास, गुल्म, लता, कच्चा मांस खानेवाले, दाढ़वाले
और क्रूर कर्मियों की योनि में जन्म लेता है । हिंसक मनुष्य
कच्चा मांस खानेवाले, कृमि और अभक्ष्य-भक्षी होते हैं । चोर

बारहवां अध्याय। ४५३

बारहवां अध्याय। ४५३
एक दूसरे को खानेवाले प्राणी होते हैं। चाण्डाली से संयोग
करनेवाले प्रेत होते हैं। पतितों से संसर्गी, परस्त्री और ब्राह्मण
धन हरनेवाला, ब्रह्मराक्षस होता है। मणि, मोती, मूँगा और
विचित्र रत्नों को चुराकर, हेमकार पक्षियों में जन्मता है। अन्न
चुराकर चूहा कांस की चोरी से हंस, जल चुराने से मेंढ़क,
मधु चुराने से मक्खी, दूध की चोरी से कौआ, रस चुराने से
कुत्ता और घी चुराने से नौला होता है ॥ ५५-६२ ॥
मांसं गृध्रो वसां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः ।
चीरीवाकस्तु लवणं बलाका शकुनिर्दधि ॥ ६३ ॥
कौशेयं तित्तिरिर्हित्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः ।
कार्पासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुडम् ॥ ६४॥
छुच्छन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकं तु बर्हिणः ।
श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ ६५ ॥
वको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्युपस्करम् ।
रक्तानि हृत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ ६६ ॥
वृको मृगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः ।
स्त्रीमृक्षः स्तोकको वारि यानान्युष्ट्रः पशूनजः ॥ ६७ ॥
यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः ।
अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ॥ ६८॥
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः ।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥ ६६ ॥
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णा ह्यनापदि।
पापान् संसृत्य संसारान् प्रेष्यतां यान्ति शत्रुषु ॥ ७०॥

४५४ मनुस्मृति ।
: मांस चुराने से गीध, चरबी चुराने से जलकाक, तेल की
चोरी से तैलपक पक्षी, लोन चुराने से झींगुर और दही की
चोरी से बलाका पक्षी होता है। रेशम चुराने से तीतर, अलसी
के कपड़ों की चोरी से मेंढक, कपास वस्त्र चुराने से सारस,
गौ चुराने से गोधा और गुड़ चुराने से वाग्गुद पक्षी होता है।
उत्तम सुगन्ध की चीज़ चुराने से छुछुन्दरि, पत्ते-शाक चुराने से
मोर, पक्वान्न चुराने पर भेड़िया और कच्चा अन्न चुराने से
शल्यक होता है। आग चुराने से बक, सूप-मूसल चुराने पर
मकड़ी और लाल वस्त्र चुराने से चकोर पक्षी होता है। मृगया,
हाथा चुराने से नाहर, घोड़ा चुराने से व्याघ्र, फल-मूल की
चोरी से वानर, स्त्री चुराने से रीछ, पीनेका जल चुराने से
चातक, सवारी की चोरी से ऊँट और पशु की चोरी से बकरा
होता है। मनुष्य दूसरे की कोई भी वस्तु चुराकर और बिना
होम हवि भोजन से अवश्य पक्षी होता है। स्त्रियां भी चोरी
करने पर इन्हीं दोषों को पाती हैं और उन्हीं जन्तुओं की स्त्री
बनती हैं। बिना आपत्ति के अपने अपने नित्य कर्मों से पतित
पुरुष पाप-योनियों में पैदा होकर, शत्रुओं के यहां दासपना को
पाते हैं ॥ ६३-७० ॥
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ।
अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ॥ ७१ ॥
मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥ ७२ ॥
यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयीत्मकाः ।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥ ७३ ॥
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।
संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥

बारहवां अध्याय। ४५५

बारहवां अध्याय। ४५५
तामिस्रादिषु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् ।
असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च ॥ ७५ ॥
विविधाश्चैव संपीड़ाः काकोलूकैश्च भक्षणम् ।
करम्भवालुकातापान् कुम्भीपाकांश्च दारुणान् ॥७६॥
संभवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः ।
शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥ ७७ ॥
असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् ।
बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥ ७८ ॥
अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण उल्कामुख प्रेत होकर वमन खाता
है। क्षत्रिय, कटपूत प्रेत होकर विष्ठा और मुरदा खाता है।
अपने धर्म से भ्रष्ट वैश्य मैत्राक्षज्योतिक प्रेत होकर, पीब खाता
है और शूद्र चैलाशक प्रेत होकर, कपड़े की जूँ खाता है । वि-
षयासक्त पुरुष जैसे जैसे विषयों का सेवन करते हैं, वैसे वैसे
उनमें उनकी कुशलता हो जाती है। वे निर्बुद्धि उन पाप कर्मों
के बार बार करने से यहां अनेक योनियों में जन्म लेकर दुःख
पाते हैं। तामिस्र आदि भयानक नरकों में बार बार जन्म होता
है। असिपत्र आदि वनों में चलना पड़ता है। यमलोक के बन्धन
और छेदन के दुःख भोगने पड़ते हैं । अनेक पीड़ायें होती हैं,
कौआ, उल्लू नोच नोच कर खाते हैं, जलती रेती का ताप और
कुम्भीपाक आदि दारुण नरक भोगने पड़ते हैं। दुःख से पूर्ण
पशु आदि की योनि में वारंवार जन्म होते हैं। सर्दी-गर्मी की
पीड़ा और भांति भांति के भय होते हैं। फिर फिर गर्भ में वास
होता है। दुःखद जन्म होता है। विविध बंधन शृङ्खला वगैरह
का और दासपना प्राप्त होता है ॥ ७१-७८ ॥
बन्धुप्रियवियोगांश्च संत्रासं चैव दुर्जनैः ।
द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ॥ ७६॥

४५६ मनुस्मृति।
जरां चैवाप्रतीकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम् ।
क्लेशांश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ॥ ८० ॥
यादृशेन तु भावेन यद्यत्कर्म निषेवते ।
तादृशेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥ ८१ ॥
एष सर्वः समुद्दिष्टः कर्मणां वः फलोदयः ।
नैःश्रेयसकरं कर्म विप्रस्येदं निबोधत ॥ ८२ ॥
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च नैःश्रेयसकरं परम् ॥ ८३ ॥
सर्वेषामेव चैतेषां शुभानामिहकर्मणाम् ।
किञ्चिच्छ्रेयस्करतरं कर्मोक्तं पुरुषं प्रति ॥ ८४ ॥
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ।
तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ८५ ॥
षण्णामेषां तु सर्वेषां कर्मणां प्रेत्य चेह च ।
श्रेयस्करतरं ज्ञेयं सर्वदा कर्म वैदिकम् ॥ ८६ ॥
बान्धवों का वियोग, दुर्जनों का सहवास, दुःख से धन पाना,
धन का नाश, कठिनता से मित्र पाना और शत्रुओं से वैर भाव
होता है । जिसका उपाय न हो सके ऐसा बुढ़ापा आता है,
व्याधियों से कष्ट, नानाप्रकार के दुःख और दुर्जय मरण होता
है । मनुष्य जिस भाव से जो कर्म करता है, उसीके अनुकूल
शरीर धारण करके फलों को भोगता है। यह सब कर्म फलों का
वृत्त कहा गया है । अब ब्राह्मणों का कल्याण करनेवाला कर्म
सुनो:—
नैःश्रेयस-कर्म ।
वेदाभ्यास, तप, आत्मज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा, गुरुसेवा,

बारहवां अध्याय। ४५७

बारहवां अध्याय। ४५७
ये कर्म ब्राह्मणों को परम-हितकारी हैं। इन सब शुभकर्मों में भी
पुरुष का, अधिक कल्याण करनेवाला कर्म-आत्मज्ञान है। वह
सब विद्याओं में श्रेष्ठ है और उससे मोक्ष मिलता है। इन ऊपर
कहे छः कर्मों में लोक-परलोक दोनों में अधिक कल्याणकारी
वैदिक कर्म है ॥ ७६-८६ ॥
वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः ।
अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन् क्रियाविधौ ॥८७॥
सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ ८८ ॥
इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते ।
निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ ८६ ॥
प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् ।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ ६० ॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ६१ ॥
यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः ।
आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ६२॥
एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः।
प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ६३ ॥
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ६४॥
वैदिक कर्मों में ऊपर कही सब क्रियाओं का अन्तर्भाव होता
है। स्वर्गादि सुख और अभ्युदय करनेवाला प्रवृत्ति कर्म और
५८

४५८ मनुस्मृति ।
मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै-
दिक कर्म होते हैं। इसलोक के और परलोक के सुख की कामना
से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम आत्मज्ञानार्थ किया कर्म
निवृत्त कहलाता है। प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता
को और निवृत्त कर्म करने से पञ्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष
पाता है। सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों
को समान देखनेवाला आत्मयाजी मोक्ष को पाता है। द्विज
शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और
वेदाभ्यास ही करे। इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म
की सफलता है। द्विज आत्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है,
अन्यथा नहीं। पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग दिखाने
वाला वेद ही नेत्र है। वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना
जानने में अशक्य है और अनन्तहै। यही मर्यादा है ॥८७-९४॥
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाःप्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥
उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् ।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ९६ ॥
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्ध्यति ॥ ९७ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥
बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् ।
तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥

बारहवां अध्याय। ४५६

बारहवां अध्याय। ४५६
यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान्।
तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः॥ १०१॥
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्।
इहैव लोके तिष्ठन् स ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १०२॥
जो स्मृति वेदमूलक नहीं हैं, जो वैदिक देव-यज्ञादि को झूठा
बतलानेवाले ग्रन्थ हैं, उन सबको निष्फल और नरकगति देनेवाले
जानना चाहिए। वेद से भिन्न-मूलक जो ग्रन्थ हैं वे सब उत्पन्न होते
हैं और थोड़े समय में नष्ट होजाते हैं। वे आधुनिक होनेसे निष्फल
और असत्य हैं। चारों वर्ण, चारों आश्रम, तीनों लोक और भूत,
भविष्य, वर्तमान काल सब वेदहीसे प्रसिद्ध होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप,
रस, गन्ध ये पांच भी वेद से उत्पन्न हैं और सत्त्वादि गुणों के कर्म
से हैं। सनातन वेद यज्ञादि से चराचर विश्व का धारण और पा-
लन करता है। इसलिये वेद अधिकारी के परम कल्याण का साधन
है। सेनापति, राज्य, न्यायाधीश और सबका स्वामी वेदशास्त्रज्ञही
होता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले वृक्षों को भी भस्म
करडालता है वैसेही वेदज्ञ अपने कर्मदोषों को भस्म करडालता
है। वेद के तत्त्व को जाननेवाला चाहे जिस आश्रम में रहकर
इसीलोक में मोक्ष पाता है॥ ६५-१०२॥
अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः।
धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥१०३॥
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।
तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ १०४॥
प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्।
त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता॥ १०५॥
आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।

४६० मनुस्मृति ।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ १०६ ॥
नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः ।
मानवस्यास्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ॥ १०७ ॥
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।
यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥ १०८ ॥
धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः ।
ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ १०६ ॥
दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् ।
त्र्यवरा वाऽपि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ ११० ॥
अज्ञों से ग्रन्थ पढ़े हुए श्रेष्ठ हैं, उनसे धारण करनेवाले श्रेष्ठ हैं।
उनसे भी अर्थ समझनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी शास्त्रानुसार
आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। तप और विद्या ब्राह्मण का परम हित-
कारी है। ब्राह्मण तप से पाप नाश करता है और ब्रह्मविद्या
से मोक्ष पाता है। धर्म के तत्त्व को जानने की इच्छावाले प्रत्यक्ष
(श्रुति) अनुमान (स्मृति) और विविध शास्त्रों को भली
भाँति जानें। जो वेद और धर्मशास्त्र का वेद के अनुकूल तर्क
से विचार करता है वह धर्म को जानता है, दूसरा नहीं जा-
नता। इस प्रकार मोक्ष देनेवाले सब कर्म कहे गये हैं। अब इस
मानव धर्मशास्त्र के रहस्य का उपदेश करते हैं:—
रहस्य-उपदेश ।
जो धर्म इस शास्त्रमें नहीं कहे गये उनका निर्णय शिष्ट ब्राह्मणों
की आज्ञा से जो हो वही माननीय होता है। जिन्होंने साङ्ग वेद
धर्मभाव से अध्ययन किया हो उन वेद के प्रत्यक्ष प्रमाण भूत ब्रा-
ह्मणों को शिष्ट जानना चाहिए। कमसे कम दश सदाचारी ब्राह्मणों
की सभा या तीनही ब्राह्मणों की सभा जो धर्म बतलावें वही धर्म
जानना चाहिए ॥ १०३-११० ॥