मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय । २६१
आठवां अध्याय । २६१ क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च । सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ॥ २६२ ॥ खेत, कुआं, तालाब, बगीचा और घरों की सीमा का निर्णय आसपास के गवाहों से करना चाहिए ॥ २६२ ॥ सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदतां नृणाम् । सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम्॥ २६३॥ गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषया हरन् । शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥२६४॥ सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् । प्रविशेद्भूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ॥ २६५ ॥ एषोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ॥ २६६ ॥ यदि सीमाके झगड़े में पास के सामन्त झूठ बोलें तो हर एक को पांच पांच सौ पण दण्ड करे । घर, तालाब, बगीचा वा खेत को डर दिखा कर कोई छीनले तो पांचसौ पण उसपर दण्ड करे और अजान में ले तो दोसौ पण दण्ड करे । सीमा के निर्णय का कोई भी ठीक सबूत न मिले तो धर्मज्ञ राजा स्वयं सीमा को बांध दे यही मर्यादा है इस भांति सब सीमा निर्णय का विषय कहा गया है, अब कठोर वचन का निर्णय कहा जायगा ॥ २६३-२६६ ॥ शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियोदण्डमर्हति । वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तु वधमर्हति ॥ २६७ ॥ पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने । वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ॥ २६८ ॥
२६२ मनुस्मृति। समवर्णो द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे । वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत् ॥ २६६ ॥ एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् । जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥ २७० ॥ कठोर वचन-गाली आदि का निर्णय । ब्राह्मण को क्षत्रिय गाली दे तो सौ पण दण्ड करे, वैश्य को डेढ़ सौ या दो सौ पण दण्ड करे । शूद्र को तो पीटनाही योग्य है। क्षत्रिय को गाली ब्राह्मण दे तो पचास पण, वैश्य को दे तो पचीस और शूद्र को गाली दे तो बारह पण दण्ड करे । द्विजाति अपने समान वर्ण को गाली दे तो बारह पण और गंदी गाली दे तो इसका दूना दण्ड करे। कोई शूद्र, द्विजाति का कठोर वाणी से अपमान करे तो उसकी जीभ काट ले । क्योंकि शूद्र पैर से पैदा हुआ है ॥ २६७-२७० ॥ नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्येदशाङ्गुलः॥२७१॥ धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ॥ २७२ ॥ श्रुतं देशं च, जातिं च, कर्म शारीरमेव च । वितथेन ब्रुवन्दप्यादाप्यः स्याद् द्विशतं दमम् ॥ २७३ ॥ काणं वाप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम्। तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणावरम् ॥ २७४ ॥ मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम् । आक्षारयञ्छतं दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः॥ २७५ ॥
आठवां अध्याय । २६३
आठवां अध्याय । २६३ ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यो विजानता । ब्राह्मणे साहसः पूर्वः क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ २७६॥ विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः । छेदवर्जं प्रणयनं दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ २७७॥ एष दण्डविधिः प्रोक्तो वाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्डपारुष्यनिर्णयम् ॥ २७८ ॥ यदि नाम और जाति को घोलकर द्वेष से द्विजातियों को गाली दे तो उस शूद्र के मुख में अग्नि में तपाई दश अंगुल की कील डाले। शूद्र, अभिमान से द्विजों को धर्मोपदेश करे तो राजा उसके मुख और कान में खौलता तेल छोड़वावे। यदि अभिमान से कहे कि तू वेद नहीं पढ़ा है, अमुक देश का नहीं है, तेरी यह जाति नहीं है, तेरे संस्कार नहीं हुए हैं तो राजा दो सौ पण दण्ड करे। काना, लूला अंधा आदि किसी को सच भी कहे तो एक कार्षापण दण्ड करे। माता, पिता, स्त्री, भाई, पुत्र, गुरु को गाली देनेवाला और गुरु को मार्ग न छोड़नेवाला सौ पण दण्ड योग्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय आपस में गाली दें तो राजा ब्राह्मण पर अढ़ाई सौ और क्षत्रिय पर पांच सौ पण दण्ड करे। वैश्य शूद्र आपस में गाली दें तो वैश्य को साधारण दण्ड और शूद्र की जीभ न काटकर कोई दूसरा दण्ड करे इस प्रकार कठोर वचन का दण्ड निर्णय कहा गया है, अब मारपीट का दण्डनिर्णय कहा जायगा ॥ २७१-२७८ ॥ येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः । छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ॥ २७९ ॥ पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति । पादेन प्रहरन् कोपात्पादच्छेदनमर्हति ॥ २८० ॥
अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।
२६४ मनुस्मृति । सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः । कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचंचास्यावकर्त्तयेत् ॥ २८१ ॥ अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः । अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्धयतो गुदम् ॥ २८२ ॥ केशेषु गृह्णतो हस्ता च्छेदयेदविचारयन् । पादयोर्दाढिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च ॥ २८३ ॥ दण्डपारुष्य-मार पीट का निर्णय । शूद्र, द्विजों को अपने जिस अङ्ग से मारे उसी अङ्ग को कटवा डाले यही मनुजी की आज्ञा है। हाथ, डंडा उठाकर मारे तो हाथ और कोप से पैर से मारे तो पैर काटने योग्य है। नीच जाति का ऊंची जातिवाले के साथ अभिमान से बैठना चाहे तो उसकी कमर में दागकरके देश से निकाल दे। हीनवर्ण ऊंचे वर्ण के ऊपर थूके तो दोनों ओठ कटवावे, मूते तो लिङ्ग और पादे तो गुदा कटवावे बाल पकड़े, पैर पकड़े, घसीटे, दाढ़ी गर्दन और अण्डकोष में हाथ लगावे तो बिना विचार झट हाथ कटवादे ॥ २७६-२८३ ॥ त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः । मांसभेत्ता तु षण्निष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ॥ २८४ ॥ वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगं यथा यथा । तथा तथा दमः कार्यों हिंसायामिति धारणा ॥ २८५ ॥ मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति । यथा यथा महद्दुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ॥ २८६ ॥ 'खाल खींचने और खून निकालने पर सौ पण दण्ड करे । मांस काटे तो छः निष्क और हड्डी तोड़े तो देशनिकाले की सज़ा करे । संपूर्ण वृक्षों का उपयोग विचार कर उनके काटनेवाले को दण्ड देवे । मनुष्य और पशुओं को मारने पर जैसा अधिक दुःख हो
आठवां अध्याय । २६५
आठवां अध्याय । २६५ उसीके अनुसार अपराधी को दण्ड भी दुःखदायी करना चाहिये ॥ २८४-२८६ ॥ अङ्गवपीडनायां च व्रणशोणितयोस्तथा । समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापि वा ॥ २८७ ॥ द्रव्याणि हिंस्याद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा । स तस्योत्पादयेत्तुष्टिं राज्ञो दद्याच्च तत्समम् ॥ २८८ ॥ चर्मचार्मिकभाण्डेषु काष्ठलोष्ठमयेषु च । मूल्यात्पञ्चगुणो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ २८६ ॥ यानस्य चैव यातुश्च यानस्वामिन एव च । दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ २६० ॥ छिन्नास्ये भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते । अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव च ॥ २६१ ॥ छेदने चैव यन्त्राणां योक्त्ररश्म्योस्तथैव च । आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ॥ २६२ ॥ हाथ, पैर आदि अङ्ग तोड़ने वा घायल करनेवाले से उसके अच्छे होने के लिए खर्च दिलवावे अथवा सब प्रकार का दण्ड देय । जो जानकर वा न जानकर किसी की कोई वस्तु बिगाड़े तो उसको दाम वगैरह देकर खुश करे और राजा को उतनाही दण्ड देय । चमड़ा, चाम के पात्र-मशक आदि, काठ और मिट्टी के पात्र, फूल, मूल और फलों की हानि करने पर मूल्य से पाँच गुना दण्ड करे । सवारी सारथि और सवारी के मालिक को दश हालतों में छोड़कर बाक़ी में दण्ड दिया जाता है। नाथ टूटने, जुवा टूटने, नीचे ऊंचे के कारण, टेढ़े वा अड़कर चलने, रथ का धुरा टूटने, पहिया टूटने, रस्सी टूटने, गले की रस्सी टूटने, लगाम टूटने और 'हटो-बचो' आदि कहने पर भी यदि किसी
२६६ मनुस्मृति । का नुक़सान होजाय तो मनुजी ने दण्ड नहीं कहा ॥ २८७-२६२ ॥ यत्रापवर्त्तते युग्यं वैगुण्यात्प्राजकस्य तु । तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो हिंसायां द्विशतं दमम् ॥ २६३ ॥ प्राजकश्चेद्भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति । युग्यस्थाः प्राजकेऽनाप्ते सर्वेदण्ड्याः शतं शतम् ॥२६४॥ जहां सारथि के चतुर न होने से रथ इधर उधर चलता है उस से नुक़सान होने पर स्वामी को दो सौ पण दण्ड होना चाहिए । और सारथि चतुर-होशियार हो तो उसीको दो सौ पण दण्ड करे । सारथि कुशल न होने पर जो सवारी करते हैं वे सब सौ सौ पण दण्ड क़ाबिल हैं ॥ २६३-२६४ ॥ स चेत्तु पथि संरुद्धः पशुभिर्वा रथेन वा । प्रमापयेत् प्राणभृतस्तत्र दण्डोऽविचारितः ॥ २६५ ॥ मनुष्यमारणे क्षिप्रं चौरवत्किल्बिषं भवेत् । प्राणभृत्सु महत्स्वर्धं गोगजोष्ट्रहयादिषु ॥ २६६ ॥ क्षुद्रकाणां पशूनां तु हिंसायां द्विशतो दमः । पञ्चाशत्तु भवेद्दण्डः शुभेषु मृगपक्षिषु ॥ २६७ ॥ गर्दभाजाविकानां तु दण्डः स्यात्पञ्चमाषिकः । माषकस्तु भवेद्दण्डः श्वसूकरनिपातने ॥ २६८ ॥ भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सौदरः । प्राप्तापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥२६६॥ पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन । अतोऽन्यथा तु प्रहरन्प्राप्तः स्याच्चोरकिल्विषम् ॥ ३०० ॥
आठवां अध्याय। २६७
आठवां अध्याय। २६७ एषोखिलेनाभिहितो दण्डपारुष्यनिर्णयः । स्तेनस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं दण्डविनिर्णये ॥ ३०१ ॥ मार्ग में पशु या दूसरी गाड़ी से रुकने पर भी सारथी हाँकते चला जाय और किसीके चोट लग जाय तो राजा तुरंत नीचे लिखा दण्ड करेः--मनुष्य का प्राणघात हुआ हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा आदि बड़े पशुओं का घात होने पर पांच सौ पण दण्ड करे । छोटे छोटे पशुओं की हिंसा होने पर दो सौ पण और मृग, मोर वगैरह सुन्दर पक्षी मर जायँ तो पचास पण दण्ड करे । गधा, बकरी और भेड़ मरें तो पाँच माषक दण्ड करे । कुत्ता, सुअर मरे तो एक माषक दण्ड करे । स्त्री, पुत्र, दास, शिष्य और छोटा भाई अपराध करें तो रस्सी या बाँस की छड़ी से ताड़न के योग्य हैं, परन्तु इनके पीठ में मारे, शिर आदि में न मारे, नहीं तो चोर के समान दण्ड योग्य होता है। इस प्रकार मार पीट का पूरा निर्णय कहा, अब चोर के दण्ड का निर्णय कहेंगे ॥ २६५-३०१ ॥ परमं यत्नमातिष्ठेत्स्तेनानां निग्रहे नृपः । स्तेनानां निग्रहादस्य यशो राष्ट्रं च वर्धते ॥ ३०२ ॥ चोर-दण्डनिर्णय । राजा चोरों को दण्ड देने में सदा पूरा यत्न करे । क्योंकि चोरों के निग्रह से राजा का यश और राज्य वृद्धि को पाता है ॥ ३०२ ॥ अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः । सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाभयदक्षिणम् ॥ ३०३ ॥ सर्वतो धर्मषड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः । अधर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य ह्यरक्षतः ॥ ३०४ ॥ ३८
२६८ मनुस्मृति । यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति । तस्य षड्भागभाद्राजा सम्यग्भवति रक्षणात्॥३०५॥ रक्षन् धर्मेण भूतानि राजा वध्यांश्च घातयन् । यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः॥ ३०६ ॥ योऽरक्षन् बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः । प्रतिभा गं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३०७ ॥ अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् । तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ॥ ३०८ ॥ जो राजा अभय देता है वह सदा पूज्य है। उस अभय-दक्षिणा देनेवाले का राज्य खूब बढ़ता है । जो रक्षा करता है उस राजा का सब के धर्म से छठा भाग होता है और जो रक्षा नहीं करता उसका सबके अधर्म में से छठा भाग होता है । जो रक्षाशील है वह प्रजा मैं जो वेद पढ़ता है, यज्ञ करता है, दान देता है, पूजा- पाठ करता है, सब के छठे भाग का फल पाता है । प्रतिदिन प्रा- णियों की धर्म से रक्षा और दुष्टों को दण्ड देने से मानो राजा लाखों रुपया की दक्षिणा का यज्ञ कर रहा है और जो राजा प्रजापालन न करके भेंट कर आदि लेता है वह शीघ्रही नरक- गामी होता है । इस प्रकार का राजा अन्न का छठा भाग जो लेता है वह सब लोगों का पाप लेनेवाला कहलाता है ॥ ३०५-३०८ ॥ अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विप्रलुम्पकम् । अरक्षितारमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ ३०६ ॥ अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः । निरोधनेन बन्धेन विविधेन वधेन च ॥ ३१० ॥ धर्ममर्यादा से रहित, नास्तिक, प्रजा धन ठगनेवाला और विना प्रजापालन कर लेनेवाला राजा नरकगामी होता है ।
आठवां अध्याय । २६६
आठवां अध्याय । २६६ अधर्मों को तीन उपायों से सदा वश में रक्खे-नज़रबंद, क़ैद और बैंत आदि से मारकर ॥ ३०६-३१० ॥ निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च । द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ ३११ ॥ क्षन्तव्यं प्रभुणा नित्यं क्षिपतां कार्थिणां नृणाम् । बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ ३१२ ॥ यः क्षिप्तो मर्षयत्यार्त्तैस्तेन स्वर्गे महीयते । यस्त्वैश्वर्यान्न क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ ३१३ ॥ राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता । आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवं कर्मास्मि शाधि माम् ॥ ३१४॥ स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम् । शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा ॥ ३१५ ॥ शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते । अशासित्वात्तु तं राजा स्तेनस्याप्नोतिकिल्बिषम् ॥ ३१६॥ पापियों को दण्ड देने से और साधु पुरुषों का संग्रह करने से राजा पवित्र होता है, जैसे यज्ञ करने से ब्राह्मण पवित्र होता है। कोई वादी-प्रतिवादी और बालक, वृद्ध और पीड़ित मनुष्य अपने दुःख से दुखी होकर कोई कुवचन कह दें तो राजा उनको क्षमा करे। जो आक्षेप वचनों को सहन कर लेता है वह राजा स्वर्ग- गामी होता है और जो ऐश्वर्य के मद से नहीं सहता, वह नरक- गामी होता है। चोर शिर के बाल खोले दौड़कर राजा के पास अपने अपराध को निवेदन करे, खैर की लकड़ी का मूसल या लट्ठ अथवा जिसमें दोनों तरफ़ धार हो ऐसी बरछी या लोह का दण्डा कंधे पर रखकर दण्ड के लिए प्रार्थना करे। उस हालत में राजा के दण्ड देने वा छोड़ देने से चोर को चोरी का पाप नहीं
३०० | मनुस्मृति ।
लगता । पर उसको दण्ड न करने से उसका पाप राजा को लगता है ॥ ३११-३१६ ॥ अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि पत्यौ भार्यापचारिणी । गुरौ शिष्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनि किल्बिषम्॥३१७॥ राजनिर्धूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥३१८॥ गर्भघाती का पाप उसके अन्न खानेवाले को, व्यभिचारिणी स्त्री का पाप उसके पति को, शिष्य का पाप गुरु को और यज्ञ करनेवाले का करानेवाले को क्षमा करने से लगता है। वैसेही छोड़ने से राजा को पाप होता है। पाप करके भी राजदण्ड पाये हुए मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं जैसे पुण्य करने से साधु पुरुष जाते हैं ॥ ३१७-३१८ ॥ यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद्भिंद्याच्च यः प्रपाम् । स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्चैत्तस्मिन् समाहरेत् ॥३१६॥ धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः । शेषेऽप्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ ३२० ॥ तथा धरिमेमेयानां शतादभ्यधिके वधः । सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम् ॥ ३२१ ॥ पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते । शेषे त्वेकादशगुणं मूल्याद्दण्डं प्रकल्पयेत् ॥ ३२२ ॥ पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः । मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ॥ ३२३ ॥ जो पुरुष कूप पर से रस्सी और घड़ा चुरावे या जो पोशाला
आठवां अध्याय। ३०१
आठवां अध्याय। ३०१ को तोड़े उसपर एकमासिक दण्ड करे और वह उस चीज़ को वहीं लाकर रखदे। बीस द्रोण का एक कुम्भ-ऐसे दश कुम्भ अन्न चुराने वाले को खूब पीटे और इससे कम हो तो ग्यारहगुना जुर्माना करे और चोरी का माल उसके मालिक को दिलावे। ऐसेही तराजू से तोलने क़ाबिल सोना, चांदी या वस्त्रादि चुराने पर यदि पदार्थ सौ १०० पल से अधिक हो तो चोर को मारडाले। और पचास पल से अधिक हो तो चोर के हाथ कटवा डाले। इससे कम हो तो माल से ग्यारहगुना जुर्माना करे। किसी कुलीन पुरुष या स्त्री के बहुमूल्य जेवर, जवाहिरात चुरानेवाले का कोई अङ्ग काट डालना चाहिए ॥ ३१६-३२३ ॥ महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च। कालमासाद्य कार्यं च दण्डं राजा प्रकल्पयेत् ॥ ३२४ ॥ गोषु ब्राह्मणसंस्थासु छुरिकायाश्च भेदने। पशूनां हरणे चैव सद्यः कार्योऽर्धपादिकः ॥ ३२५ ॥ सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च। दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य तृणस्य च ॥३२६॥ बड़े पशु, शस्त्र और औषध चुराने पर समय और अपराध के अनुसार राजा दण्ड करे। ब्राह्मणों की और गौओं की चोरी या छुरी से मारने पर तुरन्त आधा पैर कटवा देना चाहिए। सूत, कपास, मदिरा की गाद, गोबर, गुड़, दही, दूध, माठा, जल और तृण-घास चुराने पर मूल्य से दूना दण्ड करे ॥ ३२४-३२६॥ वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च। मृण्मयानां च हरणे मृदो भस्मन एव च ॥ ३२७ ॥ मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च। मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यत्पशुसम्भवम् ॥ ३२८ ॥
३०२ मनुस्मृति । अन्येषां चैवमादीनां मद्यानामाोदनस्य च । पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद्द्विगुणो दमः ॥३२६॥ पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीनगेषु च । अन्येष्वपरिपूतेषु दण्डः स्यात्पञ्चकृष्णलः ॥ ३३० ॥ परिपूतेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च । निरन्वये शतं दण्डः सान्वयेऽर्धशतं दमः ॥ ३३१ ॥ स्यात्साहसं त्वन्वयवत् प्रसभं कर्म यत्कृतम् । निरन्वयं भवेत्स्तेयं हृत्वापह्नूयते च यत् ॥ ३३२ ॥ यस्त्वेतान्युपक्लृप्तानि द्रव्याणि स्तेनयेन्नरः । तमाद्यं दण्डयेद्राजा यश्चाग्निं चोरयेद् गृहात् ॥३३३॥ येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते । तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ ३३४ ॥ बांस के पात्र, निमक, मट्टी के पात्र, मट्टी, राख, मछली, चि- ड़िया, तेल, घी, मांस, मधु, पशुओं के सींग आदि और ऐसेही दूसरे पदार्थ, मदिरा, भात और सब भांति के पक्वान्न चुराने पर माल के दाम से दूना दाम दण्ड करे । फूल, खेत का हरा अन्न, गुल्म, लता, वृक्ष और धान वगैरह चुराने पर, पाँच 'कृष्णल' दण्ड करे । सफ़ा अन्न, शाक, मूल और फलों का चोर यदि कुटुम्बी न हो तो सौ पण और हो तो पचास पण दण्ड करे । जो पदार्थ जबरन् स्वामी के सामने छीना हो वह साहस-लूट है और जो पदार्थ स्वामी के पीछे लिया हो और क़बूल न करे तो वह चोरी है । ऊपर कहे पदार्थों को जो चुरावै और जो घर से आग चुरावै उन पर प्रथम-साहस, राजा दण्ड करे । चोर, जिस जिस अङ्ग से मनुष्यों की चोरी या मार-काट वगैरह करे, उसका वही अङ्ग शिक्षा देने के लिए राजा कटवा देवे ॥ ३२७-३३४ ॥
आठवाँ अध्याय । ३०३
आठवाँ अध्याय । ३०३ पिताचार्यः सुहृन्माता भार्यापुत्रः पुरोहितः । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥३३५॥ कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः । तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा ॥ ३३६॥ अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम् । षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥ ३३७ ॥ ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत् । द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः॥ ३३८॥ पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित भी यदि अपने धर्म से न चलें तो राजा इनको भी शिक्षा देवे। साधारण मनुष्य को जिस अपराध के लिए एक पण दण्ड करे, उस अपराध में राजा अपने लिए हज़ार पण दण्ड करे, यह मर्यादा है । चोरी करने में शूद्र को आठगुना, वैश्य को सोलह गुना और क्षत्रिय को बीसगुना पाप लगता है । ब्राह्मण को चौंसठगुना वा पूरा सौगुना पाप लगता है । अथवा एकसौ-अट्ठा- इस गुना पाप लगता है, क्योंकि ब्राह्मण चोरी के दोष गुण को जानता है ॥ ३३५-३३८ ॥ वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च । तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत् ॥ ३३६ ॥ योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम् । याजनाध्यापनेनापि यथास्तेनस्तथैव सः ॥ ३४० ॥ द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके । आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति ॥ ३४१ ॥
३०४ मनुस्मृति। असंधितानां संधाता संधितानां च मोक्षकः । दासाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ॥ ३४२॥ बिना बांड़ा के खेतों से फल, मूल, अग्निहोत्र के लिए काष्ठ, गौओं के लिए घास कोई लेवे तो वह चोरी नहीं कहाती—मनुजी कहते हैं। जो ब्राह्मण परधन हरण करनेवाले को यज्ञ कराकर या शास्त्र पढ़ाकर उससे धन लेना चाहता है, वह ब्राह्मण भी चोर के समान ही है। जीविकाहीन द्विज मार्ग में जाता हुआ किसी के खेत से दो ऊख या दो मूली ले लेय तो दण्ड योग्य नहीं है। दूसरे के खुले पशुओं को बाँधनेवाला और बंधों को खोलनेवाला, दास, घोड़ा, और रथ को हरनेवाला चोरी का अपराधी होता है ॥ ३३६-३४२ ॥ अनेन विधिना राजा कुर्वाणःस्तेननिग्रहम् । यशोस्मिन् प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ३४३ ॥ ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् । नोपेक्षेत क्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ॥ ३४४ ॥ वाग्दुष्टात्तस्कराच्चैव दण्डेनैव च हिंसतः । साहसस्य नरः कर्ता विज्ञेयः पापकृत्तमः ॥ ३४५ ॥ साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः । स विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ३४६ ॥ न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात् । समुत्सृजेत साहसिकान् सर्वभूतभयावहान् ॥ ३४७ ॥ इस प्रकार उक्त विधि से चोरों का निग्रह करने से राजा इस लोक में सुयश और अन्त में अक्षय सुख पाता है। इन्द्रासन और सुयश चाहनेवाला राजा लुटेरे मनुष्यों के निग्रह में क्षणमात्र भी
आठवा अध्याय। ३०५
आठवा अध्याय। ३०५ देरी न करे। कुवाच्य कहनेवाले, चोर और मार-पीट करने वालों की अपेक्षा लुटेरों को अधिक अपराधी जानना चाहिए। जो राजा लुटेरों को क्षमा करता है वह शीघ्रही नष्ट होकर प्रजा का वैरी होजाता है। राजा, किसी मित्र के कहने से वा धन मिलने से भयदायी लुटेरों को कभी न छोड़े ॥ ३४३-३४७ ॥ शस्त्रं द्विजातिभिर्ग्राह्यं धर्मो यत्रोपरुध्यते । द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ॥ ३४८ ॥ आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च संगरे । स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च घ्नन् धर्मेण न दुष्यति ॥ ३४६ ॥ गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ ३५० ॥ जिस समय यज्ञादि धर्म-कर्म रोका जाता हो, वर्णाश्रम-धर्म का नाश होता हो, उस समय द्विजोंको अस्त्र ग्रहण करना चाहिए। अपनी रक्षा करने में, दक्षिणा की रक्षा में, स्त्री और ब्राह्मणों की विपत्ति में धर्म युद्ध से मारनेवाला पापभागी नहीं, होता । गुरु, बालक, बूढ़ा वेदज्ञ ब्राह्मण भी आततायीपन से मारने आवें तो बिना विचार उनके ऊपर प्रहार करे ॥ ३४८-३५० ॥ नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन । प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ॥ ३५१ ॥ परदाराभिमर्शेषु प्रवृत्तान्नॄन्महीपतिः । उद्वेजनकरैर्दण्डैश्चिह्नयित्वा प्रवासयेत् ॥ ३५२ ॥ तत्समुत्थो हि लोकस्य जायते वर्णसंकरः । येन मूलहरो धर्मः सर्वनाशाय कल्प्यते ॥ ३५३ ॥ परस्य पत्न्या पुरुषः संभाषां योजयन् रहः । ३६
३०६ मनुस्मृति । पूर्वमाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात् पूर्वसाहसम् ॥ ३५४ ॥ यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत कारणात् । न दोषं प्राप्नुयात् किञ्चिन्न हि तस्य व्यतिक्रमः॥ ३५५॥ परस्त्रियं योभिभवेत्तीर्थेऽरण्ये वनेऽपि वा । नदीनां वापि संभेदे स संग्रहणामाप्नुयात् ॥ ३५६ ॥ उपचारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम् । सहखट्टाशनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५७ ॥ स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तया । परस्परस्यानुमते सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५८ ॥ परस्त्रीगमन आदि । प्रकट या परोक्ष में मारनेवाले आततायी को मारने से कोई दोष नहीं होता, क्योंकि मारनेवाले का क्रोध दूसरे के क्रोध को बढ़ाता है। परस्त्रीसंभोग में लगे मनुष्यों की नाक वगैरह काट कर देश से निकाल देवे । संसार में वर्णसङ्करता उसीसे पैदा होती है, क्योंकि अधर्म जड़ काटता है, सर्वनाश कर डालता है । व्यभिचारी पुरुष परस्त्री से एकान्त में बातचीत करता हुआ, प्रथम साहस दण्ड के योग्य होता है । पर साधारण पुरुष किसी परस्त्री से बातें करे तो वह अपराधी नहीं होता न दण्ड ही होता है । जो पुरुष तीर्थ, जङ्गल, वन और नदियों के संगमस्थान में परस्त्री से बातें करता है उसको संभोग-दूषण ही लगता है । परस्त्री को पुष्पमाला, तेल आदि भेजना, हँसी करना, उसके गहने-वस्त्र छूना, एक पलंग पर बैठना, इन सब कामों को स्त्री- संग्रहण जानना चाहिए जो आपस की सलाह से स्त्री के स्तनादि, उसका गुप्त स्थान छुवे यह सब संग्रहण कहलाता है ॥३५१-३५८॥ अब्राह्मणः संग्रहेणे प्राणान्तं दण्डमर्हति ।
आठवां अध्याय। ३०७
आठवां अध्याय। ३०७ चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमाः सदा ॥ ३५६ ॥ भिक्षुका वन्दिनश्चैव दीक्षिताः कारवस्तथा । संभाषणं सह स्त्रीभिः कुर्युंरप्रतिवारिताः ॥ ३६० ॥ न संभाशां परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत् । निषिद्धो भाषमाणस्तु सुवर्णदण्डमर्हति ॥ ३६१ ॥ नैष चारणदारेषु विधिर्नात्मोपजीविषु । सज्जायन्ति हि ते नारीर्निगूढाश्चारयन्ति च ॥ ३६२ ॥ किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्संभाषां ताभिराचरन् । प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ॥ ३६३ ॥ शूद्र ब्राह्मणी के साथ व्यभिचार करे तो मार डालने लायक होता है। चारों वर्णवालों को सदा अपनी स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। भिक्षुक, भाट, यज्ञ में दीक्षित, रसोइँया और कारीगर स्त्रियों के साथ बातें बिना रोक कर सकते हैं । जिसको निषेध है वह परस्त्री के साथ बातें न करे। करनेवाला एक सुवर्ण दण्ड के योग्य होता है। यह निषेध-मनादी नट, गवैय्या आदि की स्त्रियों के लिए नहीं है, क्योंकि वे आपही अपनी स्त्रियों को सजाकर परपुरुषों से मिलाते हैं । परन्तु उनके साथ भी निर्जन में बातें करना दण्डकारक है और एकभक्ता या विरक्ता स्त्री के साथ भी बोलचाल करने से कुछ दण्ड करे ॥ ३५६-३६३ ॥ योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति । सकामां दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३६४ ॥ कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किञ्चिदपि दापयेत् । जघन्यं सेवमानां तु संयतां वासयेद् गृहे ॥ ३६५ ॥ उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।
३०८ । मनुस्मृति । शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत् पिता यदि ॥३६६॥ जो इच्छा न करनेवाली कन्या से गमन करे, वह उसी समय वध के योग्य है। पर चाहनेवाली के साथ गमन करे और वह पुरुष सजातीय हो तो वध योग्य नहीं होता। उत्तम जाति के पुरुष को सेवन करनेवाली कन्या पर कुछ भी दण्ड न करे। परन्तु नीच जाति के साथ गमन करती हो तो उसको घर में बंद रक्खे। नीच जाति का पुरुष उत्तम जाति की कन्या से भोग करे तो वध के योग्य है और समान जाति की कन्या को भोगता हो तो वह पुरुष कन्या के पिता की आज्ञा से मूल्य देकर विवाह भी कर सकता है ॥ ३६४-३६६ ॥ अभिषह्य तु यः कन्यां कुर्याद्दर्पेण मानवः । तस्याशुकर्त्ये अङ्गुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ ३६७॥ सकामां दूषयंस्तुल्यो नाङ्गुलिच्छेदमाप्नुयात् । द्विशतं तु दमो दाप्यः प्रसङ्गविनिवृत्तये ॥ ३६८ ॥ कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद् द्विशतो दमः । शुल्कं च द्विगुणं दद्याच्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ॥ ३६६ । या तु कन्यां प्रकुर्यात्स्त्री सा सद्यो मौण्ड्यमर्हति । अङ्गुल्योरेव वा छेदं खरेणोद्वहनं तथा ॥ ३७० ॥ भर्तारं लङ्घयेद् या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता । तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥३७१। पुमांसं दाहयेत्पापं शयने तप्त आयसे । अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ३७२ । जो मनुष्य अभिमान और बलात्कार से कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े उसकी दोनों अङ्गुलियां कटवा दें और छः सौ पण दण्ड
करे। समान जाति और सकामा कन्या को दूषित करनेवाले की अङ्गुलियां न कटावे, सिर्फ दो सौ पण दण्ड करे। कन्या ही कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे और उस कन्या के पिता से कहकर दूना मूल्य दिलवाये और दस कोड़े लग- वावे । यदि कोई स्त्री कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उसका शिर मुड़वा कर वा दो अङ्गुलियां काटकर, गधेपर चढ़ाकर घु- मावे। जो स्त्री अपने रूप, गुण के घमंड से पति का तिरस्कार करके व्यभिचार करे, उसको राजा सब के सामने कुत्तों से नोच- वावे और जो व्यभिचारी पापी हो उसको तपाये लोह के पलंग पर सुलाकर ऊपर से काठ रखकर जलवादे ॥ ३६७-३७२ ॥ संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः । व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ ३७३॥ शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् । अगुप्तमङ्गसर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ ३७४ ॥ एक वर्ष तक व्यभिचार करता रहे तो उस दुष्ट को उक्त दण्ड दूना होना चाहिए । हीन जाति या चाण्डाली के साथ व्यभिचार करे तो भी वही दण्ड करे । शूद्र, ब्राह्मणस्त्री से गुप्त या प्रकट व्यभि- चार करे तो उसका अंग काटडाले, सर्वस्वहरण करे ॥ ३७३-३७४॥ वैश्यः सर्वस्वदण्डः स्यात्संवत्सरनिरोधतः । सहस्त्रं क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ॥ ३७५॥ ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ । वैश्यं पञ्चशतं कुर्यात्क्षत्रियं तु सहस्रिणम् ॥ ३७६ ॥ उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह । विप्लुतौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ ३७७॥ सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्यो गुप्तां विप्रां बलाद्व्रजन् ।
३१० मनुस्मृति। शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह संगतः॥३७८॥ वैश्य रक्षित ब्राह्मणी से गमन करे तो एक वर्ष क़ैद करके उसका सर्वस्वहरण करे। क्षत्रिय करे तो एक हज़ार पण दण्ड करे और उसका शिर गधे के मूत से मुड़वा देयं । वैश्य और क्षत्रिय, यदि अरक्षित ब्राह्मणी से गमन करें तो वैश्य पर पांच सौ और क्षत्रिय पर हज़ार पण दण्ड करे। वोही दोनों यदि रक्षित ब्राह्मणी से गमन करें, शूद्र की भांति दण्ड पावें अथवा चटाई में लपेट कर जलवा दें। रक्षित ब्राह्मणी से ज़बरदस्ती व्यभिचार करनेवाले ब्राह्मण पर हज़ार पण दण्ड करे और इच्छावाली से गमन करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे ॥ ३७५-३७८ ॥ मौण्ड्यं प्राणान्तिको दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते । इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ ३७६ ॥ न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं वहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ॥ ३८० ॥ न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि । तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३८१ ॥ वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत् । यो ब्राह्मण्यामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ॥ ३८२ ॥ ब्राह्मण का शिर मुड़ा देनाही प्राणान्त दण्ड देना है दूसरों को प्राणान्त दण्ड का विधान है। कैसा भी अपराध ब्राह्मण ने किया हो पर उसको प्राणान्त दण्ड कभी न देवे। किन्तु उसको धन स- हित देश से निकाल देवे। ब्राह्मण वध से अधिक कोई अधर्म नहीं है। राजा, ब्राह्मण वध का कभी मन में भी विचार न करे। वैश्य क्षत्रिया से और क्षत्रिय रक्षित वैश्या से व्यभिचार करे तो इन दोनों को अरक्षित ब्राह्मणी से व्यभिचारवाला दण्ड देना चाहिए ॥ ३७६-३८२ ॥