भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछुवे के समान राजकीय अङ्गों को छिपा रक्खे, जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे। बगला की भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे। सिंह के समान शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौक़ा पाकर शत्रुक्षय करे। और खरगोश के समान, आपत्तियों से भग जावे ॥ १०३-१०६॥ एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः । तानानयेद्वशं सर्वान्सामदिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥ यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैनिभिः । दण्डेनैव प्रसह्यैतांञ्छनकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥ सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः । सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥ यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति । तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ॥ ११० ॥ इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हों उनको साम- दाम-भेद से अपने वश में करे। यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वश में न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे। विचार- वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपायों में, राज्यवृद्धि के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं। जैसे खेत निराने वाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर, लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करे ॥ १०७-११० ॥ मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया । सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः॥१११॥ शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा । तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥११२॥ २६

२२६ । मनुस्मृति । राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् । सुसंगहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ ११३ ॥ जो राजा, अज्ञानवश बिना विचार, अपने राज्य को दुःख देता है वह शीघ्र ही राज्य, जीवन और बान्धवों से भ्रष्ट होजाता है। जैसे शरीर के शोषण से प्राणियों के प्राण घटते हैं, वैसे, राष्ट्र को दुःख देने से, राजाओं के भी प्राण घटते हैं। राजा देश की रक्षा के लिए, ऊपर कहे उपायों को करे क्योंकि-राज्यरक्षा से राजा की सुखवृद्धि होती है ॥ १११-११३ ॥ द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् । तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ॥ ११४ ॥ ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा । विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च ॥ ११५ ॥ ग्रामदोषान् समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम् । शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने ॥ ११६ ॥ विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् । शंसेद्ग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम् ॥ ११७॥ यानि राजप्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः । अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुयात् ॥ ११८॥ दो, तीन, पांच या सौ ग्रामों के बीच में, रक्षा करनेवाले पुरुषों का एक महकमा क़ायम करे। एक गाँव का, दश का, बीस का, सौ का और हज़ार गांव का एक-एक अधिपति नियत करे। गाँव का मालिक गाँव के बखेड़ों को धीरे से जानकर उसका फ़ैसला करदे, या दश गाँव के मालिक को सूचित करदे, या वह बीस गाँव के मालिक को इत्तला करदे इत्यादि। जो अन्न, ईंधन वगैरह राजा को देनेवाले

सातवां अध्याय । २२७

सातवां अध्याय । २२७ पदार्थ हैं उनको वहां नियुक्त राजपुरुष ग्रहण करे । अर्थात् सब वस्तुओं का संग्रह करके राजस्थान को पहुँचाया करे ॥ ११४-११८॥ दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिःपुरम् ॥ ११९ ॥ तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक्कार्याणि चैव हि । राज्ञोऽन्यः सचिवः स्निग्धस्तानि पश्येदतन्द्रितः॥१२०॥ नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिन्तकम् । उच्चैः स्थानं घोररूपं नक्षत्राणामिव ग्रहम् ॥ १२१ ॥ स ताननुपरिक्रामेत्सर्वानैव सदा स्वयम् । तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु तच्चरैः ॥ १२२ ॥ राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः । भृत्या भवन्ति प्रायेण तेभ्यो रक्षेदिमाः प्रजाः॥ १२३ । दश गाँव का अधिपति एक कुल-दो हल से जोतने योग्य ज़मीन, अपने निर्वाह के लिए काम में लावे । बीस गाँव का पाँच कुल, सौ गाँव का एक साधारण गाँव और हज़ार गाँव का मालिक एक नगर को अपनी जीविका में भोगे । राजा के गाँवों के कार्य और दूसरे कार्यों को भी, एक मन्त्री, जो सर्वप्रिय हो, वह निरालस होकर देखे । प्रत्येक नगर में एक एक अध्यक्ष जो बड़े पद पर हो, तेजस्वी हो, उसको क़ायम करे । वह सदा ग्रामाधिपतियों के कार्यों को जाँचे और दूतों से उनके आचरणों को भी जान रखे । क्योंकि रक्षाधिकारी राजपुरुष, प्रायः दूसरों के धन हरनेवाले, वञ्चक होते हैं । राजा उनसे प्रजा की रक्षा करे ॥ ११९-१२३ ॥ ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः । तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ॥ १२४ ॥

२२८ : मनुस्मृति । राजा कर्मसु युक्तानां स्त्रीणां प्रेष्यजनस्य च । प्रत्यहं कल्पयेद्वृत्तिं स्थानकर्मानुरूपतः ॥ १२५ ॥ पणो देयोऽवकृष्टस्य षडुत्कृष्टस्य वेतनम् । षाण्मासिकस्तथाच्छादो धान्यद्रोणस्तु मासिकः १२६॥ और जो पापी पुरुष, रिश्वत आदि ही लिया करते हैं उनको, सब कुछ छीनकर, राजा देश से निकाल देवे। कार्यों में लगे स्त्री और पुरुषों को उनके कर्म के अनुसार सदा वृत्ति नियत करे अर्थात् कभी तनख़्वाह बढ़ावे कभी घटावे। निकृष्ट नौकर को एक पण देवे और छ महीने में दो कपड़े और एक महीने में द्रोण भर अन्न देवे। उत्तम कार्यवालों को छ गुना देवे । मध्यम नौकर को मध्यम श्रेणी का सब पदार्थ देवे ॥ १२४-१२६ ॥ क्रयविक्रयमध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् । योगक्षेमं च संप्रेक्ष्य वणिजो दापयेत्करान् ॥ १२७ ॥ यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम् । तथावेक्ष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत्सततं करान् ॥ १२८ ॥ यथाल्पल्पमदन्त्याद्यं वार्योकोवत्सषट्पदाः । तथाल्याल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाब्दिकः करः॥१२६॥ पञ्चाशद्भाग आदेयो राजा पशुहिरण्ययोः । धान्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव वा ॥ १३०॥ आददीताथ षड्भागं द्रुमांसमधुसर्पिषाम् । गन्धौषधिरसानां च पुष्पमूलफलस्य च ॥ १३१ ॥ पत्रशाकतृणानां च चर्मणो वै दलस्य च । मृन्मयानां च भाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्य च ॥ १३२॥

सातवां अध्याय । २२६

सातवां अध्याय । २२६ बेचना, खरीदना, रास्ता का खर्च, रक्षा का खर्च और उनके नि- र्वाह को देखकर राजा, व्यापारियों से कर (टैक्स) लेवे। उद्यमियौँ को और राज्य को जिससे नफ़ा पहुँचे ऐसा विचारकर, कर लगाना उचित है। जैसे जोंक, बछड़ा और भौंरा धीरे धीरे अपनी, खुराक को खींचते हैं वैसे राजा भी राष्ट्र से थोड़ा थोड़ा सालाना कर लेय। पशु और सोना के लाभ का पचासवां भाग; अन्नों के लाभ से छठां, आठवाँ या बारहवाँ भाग कर लेवे। वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध, औषध, रस, फूल, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, चमड़ा, कांस, मिट्टी, पत्थर के पात्र, इन सबके लाभों में से छठा भाग कर लेय ॥ १२७-१३२॥ म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् । न च क्षुधास्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन् ॥ १३३ ॥ यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा । तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेणैव सीदति ॥ १३४ ॥ राजा धन की कमी से दुःखी भी हो तो भी श्रोत्रिय ब्राह्मण से कर न लेय और उसके राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूखों न मरना चाहिए। अर्थात् उसकी परवरिश रहा करे। जिस राजा के राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण क्षुधा से पीड़ित होता है, उस राजा का राज्य थोड़े ही दिनों में उसकी भूख से नष्ट होजाता है ॥ १३३-१३४ ॥ श्रुतवृत्ते विदित्वास्य वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत् । संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १३५ ॥ संरक्ष्यमाणो राज्ञा यं कुरुते धर्ममन्वहम् । तेनायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ १३६ ॥ यत्किंचिदपि वर्षस्य दापयेत् करसंज्ञितम् । व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम् ॥ १३७ ॥

२३० मनुस्मृति । कारूकांश्चिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः । एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥ नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया । उच्छिन्दन्ह्यात्मनोमूलमात्मानंतांश्चपीडयेत्॥१३६॥ तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः । तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति संमतः ॥ १४० ॥ राजा, इस श्रोत्रिय के वेदाध्ययन और सदाचार को जानकर कोई धर्मविषय की जीविका बाँध दे और पिता जैसे पुत्र की रक्षा करता है वैसे ही रक्षा करे। क्योंकि राजा से रक्षित श्रोत्रिय के धर्म- पालन से राजा का आयुर्बल, द्रव्य और राज्य बढ़ता है । अपने राज्य में, व्यापारवाले से भी कुछ सालाना कर दिलावे। लोहार, बढ़ई, आदि और दासों से महीने में एक एक दिन बेगार में काम करावे। प्रजा के स्नेह से अपना कर न लेना अपना मूलोच्छेद करना है और लोभ से ज्यादा कर लेना प्रजाको सताना है, इसलिए राजा ऐसा काम कभी न करे जिसमें राज्य और प्रजा दोनों को कष्ट उठाना पड़े। राजा को कभी तीखा और कभी सीधा स्वभाव रखने से उसको सब मानते हैं ॥ १३५-१४० ॥ अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् । स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ १४१ ॥ राजा खुद, राज्य के कार्यों को और दूसरे के कामों को देखने में किसी कारण से असमर्थ हो तो, चतुर, धर्मात्मा, कुलीन प्रधान मन्त्री को अपने न्यायासन पर, काम देखने के लिए नियुक्त कर देवे ॥ १४१ ॥ एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः । युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥

सातवां अध्याय। २३१

सातवां अध्याय। २३१ विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् ध्रियन्ते दस्युभिः प्रजाः । संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ॥ १४३ ॥ क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानामेव पालनम् । निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥ अपने सब कर्त्तव्यों को इस तरह पूरा कर के, प्रमाद-रहित और कार्यपरायण होकर अपनी प्रजा की रक्षा करे । राजा और उसके कर्मचारियों के देखते यदि चोर, लुटेरे प्रजा को लूट पाट से दुःख पहुंचावें, तो वह राजा मरा सा है, जीता नहीं है। प्रजा का पालन करना ही क्षत्रिय का मुख्य धर्म है। इसलिए अपने धर्म ही से प्राप्त हो फल भोग करना उचित है ॥ १४२-१४४ ॥ उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः । हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत्सशुभां सभाम् ॥ १४५॥ तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् । विसृज्य च प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ १४६॥ गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥ १४७॥ यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः । सकृत्स्नां पृथिवीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥ १४८ ॥ जडमूकन्धबधिरान्तिर्यग्योनान्र्वयोऽतिगान् । स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान् मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥ १४६॥ राजा बड़े तड़के उठकर, शौच से निपटकर, एकाग्र चित्त होकर अग्निहोत्र और ब्राह्मणसत्कार करके, राजसभा में प्रवेश करे । वहां दर्शकों को प्रीतिपूर्वक पहले बिदा करके फिर मन्त्रियों के साथ

२३२ : मनुस्मृतिः ।

राजकाज का विचार करे। पर्वत पर या महल में जाकर, एकान्त में वा वृक्षरहित वन में, जहाँ भेद लेनेवाले दूत न पहुँच सकें, वहाँ मन्त्रणा करे। जिस राजा के मन्त्र को दूसरे लोग मिले रहने पर भी नहीं जान सकते, वह धन-सम्पत्ति के न होते भी संपूर्ण पृथिवी को भोगता है। मूर्ख, गूँगा, अंधा, बहिरा, तोता-मैना आदि पक्षी, बूढ़े, स्त्री, म्लेच्छ, रोगी, और अङ्गहीनों को, सलाह के समय हटा देवे। प्रायः ये लोग गुप्त बातों को प्रकट कर दिया करते हैं॥ १४५-१४६ ॥

भिन्दन्त्यवमता मन्त्रं तिर्यग्योनास्तथैव च । स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ १५० ॥ मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः । चिन्तयेद्धर्मकामार्थान् सार्धं तैरैक एव वा ॥ १५१ ॥ परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपाजर्नम् । कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ १५२ ॥ दूतसंप्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च । अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ १५३ ॥ कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः । अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च ॥ १५४ ॥ मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् । उदासीनप्रचारं च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ॥ १५५ ॥ एताः प्रकृतयो मूलं मण्डलस्य समासतः । अष्टौ चान्याः समाख्याता द्वादशैव तु ताः स्मृताः ॥ १५६ ॥ अमात्यं राष्ट्रदुर्गार्थदण्डाख्याः पञ्च चापराः ।

सातवां अध्याय। २३३

[Page Header] सातवां अध्याय। २३३

प्रत्येकं कथिता ह्येताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७॥ मूर्ख वगैरह, तोता, मैना और स्त्रियाँ प्रायः गुप्त सम्मति को प्रकाशित कर देती हैं इसलिए इन लोगों को धीरे से हटा देना चा- हिए। दोपहर या आधी रात को विश्राम करके, मन्त्रियों के साथ या अकेला ही धर्म-अर्थ-काम का विचार करे। यदि धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध हो तो उनको मिटाकर अर्थोपार्जन, कन्यादान, पुत्रों को रक्षा और शिक्षा की चिन्ता करे। परराज्य में दूत भेजना, बाक़ी कामों का, अन्तःपुर का और प्रतिनिधियों के काम का विचार करे। आठ प्रकार के सब काम * और पञ्चवर्ग † का खूब विचार करे। मन्त्री आदि की प्रीति-अप्रीति, शत्रु, मित्र-उदासीन आदि राजमण्डल पर, विशेष ध्यान रक्खे । अपने से मध्यम बलवाले राजा के बर्ताव, जीतने की इच्छा रखनेवाले की चेष्टा, उदासीन और शत्रु राजा के वृत्तान्तों को यत्न से जानता रहे। ये मध्यम आदि चार प्रकृतियां मण्डल का मूल मानी जाती हैं और जो आठ हैं, वे सब मिलकर बारह ‡ होती हैं। मंत्री, देश, क़िला, धनभण्डार, और दण्ड ये पांच प्रकृतियां और भी हैं। ये बारहों की अलग अलग होती हैं, यों सब मिलाकर संक्षेप में बहत्तर प्रकृतियां हुईं॥१५०-१५७॥ अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥ तान् सर्वानभिसंदध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः । व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५६ ॥


  • कर आदि की आय, नौकरी में व्यय, नौकरों की चाल, विरुद्ध कार्यों को रोकना, मिथ्या व्यवहार रोकना, धर्मव्यवहार देखना, दण्ड देना, प्रायश्चित्त कराना, ये आठ कर्म हैं। † कापटिक, उदासीन, वैदेह, गृहपति, तापस, ये पाँच वर्ग हैं । ‡ विजिगीषु, अरि, अरिसेवित, अरिमित्र, पाष्णिग्राह, पार्ष्णिग्राहासार, मित्र, मित्र का मित्र, आक्रन्द, आक्रन्दासार, मध्यम और उदासीन । ३०

२३४ मनुस्मृति । संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च । द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥ आसनं चैव यानं च संधिं विग्रहमेव च । कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६१ ॥ अपनी सीमा के पास रहनेवाले और शत्रु से मेल रखनेवाले राजा को शत्रु समझना चाहिए। शत्रु की सीमावाले राजा को मित्र और मित्र राजा की सीमावाले को उदासीन जाने। इन सब को सामादि उपायों से या एक ही से वा सब उपायों से अथवा पुरुषार्थ से, या राजनीति ही से वश में करे। मेल, लड़ाई, चढ़ाई, क़िले में रहना, अपनी सेना के दो भाग करना और अपने से बली राजा का आश्रय लेना, इन छः गुणों का नित्य विचार करे। आसन, यान, संधि, विग्रह, द्वैध और आश्रय इन गुणों को अवसर देख कर जब जैसा मौक़ा आवे तब तैसा काम करना चाहिए ॥ १५८-१६१ ॥ संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च । उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥ समानयानकर्माच विपरीतस्तथैव च । तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिर्ज्ञेयो द्विलक्षणः ॥ १६३ ॥ स्वयं कृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा । मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥ १६४ ॥ एकाकिनश्चात्ययिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया । संहतस्य च मित्रेण द्विविधं यानमुच्यते ॥ १६५ ॥ संधि, विग्रह दो दो प्रकार के हैं। आसन, यान संश्रय भी दो दो प्रकार के हैं। वर्तमान या भविष्य में लाभ के लिए, मित्र राजा

सातवां अध्याय । २३५

सातवां अध्याय । २३५ से मिल कर दूसरे के ऊपर चढ़ाई का नाम 'समानकर्मा सन्धि' है। हम इसके ऊपर चढ़ाई करेंगे, तुम दूसरे पर करो ऐसी राय को 'असमानकर्मा सन्धि' कहते हैं। शत्रु पराजय के लिए उचित या अनुचित काल में खुद लड़ाई करना एक, अपने मित्र के अपकार होने से, उसकी रक्षा के लिए लड़ाई करना दूसरा, ये दो भांति के विग्रह होते हैं। दैवयोग से, बहुत आवश्यक पड़ जाने पर अकेले या मित्र से मिलकर, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करना ये दो प्रकार की चढ़ाइयां कहलाती हैं ॥ १६२-१६५ ॥ क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात्पूर्वकृतेन वा । मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम् ॥ १६६ ॥ बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये । द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाड्गुण्यगुणवेदिभिः ॥ १६७ ॥ अर्थसम्पादनार्थं च पीड्यमानस्य शत्रुभिः । साधुषु व्यपदेशार्थं द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६८ ॥ पूर्वजन्म के पाप से या यहीं के कुकर्मों से, धन आदि से हीन राजा का चुप मार कर बैठना, अथवा सामर्थ्य होते भी किसी मित्र के कहने से चुपचाप बैठा रहना, ये दो आसन कहलाते हैं। कार्यसिद्धि के लिए कुछ सेना को एक जगह और कुछ सेना के साथ राजा क़िले में रहे, यह दो प्रकार का द्वैध, गुणज्ञों ने कहा है। शत्रुओं से पीड़ित राजा के संकट दूर करने के लिए अथवा सत्पुरुषों को जनाने के लिए बली राजा का आश्रय लेना, यह दो प्रकार का संश्रय कहलाता है ॥ १६६-१६८ ॥ यदावगच्छेदायतयामाधिक्यं ध्रुवमात्मनः । तदात्वे चाल्पिकां पीडां तदा सन्धिं समाश्रयेत्॥१६६॥ यदा प्रकृष्टा मन्येत सर्वास्तु प्रकृतीर्भृशम् ।

२३६ मनुस्मृति। अत्युच्छ्रितं तथात्मानं तदा कुर्वीत विग्रहम् ॥ १७० ॥ यदा मन्येत भावेन हृष्टं पुष्टं बलं स्वकम् । परस्य विपरीतं च तदा यायाद्रिपुं प्रति ॥ १७१ ॥ यदा तु स्यात्परिक्षीणो वाहनेन बलेन च । तदासीत प्रयत्नेन शनकैः सान्त्वयन्नरीन् ॥ १७२ ॥ मन्येतारिं यदा राजा सर्वथा बलवत्तरम् । तदा द्विधा बलं कृत्वा साधयेत् कार्यमात्मनः ॥ १७३ ॥ जब भविष्य में अपनी उन्नति की आशा हो तब शत्रु से कुछ पीड़ित होकर भी सन्धि कर लेवे। जब अपने राजमण्डल को खूब प्रसन्न जाने और अपनी शक्ति को पूर्ण देखे, तब वैरी के साथ युद्ध करे। जब अपनी सेना को मन से प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट समझे और शत्रु की सेना को साधारण दशा में जाने, तब युद्ध की तैयारी करे। जब हाथी, घोड़ा आदि वाहन और सेना से क्षीण हो तब यत्नपूर्वक शान्ति से, शत्रु को समझा कर शान्त होकर रहे अर्थात् लड़ाई में न लगे। और जब, राजा अपने शत्रु को सर्वथा बलवान् जाने, तब आधी सेना लड़ाई पर भेज दे और आधी अपने साथ में रखकर कार्यसाधन में लगे ॥ १६६-१७३ ॥ यदा परबलानां तु गमनीयतमो भवेत् । तदा तु संश्रयेत्क्षिप्रं धार्मिकं बलिनं नृपम् ॥ १७४ ॥ निग्रहं प्रकृतीनां च कुर्याद्योऽरिखलस्य च । उपसेवेत तं नित्यं सर्वयत्नैर्गुरुं यथा ॥ १७५ ॥ यदि तत्रापि संपश्येद्दोषं संश्रयकारितम् । सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ॥ १७६ ॥

सातवां अध्याय । २३७

सातवां अध्याय । २३७ सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः । यथास्याभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥१७७॥ आयतिं सर्वकार्याणां तदात्वं न विचारयेत् । आयतीनां च सर्वेषां गुणदोषौ च तत्त्वतः ॥ १७८॥ आयत्यां गुणदोषज्ञस्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः । अतीते कार्यशेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ॥ १७६ ॥ और जब कि शत्रु के आधीन अपने को होता देखे तब झट- पट धार्मिक और बलवान् राजा की शरण लेवे । जो दुष्ट मन्त्रि- मण्डल आदि और शत्रुसेना को दबा सकता हो उस राजा की, गुरु के समान, नित्य सेवा करे । और यदि उस आश्रयवाले राजा से धोखा जाने तो निडर होकर युद्ध ही करे । नीतिवेत्ता राजा को सब भांति से ऐसा बर्त्ताव करना चाहिए जिससे उसके मित्र, उदासीन और शत्रु राजा बलवान् न हो जावें । सम्पूर्ण कार्यों की वर्तमान, भूत और भविष्य स्थिति और उनके गुण-दोषों का विचार किया करे । जो राजा कार्यों के भविष्य शुभाशुभ परिणाम को जानता है, वर्तमान कार्य का शीघ्र निश्चय कर लेता है और बाक़ी कामों को जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं कर सकते ॥१७४-१७६॥ यथैनं नाभिसंदध्युर्मित्रोदासीनशत्रवः । तथा सर्वं संविदध्यादेष सामासिको नयः ॥ १८० ॥ यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्रं प्रति प्रभुः । तदानेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८१ ॥ जिस प्रकार मित्र, उदासीन और बैरी राजा अपने को पीड़ा न दे सकें वैसे उपायों को करता रहे, यह नीति है। और जब किसी बैरी के देश पर चढ़ाई करनी हो तो नीचे लिखी विधि से धीरे धीरे यात्रा करे ॥ १८०-१८१ ॥

२३८ : मनुस्मृति। मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः । फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥ अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् । तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥ कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि । उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यग् विधाय च ॥१८४॥ संशोध्यं विविधं मार्गं षड्विधं च बलं स्वकम् । सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥ शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत् । गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥ राजा अपनी सेना के वलावल का विचार करके, शुभ अगहन या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे। इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तब, अथवा जब शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे। अपने नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना * को ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु के नगर को जावे। जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥ दण्डव्यूहेन तन्मार्गं यायात्तु शकटेन वा ।

  • छः प्रकार के बलः- हाथीसवार, घोड़ासवार, रथसवार, पैदल, खज़ाना और नौकर चाकर।

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वराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ॥ १८७ ॥ यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्बलम् । पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ १८८ ॥ सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् । यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम् ॥१८६॥ राजा, दण्डव्यूह † से मार्ग में चले अथवा शकट, वराह, मकर, सूई, गरुड़ के तुल्य आकार वाले व्यूहों में, जहां जैसा देखे वैसी यात्रा करे। जिस तरफ़ डर जाने, उधर सेना बढ़ावे और खुद पद्माकार व्यूह में सदा रहे । सेनापति और सेनानायकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे और जिस दिशा में भय समझे उसे पूर्वदिशा मान लेवे ॥ १८७-१८६ ॥ गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः । स्थानयुद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः ॥ १६०॥ संहतान्योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद्बहून् । सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत् ॥१६१॥ स्यन्दनाश्वैः समे युद्ध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ १६२ ॥ कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान् शूरसेनजान् । दीर्घाल्लघूंश्चैव नरानग्रानीकेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥

† दण्डा के समान फौज रखना, दण्डव्यूह ऐसे ही शकटव्यूह वगैरह । ऐसी व्यूहरचना में आगे सेनापति, बीच में राजा, पीछे, सेनापति, दोनों बगल हाथी, उनके पास घोड़े और उनके आसपास में पैदल, इस तरह लम्बा जमाव दण्डव्यूह कहा जाता है।

२४० मनुस्मृति । प्रहर्षयेद्वलं व्यूह्य तांश्च सम्यक् परीक्षयेत् । चेष्टाश्चैव विजानीयादरीन् योधयतामपि ॥ १६४ ॥ उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् । दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ॥ १६५ ॥ भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा । समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ॥ १६६ ॥ उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् । युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभीः ॥ १६७ ॥ कुछ सेना का हिस्सा, चतुर पुरुष की अध्यक्षता में चारों तरफ़ से नियत करे और उनमें बाजा वगैरह का संकेत कर ले जिसमें समय समय पर हालात मिला करें। योद्धा कमती हों तो इकट्ठे करके युद्ध करावे, अधिक हों तो मनमानी, चारों तरफ़ फैलाकर, सूई के आकार के व्यूह से लड़ावे । समभूमि में रथ घोड़ों से, जल में नावों से, हाथियों से, वृक्ष आदि की झाड़ियों में बाणों से और स्थल में, ढाल तलवार वगैरह से युद्ध करे । कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पञ्चाल, शूरसेन आदि देशों के ऊंचे और ठिंगने मनुष्यों को सेना के आगे रक्खे । सेना को किसी रचना से खड़ी करके उत्साह दिलावे और क्या क्या करने से खुशी या नाखुश होंगे इन बातों की परीक्षा करे और शत्रुओं के मुक़ाबले दिल से लड़ते हैं या नहीं यह चेष्टाओं से जान लेवे । शत्रु लड़े वा न लड़े पर उसके देश को नष्ट कर के वहाँ का, अन्न, जल, चारा, ईंधन आदि उजाड़ देवे । तालाब, क़िला, खाइयों को तोड़ दे, शत्रु पर हमला करे और रात में अनेक आवाज़ों से उसको डरा देवे । उसके मन्त्री आदि जो फूट सकें उनको लालच देकर मिलाले, उनसे शत्रु की कुल हालतें जाने । और समय अनुकूल आवे, तो निडर होकर, युद्ध करे ॥ १६०-१६७ ॥

सातवां अध्याय। २४१

सातवां अध्याय। २४१ साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् । विजेतुं प्रयतेतारीन् न युद्धेन कदाचन ॥ १९८ ॥ अनित्यो विजये यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः । पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत् ॥ १९९ ॥ त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे । तथा युद्ध्येत संपन्नो विजयेत रिपून् यथा ॥ २०० ॥ जित्वा संपूजयेद्देवान् ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् । प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च ॥ २०१ ॥ सर्वेषां तु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम् । स्थापयेत्तत्र तद्वंश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ॥ २०२ ॥ प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान् यथोदितान् । रत्नैश्च पूजयेदेनं प्रधानपुरुषैः सह ॥ २०३ ॥ आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् । अभीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ॥ २०४ ॥ सर्वं कर्मेदमादत्तं विधाने दैवमानुषे । तयोर्दैवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ २०५ ॥ राजा साम, दान और भेद इन तीनों से या एकही किसी से शत्रु के जीतने का उपाय करे। पर जहांतक होसके युद्ध का उद्योग न करे। युद्ध में लड़नेवालों की हार वा जीत कोई निश्चित नहीं देखने में आती, कभी कोई कभी कोई, इसलिए युद्ध न करे। जब उक्त तीनों उपायों से शत्रु को जीतने का भरोसा न हो तभी युद्ध का उपाय पूरी तौर से करना उचित है जिसमें वह अधीन होजाय। युद्ध में विजय पाने पर देवता, ब्राह्मणों की पूजा करे। जीती ३१

२४२ मनुस्मृति । प्रजाओं का भूमि कर कम करे और यह ढिंढोरा पिटावे कि जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया गया। जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के वंशवाले को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे। और उनके धर्मों को-रिवाजों को माने, रत्नों से मंत्री आदि के साथ उसका सत्कार करे अर्थात्-खिलत देवे। यद्यपि किसी की प्रिय वस्तु ले लेना अप्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना और देना दोनों अच्छा माना जाता है। ये सब कर्म दैव और मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं। इन में दैव का निर्णय अशक्य है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है। अर्थात् मनुष्य-साध्य- कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८-२०५॥ सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः । मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यंस्त्रिविधं फलम् ॥२०६॥ पाष्णिग्राहं च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले । मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥ हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते । यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम् ॥ २०८॥ अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे तो लेकर सुलह कर ले। जो विजय करते हुए राजा के पीछे दूसरा राजा दबाकर चढ़ आवे उसको 'पाष्णिग्राह' कहते हैं और जो उसको इस काम से रोके उसे 'क्रन्द' कहते हैं। इन दोनों को देखकर, मित्र या अमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । (ऐसा न करे जिसमें ये दोनों बिगड़ जावें) राजा सुवर्ण और भूमि को पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर बढ़ता है ॥२०६-२०८ ॥ धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च । अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥

सातवां अध्याय । २४३

सातवां अध्याय । २४३ प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च । कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥ २१० ॥ आर्यता पुरुषज्ञानं शौर्यं करुणवेदिता । स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीनगुणोदयः ॥ २११ ॥ क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि । परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ २१२ ॥ आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ २१३ ॥ धर्मज्ञ, कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त, प्रीति करनेवाला, स्थिर कार्य का आरम्भ करनेवाला, छोटा मित्र अच्छा होता है । बुद्धिमान्, कुलीन, शूर, चतुर, दाता, कृतज्ञ और धैर्यवान् शत्रु को लोग कठिन कहते हैं । सभ्यता, पुरुषों की पहिचान, शूरता, दयालुता और उदारता ये सब उदासीन राजा के गुण हैं । कल्याण करनेवाली, संपूर्ण धान्यों को देनेवाली और पशुवृद्धि करनेवाली भूमि को भी राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए विना विचार किये छोड़ देवे । आपत्ति दूर करने के लिए धन की करे, धन से स्त्रियों की रक्षा करे और धन, स्त्री से भी अपने शरीर की रक्षा करे ॥ २०६–२१३ ॥ । ॥ २२६ ॥ सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसमीक्ष्यापदो ऽयां संहितायां संयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्स्तृ ॥ उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्र अपना नित्यकर्म यथावत एतन्त्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्ध संपूर्ण राजकार्यों का स्वयं होजाय तो अपने अधिका- एवं सर्वमिदं राजा सह संमन्त्र्य २५–२२६ ॥ व्यायाम्याप्लुत्यमध्याह्नेभोक्तुमन्तः पूरा हुआ।

२४४ , मनुस्मृति । तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापहैः ॥ २१७ ॥ विषघ्नैरुदकैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत् । विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ २१८ ॥ सब आपत्तियों को एक साथ आतीं देख पड़ें तो बुद्धिमान् राजा साम दान आदि उपायों को एक साथ वा अलग अलग काम में लावे । उपाय करनेवाले, उपाय के साधन योग्य और उपाय इन तीनों को ठीक ठीक आश्रय करके अर्थसिद्धि के लिए उपाय करे । उक्त प्रकार से संपूर्ण राजकार्यों का मन्त्रियों के साथ विचार करे । स्नान और व्यायाम (कसरत) करके दोपहर में भोजनार्थ अन्तःपुर में प्रवेश करे । वहां नम्र, भोजन- काल को जाननेवाला, शत्रु के बहकाने में न आनेवाला, रसोइयां के तैयार किये, परीक्षित और विषनिवारक मन्त्रों से शुद्ध भोजन को करे । राजा के सब खानेवाले पदार्थों में विषनाशक दवा डाले और विषनाशक रत्नों को राजा सदा धारण करे ॥ २१४–२१८॥ परीक्षिताभिः स्त्रीभिश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः । तो लेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ॥ २१९ ॥ राजा दबा उसको इस एवं कुर्वीत यानशय्यासनाशने । देखकर, मित्र या ने चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ २२० ॥ करे जिसमें ये दोनों वेष-भूषणों से सजी धजी स्त्रियां, एकाग्रमन पाकर वैसा नहीं चढ़ धूप-गन्ध से राजा की सेवा करें । इसी भांति बढ़ता है ॥ २०६-२०८ या, आसन, भोजन, स्नान, उबटन और सब धर्मज्ञं च कृतज्ञं च क्षा आदि कर्म होना चाहिए ॥ २१९-२२० ॥ अनुरक्तं स्थिरारम्भं स्त्रीभिरन्तःपुरे सह । । पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ २२१ ॥