मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४४ मनुस्मृति। ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥ १२०॥ जिससे लौकिक विषय, या वैदिक क्रिया या ब्रह्मविद्या को सीखे उसको पहले प्रणाम करना चाहिए। जो केवल गायत्री जानता हो, जितेन्द्रिय हो वह ब्राह्मण मान्य होता है। और जो तीनों वेदोंका भी ज्ञाता हो पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार न रखता हो, सब निषिद्ध चीज़ें बेंचता हो वह माननीय नहीं होता । जिस शय्या और आसन पर, अपने से श्रेष्ठ-बड़ा बैठता हो उस पैर कभी न बैठे। स्वयं आसान वा शय्या पर बैठा हो तब कोई पूज्य आवे तो उठकर प्रणाम करना चाहिए । गुरु या किसी श्रेष्ठ के आने पर युवा पुरुष के प्राण संभ्रम से ऊपर चढ़ते हैं, फिर उठकर प्रणाम आदि करने पर वे प्राण स्वस्थ होते हैं । इसलिए अवश्य स्वागत करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥ अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥ १२१ ॥ अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् । असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ॥ १२२ ॥ नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥१२३॥ भोः शब्दं कीर्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने । नाम्नां स्वरूपभावो हि भोभावऋषिभिः स्मृतः ॥१२४॥ आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ १२५ ॥ जो पुरुष बड़ों की सेवा और उनको प्रणाम करता है उसकी आयु, विद्या, यश और बल ये चारों बढ़ते हैं। वृद्ध को प्रणाम करता हुआ विप्र, 'मैं अमुक नाम हूं' ऐसा कहे। जो प्रणम्य ...
दूसरा अध्याय। ४५
दूसरा अध्याय। ४५ पुरुष आशीर्वाद देने का क़ायदा न जानते हों, उनको प्रणाम समय में 'मैं हूं' इतना ही कहे और स्त्रियों को भी प्रणाम करते हुए यही कहना चाहिए। अभिवादन-प्रणाम करने के समय, अपने नाम के अन्त में 'भोः' कहे जैसा- 'देवदत्तशर्माहमस्मि भोः'। प्रणम्य पुरुष के नाम के स्थान में 'भोः' यह सम्बोधन ऋषियों ने कहा है। अर्थात् प्रणम्य का नाम न कहकर 'भोः' कहना चाहिए। विप्र प्रणाम करे तो आशीर्वाद में 'आयुष्मान् भव सौम्य' ऐसा कहे। और उसके नाम के अन्त में अकार को अगर व्यञ्जनान्त नाम हो तो उसके पहले अक्षर का प्लुत-ऊंचा उच्चारण करे *॥ १२१-१२५ ॥ यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम् । नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ १२६ ॥ ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत्क्षत्रबन्धुमनामयम् । वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव च ॥ १२७ ॥ जो ब्राह्मण, प्रणाम-आशीर्वाद की रीति न जानता हो उसको प्रणाम न करना चाहिए। क्योंकि वह शूद्र के समान है। आपस में मिलने पर ब्राह्मण से 'कुशल' क्षत्रिय से 'अनामय' वैश्य से 'क्षेम' और शूद्र से 'आरोग्य' पूछना चाहिए ॥ १२६-१२७ ॥ अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत् । भो भवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ॥ १२८ ॥ परपत्नी तु या स्त्री स्यादासंबंधा च योनितः । तां ब्रूयाद्भवतीत्येव सुभगे भगिनीति च ॥ १२६ ॥ मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून् । असावहमिति ब्रूयात् प्रत्युत्थाय यवीयसः ॥ १३० ॥
- यह सब प्रणाम, आशीर्वाद की रीति संस्कृतभाषा में करने की लिखी गई है। प्रायः वेदपाठी-ब्रह्मचारी गुरुकुल में इन नियमों का पालन करतेगे ।
४६ मनुस्मृति । मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा । संपूज्या गुरुपत्नीवत्समास्ता गुरुभार्यया ॥ १३१ ॥ भ्रातुर्भार्योपसंग्राह्या सवर्णाऽन्वहन्वपि । विप्रोष्य तूपसंग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः ॥ १३२ ॥ यज्ञादि में दीक्षित ब्राह्मण उमर में छोटा हो तो भी उसका नाम न लेवे, उसको 'भोः' 'भवान्' कहकर पुकारना वा कुछ कहना चाहिए। जो दूसरे की स्त्री हो, या जिससे सम्बन्ध न हो उससे आप, सुभगे, वहन कहकर बोलना । मामा, पिता का भाई, श्वशुर, ऋत्विज और गुरु ये यदि उमर में छोटे हों, तो भी, मिलने पर उठकर अपना नाम ज़ाहिर करना चाहिए। मौसी, मामी, सास और बुआ, ये सब गुरु-स्त्री के समान पूज्य हैं। ज्येष्ठ भाई की सवर्णा स्त्री से रोज प्रणाम आदि करना चाहिए। और जाति, सम्बन्धी स्त्रियों को पितृकुल या मातृकुल में, विदेश से आने पर प्रणाम करना चाहिए ॥ १२८-१३२ ॥ पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि । मातृवद्वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी ॥ १३३ ॥ दशाब्दाख्यं पौरसख्यं पञ्चाब्दाख्यं कलाभृताम् । त्र्यब्दपूर्वं श्रोत्रियाणां स्वल्पेनापि स्वयोनिषु ॥ १३४ ॥ पिता की वहन, माता की वहन और बड़ी वहन माता के समान आदर योग्य हैं, पर माता इन सब से श्रेष्ठ है। एक नगर का निवासी उमर में दश वर्ष का, नाच, गान जाननेवाला उमर में पाँच वर्ष का, वेदज्ञ तीन वर्ष का और सम्बन्धी थोड़े ही दिनका, ये सब समान अवस्था के माने जाते हैं ॥ १३३-१३४ ॥ ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥१३५॥
दूसरा अध्याय । ४७
दूसरा अध्याय । ४७ वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ १३६ ॥ पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च । यत्र स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमींगतः ॥१३७॥ दश वर्ष के ब्राह्मण को, सौ वर्ष का भी क्षत्रिय पिता माने और अपने को पुत्र माने। धन, कुटुम्ब, आयु, कर्म और विद्या ये पाँच मानके स्थान हैं। इनमें, पहले से दूसरा क्रम से अधिक मान्य होता है। तीनों वर्णों में जो इन पाँच बातों में बढ़ा हो वही जगत् में माननीय है और दशवीं अवस्था में ( ६० वर्ष में ) शूद्र भी मान योग्य होता है ॥ १३५-१३७ ॥ चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः । स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च ॥ १३८॥ तेषां तु समवेतानां मान्यौ स्नातकपार्थिवौ । राजस्नातकयोश्चैव स्नातको नृपमानभाक् ॥ १३६॥ उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ॥ १४० ॥ एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः । योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ॥ १४१ ॥ गाड़ी में बैठा, नब्बे वर्ष से अधिक उमर का वृद्ध, रोगी, शिर पर बोझा लिए, स्त्री, वेदपाठी, ब्रह्मचारी, राजा और विवाह में वर, इनको देखकर मार्ग छोड़ देना चाहिए। ये सब जहां इकट्ठे हों वहां स्नातक ब्राह्मण, जिसका वेदपाठ होगया है, और राजा अधिक मान्य होता है। इन दोनों में भी राजा स्नातक का मान करे। जो अपने शिष्य का उपनयन करके उसे साङ्गवेद पढ़ाता है वह 'आचार्य' कहलाता है। जो ब्राह्मण वेद या उसके अङ्गों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह 'उपाध्याय' कहलाता है॥१३८-१४१॥
४८ : मनुस्मृति । निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते ॥ १४२ ॥ अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान् मखान् । यः करोति वृतो यस्य स तस्यर्त्विगिहोच्यते ॥ १४३ ॥ य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ । स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येतकदाचन ॥ १४४ ॥ उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता । सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १४५ ॥ जो गर्भाधान आदि संस्कार विधि से करता है और अन्न से पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है । जो ब्राह्मण किसीको वरण लेकर, अग्न्याधेय कर्म, अष्टकादर्श, पौर्णमास आदि पाकयज्ञ और अग्निष्टोम आदि यज्ञ करता है वह उसका 'ऋत्विज' कह- लाता है । जो वेद का शुद्ध अध्यापन कराता है वह पिता, माता के समान मान्य होता है, उसके साथ कभी द्रोह न करे । आचार्य उपाध्याय से दशगुना, पिता आचार्य से सौगुना और माता पिता से हज़ारगुना अधिक पूज्य है ॥ १४२-१४५ ॥ उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान्ब्रह्मदः पिता । ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ १४६ ॥ कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः । संभूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते ॥ १४७ ॥ आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः । उत्पाद॑यति सावित्र्या सा सत्या साऽजराऽमरा ॥ १४८ ॥ अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः । तमपीह गुरुं विद्याच्छ्रुतोपक्रियया तया ॥ १४६ ॥
दूसरा अध्याय । ४६
दूसरा अध्याय । ४६ पैदा करनेवाला पिता और वेदाध्यापक गुरु में, गुरु श्रेष्ठ है । क्योंकि वह ब्रह्मजन्म का दाता है, उसी से लोक, परलोक में स्थिर सुख मिलता है। माता और पिता कामवश होकर जो बालक पैदा करता है, वह जिस योनि से जाता है, उसी प्रकार उसके हाथ, पैर अङ्ग होजाते हैं। परन्तु वेदविशारद आचार्य, गायत्री उपदेश से जो बालक की जाति उत्पन्न करता है वह जाति सत्य, अजर और अमर है । जो उपाध्याय वेद पढ़ाकर, जिसका थोड़ा वा बहुत उपकार करता है, उसको भी गुरु के समान जानना चाहिए ॥ १४६-१४६ ॥ ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता । बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥ १५० ॥ अध्यापयामास पितॄन् शिशुराङ्गिरसः कविः । पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ १५१ ॥ ते तमर्थमपृच्छन्त देवानागतमन्यवः । देवाश्चैतान्समंत्योचुर्न्याय्यं वः शिशुरुक्तवान् ॥ १५२ ॥ ब्रह्म-वेद पढ़ाने योग्य जन्म देनेवाला और स्वधर्म की शिक्षा देनेवाला ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी वह धर्मानुसार बूढ़ों के पिता समान है। अङ्गिरा मुनि के पुत्र ने थोड़ी उमर में अपने चाचा, मामा आदि को वेद पढ़ाया और धर्मबुद्धि से उनको 'हे लड़को' ऐसा पुकारा था । उस पर वे लोग क्रोध से देवताओं से इसका अर्थ पूँछा, तब उन्हों ने कहा कि बालक ने उचित रीति से तुमको पुकारा है ॥ १५०-१५२ ॥ अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः । अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥ १५३ ॥ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १५४ ॥
५० मनुस्मृति । विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः । वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ॥१५५॥ न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ १५६ ॥ अज्ञानी ही बालक है और मन्त्रदाता ही पिता है। इसलिए अज्ञमूर्ख को बालक और मन्त्रदाता को पिता कहते हैं। न बहुत उमर से, न सफेद बालों से, न धन से, न सम्बन्ध-रिश्तेदारी में बड़ाई होने से ब्राह्मण की बड़ाई है, किन्तु जो वेद-विशारद है वही श्रेष्ठ है, यह ऋषियों ने नियम किया है। ब्राह्मणों का ज्ञान से, क्षत्रियों का पराक्रम से, वैश्यों का धन-धान्य से और शूद्रों का जन्म-उमर से बड़ाई होती है। शिर के बाल पक जाने से कोई वृद्ध नहीं होता, किन्तु जो युवा पुरुष भी वेद-विशारद है उसको भी देवताओं ने वृद्ध कहा है ॥ १५३-१५६ ॥ यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ १५७॥ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला । यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥ १५८॥ अहिंसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम् । वाक् चैव मधुराश्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ॥ १५९॥ यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा । स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ १६० ॥ जैसा काठ का हाथी और चमड़ा का मृग, वैसा विना पढ़ा ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र को रखते हैं पर किसी काम के नहीं हैं। जैसा स्त्रियों में नपुंसक पुरुष निष्फल, गौ के लिए दूसरी गौ निष्फल, अज्ञानी को दान निष्फल है, वैसा विना वेद पढ़ा
दूसरा अध्याय । ५१
दूसरा अध्याय । ५१ ब्राह्मण निष्फल है-क्योंकि श्रौत-स्मार्त कर्मों के अयोग्य होता है। किसी के चित्त को दुखाकर धर्मशिक्षा न देनी चाहिए । मधुर और कोमल वाणी बोलनी चाहिए । जिसका वाणी और मन शुद्ध है, दोषों से रहित है, उसको वैदिक कर्मों का पूरा फल मिलता है ॥ १५७-१६० ॥ नारन्तुदः स्यादातोंऽपि न परद्रोहकर्मधीः । ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥ १६१ ॥ संमानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव । अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १६२ ॥ सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते । सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ॥ १६३ ॥ बहुत दुखी होने पर भी किसी को मर्मभेदी वचन न कहे । जिसमें दूसरे का अनभल हो ऐसी बात न विचार करे और जिससे लोग घबड़ावें, उस अहित करनेवाली बात को न कहे । सन्मान से विष के तरह नित्य डरा करे और अपमान का अमृत के तरह सदा चाह रक्खे । इस लोक में अपमान से जो दुःख नहीं मानता वह सुख से सोता है, सुख से जागता है। सुख से विचरता है और उसका अपमान करनेवाला नष्ट होजाता है ॥ १६१-१६३ ॥ अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः । गुरौ वसन् संचिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ॥ १६४ ॥ तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः । वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ १६५ ॥ वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्यन् द्विजोत्तमः । वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १६६ ॥
५२ मनुस्मृति। आहैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः। यःस्रग्व्यपिद्विजोऽधीतेस्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्॥१६७॥ योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥१६८॥ इस क्रम से गर्भाधानादि उपनयनान्त संस्कारों से पवित्र द्विज गुरुकुल में वेद प्राप्ति योग्य तप करे। द्विज को तपों से और नाना प्रकार के व्रतों से संपूर्ण वेद और उपनिषदों का ज्ञान संपादन करना चाहिए। तप करने की इच्छा से वेद का सदा अभ्यास करे। वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप कहा गया है। जो द्विज पुष्पमाला को भी धारण करके अर्थात् ब्रह्मचारी का नियम न रखकर भी नित्य यथाशक्ति वेदाध्ययन करता है वह नख-शिख से परम तप करता है। जो द्विज वेद को न पढ़कर दूसरे शास्त्रों में श्रम करता है, वह जीताहुआ ही वंश के साथ शूद्रता को प्राप्त होता है ॥ १६४-१६८ ॥ मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने। तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ १६६ ॥ तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्। तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते॥१७०॥ वेदप्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते। न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किंचिदामौञ्जिबन्धनात्॥१७१॥ श्रुति की आज्ञा से द्विज का माता से पहला जन्म, उपनयन से दूसरा जन्म, ज्योतिष्टोम आदि यज्ञदीक्षा लेने पर तीसरा जन्म होता है। इन तीनों में उपनयनवाले ब्रह्मजन्म में सावित्री-गायत्री माता और आचार्य पिता कहा जाता है। वेद के अध्यापन से आचार्य को पिता कहते हैं। उपनयन के बिना बालक को श्रौत- स्मार्त कर्मों का अधिकार नहीं होता ॥ १६६-१७१ ॥
दूसरा अध्याय । ५३
दूसरा अध्याय । ५३ नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म स्वधानिनयनादृते । शूद्रेण हि समास्तावद्यावद्वेदे न जायते ॥ १७२॥ कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ॥ १७३ ॥ यद्यस्य विहितं चर्म यत्सूत्रं या च मेखला । यो दण्डो यच्च वसनं तत्तदस्य व्रतेष्वपि ॥ १७४ ॥ सेवेतेमांस्तु नियमान् ब्रह्मचारी गुरौ वसन् । सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तपोवृद्ध्यर्थमात्मनः ॥ १७५ ॥ जिसका यज्ञोपवीत न भया हो उसके समीप, श्राद्धकर्म के मन्त्रों के सिवाय दूसरे वेदमन्त्रों का उच्चारण न करे। क्योंकि उपनयन के पूर्व शूद्र के समान वह माना जाता है। उपनयन के बाद बालक को व्रत धारण और विधि से वेद का अध्ययन करावे। उपनयन में जिसके लिए जो चर्म, सूत्र, मेखला, दण्ड और वस्त्र धारण करने को कहा है वही व्रत में धारण करना चाहिए। गुरु- कुल में ब्रह्मचारी को इन्द्रियों का संयम करके अपने तप के वृद्धि के लिए इन नियमों का पालन करना चाहिए ॥ १७२-१७५ ॥ नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् । देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ॥ १७६ ॥ वर्जयेन्मधु मांसं च गन्धं माल्यं रसान्स्त्रियः । शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम् ॥ १७७॥ अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम् । कामं क्रोधं च लोभं च नर्त्तनं गीतवादनम् ॥ १७८ ॥ द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथानृतम् । स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च ॥ १७९ ॥
५४ मनुस्मृति । ब्रह्मचारी के धर्म । नित्य स्नान से पवित्र होकर द्विज, देवता, ऋषि और पितरों का तर्पण, देवपूजन और होम करना चाहिए । मधु-शराब, मांस, सुगन्ध का पदार्थ, पुष्प, रस, स्त्री जो सड़ी चीज़-सिरका वगैरह और प्राणियों की हिंसा इनको छोड़ देना चाहिए । तैल लगाना, आँखों में अंजन, जूता, छतरी, काम, क्रोध, लोभ, नाच, गान, बाजा, जुआ, बकवाद करना, परनिन्दा, झूठ बोलना, स्त्रियों को देखना और छूना, दूसरे का अनहित, ये सब छोड़ देना चाहिए ॥ १७६-१७८ ॥ एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित् । कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥१८०॥ स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वार्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥१८१॥ उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् । आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ॥ १८२ ॥ वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु । ब्रह्मचार्य्याहरेद्भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ॥ १८३ ॥ गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु । अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत् ॥ १८४ ॥ हमेशा अकेला सोवे और वीर्य को न गिरावे । जो इच्छा से वीर्य- पात करता है वह अपने ब्रह्मचर्यव्रत का नाश करता है । अपनी इच्छा के बिना स्वप्न में वीर्यपात होजाय तो स्नान, सूर्यपूजन कर के 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस ऋचा का तीन बार जप करे । जल का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश ये चीज़ें ज़रूरत भर लावे और प्रतिदिन भिक्षा माँगे । वेद और यज्ञ से जो रहित नहीं हैं,
दूसरा अध्याय । ५५
दूसरा अध्याय । ५५ अपने नित्यकर्म में परायण हैं, उनके घरों से ब्रह्मचारी भिक्षा लावे। अपने गुरुकुल में, जाति में और सम्बन्धीयों से भिक्षा न माँगे, यदि दूसरे जगह न मिल सके तो समीप के रिश्ते में छोड़- कर दूरवाले में माँगे ॥ १८०-१८४ ॥ सर्वं वापि चरेद्ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे । नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत् ॥ १८५ ॥ दूरादाहृत्य समिधः संनिदध्याद्विहायसि । सायं प्रातश्च जुहुयात्ताभिरग्निमतन्द्रितः ॥ १८६ ॥ अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम् । अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिब्रतं चरेत् ॥ १८७ ॥ अगर धर्म-कर्मवाले पुरुषों का गाँव में अभाव हो तो सब गाँवों में भिक्षा को जाय । महापातकी लोगों को छोड़ देवे । और अपनी वाणी का सदा संयम रक्खे । दूर से समिधा-होम की लकड़ी लाकर ऊंचेपर धरे और निरालस होकर प्रातःकाल और सायंकाल उससे अग्नि में हवन करे । ब्रह्मचारी नीरोग होने पर यदि सात रात तक भिक्षा न लावे और हवन न करे तो उसको 'अवकीर्णिब्रत' प्रायश्चित्त ( ११ अध्याय का ) करना चाहिए ॥ १८५-१८७ ॥ भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्व्रती । भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता ॥ १८८ ॥ व्रतवद्देवदैवत्ये पित्र्ये कर्मण्यथर्षिवत् । काममभ्यर्थितोऽश्नीयाद्वतमस्य न लुप्यते ॥ १८६ ॥ ब्राह्मणस्यैव कर्मैतदुपदिष्टं मनीषिभिः । राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते ॥ १६० ॥ ब्रह्मचारी भिक्षा माँगकर नित्य भोजन करे, एकही के घर का
५६ मनुस्मृति । अन्न लाकर न खावे । क्योंकि भिक्षा से जो निर्वाह होता है, वह ऋत के समान माना जाता है । देवयज्ञ में निमन्त्रण हो तो निषिद्ध पदार्थ छोड़कर एक का भी अन्न तृप्तिपूर्वक भोजन करे और श्राद्ध में ऋषियों के समान भोजन करे इस प्रकार व्रत भंग नहीं होता है । लेकिन विद्वानों ने यह कर्म ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए कहा है, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ऐसा कर्म नहीं है ॥ १८८-१६० ॥ चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदित एव वा । कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥ १६१ ॥ शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च । नियम्य प्राञ्जलिस्तिष्ठेदीक्ष्यमाणो गुरोर्मुखम् ॥ १६२ ॥ नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंयुतः । आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः ॥ १६३ ॥ हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ । उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य चरमं चैव संविशेत् ॥ १६४ ॥ प्रतिश्रवणसंभाषे शयानो न समाचरेत् । नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः ॥ १६५ ॥ गुरु रोज़ कहे वा न कहे, पर अध्ययन और आचार्य के हित के लिए सदा यत्न करना चाहिए । शरीर, वाणी, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और मन का संयम करके हाथ जोड़कर गुरुमुख को देखता हुआ रहा करे । ओढ़ने के वस्त्र से दाहना हाथ सदा बाहर रक्खे, और गुरुआज्ञा से सामने बैठे । गुरु के पास में सादा भोजन और सादा वस्त्र सदा पहने और गुरु के पहले जागे और पीछे सोवे । ब्रह्मचारी सोता, बैठा, खाता, खड़ा और मुँह फेरकर खड़ा हुआ गुरु से बात चीत न करे ॥ १६१-१६५ ॥
दूसरा अध्याय । ५७
दूसरा अध्याय । ५७ आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः । प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावंस्तु धावतः ॥ १९६ ॥ पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् । प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः ॥ १९७ ॥ नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसन्निधौ । गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥ १९८ ॥ नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् । न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् ॥ १९६ ॥ गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्तते । कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥२००॥ परीवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः । परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी ॥ २०१ ॥ गुरु आसन पर बैठे हों तो शिष्य आसन से उठकर, गुरु खड़े हों तो पास जाकर, आते हों तो सन्मुख जाकर और जा रहे हों तो उनके पीछे दौड़कर बात करना चाहिए । गुरु पीछे हों तो सन्मुख होकर, दूर हों तो पास जाकर, लेटे हों तो प्रणाम करके, खड़े हों तो समीप होकर आज्ञा को सुनना चाहिए । गुरु के पास में बिछौना वा आसन गुरु से नीचा रखना चाहिए और उनके सामने मनमानी तौर से न बैठे । गुरु के पीछे भी उनका अकेला नाम लेकर न बोले और उनकी चाल, बोल, चेष्टाकी नक़ल न करे । जहाँ गुरुनिन्दा होती हो वहाँ शिष्य अपने दोनों कानों को बंद करलेवे या वहां से अलग चला जाय । गुरुनिन्दा सच्ची या झूठी करने से, मर कर गधा और कुत्ता होता है । गुरुधन भोगनेवाला कृमि और कुचाल करनेवाला कीट होता है ॥ १९६—२०१ ॥ दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः । यानासनस्थश्चैवैनमवरुह्याभिवादयेत् ॥ २०२ ॥
५८ । मनुस्मृति । प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह । असंश्चवे चैव गुरोर्न किंचिदपि कीर्तयेत् ॥ २०३ ॥ शिष्य खुद दूर रहकर, दूसरे के द्वारा गुरुपूजा न करे। पूजा में क्रोध न करे, गुरु अपनी स्त्री के पास हों तब पूजा न करे । अगर आसन या गाड़ी में बैठा हो तो उतर कर गुरु को प्रणाम करे। गुरु के तरफ, शिष्य के तरफ से वायु लगता हो या शिष्य के गुरु के तरफ से वायु लगता हो तो शिष्य गुरुसम्मुख में न बैठे। और गुरु.न सुन सकें तो कुछ न कहना चाहिए ॥ २०२-२०३॥ गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च । आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च ॥ २०४ ॥ गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् । न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनाभिवादयेत् ॥ २०५ ॥ विद्यागुरुष्वेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु । प्रतिषेधत्सु चाधर्मान् हितं चोपदिशत्स्वपि ॥ २०६ ॥ श्रेयःसु गुरुवद्वृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् । गुरुपुत्रेषु चार्येषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु ॥ २०७ ॥ बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि । अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ॥ २०८ ॥ बैल, घोड़ा, ऊंट की सवारी में, मकान की छत, चटाई, शिला. पाटा और नाव पर गुरु के साथ बैठने का निषेध नहीं है। गुरु का गुरु समीप आवे तो गुरु के माफिक बर्ताव करे । गुरु की आज्ञा बिना अपने माता, पिता आदि को भी प्रणाम न करे । विद्या गुरु पिता आदि, अधर्म से बचानेवाला और हितैषी इन से गुरु समान बर्ताव करे। विद्या, तप से श्रेष्ठ, अपने से बड़ा सदाचारी, गुरुपुत्र और गुरुसम्बन्धी इनसे भी गुरु के समान व्यवहार करे। गुरुपुत्र, अपने से छोटा, या समान अवस्था का
दूसरा अध्याय । ५६
दूसरा अध्याय । ५६ या यज्ञकर्म में शिष्य हो तो भी वेद का अध्यापक होने से गुरु- तुल्य मान्य होता है ॥ २०४-२०८ ॥ उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने । न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥ २०६ ॥ गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णा गुरुयोषितः । असवर्णास्तु संपूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ॥ २१० ॥ अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च । गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् ॥ २११ ॥ गुरु के समान गुरुपुत्र के तैल मलना, स्नान कराना, पैर दबाना और झूठा खाना इतना काम न करना चाहिए। गुरु की स्त्री सजातीय हो तो गुरुसमान पूज्य है, नहीं तो उसको उठकर प्रणाम करले-यही सेवा है। तैल मलना, स्नान कराना, शरीर दाबना, फूलों से बाल गूंथना, ये काम गुरुस्त्री के न करना चाहिए ॥ २०६-२११ ॥ गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः । पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता ॥ २१२ ॥ स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम् । अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ॥ २१३ ॥ अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ॥ २१४ ॥ मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ २१५ ॥ कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि । विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहमिति ब्रुवन् ॥ २१६ ॥
६० मनुस्मृति । पूरे बीस साल का जवान और भला बुरा जाननेवाला शिष्य जवान गुरुस्त्री के पैर छूकर प्रणाम न करे, दूर से सदा करे। यह स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पुरुषों को दोष लगा देना, इस लिए बुद्धिमान् स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं। संसार में पुरुष पण्डित हो या मूर्ख, उसको काम, क्रोध के वश कुमार्ग में लेजाने को स्त्रियां बड़ी समर्थ होती हैं। माता, बहन वा लड़की के साथ भी एकान्त में न बैठे, क्योंकि इन्द्रियां ऐसी प्रबल हैं कि विद्वान् के मनको भी खींच लेती हैं। यदि इच्छा हो तो युवा शिष्य युवती गुरुपत्नी को 'मैं अमुक हूं' कहकर दूर से प्रणाम करलेवे ॥ २१२–२१६ ॥ विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् । गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ २१७ ॥ यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ २१८ ॥ मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः । नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत् सूर्यो नाभ्युदयात्क्वचित् ॥ २१६ ॥ विदेश से आने पर पैर छूकर और रोज़ दूर से, गुरुस्त्री को प्रणाम करना चाहिए। यही शिष्यों का आचार है। जैसे पुरुष कुदाल-फावड़े से भूमि खोदता हुआ जल पाता है वैसे सेवा से गुरुविद्या को पाता है। ब्रह्मचारी, मुण्डित या शिखावाला, या जटाधारी हो उसको गाँव के भीतर सूर्योदय और सूर्यास्त न होना चाहिए। अर्थात् दोनों काल में गाँव के बाहर सन्ध्या-गायत्री की उपासना में रहना चाहिए ॥ २१७–२१६ ॥ तं चेदभ्युदियात्सूर्यः शयानं कामचारतः । निम्लोचेद्वाप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ॥ २२० ॥ सूर्येण ह्यभिनिर्मुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः। प्रायश्चित्तमकुर्वाणो युक्तः स्यान्महतेनसा ॥ २२१ ॥
दूसरा अध्याय । ६१
दूसरा अध्याय । ६१ आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः । शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधि ॥ २२२ ॥ यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किंचित्समाचरेत् । तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वास्य रमेन्मनः ॥ २२३ ॥ यदि ब्रह्मचारी, इच्छा से सोता रहे और सूर्योदय होजाय या नगर में ही बिना जाने सूर्यास्त होजाय, तो एक दिन उपवास और गायत्रीजप करे । यदि सोते हुए को सूर्योदय और सूर्यास्त होजाय और उसका प्रायश्चित्त न करे तो उसको महापातक लगता है । रोज़ दोनों सन्ध्या में एकाग्रमन होकर पवित्र स्थान में गायत्रीजप करे । यदि किसी धर्म का स्त्री या शूद्र आचरण करता हो और उसमें मन लगे तो उसीका पालन करे । या जिस में अपना चित्त प्रसन्न हो वही करे ॥ २२०-२२३ ॥ धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थौ धर्म एव च । अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ॥ २२४ ॥ आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ॥ २२५॥ आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः । नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः॥ २२६ ॥ यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥ २२७ ॥ कोई अर्थ और धर्म को, कोई काम, अर्थ को, कोई अर्थ को, कोई धर्म को ही अच्छा मानते हैं। पर धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का आचरण करने से भला होता है-यह धर्मशास्त्र की आज्ञा है। आचार्य ब्रह्मा की मूर्ति, पिता प्रजापति की मूर्ति, माता पृ- थिवी की मूर्ति और बड़ा भाई अपनी ही मूर्ति है। इनसे दुःखी होने पर भी इनका अपमान न करे और ब्राह्मण को तो कभी भ
६२ मनुस्मृति । करना चाहिए । मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन आदि में; माता, पिता जो दुःख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से भी नहीं हो सकता ॥ २२४—२२७ ॥ तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा । तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ २२८ ॥ तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते । न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ २२६ ॥ त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः । त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ॥ २३० ॥ पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः । गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ २३१ ॥ त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीँल्लोकान् विजयेद्गृही । दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ॥ २३२ ॥ इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् । गुरुशुश्रूषया त्वेव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ २३३ ॥ सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः । अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥२३४ ॥ यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् । तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ॥ २३५ ॥ इसलिए सदा माता, पिता और आचार्य का प्रिय कार्य करे । इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं। इन तीनों की सेवा परम तप कहा जाता है। इनकी आज्ञा लेकर दूसरे धर्मों का आचरण करना चाहिए । ये ही तीनों लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग हैं। तीनों आश्रम, तीनों वेद और तीनों अग्नि हैं। पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि का
दूसरा अध्याय । ६३
दूसरा अध्याय । ६३ स्वरूप है, ये तीनों अग्नि संसार में बड़े हैं। इन तीनों की भक्ति- सेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता है। और स्वर्ग में देवताओं की भांति सुख पाता है। मातृभक्ति से यह लोक, पितृभक्ति से मध्यलोक और गुरुभक्ति से ब्रह्मलोक को पाता है। जिसने इन तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का पालन किया—और जिसने अनादर किया उसके सब धर्म-कर्म निष्फल हैं। जब तक , पिता, माता और गुरु जीवित रहें तब तक इनकी सेवा में विशेष लगा रहे ॥ २२८—२३५ ॥ तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् । तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ॥ २३६ ॥ त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते । एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ २३७ ॥ श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि । अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥ २३६ ॥ स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥२४०॥ इसके सिवा जो कर्म करे वह इनको निवेदन करदेवे। इन तीनों की सेवा से, पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़जाते हैं। यह मुख्य धर्म है और गौणधर्म माना जाता है। श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को हीनजाति से भी सीखे और चण्डाल से भी लोकमर्यादा सीखे और हीनकुल से भी सुशील स्त्री का विवाह करे। विष से भी अमृत और बालक से भी हित वचन ग्रहण करले। शत्रु से भी सदाचार और अपवित्र में से भी सुवर्ण निकाल लेवे। स्त्री, रत्न विद्या, धर्म, शौच, अच्छे वचन और भांति भांति की दस्तकारी आदि सब से सीख लेवे ॥ २३६—२४० ॥