मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
३५६ मनुस्मृति । एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्न तस्कराः । विकर्मक्रियया नित्यं बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥ २२६ ॥ द्यूतमेतत्पुरा कल्पे दृष्टं वैरकरं महत् । तस्माद् द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥ द्यूत-जुआ । राजा अपने देश में जुआ और समाह्वय को दूर करे । क्योंकि ये दोनों दोष राजा के राज्य का नाश कर देते हैं । जुआ * और समाह्वय प्रत्यक्ष लूट हैं, इस कारण राजा इन दोनों के नाश का यत्न करे । जो रुपया-पैसा-कौड़ी आदि निर्जीव से खेला जाय उसको जुआ कहते हैं । और तीतर, बटेर आदि जीवों पर जो बाजी ल- गाई जाती है उसको 'समाह्वय' कहते हैं । जो पुरुष जुआ और समाह्वय करें या करावें उन सब को और ब्राह्मण वेषधारी शूद्रों को राजा खूब पिटवावे । जुआरी, धूर्त, क्रूरकर्मा, पाखण्डी, म- र्यादा के खिलाफ चलनेवाले और शराबी को राजा अपने नगर से निकलवा देय । क्योंकि राजा के राज्य में ये छिपे चोर हैं- अपने कुकर्म से प्रजा को दुःख देते हैं । यह जुआ, पहले कल्प में बड़ा वैर बढ़ानेवाला देखा गया है। इस कारण बुद्धिमान हँसी के लिए भी जुआ न खेलें ॥ २२१-२२७ ॥ प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः । तस्य दण्डविकल्पःस्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा ॥ २२८ ॥ क्षत्रविट्शूद्रयोनिस्तु दण्डं दातुमशक्नुवन् ।
- ऋग्वेद के दशम मण्डल के चौतीसवें सूक्त में विस्तार से द्यूत का परिणाम वर्णित है । उस सूक्त में १४ ऋचा हैं; उनमें अन्न और कृषिकी प्रशंसा और अक्ष- कितवकी निंदा भी है अक्ष-द्यूत का निषेध जैसाः- ' अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमत्कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमानः । ' इत्यादि । द्यूत से जो हानि होती है वह इतिहासों में और प्रत्यक्ष में प्रसिद्ध है ।
नवां अध्याय । ३५७
नवां अध्याय । ३५७ आनृण्यं कर्मणा गच्छेद्विप्रो दद्याच्छनैः शनैः॥२२६॥ स्त्रीवालोन्मत्तवृद्धानां दरिद्राणां च रोगिणाम् । शिफाविदलज्वाद्यैर्विदध्यान्नृपतिर्दमम् ॥ २३०॥ ये नियुक्तास्तु कार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम् । धनोष्मणा पच्यमानास्तान्निःस्वान्कारयेन्नृपः॥२३१॥ कूटशासनकर्तॄंश्च प्रकृतीनां च दूषकान् । स्त्रीवालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा॥२३२॥ तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन यद्भवेत् । कृतं तद्धर्मतो विद्यान्नतद्भूयो निवर्त्तयेत् ॥ २३३ ॥ जो कोई छिपकर या प्रकटरीति से जुआ खेले उसको राजा इच्छानुसार दण्ड देवे । क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दण्ड न देसकता हो तो मज़दूरी करके दण्ड चुकावे और ब्राह्मण धीरे धीरे देडाले । स्त्री, बालक, पागल, बूढ़ा, निर्धन और रोगियों को चाबुक, बेंत और रस्सी से शिक्षा देय। जिन कर्मचारियों को राज्यकार्य सौंपा हो, वे यदि धनकी गरमी से लोगों के काम बिगाड़ें तो राजा उन का सब धन छीन लेय। राजा की तरफ से बनावटी आज्ञा करने वाले, मंत्रियों में बिगाड़ करानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मण- घातक और शत्रु से मिलनेवाले को राजा दण्ड देयं। जिस मामले का न्यायानुसार दण्ड तक निर्णय होचुका हो उसको पूरा समझे फिर न दोहरावे ॥ २२८-२३३ ॥ अमात्याः प्राड्विवाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा । तत्स्वयं नृपतिः कुर्यात्तान्सहस्रं च दण्डयेत् ॥ २३४ ॥ ब्रह्महा च सुरापश्च स्तेयो च गुरुतल्पगः । एते सर्वे पृथक् ज्ञेया महापातकिनो नराः ॥ २३५ ॥
३५८ मनुस्मृतिः । चोर-दुष्टों का निग्रह । मन्त्री और न्यायाधीश जिस मुकद्दमे को अन्यथा करें उसको राजा खुद देखे और अपराध साबित होनेपर उनपर हज़ारपण दण्ड करे। ब्रह्मघाती, मद्यप, चोर और गुरुपत्नी से समागम करने वाला इन सबको महापातकी मनुष्य जानना चाहिए ॥२३४-२३५॥ चतुर्णामपि चैतेषां प्रायश्चित्तमकुर्वताम् । शरीरं धनसंयुक्तं दण्डं धर्म्यं प्रकल्पयेत् ॥ २३६ ॥ गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः । स्तेये च श्वपदं कार्यं ब्रह्महण्यशिराः पुमान्॥२३७॥ असंभाज्या ह्यसंयाज्या असंपाठ्या विबाहिनः । चरेयुः पृथिवीं दीनाः सर्वधर्मबहिष्कृताः ॥ २३८ ॥ ज्ञातिसम्बन्धिभिस्त्वेते त्यक्तव्याः कृतलक्षणाः । निर्दया निर्नमस्कारास्तन्मनोरनुशासनम् ॥ २३९ ॥ प्रायश्चित्तन्तु कुर्वाणाः सर्ववर्णा यथोदितम् । नाङ्क्या राज्ञा ललाटेषुद्दाप्यास्तूत्तमसाहसम्॥२४०॥ आगःसु ब्राह्मणस्यैव कार्यो मध्यमसाहसः । विवास्यो वा भवेद्राष्ट्रात्सद्रव्यः सपरिच्छदः ॥ २४१॥ इतरे कृतवन्तस्तु पापान्येतान्यकामतः । सर्वस्वहारमर्हन्ति कार्यतस्तु प्रवासनम् ॥ २४२ ॥ नाददीत नृपः साधुर्महापातकिनां धनम् । आददानस्तु तल्लोभात्तेन दोषेण लिप्यते ॥ २४३ ॥ ये चारों यदि प्रायश्चित्त न करें तो राजा धर्मानुसार शारीरिक
नवां अध्याय। ३५६
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शिक्षा और धन-दण्ड भी करे। गुरुपत्नी-गामी के मस्तक में भग-चिह्न, शराबी के कलाल के झण्डे का चिह्न, चोर के कुत्ते के पैर का चिह्न और ब्रह्मघाती के मस्तक में शिरहीन धड़ का चिह्न करे। ऐसे मनुष्य सहभोजन, यज्ञ, वेदाध्ययन और विवाह-स- म्बन्ध के अयोग्य होते हैं। और श्रौत-स्मार्त कर्मों से बहिष्कृत निर्धन पृथिवी पर विचरें। इन चिह्नवाले पातकियों को स- म्बन्धी और जातिवाले त्याग दें। उन पर दया न करें, नमस्कार न करें, यही मनुजी की आज्ञा है। परन्तु जो महापातकी प्राय- श्चित्त करें उन के मस्तक में चिह्न न करे, केवल उत्तम साहस दण्ड करे। इन अपराधों में ब्राह्मण कोही 'मध्यम साहस' दण्ड करे अथवा धन-परिवार के साथ राज्य से निकाल दे। और दूसरे लोग इन पापों को जान कर करें तो उनका सर्वस्व छीन लेय और जानकर करें तो देश से निकाल देय। धार्मिक राजा महापातकी के धन को ग्रहण न करे। यदि लोभ से ग्रहण करे तो उस पाप से लिप्त होजाता है ॥ २३६-२४३ ॥ अप्सु प्रवेश्य तं दण्डं वरुणायोपपादयेत् । श्रुतवृत्तोपपन्ने वा ब्राह्मणे प्रतिपादयेत् ॥ २४४ ॥ ईशो दण्डस्य वरुणो राज्ञां दण्डधरो हि सः । ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ २४५ ॥ यत्र वर्जयते राजा पापकृद्भ्यो धनागमम् । तत्र कालेन जायन्ते मानवा दीर्घजीविनः ॥ २४६ ॥ निष्पद्यन्ते च सस्यानि यथोक्तानि विशां पृथक् । बालाश्च न प्रमीयन्ते विकृतं न च जायते ॥ २४७ ॥ महापातकी के दण्ड-धन को राजा जल में डालकर वरुण के अर्पण करदे या वेदज्ञ-सदाचारी ब्राह्मण को देदेवे। पातकी के दण्ड का स्वामी वरुण है क्योंकि वह राजाओं को भी दण्ड देनेवाला
३६० मनुस्मृति । है । और वेदज्ञ ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है । जिस देश में राजा पापियों का दण्ड लेकर उस का भोग नहीं करता उस देश में मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। और प्रजाओं के धान्य ठीक ठीक पैदा होते हैं, बालक नहीं मरते और कोई विकार नहीं होता ॥२४४-२४७॥ ब्राह्मणान्बाधमानं तु कामादवरवर्णजम् । हन्याच्चित्रैर्वधोपायैरुद्वेजनकरैर्नृपः ॥ २४८ ॥ यावानवध्यस्य वधे तावान्वध्यस्य मोक्षणे । अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ॥ २४९ ॥ उदितोऽयं विस्तरशो मिथो विवदमानयोः । अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः ॥ २५० ॥ एवं धर्म्याणि कार्याणि सम्यक्कुर्वन् महीपतिः । देशानलब्धाँल्लिप्सेत लब्धांश्च परिपालयेत् ॥ २५१ ॥ जानकर ब्राह्मण को कष्ट देनेवाले, नीचजाति के पुरुष को राजा अनेक उपायों से शारीरिक दण्ड देवे । अदण्ड्य को दण्ड देने से राजा को जितना अधर्म होता है उतनाही अपराधी को छोड़ने से होता है । न्यायकारी को धर्म प्राप्त होता है । अठारह प्रकार के दावों में प्रत्येक के परस्पर-विवाद का निर्णय विस्तार से कहा गया है । राजा इस प्रकार सब कार्यों का धर्मानुसार निर्णय करे । अप्राप्त देशों को लेना और प्राप्त देशों की रक्षा करना, राजा का धर्म है ॥ २४८-२५१ ॥ सम्यङ्निविष्टदेशस्तु कृतदुर्गश्च शास्त्रतः । कण्टकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ॥ २५२ ॥ रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात् । नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः ॥ २५३ ॥
नवों अध्याय । ३६१
नवों अध्याय । ३६१ अशासंस्तस्करान्यस्तु बलिं गृह्णाति पार्थिवः । तस्य प्रक्षुभ्यते राष्ट्रं स्वर्गाच्च परिहीयते ॥ २५४ ॥ निर्भयं तु भवेद्यस्य राष्ट्रं बाहुबलाश्रितम् । तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः ॥ २५५ ॥ विविधांस्तस्करान् विद्यात्परद्रव्यापहारकान् । प्रकाशांश्चाप्रकाशांश्च चारचक्षुर्महीपतिः ॥ २५६ ॥ प्रकाशवञ्चकास्तेषां नानापण्योपजीविनः । प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाटविकादयः ॥ २५७ ॥ उत्कोचकाश्चौपधिका वञ्चकाः कितवास्तथा । मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्राश्चेक्षणिकैः सह ॥ २५८ ॥ असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः । शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणाः पण्ययोषितः ॥२५६॥ अच्छे प्रकार देश वसानेवाला और शास्त्रानुसार किला बनाने वाला राजा नित्य चोरों के नाश का पूरा उपाय करे । प्रजापालक राजा सदाचारियों की रक्षा और दुष्टों को दण्ड करने से स्वर्ग- गामी होता है । जो राजा चोरों को दण्ड न देकर प्रजा से कर लेता है उसकी प्रजा अप्रसन्न रहती है और वह स्वर्ग से पतित होता है । जिस राजा का देश निर्भय होता है वह देश जल से सींचे वृक्ष की भांति नित्य बढ़ता है । चार-दूतरूपी आँखवाला राजा दो प्रकार के परद्रव्य हरनेवाले चोरों को जाने । एक प्रकट, दूसरे अप्रकट । उन में नाना प्रकार के व्यापारवाले प्रत्यक्ष चोर हैं और वन में रहनेवाले छिपे चोर हैं । रिश्वतखोर, भय दिखाकर धन लेनेवाले, ठग, जुआरी, तुमको धन मिलेगा ऐसी मीठी बातों से बहकानेवाले, ऊपर धार्मिक हृदय में पापी, ४६
३६२ : मनुस्मृति । हाथरेखा देखनेवाले, राजकर्मचारी, धूर्तवैद्य, कारीगर वग़ैरह और वेश्या ॥ २५२-२५६ ॥ एवमादीन् विजानीयात्प्रकाशाँल्लोककण्टकान् । निगूढचारिणश्चान्याननार्यानार्यलिङ्गिनः ॥ २६० ॥ तान् विदित्वा सुचरितैर्गूढैस्तत्कर्मकारिभिः । चारैश्चानेकसंस्थानैः प्रोत्साद्य वशमानयेत् ॥ २६१ ॥ तेषां दोषानभिख्याप्य स्वे स्वे कर्मणि तत्त्वतः । कुर्वीत शासनं राजा सम्यक् सारापराधतः ॥ २६२ ॥ न हि दण्डाहते शक्यः कर्तुं पापविनिग्रहः । स्तेनानां पापबुद्धीनां निभृतं चरतां क्षितौ ॥ २६३ ॥ सभाप्रपापूपशालावेशमद्यान्नविक्रयाः । चतुष्पथाश्चैत्यवृक्षाः समाजाः प्रेक्षणानि च ॥ २६४ ॥ जीर्णोद्यानान्यरण्यानि कारुकावेशनानि च । शून्यानि चाप्यगाराणि वनान्युपवनानि च ॥ २६५ ॥ एवं विधान्नृपो देशान् गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः । तस्करप्रतिषेधार्थं चारैश्चाप्यनुचारयेत् ॥ २६६ ॥ तत्सहायेरनुगतैर्नानाकर्मप्रवेदिभिः । विद्यादुत्सादयेच्चैव निपुणैः पूर्वतस्करैः ॥ २६७ ॥ इस तरह के इन प्रत्यक्ष ठगों को राजा दूतद्वारा जानें और ब्राह्मणवेश में छिपे फिरनेवाले शूद्रों पर भी दृष्टि करे। गुप्त, प्रकट, अनेक वेष और चालाकी से दूतलोग चोरों को पकड़ें। राजा सब के अपराधों को जगत् में प्रकट करके उनको उचित दण्ड देवे। बिना दण्ड के पाप को रोकना असंभव है। पापी वश में
नहीं आसकते । सभा, पोशाला, मिठाई की दूकान, रण्डी का घर, कलाल का घर, अन्न बिकने का स्थान, चौराहा, प्रसिद्ध वृक्ष, समाज, नाच, गान और नाटक के स्थान, पुराने बगीचे, जंगल, कारीगर के घर, खंडहर, वन और उपवन ऐसे स्थानों की जांच दूतोंद्वारा राजा सदा करावे । चोरों के सहायक, उनका कर्म करनेवाले, चोरी के कामों को जाननेवाले और पुराने चोर ऐसे चतुर दूतों से चोरों को पकड़वाकर दण्ड देवे ॥ २६०-२६७ ॥ भक्ष्यभोज्यापदेशैश्च ब्राह्मणानां च दर्शनैः । शौर्यकर्मापदेशैश्च कुर्युस्तेषां समागमम् ॥ २६८ ॥ ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च ये । तान् प्रसह्य नृपो हन्यात्समित्रज्ञातिबान्धवान् ॥२६६॥ न होढेन विना चौरं घातयेद्धार्मिको नृपः । स होढं सोपकरणं घातयेदविचारयन् ॥ २७० ॥ ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चौराणां भक्तदायकाः । भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत् ॥२७१॥ राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतान्सामन्तांश्चैव चोदितान् । अभ्याघातेषु मध्यस्थान् शिष्याच्चौरानिवद्रुतम्॥२७२॥ यश्चापि धर्मसमयात्प्रच्युतो धर्मजीवनः । दण्डेनैव तमप्योषेत्स्वकाद्धर्माद्धि विच्युतम् ॥ २७३॥ ग्रामघाते हिताभङ्गे पथि मोषाभिदर्शने । शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः॥ २७४ राज्ञः कोषापहर्तूंश्च प्रतिकूलेषु च स्थितान् । घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोपजापकान् ॥ २७५ ॥
३६४ मनुस्मृति । वे दूत उन चोरों को खाने-पीने के बहाने ब्राह्मणदर्शन के मिस से और वीरता के काम के ढंग से राजद्वार में लाकर पक- ड़वा दें। जो वहां पकड़े जानेकी डरसे न जावें और गुप्त राजदूतों के साथ चालाकी करके अपने को बचाते हों, उनको राजा बला- त्कार से पकड़ कर मित्र-जाति भाइयों सहित वध करे। गांवों में भी जो चोरों का भोजन, उनको ठहरने का स्थान देते हैं या चोरी का माल रखते हैं उनको भी राजा पिटवावे। चोरों के उपद्रवों में देश और सीमा के रक्षक उदासीन रहें तो उनको भी दण्ड करे। दान या यज्ञ से निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण मर्यादा से भ्रष्ट हो जाय तो उसको भी राजा दण्ड देवे। ग्राम लुटता हो, पौ तोड़ी जाती हो, मार्ग में चोर देखने में आवें, उस समय रक्षावाले सिपाही आदि अपराधियों के पकड़नेकी चेष्टा न करें। तो उन्हें सर्वस्वछीन कर देश से निकाल देय । राजा के खजाना में चोरी करनेवाले राजा की आज्ञा-भङ्ग करनेवाले, शत्रुओं में मिलेहुए मनुष्यों को हाथ-पैर कटवा कर अनेक कठोर दण्ड देवे ॥ २६८-२७५ ॥ संधिं छित्त्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः । तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णे शूले निवेशयेत् ॥२७६॥ अङ्गुलीर्ग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे । द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति ॥ २७७ ॥ अग्निदान् भक्तदांश्चैव तथा शस्त्रावकाशदान् । संनिधातॄंश्च मोघस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः ॥ २७८ ॥ तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा । यद्वापि प्रतिसंस्कुर्याद्दाप्यस्तूत्तमसाहसम् ॥ २७६ ॥ जो चोर रात को सेंध लगाकर चोरी करते हैं उनका हाथ काट कर तीखी शूली पर चढ़वा दे । गांठ काटनेवाला पहली बार पकड़ जावे तो उसकी अंगुली कटवादे, दूसरी बार हाथ-पैर कटवादे,
तीसरी बार में वध की आज्ञा देवे । चोरों को आग, भोजन, शस्त्र और ठहरने का स्थान देनेवाले को और चोरीका माल रखने वाले को चोर की भांति दण्ड देवे । जो तालाब बिगाड़े उसको जल में डुबवादे या प्रत्यक्ष मरवादे या उससे फिर तालाब बन- वावे और एक हज़ार पण दण्ड करे ॥ २७६-२७६ ॥ कोष्ठागारायुधागारदेवतागारभेदकान् । हस्त्यश्वरथहर्तॄंश्च हन्यादेवाविचारयन् ॥ २८० ॥ यस्तु पूर्वनिर्विष्टस्य तडागस्योदकं हरेत् । आगमं वाप्यपां भिंद्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम् ॥ २८१ ॥ समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि । स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशु शोधयेत् ॥ २८२ ॥ आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव वा । परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः ॥ २८३ ॥ राजा का अन्न भण्डार, शस्त्रशाला और देवमंदिर तोड़नेवाले को और हाथी, घोड़ा, रथ चुरानेवाले को, विना विचार मरवादे । जो पूर्व से सब के काम में आनेवाले, जलाशय के जल को अपने वश में करले या जल के प्रवाह को रोके उसपर ढाई सौ पण दण्ड करे । जो नीरोग होकर भी खास सड़कों पर मल आदि अप- वित्र वस्तु डाले उस पर दो कार्षापण दण्ड करे और वह मल उसीसे उठवावे । परन्तु रोगी, बूढ़ा, गर्भिणी, बालक ऐसा करे तो उनको मना करदे और स्थान शुद्ध करवावे, यही मर्यादा है ॥ २८०-२८३ ॥ चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्याप्रहरतां दमः । अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु तु मध्यमः ॥ २८४ ॥ संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः ।
३६६ मनुस्मृति। प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च ॥ २८५ ॥ अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा । मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ॥ २८६ ॥ समैर्हि विषमं यस्तु चरेद्वै मूल्यतोऽपि वा । समाप्नुयाद्दमं पूर्वं नरो मध्यममेव वा ॥ २८७ ॥ बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत् । दुःखिता यत्र दृश्येरन् विकृता पापकारिणः ॥ २८८ ॥ प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम् । द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ २८९ ॥ अभिचारेषु सर्वेषु कर्त्तव्यो द्विशतो दमः । मूलकर्मणि चानाप्ते कृत्यासु विविधासु च ॥ २९० ॥ अबीजविक्रयी चैव बीजोत्कृष्टं तथैव च । मर्यादा भेदकश्चैव विकृतं प्राप्नुयाद्वधम् ॥ २९१ ॥ चिकित्सा करनेवाले उलटी चिकित्सा करें तो पशु आदि के विषय में ढाई सौ पण और मनुष्यों के विषय में पांच सौ पण दण्ड करे। नदी के पुलका काठ, राजपताका का दण्डा और मूर्तियों को तोड़नेवाला, उन सबको फिर बनवावे और पांच सौ पण दण्ड देवे। अच्छी वस्तु को दूषित करने, तोड़ने और मणियों के बुरा बेधने में, ढाई सौ पण दण्ड करे। जो समान-मूल्य की वस्तुओं से न्यूनाधिक मूल्य की वस्तुओं का व्यवहार करे, वह मनुष्य पूर्व वा मध्यम साहस दण्ड पावे। राजा मार्ग में बंदीघर को बनवावे जहां दुःखी और पापी सबको दीख पड़े। लफील को तोड़नेवाले और उसकी खाई को भरनेवाले और राजद्वारों को तोड़नेवालों को तुरंत देश से निकालदेय । सब तरह के मारणों से यदि जिस
नवां अध्याय । ३६७
नवां अध्याय । ३६७ के ऊपर किया गया हो वह न सरे, वशीकरण, उच्चाटन आदि से कोई काम न सिद्ध हो तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे । खराब बीजों को बेंचनेवाला या अच्छे में बुरा मिलाकर बेंचनेवाला और हद तोड़नेवाले को अंगच्छेद का दण्ड देय ॥ २८४-२६१ ॥ सर्वकण्टकपापिष्ठं हेमकारं तु पार्थिवः । प्रवर्त्तमानमन्याये छेदयेल्लवशः क्षुरैः ॥ २६२ ॥ सीताद्रव्यापहरणे शस्त्राणामौषधस्य च । कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्॥ २६३॥ सब चोरों में महापापी सुनार यदि कोई दुराचार करे तो उसको चाकू से टुकड़े टुकड़े करवादे । खेती के हल, कुदाल आदि शस्त्र और औषध चुराने पर राजा समयानुसार दण्ड करे ॥ २६२-२६३ ॥ स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोशदण्डौ सुहृत्तथा । सप्तप्रकृतयो ह्येताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥ २६४ ॥ सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम् । पूर्वं पूर्वं गुरुतरं जानीयाद्व्यसनं महत् ॥ २६५ ॥ सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत् । अन्योन्यगुणवैशेष्यान्न किञ्चिदतिरिच्यते ॥ २६६ ॥ तेषु तेषु तु कृत्येषु तत्तदङ्गं विशिष्यते । येन यत्साध्यते कार्यं तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते॥ २६७॥ चारेणोत्साहयोगेन क्रिययैव च कर्मणाम् । स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः ॥२६८ ॥ पीडनानि च सर्वाणि व्यसनानि तथैव च ।
[Header] ३६८ मनुस्मृति ।
आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥ २६६ ॥ राजा, मन्त्री, राज्य, देश, खजाना, दण्ड और मित्र, राज्य-शक्ति ये सात प्रकृतियों में क्रम से पहली से अगली अगली श्रेष्ठ है । इसलिए पहले अङ्ग की हानि होने से आगे के अङ्ग पर बड़ा दुःख आपड़ता है । जैसे तीन दण्ड, एक दूसरे के आधार पर रुके रहते हैं, वैसे सात अङ्गवाला राज्य भी प्रत्येक अङ्गके आधार पर टिका रहता है। प्रत्येक अङ्ग अपनी विशेषता से समान हैं। जिससे जो काम सधता है उसमें वही श्रेष्ठ कहा जाता है । राजा नित्य दूतों के द्वारा सेनाको उत्साह देवे, सब कार्यों को ठीक रक्खे अपने और शत्रुकी शक्तिको जाना करे । सब प्रकार की पीड़ा और व्यसनों का गौरव-लाघव विचार कर कार्य का आरम्भ करे ॥ २६४-२६६ ॥ आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः । कर्माण्यारहमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ॥ ३०० ॥ कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च । राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ ३०१ ॥ कलिः प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम् । कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ ३०२ ॥ इन्द्रकार्यस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च । चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत् ॥ ३०३॥ राजा राज्यवृद्धि के कार्यों को धीरे धीरे करताही रहे । क्योंकि कर्म करनेवाले को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है । सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग, सब राजा के कार्यों पर हीं आधार रखते हैं क्योंकि राजा ही भले-बुरे समय का कारण है-युगस्वरूप है । जब राजा आलस्य, निद्रा में समय बितावे तो कलियुग, जब सावधानी से राज्य करे तो द्वापर, जब अपने कार्यों में लगा रहे तब त्रेता और जब शास्त्रानुसार कर्मों का संपादन करे तब सत्ययुग
नवां अध्याय । ३६६
नवां अध्याय । ३६६ होता है । इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि और पृथ्वी के तेजोमय-प्रकाशमान आचरणों से जगत् में व्यवहार करे ॥ ३००-३०३ ॥ वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति । तथाभिवर्षेत्स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ ३०४ ॥ अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः । तथा हरेत्करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ ३०५ ॥ प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः । तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ ३०६ ॥ यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति । तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम्॥३०७॥ जैसे इन्द्र वर्षा में चार मास जल वर्षा करके प्रजामनोरथ पूर्ण करता है वैसे राजा-इन्द्र के आचरण से अपने देशकी प्रजा को सन्तुष्ट करे । जैसे आठ मास सूर्य अपने तेजसे पृथिवीका जल खींच लेता है, वैसे राजा सूर्य की भांति आचरण करके प्रजा को दुःख न देकर राज्य-करलेवे । जैसे वायु प्राणरूप से सब प्राणियों में विचरता है, राजा भी दूतों से अपने देशका समाचार लेता रहे । जैसे यम समयपर मित्र-शत्रु सबको शिक्षा देताहै, वैसे राजा- यम के समान सारी प्रजाका शासन करे ॥ ३०४-३०७ ॥ वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते । तथा पापान्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ ३०८ ॥ परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः । तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ ३०६॥ प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु । ४७
३७० मनुस्मृति । दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ ३१० ॥ यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् । तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ ३११ ॥ एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः । स्तेनान् राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ ३१२ ॥ जैसे वरुण अपराधियों को अपने पाशों से बाँधता है, वैसे राजा वरुण होकर पापियों को दण्ड देवे । जैसे मनुष्य पूर्ण चन्द्रबिम्ब को देखकर खुश होते हैं, वैसे प्रजामण्डल जिस राजा को देख कर खुश हो वह राजा चन्द्रव्रतधारी है। पापियों पर अग्नि के समान प्रताप रक्खे, दुष्ट मन्त्रियों को मरवा दे यह अग्निव्रत है। जैसे पृथ्वी सर्व प्राणियों को सम-भाव से धारण करती है, वैसे राजा भी सम-भाव से प्राणियों का पालन करे । इन सब और दूसरे भी उपायों से बर्ताव करे और स्वराज्य या परराज्य के चोरों को दण्ड देवे ३०८-३१२ ॥ परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् । ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ॥ ३१३ ॥ यैः कृतः सर्वभक्ष्योऽग्निरपेयश्च महोदधिः । क्षयी चाप्यायितःसोमःको न नश्येत्प्रकोप्य तान्॥३१४॥ लोकानन्यान सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः । देवान्कुर्युरदेवांश्च कः क्षिएवंस्तान्समुद्ध्नुयात् ॥ ३१५॥ ब्राह्मण-माहात्म्य । खजाना की कमी आदि विपत्ति में पड़कर भी राजा ब्राह्मणों को नाराज न करे क्योंकि वे लोग कुपित होकर राज्य का नाश कर देते हैं। जिन ब्राह्मणों ने कुपित होकर अग्नि को सर्वभक्षक,
नवां अध्याय । ३७१
नवां अध्याय । ३७१ समुद्र को न पीने योग्य और चन्द्रमा को क्षयरोगी करके पीछे पूर्ण किया उन ब्राह्मणों को कुपित करके कौन नष्ट न होजायगा ? जो ब्राह्मण रुष्ट होकर दूसरे लोक और लोकपालों को रच सकते हैं और देवताओं को शाप देकर नीचयोनि में डाल सकते हैं, उन को दुःख देकर कौन बढ़ सकता है ? ॥ ३१३-३१५ ॥ यानुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोका देवाश्च सर्वदा । ब्रह्म चैव धनं येषां को हिंस्यात्तान् जिजीविषुः॥३१६॥ अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ ३१७ ॥ श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति । हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ ३१८ ॥ एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु । सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ॥ ३१६ ॥ स्वर्गादि लोक और देवता, जिनके आश्रय से टिके रहते हैं और वेद ही जिन का धन है उन ब्राह्मणों को कौन मारना चाहेगा? जैसे अग्नि वेदमन्त्रों से, या दूसरे प्रकार से प्रकट हो पर महान् देवता है, वैसे ब्राह्मण विद्वान् या मूर्ख हो महान् देवता है । ते- जस्वी अग्नि श्मशान में भी दूषित नहीं होता किंतु यज्ञ में हवन किया हुआ फिर वृद्धि को प्राप्त होता है । इसी प्रकार ब्राह्मण सब निंदित कामों के करने पर भी सर्वथा पूज्य हैं, महान् देवता हैं ॥ ३१६-३१६ ॥ क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान् प्रतिसर्वशः । ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् ॥ ३२० ॥ अद्द्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ ३२१ ॥
३७२ मनुस्मृति । नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते । ब्रह्मक्षत्रं च संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ ३२२ ॥ दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्यः सर्वदण्डसमुत्थितम्। पुत्रे राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रायणं रणे ॥ ३२३ ॥ क्षत्रिय यदि ब्राह्मण को दुःख दे तो ब्राह्मण ही उनको किसी उपाय से अपने वश में रक्खें । क्योंकि ब्राह्मणों से ही क्षत्रिय उत्पन्न हैं। जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा पैदा हुआ है। इनको पैदा करनेवाला व्यापक तेज अपने कारण में शान्त होजाता है। ब्राह्मण की सहायता विना क्षत्रिय नहीं बढ़ता और क्षत्रिय की सहायता विना ब्राह्मण की उन्नति नहीं होती इस लिये दोनों मिलकर रहें तभी लोक-परलोक में वृद्धि पाते हैं । राजा दण्ड का सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों को देकर और पुत्र को राज्य समर्पण करके रण में प्राणत्याग करे ॥ ३२०-३२३॥ एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः । हितेषु चैव लोकस्य सर्वान् भृत्यान्नियोजयेत् ॥३२४॥ एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः । इमं कर्मविधिं विद्यात्क्रमशो वैश्यशूद्रयोः ॥ ३२५ ॥ इसप्रकार राजा सदा आचरण करके राजधर्मों का पालन करे और लोकहित के कामों में सब कर्मचारियों को नियुक्त करे । ये सब राजा का सनातन-कर्तव्य कहा गया है अब वैश्य और शूद्र के कर्तव्यों को क्रम से सुनो ॥ ३२४-३२५ ॥ वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् । वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैव रक्षणे ॥ ३२६ ॥ प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।
नवां अध्याय । ३७३
नवां अध्याय । ३७३ ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ ३२७ ॥ न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति । वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन ॥ ३२८ ॥ मणिमुक्ताप्रवालानां लोहानां तान्तवस्य च । गन्धानां च रसानां च विद्यादर्घबलाबलम् ॥ ३२६ ॥ बीजानामुप्तिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च । मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ॥ ३३० ॥ वैश्य-शूद्रकर्त्तव्य । वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करके नित्य व्यापार और पशुरक्षा में तत्पर रहे । प्रजापति ने पशुओं की सृष्टि करके रक्षार्थ वैश्यों को सौंपा और ब्राह्मण, क्षत्रिय को प्रजा को सौंपा । इसलिए पशुपालन न करने की इच्छा वैश्य न करे, जबतक वैश्य पालन करे, दूसरे वर्ण को कभी न चाहिए । मणि, मोती, मूँगा, लोहा, सूत की वस्तु, कपूर और मीठा, घी आदि रसपदार्थों का भाव वैश्य सदा विचार में रक्खे । सब बीजों के बोने की विधि, खेतों के गुण-दोष और सब तरह की नाप-तौल को जाना करे ॥ ३२६-३३० ॥ सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान् । लाभालाभं च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ ३३१ ॥ भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम् । द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥ ३३२ ॥ धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् । दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ॥ ३३३ ॥
३७४ . मनुस्मृति । विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् । शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥ शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः । ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥ एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः । आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण, अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्, गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक, मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥ नवां अध्याय पूरा हुआ ।
अथ दशमोऽध्यायः । अधीयीरंस्त्रयोवर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः। प्रब्रूयाद् ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १ ॥ सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्युपायान् यथाविधि । प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ २ ॥ वैशेष्यात्प्रकृतिश्रैष्ठ्यान्नियमस्य च धारणात् । संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ३ ॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ ४ ॥ दशवां अध्याय । संकीर्ण-जातिभेद । अपने अपने धर्म कर्मों के अनुसार रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वेदों को पढ़ें । इन में ब्राह्मण सब को पढ़ावै और क्ष- त्रिय, वैश्य पढ़ें, पढ़ावै नहीं, यह निर्णय है। ब्राह्मण सब वर्णों को उनकी जीविका के उपायों को बतलावे और खुद भी अपने कर्त्तव्यों को जाने । जाति की विशेषता परमात्मा के मुखसे उत्पत्ति नियमों का धारण और जातकर्मादि संस्कारों की विशेषता से ब्राह्मण वर्णों का स्वामी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति *
- ब्राह्मण आदि जातिवाचक शब्द ऋग्वेद में भी हैं, जैसा—'ब्राह्मणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ।' 'पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम्' इति । यहां पञ्चजन शब्द चारों वर्ण के लिए है, ऐसा निरुक्त में यास्कमुनि ने लिखा है। जातिभेद वैदिक युग का है, नवीन नहीं है ।