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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति २०६ ऋषिरुवाच ॥ ३८ ॥ इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः। तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ३९ ॥ इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा। देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४० ॥ पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् । वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४१ ॥ रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी। तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ह्रीँ ॐ ॥ ४२ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ ३८ ॥ राजन् ! देवताओंने जब अपने तथा जगत्‌के कल्याणके लिये भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया, तब वे 'तथास्तु' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ३९ ॥ भूपाल ! इस प्रकार पूर्वकालमें तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई थीं, वह सब कथा मैंने कह सुनायी ॥ ४० ॥ अब पुनः देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं सब लोकोंकी रक्षा करनेके लिये गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं, वह सब प्रसङ्ग मेरे मुँहसे सुनो। मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ उवाच ५, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३५, एवम् ४२, एवमादितः ॥ २५९ ॥ इस प्रकार श्रीमार्केण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'शक्रादिस्तुति' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥ १. किसी-किसी प्रतिमें 'गौरीदेहा सा' 'गौरी देहात्सा' इत्यादि पाठ भी उपलब्ध होते हैं।

२०४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पञ्चमोऽध्यायः

देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिकाके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना और दूतका निराश लौटना

विनियोग
[ ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्रऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
ॐ इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं, महासरस्वती देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है, भीमा शक्ति है, भ्रामरी बीज है, सूर्य तत्त्व है और सामवेद स्वरूप है। महासरस्वतीकी प्रसन्नताके लिये उत्तर चरित्रके पाठमें इसका विनियोग किया जाता है।

ध्यान
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
जो अपने करकमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, शरद्-ऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाके समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवीका मैं निरन्तर भजन करता हूँ।]

'ॐ क्लीं' ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ॥ २ ॥
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥ ३॥
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च<sup></sup>
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ॥ ४ ॥
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥ ५॥
तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ॥ ६ ॥
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ॥ ७ ॥

ऋषि कहते हैं—॥ १॥ पूर्वकालमें शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरोंने अपने बलके घमंडमें आकर शचीपति इन्द्रके हाथसे तीनों लोकोंका राज्य और यज्ञभाग छीन लिये॥ २॥ वे ही दोनों सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम और वरुणके अधिकारका भी उपयोग करने लगे। वायु और अग्निका कार्य भी वे ही करने लगे। उन दोनोंने सब देवताओंको अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन करके स्वर्गसे निकाल दिया। उन दोनों महान् असुरोंसे तिरस्कृत देवताओंने अपराजिता देवीका स्मरण किया और सोचा 'जगदम्बाने हमलोगोंको वर दिया था कि आपत्तिकालमें स्मरण करनेपर मैं तुम्हारी सब आपत्तियोंका तत्काल नाश कर दूँगी'॥ ३—६॥ यह विचारकर देवता गिरिराज हिमालयपर गये और वहाँ भगवती विष्णुमायाकी स्तुति करने लगे॥ ७॥

देवा ऊचुः ॥ ८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥ ९॥


१. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद 'अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति' इतना पाठ अधिक है।

• देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति •२०५

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।<br>ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ १०॥<br>कल्याण्यै प्रणतां<sup></sup> वृद्धयै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।<br>नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ११॥<br>दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।<br>ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ १२॥<br>अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।<br>नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ १३॥<br>या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।<br>नमस्तस्यै ॥ १४॥ नमस्तस्यै ॥ १५॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६॥<br>या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।<br>नमस्तस्यै ॥ १७॥ नमस्तस्यै ॥ १८॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १९॥<br>या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २०॥ नमस्तस्यै ॥ २१॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२॥<br>या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २३॥ नमस्तस्यै ॥ २४॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २५॥<br>या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २६ ॥ नमस्तस्यै ॥ २७ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८॥<br>या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २९॥ नमस्तस्यै ॥ ३० ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३१ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३२ ॥ नमस्तस्यै ॥ ३३ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३४॥<br>या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३५॥ नमस्तस्यै ॥ ३६ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३७॥<br>या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ३९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४० ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४१ ॥ नमस्तस्यै ॥ ४२ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४३॥<br>या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४४ ॥ नमस्तस्यै ॥ ४५ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४६ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४७॥ नमस्तस्यै ॥ ४८ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४९॥या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५०॥ नमस्तस्यै ॥ ५१॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५२॥<br>या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५३ ॥ नमस्तस्यै ॥ ५४ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५५॥<br>या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५६ ॥ नमस्तस्यै ॥ ५७ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५८॥<br>या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५९ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६० ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६१ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६२ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६३ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६४॥<br>या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६५ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६६ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६७॥<br>या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७० ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ७१ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७२ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७३ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ७४ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७५ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७६॥<br>इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।<br>भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ ७७॥<br>चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।<br>नमस्तस्यै ॥ ७८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ८० ॥<br>स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-<br>त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।<br>करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी<br>शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ ८१ ॥<br>या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-<br>रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।<br>या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः<br>सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥ ८२ ॥<br>देवता बोले— ॥८॥ देवीको नमस्कार है,<br>महादेवी शिवाको सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं

१. वृद्धयै सिद्ध्यै च प्रणतां देवीं प्रति नमः नतिं कुर्म इत्यन्वयः। यद् वा प्रणमन्तीति प्रणन्तः, तेषां प्रणतामिति षष्ठीबहुवचनान्तं बोध्यम्। इति शान्तनव्यां टीकायां स्पष्टम्। 'प्रणताः' इति पाठान्तरम्।

२०६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * भद्राको प्रणाम है। हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बाको नमस्कार करते हैं ॥ ९ ॥ रौद्राको नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्रीको बारंबार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवीको सतत प्रणाम है ॥ १०॥ शरणागतोंका कल्याण करनेवाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवीको हम बारंबार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसोंकी लक्ष्मी), राजाओंकी लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी)-स्वरूपा आप जगदम्बाको बार-बार नमस्कार है ॥ ११॥ दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकटसे पार उतारनेवाली), सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवीको सर्वदा नमस्कार है ॥ १२ ॥ अत्यन्त सौम्य तथा अत्यन्त रौद्ररूपा देवीको हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारंबार प्रणाम है। जगत्की आधारभूता कृति देवीको बारंबार नमस्कार है ॥ १३ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें विष्णुमायाके नामसे कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ १४-१६ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ १७- १९॥ जो देवी सब प्राणियोंमें बुद्धिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २०-२२॥ जो देवी सब प्राणियोंमें निद्रारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २३-२५ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें क्षुधारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २६-२८ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें छायारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २९-३१॥ जो देवी सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३२-३४॥ जो देवी सब प्राणियोंमें तृष्णारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३५-३७ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें क्षान्ति (क्षमा)-रूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३८-४० ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें जातिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४१-४३॥ जो देवी सब प्राणियोंमें लज्जारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४४-४६ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें शान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४७-४९ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें श्रद्धारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५०-५२ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें कान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५३-५५ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें लक्ष्मीरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५६-५८ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें वृत्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५९-६१ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें स्मृतिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६२-६४ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें दयारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६५-६७ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें तुष्टिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६८-७० ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें मातारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति * २०७

है॥७१—७३॥ जो देवी सब प्राणियोंमें भ्रान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥७४—७६॥ जो जीवोंके इन्द्रियवर्गकी अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियोंमें सदा व्याप्त रहनेवाली हैं, उन व्याप्तिदेवीको बारंबार नमस्कार है॥७७॥ जो देवी चैतन्यरूपसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥७८—८०॥ पूर्वकालमें अपने अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे देवताओंने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्रने बहुत दिनोंतक जिनका सेवन किया, वह कल्याणकी साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियोंका नाश कर डाले॥८१॥ उद्दण्ड दैत्योंसे सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरीको इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्तिसे विनम्र पुरुषोंद्वारा स्मरण की जानेपर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियोंका नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमारा संकट दूर करें॥८२॥

ऋषिरुवाच ॥८३॥

एवं स्तवाभियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ॥८४॥
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा ॥८५॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥८६॥
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥८८॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥८९॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥९०॥
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥९१॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥९२॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥९३॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥९४॥
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम् ॥९५॥
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम् ॥९६॥
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत्प्रजापतेः ॥९७॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे ॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥९९॥
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ॥१००॥

ऋषि कहते हैं— ॥८३॥ राजन्! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेके लिये वहाँ आयीं ॥८४॥ उन सुन्दर भौंहोंवाली भगवतीने देवताओंसे पूछा—‘आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?’ तब उन्हींके शरीरकोशसे प्रकट हुई शिवादेवी बोलीं— ॥८५॥ ‘शुम्भदैत्यसे तिरस्कृत और युद्धमें निशुम्भसे पराजित हो यहाँ एकत्रित हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति


१. पा०—समतैः। २. पा०—कोषा। ३. पा०—कौषिकी। ४. पा०—र्द्धापि।

२०८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • कर रहे हैं' ॥८६॥ पार्वतीजीके शरीरकोशसे अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त लोकोंमें 'कौशिकी' कही जाती हैं ॥ ८७ ॥ कौशिकीके प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली कालिकादेवीके नामसे विख्यात हुई ॥८८॥ तदनन्तर शुम्भ निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करनेवाली अम्बिकादेवीको देखा ॥८९॥ फिर वे शुम्भके पास जाकर बोले-'महाराज! एक अत्यन्त मनोहर स्त्री है, जो अपनी दिव्य कान्तिसे हिमालयको प्रकाशित कर रही है ॥ ९० ॥ वैसा उत्तम रूप कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर ! पता लगाइये, वह देवी कौन है और उसे पकड़ लीजिये ॥ ९१ ॥ स्त्रियोंमें तो वह रत्न है, उसका प्रत्येक अङ्ग बहुत ही सुन्दर है तथा वह अपने श्रीअङ्गोंकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैला रही है। दैत्यराज ! अभी वह हिमालयपर ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हैं ॥९२॥ प्रभो ! तीनों लोकोंमें मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें शोभा पाते हैं ॥९३॥ हाथियोंमें रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजातका वृक्ष और यह उच्चैःश्रवा घोड़ा-यह सब आपने इन्द्रसे ले लिया है ॥ ९४ ॥ हंसोंसे जुता हुआ यह विमान भी आपके आँगनमें शोभा पाता है। यह रत्नभूत अद्भुत विमान, जो पहले ब्रह्माजीके पास था, अब आपके यहाँ लाया गया है ॥९५ ॥ यह महापद्म नामक निधि आप कुबेरसे छीन लाये हैं। समुद्रने भी आपको किञ्जल्किनी नामकी माला भेंट की है, जो केसरोंसे सुशोभित है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं ॥ ९६ ॥ सुवर्णकी वर्षा करनेवाला वरुणका छत्र भी आपके घरमें शोभा पाता है तथा यह श्रेष्ठ रथ, जो पहले प्रजापतिके अधिकारमें था, अब आपके पास मौजूद है ॥९७॥ दैत्येश्वर ! मृत्युकी उत्क्रान्तिदा नामवाली शक्ति भी आपने छीन ली है तथा वरुणका पाश और समुद्रमें होनेवाले सब प्रकारके रत्न आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें हैं। अग्निने भी स्वतः शुद्ध किये हुए दो वस्त्र आपकी सेवामें अर्पित किये हैं ॥९८-९९ ॥ दैत्यराज ! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिये हैं। फिर जो यह स्त्रियोंमें रत्नरूप कल्याणमयी देवी है, इसे आप क्यों नहीं अपने अधिकारमें कर लेते ?॥ १००॥ ऋषिरुवाच ॥ १०१ ॥ निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः । प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम् ॥ १०२ ॥ इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम । यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्य त्वया लघु ॥ १०३॥ स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने । सां देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ १०४॥ ऋषि कहते हैं- ॥१०१॥ चण्ड-मुण्डका यह वचन सुनकर शुम्भने महादैत्य सुग्रीवको दूत बनाकर देवीके पास भेजा और कहा- 'तुम मेरी आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहाँ आ जाय' ॥ १०२-१०३ ॥ वह दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें, जहाँ देवी मौजूद थीं, गया और मधुर वाणीमें कोमल वचन बोला ॥ १०४॥ दूत उवाच ॥ १०५ ॥ देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः। दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥१०६ ॥ अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु । निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥ १०७ ॥ १. पा०-इसके बाद कहीं-कहीं 'शुम्भ उवाच' इतना अधिक पाठ है। २. पा०-तां च देवीं ततः।

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति * २०१ मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः । यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥ १०८ ॥ त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः । तथैव गजरत्नं १ च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम् ॥ १०९ ॥ क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः । उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥ ११० ॥ यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च । रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ १११ ॥ स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् । सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥ ११२ ॥ मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् । भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ ११३ ॥ परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् । एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ ११४ ॥ दूत बोला- ॥१०५॥ देवि ! दैत्यराज शुम्भ थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं ॥१११॥ देवि ! इस समय तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं। मैं उन्हींका हमलोग तुम्हें संसारकी स्त्रियोंमें रत्न मानते हैं, भेजा हुआ दूत हूँ और यहाँ तुम्हारे ही पास आया अतः तुम हमारे पास आ जाओ; क्योंकि रत्नोंका हूँ ॥ १०६ ॥ उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक उपभोग करनेवाले हम ही हैं ॥११२॥ चञ्चल स्वरसे मानते हैं। कोई उसका उल्लङ्घन नहीं कर कटाक्षोंवाली सुन्दरी ! तुम मेरी या मेरे भाई सकता। वे सम्पूर्ण देवताओंको परास्त कर चुके महापराक्रमी निशुम्भकी सेवामें आ जाओ; क्योंकि हैं। उन्होंने तुम्हारे लिये जो संदेश दिया है, उसे तुम रत्नस्वरूपा हो ॥११३ ॥ मेरा वरण करनेसे सुनो ॥ १०७ ॥ 'सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकारमें तुम्हें तुलनारहित महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी। है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। अपनी बुद्धिसे यह विचार कर तुम मेरी पत्नी बन सम्पूर्ण यज्ञोंके भागोंको मैं ही पृथक्-पृथक् जाओ' ॥११४ ॥ भोगता हूँ ॥ १०८ ॥ तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न ऋषिरुवाच ॥ ११५ ॥ हैं, वे सब मेरे अधिकारमें हैं। देवराज इन्द्रका इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ । वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है, मैंने दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥ ११६ ॥ छीन लिया है ॥ १०९ ॥ क्षीरसागरका मन्थन करनेसे ऋषि कहते हैं- ॥ ११५ ॥ दूतके यों जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे कहनेपर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी, जो देवताओंने मेरे पैरोंपर पड़कर समर्पित किया इस जगत्को धारण करती हैं, मन-ही-मन है ॥११० ॥ सुन्दरी ! उनके सिवा और भी जितने गम्भीर भावसे मुसकरायीं और इस प्रकार रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गन्धर्वों और नागोंके पास बोलीं- ॥ ११६ ॥ १. पा०-गजरत्नं हत्वा । २. पा०-हृदं

२९० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


देव्युवाच ॥ ११७॥सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ॥ १२६ ॥
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ॥ ११८ ॥दूत बोला— ॥ १२२ ॥ देवि! तुम घमंडमें
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।भरी हो, मेरे सामने ऐसी बातें न करो। तीनों
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा ॥ ११९ ॥लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो शुम्भ-
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति ।निशुम्भके सामने खड़ा हो सके ॥ १२३॥ देवि।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥ १२० ॥अन्य दैत्योंके सामने भी सारे देवता युद्धमें
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।नहीं ठहर सकते, फिर तुम अकेली स्त्री
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु ॥ १२१ ॥होकर कैसे ठहर सकती हो ॥ १२४ ॥ जिन
देवीने कहा— ॥ ११७॥ दूत ! तुमने सत्यशुम्भ आदि दैत्योंके सामने इन्द्र आदि देवता
कहा है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। शुम्भभी युद्धमें खड़े नहीं हुए, उनके सामने तुम
तीनों लोकोंका स्वामी है और निशुम्भ भी उसीकेस्त्री होकर कैसे जाओगी ॥ १२५ ॥ इसलिये
समान पराक्रमी है ॥ ११८ ॥ किंतु इस विषयमें मैंनेतुम मेरे ही कहनेसे शुम्भ-निशुम्भके पास
जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसे मिथ्या कैसे करूँ। मैंनेचली चलो। ऐसा करनेसे तुम्हारे गौरवकी रक्षा
अपनी अल्पबुद्धिके कारण पहलेसे जो प्रतिज्ञाहोगी; अन्यथा जब वे केश पकड़कर घसीटेंगे,
कर रखी है, उसको सुनो ॥ ११९ ॥ 'जो मुझेतब तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा खोकर जाना
संग्राममें जीत लेगा, जो मेरे अभिमानको चूर्ण करपड़ेगा ॥ १२६ ॥
देगा तथा संसारमें जो मेरे समान बलवान् होगा,देव्युवाच ॥ १२७॥
वही मेरा स्वामी होगा' ॥ १२० ॥ इसलिये शुम्भएवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान् ।
अथवा महादैत्य निशुम्भ स्वयं ही यहाँ पधारें औरकिं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ॥ १२८ ॥
मुझे जीतकर शीघ्र ही मेरा पाणिग्रहण कर लें,स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
इसमें विलम्बकी क्या आवश्यकता है ॥ १२१ ॥तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत्॥ ॐ ॥ १२९ ॥
दूत उवाच ॥ १२२ ॥देवीने कहा— ॥ १२७ ॥ तुम्हारा कहना ठीक
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।है, शुम्भ बलवान् हैं और निशुम्भ भी बड़े
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥ १२३ ॥पराक्रमी हैं; किंतु क्या करूँ। मैंने पहले बिना
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।सोचे-समझे प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १२८ ॥ अतः अब
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥ १२४॥तुम जाओ; मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे ।दैत्यराजसे आदरपूर्वक कहना। फिर वे जो उचित
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम् ॥ १२५ ॥जान पड़े, करें ॥ १२९ ॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ उवाच ९, त्रिपन्मन्त्राः ६६, श्लोकाः ५४, एवम् १२९, एवमादितः ॥ ३८८ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'देवी-दूत-संवाद' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥


१. पाठ०—यत्।

• धूम्रलोचन-वध • २११


षष्ठोऽध्यायः

धूम्रलोचन-वध

ध्यान
( ॐ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली-
भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूड़ां परां
सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥
मैं सर्वज्ञेश्वर भैरवके अङ्कमें निवास करनेवाली परमोत्कृष्ट पद्मावती देवीका चिन्तन करता हूँ। वे नागराजके आसनपर बैठी हैं, नागोंके फणोंमें सुशोभित होनेवाली मणियोंकी विशाल मालासे उनकी देहलता उद्भासित हो रही है। सूर्यके समान उनका तेज है, तीन नेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे हाथोंमें माला, कुम्भ, कपाल और कमल लिये हुए हैं तथा उनके मस्तकमें अर्धचन्द्रका मुकुट सुशोभित है।)

पकड़कर घसीटते हुए जबरदस्ती यहाँ ले आओ॥ ४॥ उसकी रक्षा करनेके लिये यदि कोई दूसरा खड़ा हो तो वह देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व—कोई भी क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालना'॥ ५॥

ऋषिरुवाच॥ १॥
'ॐ इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः।
समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्॥ २॥
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः।
सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्॥ ३॥
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः।
तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्॥ ४॥
तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः।
स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥ ५॥

ऋषि कहते हैं—॥ १॥ देवीका यह कथन सुनकर दूतको बड़ा अमर्ष हुआ और उसने दैत्यराजके पास जाकर सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया॥ २॥ दूतके उस वचनको सुनकर दैत्यराज कुपित हो उठा और दैत्यसेनापति धूम्रलोचनसे बोला—॥ ३॥ 'धूम्रलोचन ! तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और उस दुष्टाको केश

ऋषिरुवाच ॥ ६॥
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः।
वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥ ७॥
स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्।
जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः॥ ८॥
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति।
ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्॥ ९॥

ऋषि कहते हैं—॥ ६॥ शुम्भके इस प्रकार आज्ञा देनेपर वह धूम्रलोचन दैत्य साठ हजार असुरोंकी सेनाको साथ लेकर वहाँसे तुरंत चल

२१२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * दिया॥७॥ वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली उन देवीको देखा और ललकारकर कहा- 'अरी! तू शुम्भ-निशुम्भके पास चल। यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा' ॥ ८-९ ॥ दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः। बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥ १० ॥ देवी बोलीं - ॥ १० ॥ तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशामें यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ ॥ ११॥ ऋषिरुवाच ॥ १२ ॥ इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥ १३ ॥ अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिके। ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥ १४ ॥ ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥ १५ ॥ कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान् ॥ १६ ॥ केषांचिपाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥ १७ ॥ विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥ १८ ॥ क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥ १९ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ १२ ॥ देवीके यों कहनेपर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने 'हुं' शब्दके उच्चारणमात्रसे उसको भस्म कर दिया॥ १३॥ फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्योंकी विशाल सेना और अम्बिकाने एक-दूसरेपर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ १४॥ इतनेमें ही देवीका वाहन सिंह क्रोधमें भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें कूद पड़ा ॥ १५ ॥ उसने कुछ दैत्योंको पंजोंकी मारसे, कितनोंको अपने जबड़ोंसे और कितने ही महादैत्योंको पटककर ओठकी दाढ़ोंसे घायल करके मार डाला ॥ १६ ॥ उस सिंहने अपने नखोंसे कितनोंके पेट फाड़ डाले और थप्पड़ मारकर कितनोंके सिर धड़से अलग कर दिये ॥ १७ ॥ कितनोंकी भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दनके बाल १. पा०-तथाम्बिकाम्। २. पा०-आक्रम्या । ३. पा०-चरणेनान्यान् । ४. यहाँ तीन तरहके पाठान्तर मिलते हैं- संजघान, निजघान, जघान सु महा० । ५. पा०-केशरी। बंगला प्रतिमें सब जगह 'केसरी' और 'केसर' शब्दमें तालव्य 'श' का प्रयोग है।

  • चण्ड और मुण्डका वध * २१३

हिलाते हुए उसने दूसरे दैत्योंके पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया॥ १८॥ अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए देवीके वाहन उस महाबली सिंहने क्षणभरमें ही असुरोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला ॥ १९ ॥
श्रुत्वा तमुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्।
बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः ॥ २० ॥
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः ।
आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥ २१ ॥
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ।
तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु ॥ २२ ॥
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि ।
तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विन्निहन्यताम् ॥ २३ ॥
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते।
शीघ्रमागभ्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥ ॐ ॥ २४ ॥

शुम्भने जब सुना कि देवीने धूम्रलोचन असुरको मार डाला तथा उसके सिंहने सारी सेनाका सफाया कर डाला, तब उस दैत्यराजको बड़ा क्रोध हुआ। उसका ओठ काँपने लगा। उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्योंको आज्ञा दी—॥ २०-२१ ॥ 'हे चण्ड ! और हे मुण्ड ! तुमलोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ और उस देवीके झोंटे पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लानेमें तुम्हें संदेह हो तो युद्धमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेनाका प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना ॥ २२-२३ ॥ उस दुष्टाकी हत्या होने तथा सिंहके भी मारे जानेपर उस अम्बिकाको बाँधकर साथ ले शीघ्र ही लौट आना ॥ २४ ॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
उवाच ४, श्लोकाः २०, एवम् २४, एवमादितः ॥ ४१२ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें
'धूम्रलोचन-वध' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः

चण्ड और मुण्डका वध

ध्यान
( ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम् ।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम् ॥
मैं मातङ्गी देवीका ध्यान करता हूँ। वे रत्नमय सिंहासनपर बैठकर पढ़ते हुए तोतेका मधुर शब्द सुन रही हैं। उनके शरीरका वर्ण श्याम है। वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं। कह्लार-पुष्पोंकी माला धारण किये वीणा बजाती हैं। उनके अङ्गमें कसी हुई चोली शोभा पा रही है। लाल रंगकी साड़ी पहने हाथमें शङ्खमय पात्र लिये हुए हैं। उनके वदनपर मधुका हल्का-हल्का नशा जान पड़ता है और ललाटमें बेंदी शोभा दे रही है।)

ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
'ॐ' आज्ञाप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः ।
चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ॥ २ ॥
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्वहासां व्यवस्थिताम् ।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने ॥ ३ ॥
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः ।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः ॥ ४ ॥

२९४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति । कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ॥ ५ ॥ भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्। काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥ ६ ॥ विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥ ७ ॥ अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्ना रक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥ ८ ॥ सा वेगेनाभिपत्तिता घातयन्ती महासुरान् । सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम् ॥ ९ ॥ पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान् । समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥ १०॥ तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह। निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम् ॥११॥ एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्। पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोधयत् ॥ १२ ॥ तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः । मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥ १३ ॥ बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् । ममर्दामक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥ १४ ॥ असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः। जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा ॥ १५ ॥ क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम् । दृष्ट्वाचण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥ १६ ॥ शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः। छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥१७॥ तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्। बभुर्यथार्कबिम्बानि सुवहूनि घनोदरम् ॥ १८ ॥ ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी । काली करालवक्त्रान्तर्दुदर्शदशनोज्ज्वला ॥ १९ ॥ उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत । गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥ २० ॥ ऋषि कहते हैं- ॥१॥ तदनन्तर शुम्भकी आज्ञा पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरङ्गिणी सेनाके साथ अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो चल दिये ॥ २ ॥ फिर गिरिराज हिमालयके सुवर्णमय ऊँचे शिखरपर पहुँचकर उन्होंने सिंहपर बैठी हुई देवीको देखा। वे मन्द-मन्द मुसकरा रही थीं ॥ ३ ॥ उन्हें देखकर दैत्यलोग तत्परतासे पकड़नेका उद्योग करने लगे। किसीने धनुष तान लिया, किसीने तलवार संभाली और कुछ लोग देवीके पास आकर खड़े हो गये ॥४॥ तब अम्बिकाने उन शत्रुओंके प्रति बड़ा क्रोध किया। उस समय क्रोधके कारण उनका मुख काला पड़ गया ॥ ५ ॥ ललाटमें भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहाँसे तुरंत विकरालमुखी काली प्रकट हुई, जो तलवार और पाश लिये हुए थीं ॥६॥ विचित्र खट्वाङ्ग धारण किये और चीतेके चर्मकी साड़ी पहने नर- मुण्डोंकी मालासे विभूषित थीं। उनके शरीरका मांस सूख गया था, केवल हड्डियोंका ढाँचा था, जिससे वे अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थीं ॥७॥ उनका मुख बहुत विशाल था, जीभ लपलपानेके कारण वे और भी डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आँखें भीतरको धँसी हुई और लाल थीं, वे अपनी भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा रही थीं ॥८॥ बड़े-बड़े दैत्योंका वध करती हुई वे कालिकादेवी बड़े वेगसे दैत्योंकी उस सेनापर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं ॥९॥ वे पार्श्वक्षकों, अङ्कुशधारी महावतों, योद्धाओं और घण्टासहित कितने ही हाथियोंको १. पा०-गसी०। २. पा०-यत्यति । ३. पा०-ता णे । ४. शान्तनवी टीकाकारने यहाँ एक श्लोक अधिक पाठ माना है, जो इस प्रकार है- 'छिन्रे शिरसि दैत्येन्द्रश्चक्रे नादं सुभैरवम् । वेग नादेन महता त्रस्तितं भुवनत्रयम् ।'

• चण्ड और मुण्डका वध • २९५ एक ही हाथसे पकड़कर मुँहमें डाल लेती थीं ॥१०॥ इसी प्रकार घोड़े, रथ और सारथिके साथ रथी सैनिकोंको मुँहमें डालकर वे उन्हें बड़े भयानक रूपसे चबा डालती थीं ॥ ११॥ किसीके बाल पकड़ लेतीं, किसीका गला दबा देतीं, किसीको पैरोंसे कुचल डालतीं और किसीको छातीके धक्केसे गिराकर मार डालती थीं ॥ १२ ॥ वे असुरोंके छोड़े हुए बड़े बड़े अस्त्र-शस्त्र मुँहमें पकड़ लेतीं और रोषमें भरकर उनको दाँतोंसे पीस डालतीं ॥ १३ ॥ कालीने बलवान् एवं दुरात्मा दैत्योंकी वह सारी सेना रौंद डाली, खा डाली भयङ्कर बाणोंकी वर्षासे तथा हजारों बार चलाये हुए चक्रोंसे उन भयानक नेत्रोंवाली देवीको आच्छादित कर दिया ॥ १७॥ वे अनेकों चक्र देवीके मुखमें समाते हुए ऐसे जान पड़े, मानो सूर्यके बहुतेरे मण्डल बादलोंके उदरमें प्रवेश कर रहे हों ॥१८॥ तब भयङ्कर गर्जना करनेवाली कालीने अत्यन्त रोषमें भरकर विकट अट्टहास किया। उस समय उनके विकराल वदनके भीतर कठिनतासे देखे जा सकनेवाले दाँतोंकी प्रभासे वे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थीं ॥ १९ ॥ देवीने बहुत बड़ी तलवार हाथमें ले 'हुं' का उच्चारण करके चण्डपर धावा किया और उसके केश पकड़कर उसी तलवारसे उसका मस्तक काट डाला ॥ २० ॥ अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥ २१ ॥ हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥ २२ ॥ शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च । प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥ २३ ॥ और कितनोंको मार भगाया ॥ १४ ॥ कोई तलवारके घाट उतारे गये, कोई खट्वाङ्गसे पीटे गये और कितने ही असुर दाँतोंके अग्रभागसे कुचले जाकर मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥ इस प्रकार देवीने असुरोंकी उस सारी सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। यह देख चण्ड उस अत्यन्त भयानक कालीदेवीकी ओर दौड़ा ॥ १६ ॥ तथा महादैत्य मुण्डने भी अत्यन्त

२१६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू। युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥ २४॥ चण्डको मारा गया देख मुण्ड भी देवीकी ओर दौड़ा। तब देवीने रोषमें भरकर उसे भी तलवारसे घायल करके धरतीपर सुला दिया ॥ २१ ॥ महापराक्रमी चण्ड और मुण्डको मारा गया देख मरनेसे बची हुई बाकी सेना भयसे व्याकुल हो चारों ओर भाग गयी ॥ २२ ॥ तदनन्तर कालीने चण्ड और मुण्डका मस्तक हाथमें ले चण्डिकाके पास जाकर प्रचण्ड अट्टहास करते हुए कहा- ॥ २३ ॥ 'देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक इन दो महापशुओंको तुम्हें भेंट किया है। अब युद्धयज्ञमें तुम शुम्भ और निशुम्भका स्वयं ही वध करना' ॥ २४ ॥ ऋषिरुवाच ॥ २५ ॥ तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ। उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥ २६ ॥ यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ ॐ ॥ २७ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ २५ ॥ वहाँ लाये हुए उन चण्ड मुण्ड नामक महादैत्योंको देखकर कल्याणमयी चण्डीने कालीसे मधुर वाणीमें कहा- ॥ २६ ॥ देवि ! तुम चण्ड और मुण्डको लेकर मेरे पास आयी हो, इसलिये संसारमें चामुण्डाके नामसे तुम्हारी ख्याति होगी ॥ २७ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ उवाच १, श्लोकाः १५, एवम् २७, एवमादितः ॥ ४३१ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'चण्ड-मुण्ड-वध' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

रक्तबीज-वध१९७

अष्टमोऽध्यायः

रक्तबीज-वध

ध्यानएतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्।
(‘ॐ' अरुणां करुणातरङ्गित्ताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्।भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥ १२ ॥
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ॥ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।
मैं अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणोंसे आवृत भवानीका ध्यान करता हूँ। उनके शरीरका रंग लाल है। नेत्रोंमें करुणा लहरा रही है तथा हाथोंमें पाश, अङ्कुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।)शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥ १३ ॥
ऋषिरुवाच ॥ १ ॥यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥ १४ ॥
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः।
‘ॐ' चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते।आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥ १५ ॥
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥ २ ॥माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी।
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापनान्।महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥ १६ ॥
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥ ३ ॥कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना।
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥ १७ ॥
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥ ४ ॥तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता।
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै।शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥ १८ ॥
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥ ५ ॥यज्ञवाराहमतुलं³ रूपं या बिभ्रतो⁴ हरेः।
कालका दौर्हदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः।शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥ १९ ॥
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥ ६ ॥नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः ।प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥ २० ॥
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥ ७ ॥वज्रहस्ता तथैवेन्द्री गजराजोपरि स्थिता।
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥ २१ ॥
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥ ८ ॥ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ चण्ड और मुण्ड
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप।नामक दैत्योंके मारे जाने तथा बहुत-सी सेनाका
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका² चोपबृंहयत् ॥ ९ ॥संहार हो जानेपर दैत्योंके राजा प्रतापी शुम्भके
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा।मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्योंकी
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥ १० ॥सम्पूर्ण सेनाको युद्धके लिये कूच करनेकी आज्ञा
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्।दी ॥ २-३ ॥ वह बोला—'आज उदायुध नामके
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥ ११ ॥छियासी दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओंके साथ
युद्धके लिये प्रस्थान करें। कम्बु नामवाले दैत्योंके

१. पा०—स च। २. पा०—तन्नादानम्बिका। ३. पा०—जज्ञे वाराहं। ४. पा०—तौ।
[ 539 ] सं० पा० पृ०—८

२१८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनीसे घिरे हुए यात्रा करें ॥ ४ ॥ पचास कोटिवीर्य-कुलके और सौ धौम्र-कुलके असुर सेनापति मेरी आज्ञासे सेनसहित कूच करें ॥ ५ ॥ कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्धके लिये तैयार हों मेरी आज्ञासे तुरंत प्रस्थान करें' ॥ ६॥ भयानक शासन करनेवाला असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रों बड़ी- बड़ी सेनाओंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥ उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिकाने अपने धनुषकी टंकारसे पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गूँजा दिया ॥८॥ राजन् ! तदनन्तर देवीके सिंहने भी बड़े जोर-जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया, फिर अम्बिकाने घंटेके शब्दसे उस ध्वनिको और भी बढ़ा दिया ॥ ९ ॥ धनुषकी टंकार, सिंहकी दहाड़ और घंटेकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। उस भयंकर शब्दसे कालीने अपने विकराल मुखको और भी बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुईं ॥ १०॥ उस तुमुल नादको सुनकर दैत्योंकी सेनाओंने चारों ओरसे आकर चण्डिकादेवी, सिंह तथा कालीदेवीको क्रोधपूर्वक घेर लिया ॥ ११ ॥ राजन् ! इसी बीचमें असुरोंके विनाश तथा देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवोंकी शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम और बलसे सम्पन्न थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर उन्हींके रूपमें चण्डिकादेवीके पास गयीं ॥ १२-१३ ॥ जिस देवताका जैसा रूप, जैसी वेश-भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही साधनोंसे सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरोंसे युद्ध करनेके लिये आयी ॥ १४ ॥ सबसे पहले हंसयुक्त विमानपर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलुसे सुशोभित ब्रह्माजीकी शक्ति उपस्थित हुई, जिसे ब्रह्माणी कहते हैं ॥१५॥ महादेवजीकी शक्ति वृषभपर आरूढ़ हो हाथोंमें श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानागका कङ्कण पहने, मस्तकमें चन्द्ररेखासे विभूषित हो वहाँ आ पहुँची ॥ १६ ॥ कार्तिकेयजीकी शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हींका रूप धारण किये श्रेष्ठ मयूरपर आरूढ़ हो हाथमें शक्ति लिये दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये आयीं ॥ १७ ॥ इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति गरुड़पर विराजमान हो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष तथा खड्ग हाथमें लिये वहाँ आयी ॥ १८ ॥ अनुपम यज्ञवाराहका रूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी जो शक्ति है, वह भी वाराह शरीर धारण करके वहाँ उपस्थित हुई ॥१९॥ नारसिंही शक्ति भी नृसिंहके समान शरीर धारण करके वहाँ आयी। उसकी गर्दनके बालोंके झटकेसे आकाशके तारे बिखरे पड़ते थे ॥ २० ॥ इसी प्रकार इन्द्रकी शक्ति वज्र हाथमें लिये गजराज ऐरावतपर बैठकर आयी। उसके भी सहस्र नेत्र थे। इन्द्रका जैसा रूप है, वैसा ही उसका भी था ॥ २१ ॥

  • रक्तबीज-वध * २१९ ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः। चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः । हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽऽह चण्डिकाम् ॥२२॥ पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥ ३८ ॥ ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा। तदनन्तर उन देव-शक्तियोंसे घिरे हुए महादेवजीने चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥ २३॥ चण्डिकासे कहा-'मेरी प्रसन्नताके लिये तुम सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता। शीघ्र ही इन असुरोंका संहार करो' ॥ २२॥ तब दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्व शुम्भनिशुम्भयोः ॥ २४॥ देवीके शरीरसे अत्यन्त भयानक और परम उग्र ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ । चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों गीदड़ियोंकी ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥ २५॥ भाँति आवाज करनेवाली थी ॥ २३॥ उस अपराजिता त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः । देवीने धूमिल जटावाले महादेवजीसे कहा- 'भगवन्! यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥ २६॥ आप शुम्भ-निशुम्भके पास दूत बनकर जाइये ॥ २४ ॥ बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः । और उन अत्यन्त गर्वीले दानव शुम्भ एवं तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥ २७॥ निशुम्भ- दोनोंसे कहिये। साथ ही उनके अतिरिक्त यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयंम्। जो दानव युद्धके लिये वहाँ उपस्थित हों, शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥ २८ ॥ तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः। अमर्षपूरिता जग्मुर्यत्र' कात्यायनी स्थिता ॥ २९॥ ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः। ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥ ३० ॥ सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् । चिच्छेद लीलयाऽऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥ ३१ ॥ तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् । खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा ॥ ३२॥ कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः । ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥ ३३॥ माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी। दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपनाव ॥ ३४॥ ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः । पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥ ३५ ॥ तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः । उनको भी यह संदेश दीजिये ॥ २५॥ 'दैत्यो ! यदि वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥ ३६ ॥ तुम जीवित रहना चाहते हो तो पातालको लौट नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् । जाओ। इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य मिल जाय और नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णादिगम्बरा ॥ ३७॥ देवता यज्ञभागका उपभोग करें ॥ २६ ॥ यदि बलके १. पा.-जग्मुर्यतः

२१०

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * घमंडमें आकर तुम युद्धकी अभिलाषा रखते हो तो आओ। मेरी शिवाएँ (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे मांससे तृप्त हों' ॥२७॥ चूँकि उस देवीने भगवान् शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये वह 'शिवदूती' के नामसे संसारमें विख्यात हुई ॥ २८ ॥ वे महादैत्य भी भगवान् शिवके मुँहसे देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगे ॥ ३० ॥ तब देवीने भी खेल-खेलमें ही धनुषकी टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े- बड़े बाणोंद्वारा दैत्योंके चलाये हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसोंको काट डाला ॥ ३१ ॥ फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे विदीर्ण करने लगी और खट्वाङ्गसे उनका कचूमर निकालती हुई रणभूमिमें विचरने लगी ॥ ३२ ॥ ब्रह्माणी भी जिस जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी ओर अपने कमण्डलुका जल छिड़ककर शत्रुओंके ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥ ३३ ॥ माहेश्वरीने त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी शक्तिने शक्तिसे दैत्योंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥ इन्द्रशक्तिने वज्रप्रहारसे विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य- दानव रक्तकी धारा बहाते हुए पृथ्वीपर सो गये ॥ ३५ ॥ वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य चक्रकी चोटसे विदीर्ण हो गये ॥ ३६ ॥ नारसिंही भी दूसरे-दूसरे महादैत्योंको अपने नखोंसे विदीर्ण करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको गुँजाती हुई युद्ध-क्षेत्रमें विचरने लगी ॥ ३७ ॥ कितने ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अट्टहाससे अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें शिवदूतीने उस समय अपना ग्रास बना लिया ॥ ३८ ॥ इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्। दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३९ ॥ पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्। योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥ ४० ॥ रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः। समुत्पतति मेदिन्यां१ तत्प्रमाणस्तदासुरः ॥ ४१ ॥ युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः। ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥ ४२ ॥ कुलिशेनाहतस्याशु बहु२ सुस्राव शोणितम्। समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ ४३ ॥ यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः। तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥ ४४ ॥ ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः। समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥ ४५ ॥ १. पा०—न्यास्तो। २. पा०—तस्य।

७. सूर्यवंश, नाभाग, मरुत्त चरित्र व उपसंहार

  • रक्तबीज-वध * २२१ पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा। ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥ वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह। गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥ वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः। सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥ शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना। माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥ ४९ ॥ स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाह्नत् पृथक्। मातृः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥ तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि। पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥ तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्। व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५२॥ तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा। उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं' वदनं कुरु ॥ ५३ ॥ मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् । रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥५४॥ भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् । एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥ भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे । इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूसेनाभिजघान तम् ॥५६॥ मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्। ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥ न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि । तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥ यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति । मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः । तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ॥५९॥ देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः। जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ॥६०॥ स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ५। नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ॥६१॥ ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥ तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥ॐ॥ ६३ ॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए मातृगणोंको नाना प्रकारके उपायोंसे बड़े-बड़े असुरोंका मर्दन करते देख दैत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥३९॥ मातृगणोंसे पीड़ित दैत्योंको युद्धसे भागते देख रक्तबीज नामका महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्धके लिये आया ॥४०॥ उसके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वीपर पैदा हो जाता ॥४१॥ महासुर रक्तबीज हाथमें गदा लेकर इन्द्रशक्तिके साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्रीने अपने वज्रसे रक्तबीजको मारा ॥४२॥ वज्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे बहुत सा रक्त चूने लगा और उससे उसीके समान रूप तथा पराक्रमवाले योद्धा उत्पन्न होने लगे ॥४३॥ उसके शरीरसे रक्तकी जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्, बलवान् तथा पराक्रमी थे ॥४४॥ ये रक्तसे उत्पन्न होनेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयङ्कर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥४५॥ पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका मस्तक घायल हुआ तो रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥४६॥ वैष्णवीने युद्धमें रक्तबीजपर चक्रका प्रहार किया तथा ऐन्द्रीने उस दैत्य-सेनापतिको गदासे चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥ वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो उसीके बराबर आकारवाले सहस्रों महादैत्य प्रकट १. पा०-विस्तरं। २. पा०-योगिना। ३. इसके बाद कहीं कहीं 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है। ४. पा०- चक्रेण । ५. पा०-शस्त्रैरगणितैर्हतः ।

२२२

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया ॥४८॥ कौमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥ ४९ ॥ क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीजने भी गदासे सभी मातृ-शक्तियोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥५०॥ शक्ति और शूल आदिसे अनेक बार घायल होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए ॥ ५१ ॥ इस प्रकार उस महादैत्यके रक्तसे प्रकट हुए असुरोंद्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५२ ॥ देवताओंको उदास देख चण्डिकाने कालीसे शीघ्रतापूर्वक कहा- 'चामुण्डे ! तुम अपना मुख और भी फैलाओ ॥ ५३ ॥ तथा मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ ॥ ५४॥ इस प्रकार रक्तसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती रहो। ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो जानेपर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा ॥५५॥ उन भयङ्कर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी तो दूसरे नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे।' कालीसे यों कहकर चण्डिका देवीने शूलसे रक्तबीजको मारा ॥५६ ॥ और कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया ॥ ५७ ॥ किंतु उस गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं पहुँचायी। रक्तबीजके घायल शरीरसे बहुत-सा रक्त गिरा ॥ ५८ ॥ किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डा ने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया ॥ ५९ ॥ तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डा ने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला ॥ ६० ॥ राजन् ! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर ! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥ ६१-६२ ॥ और मातृगण उन असुरोंके रक्तपानके मदसे उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगा ॥ ६३ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ उवाच १, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ६१, एवम् ६३, एवमादितः ॥५०२॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'रक्तबीज-वध' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥