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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

२१२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * दिया॥७॥ वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली उन देवीको देखा और ललकारकर कहा- 'अरी! तू शुम्भ-निशुम्भके पास चल। यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा' ॥ ८-९ ॥ दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः। बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥ १० ॥ देवी बोलीं - ॥ १० ॥ तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशामें यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ ॥ ११॥ ऋषिरुवाच ॥ १२ ॥ इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥ १३ ॥ अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिके। ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥ १४ ॥ ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥ १५ ॥ कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान् ॥ १६ ॥ केषांचिपाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥ १७ ॥ विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥ १८ ॥ क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥ १९ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ १२ ॥ देवीके यों कहनेपर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने 'हुं' शब्दके उच्चारणमात्रसे उसको भस्म कर दिया॥ १३॥ फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्योंकी विशाल सेना और अम्बिकाने एक-दूसरेपर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ १४॥ इतनेमें ही देवीका वाहन सिंह क्रोधमें भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें कूद पड़ा ॥ १५ ॥ उसने कुछ दैत्योंको पंजोंकी मारसे, कितनोंको अपने जबड़ोंसे और कितने ही महादैत्योंको पटककर ओठकी दाढ़ोंसे घायल करके मार डाला ॥ १६ ॥ उस सिंहने अपने नखोंसे कितनोंके पेट फाड़ डाले और थप्पड़ मारकर कितनोंके सिर धड़से अलग कर दिये ॥ १७ ॥ कितनोंकी भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दनके बाल १. पा०-तथाम्बिकाम्। २. पा०-आक्रम्या । ३. पा०-चरणेनान्यान् । ४. यहाँ तीन तरहके पाठान्तर मिलते हैं- संजघान, निजघान, जघान सु महा० । ५. पा०-केशरी। बंगला प्रतिमें सब जगह 'केसरी' और 'केसर' शब्दमें तालव्य 'श' का प्रयोग है।

  • चण्ड और मुण्डका वध * २१३

हिलाते हुए उसने दूसरे दैत्योंके पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया॥ १८॥ अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए देवीके वाहन उस महाबली सिंहने क्षणभरमें ही असुरोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला ॥ १९ ॥
श्रुत्वा तमुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्।
बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः ॥ २० ॥
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः ।
आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥ २१ ॥
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ।
तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु ॥ २२ ॥
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि ।
तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विन्निहन्यताम् ॥ २३ ॥
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते।
शीघ्रमागभ्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥ ॐ ॥ २४ ॥

शुम्भने जब सुना कि देवीने धूम्रलोचन असुरको मार डाला तथा उसके सिंहने सारी सेनाका सफाया कर डाला, तब उस दैत्यराजको बड़ा क्रोध हुआ। उसका ओठ काँपने लगा। उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्योंको आज्ञा दी—॥ २०-२१ ॥ 'हे चण्ड ! और हे मुण्ड ! तुमलोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ और उस देवीके झोंटे पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लानेमें तुम्हें संदेह हो तो युद्धमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेनाका प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना ॥ २२-२३ ॥ उस दुष्टाकी हत्या होने तथा सिंहके भी मारे जानेपर उस अम्बिकाको बाँधकर साथ ले शीघ्र ही लौट आना ॥ २४ ॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
उवाच ४, श्लोकाः २०, एवम् २४, एवमादितः ॥ ४१२ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें
'धूम्रलोचन-वध' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः

चण्ड और मुण्डका वध

ध्यान
( ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम् ।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम् ॥
मैं मातङ्गी देवीका ध्यान करता हूँ। वे रत्नमय सिंहासनपर बैठकर पढ़ते हुए तोतेका मधुर शब्द सुन रही हैं। उनके शरीरका वर्ण श्याम है। वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं। कह्लार-पुष्पोंकी माला धारण किये वीणा बजाती हैं। उनके अङ्गमें कसी हुई चोली शोभा पा रही है। लाल रंगकी साड़ी पहने हाथमें शङ्खमय पात्र लिये हुए हैं। उनके वदनपर मधुका हल्का-हल्का नशा जान पड़ता है और ललाटमें बेंदी शोभा दे रही है।)

ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
'ॐ' आज्ञाप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः ।
चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ॥ २ ॥
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्वहासां व्यवस्थिताम् ।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने ॥ ३ ॥
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः ।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः ॥ ४ ॥

२९४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति । कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ॥ ५ ॥ भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्। काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥ ६ ॥ विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥ ७ ॥ अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्ना रक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥ ८ ॥ सा वेगेनाभिपत्तिता घातयन्ती महासुरान् । सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम् ॥ ९ ॥ पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान् । समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥ १०॥ तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह। निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम् ॥११॥ एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्। पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोधयत् ॥ १२ ॥ तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः । मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥ १३ ॥ बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् । ममर्दामक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥ १४ ॥ असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः। जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा ॥ १५ ॥ क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम् । दृष्ट्वाचण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥ १६ ॥ शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः। छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥१७॥ तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्। बभुर्यथार्कबिम्बानि सुवहूनि घनोदरम् ॥ १८ ॥ ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी । काली करालवक्त्रान्तर्दुदर्शदशनोज्ज्वला ॥ १९ ॥ उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत । गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥ २० ॥ ऋषि कहते हैं- ॥१॥ तदनन्तर शुम्भकी आज्ञा पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरङ्गिणी सेनाके साथ अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो चल दिये ॥ २ ॥ फिर गिरिराज हिमालयके सुवर्णमय ऊँचे शिखरपर पहुँचकर उन्होंने सिंहपर बैठी हुई देवीको देखा। वे मन्द-मन्द मुसकरा रही थीं ॥ ३ ॥ उन्हें देखकर दैत्यलोग तत्परतासे पकड़नेका उद्योग करने लगे। किसीने धनुष तान लिया, किसीने तलवार संभाली और कुछ लोग देवीके पास आकर खड़े हो गये ॥४॥ तब अम्बिकाने उन शत्रुओंके प्रति बड़ा क्रोध किया। उस समय क्रोधके कारण उनका मुख काला पड़ गया ॥ ५ ॥ ललाटमें भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहाँसे तुरंत विकरालमुखी काली प्रकट हुई, जो तलवार और पाश लिये हुए थीं ॥६॥ विचित्र खट्वाङ्ग धारण किये और चीतेके चर्मकी साड़ी पहने नर- मुण्डोंकी मालासे विभूषित थीं। उनके शरीरका मांस सूख गया था, केवल हड्डियोंका ढाँचा था, जिससे वे अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थीं ॥७॥ उनका मुख बहुत विशाल था, जीभ लपलपानेके कारण वे और भी डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आँखें भीतरको धँसी हुई और लाल थीं, वे अपनी भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा रही थीं ॥८॥ बड़े-बड़े दैत्योंका वध करती हुई वे कालिकादेवी बड़े वेगसे दैत्योंकी उस सेनापर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं ॥९॥ वे पार्श्वक्षकों, अङ्कुशधारी महावतों, योद्धाओं और घण्टासहित कितने ही हाथियोंको १. पा०-गसी०। २. पा०-यत्यति । ३. पा०-ता णे । ४. शान्तनवी टीकाकारने यहाँ एक श्लोक अधिक पाठ माना है, जो इस प्रकार है- 'छिन्रे शिरसि दैत्येन्द्रश्चक्रे नादं सुभैरवम् । वेग नादेन महता त्रस्तितं भुवनत्रयम् ।'

• चण्ड और मुण्डका वध • २९५ एक ही हाथसे पकड़कर मुँहमें डाल लेती थीं ॥१०॥ इसी प्रकार घोड़े, रथ और सारथिके साथ रथी सैनिकोंको मुँहमें डालकर वे उन्हें बड़े भयानक रूपसे चबा डालती थीं ॥ ११॥ किसीके बाल पकड़ लेतीं, किसीका गला दबा देतीं, किसीको पैरोंसे कुचल डालतीं और किसीको छातीके धक्केसे गिराकर मार डालती थीं ॥ १२ ॥ वे असुरोंके छोड़े हुए बड़े बड़े अस्त्र-शस्त्र मुँहमें पकड़ लेतीं और रोषमें भरकर उनको दाँतोंसे पीस डालतीं ॥ १३ ॥ कालीने बलवान् एवं दुरात्मा दैत्योंकी वह सारी सेना रौंद डाली, खा डाली भयङ्कर बाणोंकी वर्षासे तथा हजारों बार चलाये हुए चक्रोंसे उन भयानक नेत्रोंवाली देवीको आच्छादित कर दिया ॥ १७॥ वे अनेकों चक्र देवीके मुखमें समाते हुए ऐसे जान पड़े, मानो सूर्यके बहुतेरे मण्डल बादलोंके उदरमें प्रवेश कर रहे हों ॥१८॥ तब भयङ्कर गर्जना करनेवाली कालीने अत्यन्त रोषमें भरकर विकट अट्टहास किया। उस समय उनके विकराल वदनके भीतर कठिनतासे देखे जा सकनेवाले दाँतोंकी प्रभासे वे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थीं ॥ १९ ॥ देवीने बहुत बड़ी तलवार हाथमें ले 'हुं' का उच्चारण करके चण्डपर धावा किया और उसके केश पकड़कर उसी तलवारसे उसका मस्तक काट डाला ॥ २० ॥ अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥ २१ ॥ हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥ २२ ॥ शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च । प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥ २३ ॥ और कितनोंको मार भगाया ॥ १४ ॥ कोई तलवारके घाट उतारे गये, कोई खट्वाङ्गसे पीटे गये और कितने ही असुर दाँतोंके अग्रभागसे कुचले जाकर मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥ इस प्रकार देवीने असुरोंकी उस सारी सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। यह देख चण्ड उस अत्यन्त भयानक कालीदेवीकी ओर दौड़ा ॥ १६ ॥ तथा महादैत्य मुण्डने भी अत्यन्त

२१६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू। युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥ २४॥ चण्डको मारा गया देख मुण्ड भी देवीकी ओर दौड़ा। तब देवीने रोषमें भरकर उसे भी तलवारसे घायल करके धरतीपर सुला दिया ॥ २१ ॥ महापराक्रमी चण्ड और मुण्डको मारा गया देख मरनेसे बची हुई बाकी सेना भयसे व्याकुल हो चारों ओर भाग गयी ॥ २२ ॥ तदनन्तर कालीने चण्ड और मुण्डका मस्तक हाथमें ले चण्डिकाके पास जाकर प्रचण्ड अट्टहास करते हुए कहा- ॥ २३ ॥ 'देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक इन दो महापशुओंको तुम्हें भेंट किया है। अब युद्धयज्ञमें तुम शुम्भ और निशुम्भका स्वयं ही वध करना' ॥ २४ ॥ ऋषिरुवाच ॥ २५ ॥ तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ। उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥ २६ ॥ यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ ॐ ॥ २७ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ २५ ॥ वहाँ लाये हुए उन चण्ड मुण्ड नामक महादैत्योंको देखकर कल्याणमयी चण्डीने कालीसे मधुर वाणीमें कहा- ॥ २६ ॥ देवि ! तुम चण्ड और मुण्डको लेकर मेरे पास आयी हो, इसलिये संसारमें चामुण्डाके नामसे तुम्हारी ख्याति होगी ॥ २७ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ उवाच १, श्लोकाः १५, एवम् २७, एवमादितः ॥ ४३१ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'चण्ड-मुण्ड-वध' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

रक्तबीज-वध१९७

अष्टमोऽध्यायः

रक्तबीज-वध

ध्यानएतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्।
(‘ॐ' अरुणां करुणातरङ्गित्ताक्षीं धृतपाशाङ्कुशबाणचापहस्ताम्।भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥ १२ ॥
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ॥ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।
मैं अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणोंसे आवृत भवानीका ध्यान करता हूँ। उनके शरीरका रंग लाल है। नेत्रोंमें करुणा लहरा रही है तथा हाथोंमें पाश, अङ्कुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।)शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥ १३ ॥
ऋषिरुवाच ॥ १ ॥यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ ॥ १४ ॥
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः।
‘ॐ' चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते।आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते ॥ १५ ॥
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥ २ ॥माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी।
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापनान्।महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥ १६ ॥
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥ ३ ॥कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना।
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥ १७ ॥
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥ ४ ॥तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता।
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै।शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥ १८ ॥
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥ ५ ॥यज्ञवाराहमतुलं³ रूपं या बिभ्रतो⁴ हरेः।
कालका दौर्हदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः।शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥ १९ ॥
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥ ६ ॥नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः ।प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥ २० ॥
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥ ७ ॥वज्रहस्ता तथैवेन्द्री गजराजोपरि स्थिता।
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥ २१ ॥
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥ ८ ॥ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ चण्ड और मुण्ड
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप।नामक दैत्योंके मारे जाने तथा बहुत-सी सेनाका
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका² चोपबृंहयत् ॥ ९ ॥संहार हो जानेपर दैत्योंके राजा प्रतापी शुम्भके
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा।मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्योंकी
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥ १० ॥सम्पूर्ण सेनाको युद्धके लिये कूच करनेकी आज्ञा
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्।दी ॥ २-३ ॥ वह बोला—'आज उदायुध नामके
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥ ११ ॥छियासी दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओंके साथ
युद्धके लिये प्रस्थान करें। कम्बु नामवाले दैत्योंके

१. पा०—स च। २. पा०—तन्नादानम्बिका। ३. पा०—जज्ञे वाराहं। ४. पा०—तौ।
[ 539 ] सं० पा० पृ०—८

२१८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनीसे घिरे हुए यात्रा करें ॥ ४ ॥ पचास कोटिवीर्य-कुलके और सौ धौम्र-कुलके असुर सेनापति मेरी आज्ञासे सेनसहित कूच करें ॥ ५ ॥ कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्धके लिये तैयार हों मेरी आज्ञासे तुरंत प्रस्थान करें' ॥ ६॥ भयानक शासन करनेवाला असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रों बड़ी- बड़ी सेनाओंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥ उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिकाने अपने धनुषकी टंकारसे पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गूँजा दिया ॥८॥ राजन् ! तदनन्तर देवीके सिंहने भी बड़े जोर-जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया, फिर अम्बिकाने घंटेके शब्दसे उस ध्वनिको और भी बढ़ा दिया ॥ ९ ॥ धनुषकी टंकार, सिंहकी दहाड़ और घंटेकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं। उस भयंकर शब्दसे कालीने अपने विकराल मुखको और भी बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुईं ॥ १०॥ उस तुमुल नादको सुनकर दैत्योंकी सेनाओंने चारों ओरसे आकर चण्डिकादेवी, सिंह तथा कालीदेवीको क्रोधपूर्वक घेर लिया ॥ ११ ॥ राजन् ! इसी बीचमें असुरोंके विनाश तथा देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवोंकी शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम और बलसे सम्पन्न थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर उन्हींके रूपमें चण्डिकादेवीके पास गयीं ॥ १२-१३ ॥ जिस देवताका जैसा रूप, जैसी वेश-भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही साधनोंसे सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरोंसे युद्ध करनेके लिये आयी ॥ १४ ॥ सबसे पहले हंसयुक्त विमानपर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलुसे सुशोभित ब्रह्माजीकी शक्ति उपस्थित हुई, जिसे ब्रह्माणी कहते हैं ॥१५॥ महादेवजीकी शक्ति वृषभपर आरूढ़ हो हाथोंमें श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानागका कङ्कण पहने, मस्तकमें चन्द्ररेखासे विभूषित हो वहाँ आ पहुँची ॥ १६ ॥ कार्तिकेयजीकी शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हींका रूप धारण किये श्रेष्ठ मयूरपर आरूढ़ हो हाथमें शक्ति लिये दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये आयीं ॥ १७ ॥ इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति गरुड़पर विराजमान हो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष तथा खड्ग हाथमें लिये वहाँ आयी ॥ १८ ॥ अनुपम यज्ञवाराहका रूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी जो शक्ति है, वह भी वाराह शरीर धारण करके वहाँ उपस्थित हुई ॥१९॥ नारसिंही शक्ति भी नृसिंहके समान शरीर धारण करके वहाँ आयी। उसकी गर्दनके बालोंके झटकेसे आकाशके तारे बिखरे पड़ते थे ॥ २० ॥ इसी प्रकार इन्द्रकी शक्ति वज्र हाथमें लिये गजराज ऐरावतपर बैठकर आयी। उसके भी सहस्र नेत्र थे। इन्द्रका जैसा रूप है, वैसा ही उसका भी था ॥ २१ ॥

  • रक्तबीज-वध * २१९ ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः। चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः । हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽऽह चण्डिकाम् ॥२२॥ पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥ ३८ ॥ ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा। तदनन्तर उन देव-शक्तियोंसे घिरे हुए महादेवजीने चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥ २३॥ चण्डिकासे कहा-'मेरी प्रसन्नताके लिये तुम सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता। शीघ्र ही इन असुरोंका संहार करो' ॥ २२॥ तब दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्व शुम्भनिशुम्भयोः ॥ २४॥ देवीके शरीरसे अत्यन्त भयानक और परम उग्र ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ । चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों गीदड़ियोंकी ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥ २५॥ भाँति आवाज करनेवाली थी ॥ २३॥ उस अपराजिता त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः । देवीने धूमिल जटावाले महादेवजीसे कहा- 'भगवन्! यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥ २६॥ आप शुम्भ-निशुम्भके पास दूत बनकर जाइये ॥ २४ ॥ बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः । और उन अत्यन्त गर्वीले दानव शुम्भ एवं तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥ २७॥ निशुम्भ- दोनोंसे कहिये। साथ ही उनके अतिरिक्त यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयंम्। जो दानव युद्धके लिये वहाँ उपस्थित हों, शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥ २८ ॥ तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः। अमर्षपूरिता जग्मुर्यत्र' कात्यायनी स्थिता ॥ २९॥ ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः। ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥ ३० ॥ सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् । चिच्छेद लीलयाऽऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥ ३१ ॥ तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् । खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा ॥ ३२॥ कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः । ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ॥ ३३॥ माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी। दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपनाव ॥ ३४॥ ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः । पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥ ३५ ॥ तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः । उनको भी यह संदेश दीजिये ॥ २५॥ 'दैत्यो ! यदि वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥ ३६ ॥ तुम जीवित रहना चाहते हो तो पातालको लौट नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् । जाओ। इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य मिल जाय और नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णादिगम्बरा ॥ ३७॥ देवता यज्ञभागका उपभोग करें ॥ २६ ॥ यदि बलके १. पा.-जग्मुर्यतः

२१०

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * घमंडमें आकर तुम युद्धकी अभिलाषा रखते हो तो आओ। मेरी शिवाएँ (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे मांससे तृप्त हों' ॥२७॥ चूँकि उस देवीने भगवान् शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये वह 'शिवदूती' के नामसे संसारमें विख्यात हुई ॥ २८ ॥ वे महादैत्य भी भगवान् शिवके मुँहसे देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगे ॥ ३० ॥ तब देवीने भी खेल-खेलमें ही धनुषकी टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े- बड़े बाणोंद्वारा दैत्योंके चलाये हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसोंको काट डाला ॥ ३१ ॥ फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे विदीर्ण करने लगी और खट्वाङ्गसे उनका कचूमर निकालती हुई रणभूमिमें विचरने लगी ॥ ३२ ॥ ब्रह्माणी भी जिस जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी ओर अपने कमण्डलुका जल छिड़ककर शत्रुओंके ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥ ३३ ॥ माहेश्वरीने त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी शक्तिने शक्तिसे दैत्योंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥ इन्द्रशक्तिने वज्रप्रहारसे विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य- दानव रक्तकी धारा बहाते हुए पृथ्वीपर सो गये ॥ ३५ ॥ वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य चक्रकी चोटसे विदीर्ण हो गये ॥ ३६ ॥ नारसिंही भी दूसरे-दूसरे महादैत्योंको अपने नखोंसे विदीर्ण करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको गुँजाती हुई युद्ध-क्षेत्रमें विचरने लगी ॥ ३७ ॥ कितने ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अट्टहाससे अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें शिवदूतीने उस समय अपना ग्रास बना लिया ॥ ३८ ॥ इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्। दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३९ ॥ पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्। योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥ ४० ॥ रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः। समुत्पतति मेदिन्यां१ तत्प्रमाणस्तदासुरः ॥ ४१ ॥ युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः। ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥ ४२ ॥ कुलिशेनाहतस्याशु बहु२ सुस्राव शोणितम्। समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ ४३ ॥ यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः। तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥ ४४ ॥ ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः। समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥ ४५ ॥ १. पा०—न्यास्तो। २. पा०—तस्य।

७. सूर्यवंश, नाभाग, मरुत्त चरित्र व उपसंहार

  • रक्तबीज-वध * २२१ पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा। ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥ वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह। गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥ वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः। सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥ शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना। माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥ ४९ ॥ स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाह्नत् पृथक्। मातृः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥ तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि। पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥ तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्। व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५२॥ तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा। उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं' वदनं कुरु ॥ ५३ ॥ मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् । रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥५४॥ भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् । एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥ भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे । इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूसेनाभिजघान तम् ॥५६॥ मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्। ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥ न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि । तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥ यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति । मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः । तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ॥५९॥ देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः। जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ॥६०॥ स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ५। नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ॥६१॥ ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥ तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥ॐ॥ ६३ ॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए मातृगणोंको नाना प्रकारके उपायोंसे बड़े-बड़े असुरोंका मर्दन करते देख दैत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥३९॥ मातृगणोंसे पीड़ित दैत्योंको युद्धसे भागते देख रक्तबीज नामका महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्धके लिये आया ॥४०॥ उसके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वीपर पैदा हो जाता ॥४१॥ महासुर रक्तबीज हाथमें गदा लेकर इन्द्रशक्तिके साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्रीने अपने वज्रसे रक्तबीजको मारा ॥४२॥ वज्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे बहुत सा रक्त चूने लगा और उससे उसीके समान रूप तथा पराक्रमवाले योद्धा उत्पन्न होने लगे ॥४३॥ उसके शरीरसे रक्तकी जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्, बलवान् तथा पराक्रमी थे ॥४४॥ ये रक्तसे उत्पन्न होनेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयङ्कर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥४५॥ पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका मस्तक घायल हुआ तो रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥४६॥ वैष्णवीने युद्धमें रक्तबीजपर चक्रका प्रहार किया तथा ऐन्द्रीने उस दैत्य-सेनापतिको गदासे चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥ वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो उसीके बराबर आकारवाले सहस्रों महादैत्य प्रकट १. पा०-विस्तरं। २. पा०-योगिना। ३. इसके बाद कहीं कहीं 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है। ४. पा०- चक्रेण । ५. पा०-शस्त्रैरगणितैर्हतः ।

२२२

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया ॥४८॥ कौमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥ ४९ ॥ क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीजने भी गदासे सभी मातृ-शक्तियोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥५०॥ शक्ति और शूल आदिसे अनेक बार घायल होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए ॥ ५१ ॥ इस प्रकार उस महादैत्यके रक्तसे प्रकट हुए असुरोंद्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५२ ॥ देवताओंको उदास देख चण्डिकाने कालीसे शीघ्रतापूर्वक कहा- 'चामुण्डे ! तुम अपना मुख और भी फैलाओ ॥ ५३ ॥ तथा मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ ॥ ५४॥ इस प्रकार रक्तसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती रहो। ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो जानेपर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा ॥५५॥ उन भयङ्कर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी तो दूसरे नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे।' कालीसे यों कहकर चण्डिका देवीने शूलसे रक्तबीजको मारा ॥५६ ॥ और कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया ॥ ५७ ॥ किंतु उस गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं पहुँचायी। रक्तबीजके घायल शरीरसे बहुत-सा रक्त गिरा ॥ ५८ ॥ किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डा ने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया ॥ ५९ ॥ तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डा ने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला ॥ ६० ॥ राजन् ! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर ! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥ ६१-६२ ॥ और मातृगण उन असुरोंके रक्तपानके मदसे उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगा ॥ ६३ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ उवाच १, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ६१, एवम् ६३, एवमादितः ॥५०२॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'रक्तबीज-वध' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥

निशुम्भ-वध २२३


नवमोऽध्यायः

निशुम्भ-वध

ध्यानसंदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥ ७ ॥
( ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालांआजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः।
पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥ ८ ॥
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः।
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥ ९ ॥
मैं अर्धनारीश्वरके श्रीविग्रहकी निरन्तर शरण लेता हूँ। उसका वर्ण बन्धूकपुष्प और सुवर्णके समान रक्त-पीतमिश्रित है। वह अपनी भुजाओंमें सुन्दर अक्षमाला, पाश, अङ्कुश और वरद-मुद्रा धारण करता है; अर्धचन्द्र उसका आभूषण है तथा वह तीन नेत्रोंसे सुशोभित है।)चिच्छेदास्ताञ्शरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः१।<br>ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥ १० ॥<br>निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।<br>अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br>ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।<br>निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥ १२ ॥<br>छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।
राजोवाच ॥ १ ॥तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥ १३ ॥
' ॐ' विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम।कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।
देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजसमाश्रितम् ॥ २ ॥आयातं २ मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥ १४ ॥
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते।आविद्ध्याथ ३ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥ ३ ॥सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥ १५ ॥
राजाने कहा-॥ १ ॥ भगवन् ! आपने रक्तबीजके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला देवी-चरित्रका यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया ॥ २ ॥ अब रक्तबीजके मारे जानेपर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए शुम्भ और निशुम्भने जो कर्म किया, उसको मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्।<br>आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥ १६ ॥<br>तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।<br>भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥ १७ ॥<br>स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः।
ऋषिरुवाच ॥ ४ ॥भुजैरष्टाभिरतुलैर्र्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥ १८ ॥
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते।तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्।
शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥ ५ ॥ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥ १९ ॥
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्।पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥ ६ ॥समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥ २० ॥
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः।ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।<br>पूरयामास गगनं गां तथैव ४ दिशो दश ॥ २१ ॥

१. पा०—ऽऽशु शरोत्करैः। २. पा०—आधान्तं। ३ पा०—अभ्रान्त। ४. पा०—तथोपदिशो।

२२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्। कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥ २२॥ अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह। तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥ २३ ॥ दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा। तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥ २४॥ शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा। आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥ २५ ॥ सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्। निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥ २६॥ शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्। चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७॥ ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्। स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥ २८ ॥ ऋषि कहते हैं - ॥४॥ राजन् ! युद्धमें रक्तबीज तथा अन्य दैत्योंके मारे जानेपर शुम्भ और निशुम्भके क्रोधकी सीमा न रही ॥ ५॥ अपनी विशाल सेना इस प्रकार मारी जाती देख निशुम्भ अमर्षमें भरकर देवीकी ओर दौड़ा। उसके साथ असुरोंकी प्रधान सेना थी ॥६॥ उसके आगे, पीछे तथा पार्श्वभागमें बड़े-बड़े असुर थे, जो क्रोधसे ओठ चबाते हुए देवीको मार डालनेके लिये आये ॥७॥ महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेनाके साथ मातृगणोंसे युद्ध करके क्रोधवश चण्डिकाको मारनेके लिये आ पहुँचा ॥८॥ तब देवीके साथ शुम्भ और निशुम्भका घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य मेघोंकी भाँति बाणोंकी भयंकर वृष्टि कर रहे थे ॥ ९॥ उन दोनोंके चलाये हुए बाणोंको चण्डिकाने अपने बाणोंके समूहसे तुरंत काट डाला और शस्त्रसमूहोंकी वर्षा करके उन दोनों दैत्यपतियोंके अङ्गोंमें भी चोट पहुँचायी ॥ १० ॥ निशुम्भने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवीके श्रेष्ठ वाहन सिंहके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ११ ॥ अपने वाहनको चोट पहुँचनेपर देवीने क्षुरप्र नामक बाणसे निशुम्भकी श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट डाली और उसकी ढालको भी, जिसमें आठ चाँद जड़े थे, खण्ड-खण्ड कर दिया ॥ १२ ॥ ढाल और तलवारके कट जानेपर उस असुरने शक्ति चलायी, किंतु सामने आनेपर देवीने चक्रसे उसके भी दो टुकड़े कर दिये ॥ १३ ॥ अब तो निशुम्भ क्रोधसे जल उठा और उस दानवने देवीको मारनेके लिये शूल उठाया; किंतु देवीने समीप आनेपर उसे भी मुक्केसे मारकर चूर्ण कर दिया ॥ १४॥ तब उसने गदा घुमाकर चण्डीके ऊपर चलायी, परंतु वह भी देवीके त्रिशूलसे कटकर भस्म हो गयी ॥ १५ ॥ तदनन्तर दैत्यराज निशुम्भको फरसा हाथमें लेकर आते देख देवीने बाणसमूहोंसे घायलकर धरतीपर सुला दिया ॥ १६ ॥ उस भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भके धराशायी हो जानेपर शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और अम्बिकाका वध करनेके लिये वह आगे बढ़ा ॥ १७ ॥ रथपर बैठे-बैठे ही उत्तम

  • निशुम्भ-वध * २२५

आयुधोंसे सुशोभित अपनी बड़ी-बड़ी आठ अनुपम भुजाओंसे समूचे आकाशको ढककर वह अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ १८ ॥ उसे आते देख देवीने शङ्ख बजाया और धनुषकी प्रत्यञ्चाका भी अत्यन्त दुस्सह शब्द किया ॥ १९ ॥ साथ ही अपने घंटेके शब्दसे, जो समस्त दैत्य-सैनिकोंका तेज नष्ट करनेवाला था, सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त कर दिया ॥ २० ॥ तदनन्तर सिंहने भी अपनी दहाड़से, जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजोंका महान् मद दूर हो जाता था, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओंको गुँजा दिया ॥ २१ ॥ फिर कालीने आकाशमें उछलकर अपने दोनों हाथोंसे पृथ्वीपर आघात किया। उससे ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जिससे पहलेके सभी शब्द शान्त हो गये ॥ २२ ॥ तत्पश्चात् शिवदूतीने दैत्योंके लिये अमङ्गलजनक अट्टहास किया, इन शब्दोंको सुनकर समस्त असुर थर्रा उठे; किंतु शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ ॥ २३ ॥ उस समय देवीने जब शुम्भको लक्ष्य करके कहा- 'ओ दुरात्मन् ! खड़ा रह, खड़ा रह,' तभी आकाशमें खड़े हुए देवता बोल उठे, 'जय हो, जय हो' ॥ २४ ॥ शुम्भने वहाँ आकर ज्वालाओंसे युक्त अत्यन्त भयानक शक्ति चलायी। अग्निमय पर्वतके समान आती हुई उस शक्तिको देवीने बड़े भारी लुकेसे दूर हटा दिया ॥ २५ ॥ उस समय शुम्भके सिंहनादसे तीनों लोक गूँज उठे। राजन् ! उसकी प्रतिध्वनिसे वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ, जिसने अन्य सब शब्दोंको जीत लिया ॥ २६ ॥ शुम्भके चलाये हुए बाणोंके देवीने और देवीके चलाये हुए बाणोंके शुम्भने अपने भयंकर बाणोंद्वारा सैंकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये ॥ २७ ॥ तब क्रोधमें भरी हुई चण्डिकाने शुम्भको शूलसे मारा। उसके आघातसे मूच्छित हो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २८ ॥ ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः । आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥ २९ ॥ पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः । चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥ ३० ॥ ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥ ३१ ॥ ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् । अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥ ३२ ॥ तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥ ३३ ॥ शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममराईनम् । हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥ ३४ ॥ भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः । महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥ ३५ ॥ तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः । शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥ ३६ ॥ ततः सिंहश्चखादोग्रं १ दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् । असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥ ३७ ॥ कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः । ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥ ३८ ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे । वाराहीतण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥ ३९ ॥ खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः । वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे ॥ ४० ॥ केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् । भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥ ॐ ॥ ४१ ॥ इतनेमें ही निशुम्भको चेतना हुई और उसने धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा देवी, काली तथा सिंहको घायल कर डाला ॥ २९ ॥ फिर उस दैत्यराजने दस हजार बाहें बनाकर चक्रोंके प्रहारसे चण्डिकाको आच्छादित कर दिया ॥ ३० ॥ तब दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली भगवती दुर्गाने कुपित होकर अपने बाणोंसे उन चक्रों तथा १. पा०-दोग्रदंष्ट्रो । २. पा०-खण्डशखण्डं ।

२३६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण > बाणोंको काट गिराया ॥ ३१ ॥ यह देख निशुम्भ दैत्यसेनाके साथ चण्डिकाका वध करनेके लिये हाथमें गदा ले बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३२ ॥ उसके आते ही चण्डीने तीखी धारवाली तलवारसे उसकी गदाको शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथमें लिया ॥ ३३ ॥ देवताओंको पीड़ा देनेवाले निशुम्भको शूल हाथमें गर्दन कुचलकर खाने लगा, वह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर काली तथा शिवदूतीने भी अन्यान्य दैत्योंका भक्षण आरम्भ किया ॥ ३७ ॥ कौमारीकी लिये आते देख चण्डिकाने वेगसे चलाये हुए अपने शूलसे उसकी छाती छेद डाली ॥ ३४ ॥ शूलसे विदीर्ण हो जानेपर उसकी छातीसे एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ निकला ॥ ३५ ॥ उस निकलते हुए पुरुषकी बात सुनकर देवी ठठाकर हंस पड़ीं और खड्गसे उन्होंने उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ोंसे असुरोंकी शक्तिसे विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गये। ब्रह्माणीके मन्त्रपूत जलसे निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥ कितने ही दैत्य माहेश्वरीके त्रिशूलसे छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गये। वाराहीके थूथुनके आघातसे कितनोंका पृथ्वीपर कचूमर निकल गया ॥ ३९ ॥ वैष्णवीने भी अपने चक्रसे दानवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ऐन्द्रीके हाथसे छूटे हुए वज्रसे भी कितने ही प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ ४० ॥ कुछ असुर नष्ट हो गये, कुछ उस महायुद्धसे भाग गये तथा कितने ही काली, शिवदूती तथा सिंहके ग्रास बन गये ॥ ४१ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ उवाच २, श्लोकाः ३९, एवम् ४१, एवमादितः ॥ ५४३ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'निशुम्भ-वध' नामक नवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

  • शुम्भ-वध * २२७ दशमोऽध्यायः शुम्भ-वध ध्यान ('ॐ' उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि- नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्। रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥ मैं मस्तकपर अर्द्धचन्द्र धारण करनेवाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीका हृदयमें चिन्तन करता हूँ। वे तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये ही तीन उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर हाथोंमें धनुष-बाण, अङ्कुश, पाश और शूल धारण किये हुए हैं।) ऋषिरुवाच ॥ १ ॥ 'ॐ' निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्। हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ २ ॥ बलावलेपाद्दुष्टे १ त्वं मा दुर्गे गर्वमावह। अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी ॥ ३ ॥ ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ राजन् ! अपने प्राणोंके समान प्यारे भाई निशुम्भको मारा गया देख तथा सारी सेनाका संहार होता जान शुम्भने कुपित होकर कहा— ॥ २ ॥ 'दुष्ट दुर्गे ! तू बलके अभिमानमें आकर झूठ-मूठका घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी हुई है, किन्तु दूसरी स्त्रियोंके बलका सहारा लेकर लड़ती है' ॥ ३ ॥ देव्युवाच ॥४॥ एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः २ ॥ ५ ॥ देवी बोलीं— ॥ ४ ॥ ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूँ। इस संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन है। देख, वे मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं ॥ ५ ॥ ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्। तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥ ६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अम्बिका देवीके शरीरमें लीन हो गयीं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं ॥ ६ ॥ देव्युवाच ॥ ७ ॥ अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता। तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ ८ ॥ देवी बोलीं— ॥ ७ ॥ मैं अपनी ऐश्वर्यशक्तिसे अनेक रूपोंमें यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपोंको मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्धमें खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ ॥ ८ ॥ १. पा०-पदु० । २. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है।

२२८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


(संस्कृत श्लोक)(संस्कृत श्लोक)
ऋषिरुवाच ॥ ९ ॥स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः<sup></sup>
ततः प्रवृत्ते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ २५ ॥
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ १० ॥तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः ।जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ २६ ॥
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ ११ ॥स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः ।
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ २७ ॥
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ १२ ॥ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ २८ ॥
बभञ्ज लीलयैवो<sup></sup>ग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ १३ ॥उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः ।सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ २९ ॥
सापि<sup></sup> तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ १४ ॥ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ ३० ॥
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ १५ ॥अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥ ३१ ॥
अभ्यधावत्तदा<sup></sup> देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १६ ॥जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ ॐ ॥ ३२ ॥
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।(हिन्दी अनुवाद)
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्<sup></sup> ॥ १७ ॥ऋषि कहते हैं— ॥ ९ ॥ तदनन्तर देवी और
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।शुम्भ दोनोंमें सब देवताओं तथा दानवोंके देखते-
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ १८ ॥देखते भयङ्कर युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥ बाणोंकी
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रोंके प्रहारके
तथापि सोऽभ्यधावन्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ १९ ॥कारण उन दोनोंका युद्ध सब लोगोंके लिये बड़ा
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।भयानक प्रतीत हुआ ॥ ११ ॥ उस समय अम्बिका
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ २० ॥देवीने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।शुम्भने उनके निवारक अस्त्रोंद्वारा काट डाला ॥ १२ ॥
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ २१ ॥इसी प्रकार शुम्भने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये,
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।उन्हें परमेश्वरीने भयङ्कर हुङ्कार शब्दके उच्चारण
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ २२ ॥आदिद्वारा खिलवाड़में ही नष्ट कर डाला ॥ १३ ॥
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।तब उस असुरने सैकड़ों बाणोंसे देवीको आच्छादित
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ २३ ॥कर दिया। यह देख क्रोधमें भरी हुई उन देवीने
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला ॥ १४ ॥
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ २४ ॥धनुष कट जानेपर फिर दैत्यराजने शक्ति हाथमें ली, किन्तु देवीने चक्रसे उसके हाथकी शक्तिको

१. पा०—हू० । २. पा०—सा च । ३. पा०—वत तां हन्तुं दैत्या० । ४. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें—‘अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह।’ इतना अधिक पाठ है। ५. पा०—वेगवान् ।

• शुम्भ-वध • २२५ भी काट गिराया ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् दैत्योंके स्वामी शुम्भने सौ चाँदवाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथमें ले उस समय देवीपर धावा किया ॥ १६ ॥ उसके आते ही चण्डिकाने अपने धनुषसे छोड़े हुए तीखे बाणोंद्वारा उसकी सूर्य-किरणोंके समान उज्ज्वल ढाल और तलवारको तुरंत काट दिया ॥ १७॥ फिर उस दैत्यके घोड़े और सारथि मारे गये, धनुष तो पहले ही कट चुका था, अब उसने अम्बिकाको मारनेके लिये उद्यत हो भयंकर मुद्गर हाथमें लिया ॥१८॥ उसे आते देख देवीने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसका मुद्गर भी काट डाला, तिसपर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेगसे देवीकी ओर झपटा ॥ १९ ॥ उस दैत्यराजने देवीकी छातीमें मुक्का मारा, तब उन देवीने भी उसकी छातीमें एक चाँटा जड़ दिया ॥ २० ॥ देवीका थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वीपर गिर पड़ा, किन्तु पुनः सहसा पूर्ववत् उठकर खड़ा हो गया ॥ २१ ॥ फिर वह उछला और देवीको ऊपर ले जाकर आकाशमें खड़ा हो गया; तब चण्डिका आकाशमें भी बिना किसी आधारके ही शुम्भके साथ युद्ध करने लगी ॥ २२ ॥ उस समय दैत्य और चण्डिका आकाशमें एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले सिद्ध और मुनियोंको विस्मयमें डालनेवाले हुआ ॥ २३ ॥ फिर अम्बिकाने शुम्भके साथ बहुत देरतक युद्ध करनेके पश्चात् उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया ॥ २४ ॥ पटके जानेपर पृथ्वीपर आनेके बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिकाका वध करनेके लिये उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ २५ ॥ तब समस्त दैत्योंके राजा शुम्भको अपनी ओर आते देख देवीने त्रिशूलसे उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २६ ॥ देवीके शूलकी धारसे घायल होनेपर उसके प्राण पखेरू उड़ गये और वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको कँपाता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥ तदनन्तर उस दुरात्माके मारे जानेपर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया। आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा ॥ २८ ॥ पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्यके मारे जानेपर नदियाँ भी ठीक मार्गसे बहने लगीं ॥ २९ ॥ उस समय शुम्भकी मृत्युके बाद सम्पूर्ण देवताओंका हृदय हर्षसे भर गया और गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे ॥ ३० ॥ दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्यकी प्रभा उत्तम हो गयी ॥ ३१ ॥ अग्निशालाकी बुझी हुई आग अपने- आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाओंके भयंकर शब्द शान्त हो गये ॥ ३२ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः २३, एवम् ३२, एवमादितः ॥ ५७५ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'शुम्भ-वध' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

२३० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


एकादशोऽध्यायः

देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान

ध्यान (बालरविद्युतिमिन्दुकरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥ मैं भुवनेश्वरी देवीका ध्यान करता हूँ। उनके श्रीअङ्गोंकी आभा प्रभातकालके सूर्यके समान है। मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है। वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रोंसे युक्त हैं। उनके मुखपर मुसकानकी छटा छायी रहती है और हाथोंमें वरद, अङ्कुश, पाश एवं अभय-मुद्रा शोभा पाते हैं।)

ऋषिरुवाच ॥ १ ॥

'ॐ' देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्<sup></sup> विकाशिवक्त्राब्जविकासिताशाः<sup></sup> ॥ २ ॥

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ३ ॥

आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ ४ ॥

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ५ ॥

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ६ ॥

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी<sup></sup> । त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ ७ ॥

सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये<sup></sup> शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥

हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥

त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥

मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १६ ॥

गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १७ ॥

नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥

किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १९ ॥


१. पा०—लाभात् । २. पा०—वक्त्राब्ज वि० । ३. पा०—भुक्ति । ४. पा०—माङ्गल्ये ।

  • देवताओं‌द्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान * २३१ शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले। घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २० ॥ दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे। चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २१ ॥ लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे। महारात्रि महाऽविद्ये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २२ ॥ मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि। नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २३ ॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ २४ ॥ एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥ ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् । त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥ २६ ॥ हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव ॥ २७॥ असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥ २८ ॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ २९ ॥ एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् । रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्ति कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥ ३० ॥ विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे- ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या। ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥ ३१ ॥ रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र। दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ३३ ॥ देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः। पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥ ३४ ॥ प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ ३५ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ १॥ देवोंके द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भके मारे जानेपर इन्द्र आदि देवता अग्निको आगे करके उन कात्यायनी देवीकी स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे उनके मुख-कमल दमक उठे थे और उनके प्रकाशसे दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं ॥ २ ॥ देवता बोले- शरणागतकी पीड़ा दूर करनेवाली देवि ! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत्‌की माता ! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि ! विश्वकी रक्षा करो। देवि ! तुम्हीं चराचर जगत्की अधीश्वरी हो ॥ ३ ॥ तुम इस जगत्‌का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वीरूपमें तुम्हारी ही स्थिति है। देवि ! तुम्हारा पराक्रम अलङ्घनीय है। तुम्हीं जलरूपमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्‌को तृप्त करती हो ॥ ४ ॥ तुम अनन्त बलसम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्वकी कारणभूता परा माया हो। देवि ! तुमने इस समस्त जगत्‌को १. पा०-पुष्टे। २. पा०-रात्रे। ३. पा०-महामाये। ४. शान्तनवी टीकाकारने यहाँ एक श्लोक अधिक पाठ माना है, जो इस प्रकार है- 'सर्वतःपाणिपादान्ते सर्वतोऽक्षिशिरोमुखे । सर्वतः श्रवणघ्राणे नारायणि नमोऽस्तु ते॥'