मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः १७१
जल से शीतल पवनों से सेवित, तीर पर उत्पन्न मन्दार वृक्षों की छाया से जिनकी धूप दूर कर दी गयी है, ऐसी यक्षकुमारियाँ सोने के बालुओं में मुट्ठी बाँधकर छिपायी गयी एवं जिसे खोजना पड़ता है ऐसी मणियों से अच्छी तरह खेलती हैं ।
समासः—अमरैः प्रार्थिताः = अमरप्रार्थिताः (तृ० तत्) । सलिलेन शिशिराः = सलिलशिशिराः (तृ० तत्) । तटे इति अनुतटम् (विभक्त्यर्थे अव्ययीभावः) । अनुतटं रोहन्तीति अनुतटरुहः (उपपद०) तेषाम् कनकस्य सिकताः = कनकसिकताः (ष० तत्०) मुष्टिभिर्निक्षेपः = मुष्टिनिक्षेपः (तृ० तत्०), कनकसिकतासु मुष्टिनिक्षेपः = कनकसिकता-मुष्टिनिक्षेपः (स० तत्०) कनकसिकतामुष्टिनिक्षेपेण गूढाः = कनकसिकतामुष्टिनिक्षेपगूढाः (तृ० तत्०) । वारितो उष्णो यासां ताः वारितोष्णाः (बहु०) ।
कोशः—कन्या कुमारिका नार्यः, इति विश्वः । रत्नादिभिर्वालुकादौ गुप्तैर्द्रष्टव्यकर्मभिः । कुमारिभिः कृता क्रीडा नाम्ना गुप्तमणिः स्मृता । इति दशार्णवः । 'मन्दाकिनी वियद्गङ्गा स्वर्णदी सुरदीर्घिका, इत्यमरः ।
टिप्पणी—प्रार्थिताः—"प्र" उपसर्गपूर्वक णिजन्त "आर्थि" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "प्रार्थित" शब्द बनता है, स्त्रीत्व विवक्षा में "टाप्" करके "प्रार्थिता" ऐसा बनता है । अनुतटरुहाम्—यहाँ 'अनुतट' उपपदपूर्वक "रुह" धातु से क्विप् प्रत्यय किया गया है और उसका सर्वापहारीलोप हो गया है । इसका पाठान्तर "तटवनरुहाम्" ऐसा भी मिलता है । इन्द्र के नन्दनबन के पाँच वृक्षों में मन्दार भी एक वृक्ष है । पञ्चैते देवतरवो मन्दारः पारिजातकः । सन्तानः कल्पवृक्षश्च पुंसि वा हरिचन्दनम् ॥ इत्यमरः । वारिताः—णिजन्त "वारि" धातु से "क्त" प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके बहुवचन में ऐसा रूप निष्पन्न होता है । गूढाः—"गुह्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके ढत्वादिक करके "ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः" इस सूत्र से धातु के उकार को दीर्घ करके "स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके बहुवचन में "गूढाः" ऐसा रूप बनाया जाता है । अन्वेष्टव्यैः—"अनु" उपसर्गक "इष्" धातु से "तव्यत्" प्रत्यय