मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३० मेघदूतम्
भ्यामिति = आगण्डम् (अव्ययीभाव)। आगण्डं लम्बः = आगण्डलम्बः (सुप्सुपा) तम्। अधरः किसलयमिव = अधरकिसलयम् (उपमित कर्म), अधरकिसलयं क्लिश्नाति इति अधरकिसलयक्लेशी (उपपद स०)। मम संभोगः = मत्संभोगः (ष० त०)। नयनोः सलिलानि = नयनसलिलानि (ष० त०) तेषामुत्पीडः = नयनसलिलोत्पीडः (ष० स०)। रुद्धः अवकाशो यस्याः सा रुद्धावकाशा (बहु०), नयनसलिलोत्पीडेन रुद्धावकाशा = नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशा (तृ० तत्०) ताम्।
कोशः—ओष्ठाधरौ तु रदनच्छदौ दशनवाससी, इत्यमरः। पल्लवोऽस्त्री किसलयम्, इत्यमरः।
टिप्पणी—शुद्धस्नानात्—पतिव्रता प्रोषितभर्तृका के लिये शरीरसंस्कार का निषेध किया गया है, अतः यक्षपत्नी तैल आदि का उपयोग नहीं करती है। इस बात को ध्वनित करने के लिए 'शुद्धस्नानात्' ऐसा पढा गया। यहाँ हेतु में पञ्चमी है। लम्बः—लम्बत इति, इस विग्रह में अवस्रंसनार्थक 'लवि' धातु से 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यो'—इत्यादि सूत्र से अच् प्रत्यय हुआ है एवं धातु के इदित् होने के कारण 'इदितो नुम्धातोः' इस सूत्र से नुमादि करके 'लम्बः' ऐसा बनाया जाता है। अलकम्—यहाँ केशों के आधिक्य होने के कारण बहुवचन का प्रयोग होना चाहिए, परन्तु जातिवाचक होने के कारण एकवचन का प्रयोग किया गया है। क्योंकि—
'जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्।'
इस सूत्र से विकल्प से बहुवचन का विधान किया गया है। कथम्—'किम्' शब्द से 'केन प्रकारेण' इस विग्रह में 'किमश्च' इस सूत्र से थम् (थमु) प्रत्यय करके एवं 'किमः कः' इस सूत्र से किम् के स्थान पर 'क' आदेश करके 'कथम्' ऐसा रूप बनता है। यह अव्यय पद है अतः सुप् का लुक् हो जाता है। उपनयेत्—'उप' उपसर्गपूर्वक 'नी' धातु के लिङ् लकार का यह रूप है। यद्यपि 'नी' धातु का अर्थ ले जाना है परन्तु 'उप' उपसर्ग के