मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
२३० मेघदूतम्
भ्यामिति = आगण्डम् (अव्ययीभाव)। आगण्डं लम्बः = आगण्डलम्बः (सुप्सुपा) तम्। अधरः किसलयमिव = अधरकिसलयम् (उपमित कर्म), अधरकिसलयं क्लिश्नाति इति अधरकिसलयक्लेशी (उपपद स०)। मम संभोगः = मत्संभोगः (ष० त०)। नयनोः सलिलानि = नयनसलिलानि (ष० त०) तेषामुत्पीडः = नयनसलिलोत्पीडः (ष० स०)। रुद्धः अवकाशो यस्याः सा रुद्धावकाशा (बहु०), नयनसलिलोत्पीडेन रुद्धावकाशा = नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशा (तृ० तत्०) ताम्।
कोशः—ओष्ठाधरौ तु रदनच्छदौ दशनवाससी, इत्यमरः। पल्लवोऽस्त्री किसलयम्, इत्यमरः।
टिप्पणी—शुद्धस्नानात्—पतिव्रता प्रोषितभर्तृका के लिये शरीरसंस्कार का निषेध किया गया है, अतः यक्षपत्नी तैल आदि का उपयोग नहीं करती है। इस बात को ध्वनित करने के लिए 'शुद्धस्नानात्' ऐसा पढा गया। यहाँ हेतु में पञ्चमी है। लम्बः—लम्बत इति, इस विग्रह में अवस्रंसनार्थक 'लवि' धातु से 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यो'—इत्यादि सूत्र से अच् प्रत्यय हुआ है एवं धातु के इदित् होने के कारण 'इदितो नुम्धातोः' इस सूत्र से नुमादि करके 'लम्बः' ऐसा बनाया जाता है। अलकम्—यहाँ केशों के आधिक्य होने के कारण बहुवचन का प्रयोग होना चाहिए, परन्तु जातिवाचक होने के कारण एकवचन का प्रयोग किया गया है। क्योंकि—
'जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्।'
इस सूत्र से विकल्प से बहुवचन का विधान किया गया है। कथम्—'किम्' शब्द से 'केन प्रकारेण' इस विग्रह में 'किमश्च' इस सूत्र से थम् (थमु) प्रत्यय करके एवं 'किमः कः' इस सूत्र से किम् के स्थान पर 'क' आदेश करके 'कथम्' ऐसा रूप बनता है। यह अव्यय पद है अतः सुप् का लुक् हो जाता है। उपनयेत्—'उप' उपसर्गपूर्वक 'नी' धातु के लिङ् लकार का यह रूप है। यद्यपि 'नी' धातु का अर्थ ले जाना है परन्तु 'उप' उपसर्ग के
उत्तरमेघः २३१
लग जाने से उसका अर्थ दूसरा हो गया है । धातोरर्थन्तरे......इत्यादि पहले ही निर्देश किया जा चुका है ।
यहाँ अश्रुत्याग के द्वारा त्रपा ( लज्जा ) नाश नामक कामदशा का कथन है ।
अलङ्कारः—'अधरकिसलय' यहाँ लुप्तोपमा है ॥ २८ ॥
आद्ये बद्धा विरहदिवसे या शिखादाम हित्वा शापस्यान्ते विगलितशुचा तां मयोद्वेष्टनीयाम् । स्पर्शक्लिष्टामयमितनखेनासकृत् सारयन्तीं गण्डाभोगात्कठिनविषमामेकवेणीं करेण ॥२९॥
अन्वयः—आद्ये, विरहदिवसे, दाम, हित्वा, या, शिखा, बद्धा, शापस्य, अन्ते, विगलितशुचा, मया, उद्वेष्टनीयाम्, स्पर्शक्लिष्टाम्, कठिनविषमाम्, एकवेणीम्, ताम्, अयमितनखेन, करेण, गण्डाभोगात्, असकृत्, सारयन्तीम्, ( तां पश्य ) ॥ २९ ॥
व्याख्या—आद्ये = प्रथमे, विरहदिवसे = वियोगदिने, दाम = पुष्पमालाम्, हित्वा = त्यक्त्वा, या शिखा = या केशपाशी, बद्धा = निबद्धा ग्रथितेत्यर्थः, शापस्य = अभिशापस्य, अन्ते अवसाने, विगलितशुचा = विनष्टशोकेन, मया = प्रियेण, यक्षेणेत्यर्थः, उद्वेष्टनीयाम् = मोचनीयाम्, स्पर्शक्लिष्टाम् = संस्पर्शेण दुःखदायिनीम्, कठिनविषमाम् = परुषोच्चावचाम्, एकवेणीम् = एकबन्धनवतीं वेणीम्, ताम् = केशपाशीम्, अयमितनखेन = अकृत्तानखेन, करेण = हस्तेन, गण्डाभोगात् = कपोल-प्रदेशात्, असकृत् = भूयोभूयः, सारयन्तीम् = अपसारयन्तीम् ( तां पश्य ) ॥ २९ ॥
शब्दार्थः—आद्ये = पहले, विरहदिवसे = वियोग के दिन, दाम = पुष्पमाला को, हित्वा = छोड़कर, या शिखा = जो चोटी, बद्धा = गूँथी थी, शापस्यान्ते = शाप के बीत जाने पर, विगलितशुचा = अपगत शोक वाले, मया = मेरे द्वारा, उद्वेष्टनीयाम् = खोली जाने वाली, स्पर्शक्लिष्टाम् = छूने से व्यथा पहुँचाने वाली
२३२ मेघदूतम्
( दुःखने वाली ), कठिनविषमाम् = रूक्ष एवं ऊँची-नीची, एकवेणीम् = एक ही लड़ वाली, ताम् = उस केश की चोटी को, अयमितनखेन = बिना काटे हुए नखों वाले, करेण = हाथ से, गण्डाभोगात् = बड़े गालों पर से, असकृत् = बार-बार, सारयन्तीम् = हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २९ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! प्रथमे विरहदिने पुष्पमालारहिता या केशपाशी गुम्फिता, शापावसाने विगतशोकेन मयोद्वेष्टनीयां रूक्षां निम्नोन्नतां तामेव केशपाशीं, अकर्तितनखेन हस्तेन कपोलविस्तारात् पुनः पुनः अपसारयन्तीम् ( तां मत्प्रियां पश्य ) ॥ २९ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! पहले वियोग के दिन पुष्पमाला को त्यागकर जो बालों की चोटी गूंथी थी, शाप के बीत जाने पर शोकरहित होकर मेरे द्वारा खोली जाने वाली, छूने से क्लेश देने वाली, रूक्ष और ऊँची-नीची एक लड़ वाली उस चोटी को बिना कटे नाखूनों वाले हाथ के द्वारा अपने विस्तृत गालों पर से बराबर हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ।
समासः—विरहस्य दिवसः विरहदिवसः ( ष० तत्० ) । विगलिता शुक् यस्य स विगलितशुक् ( बहु० ) तेन । उद्गतं वेष्टनं यस्याः सा उद्वेष्टनीया ( बहु० ) ताम् । स्पर्शे क्लिष्टा = स्पर्शक्लिष्टा ( स० स० ) ताम् । कठिना चासौ विषमा = कठिनविषमा ( कर्म० ) ताम् । एका चासौ वेणी = एकवेणी (कर्म०) ताम् । अयमिताः नखाः यस्य स अयमितनखः (बहु०) तेन । गण्डस्य आभोगः = गण्डाभोगः ( ष० तत्० ) तस्मात् ।
कोशः—वेणी नदीभेदे कचोच्चये, इत्यमरः । गण्डौ कपोलौ, इत्यमरः । पुनर्भवः कररुहः नखः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—दाम—यह 'दामन्' शब्द के द्वि० विभक्ति के एकवचन का रूप है, यह शब्द नपुंसकलिंगी है । हित्वा—त्यागने के अर्थ में विद्यमान ओहाक् धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके 'जहातेर्हिः' इस सूत्र से 'हो' को 'हि' आदेश करके 'हित्वा' रूप निष्पन्न होता है । बद्धाः—'बन्ध' धातु से
उत्तरमेघः २३३
'क्त' प्रत्यय करके नलोपादि करके स्त्रीत्व विवक्षा में 'टाप्' करके 'बद्धा' ऐसा रूप बनता है। उद्वेष्टनीयाम्—'उद्वेष्टनं करोति' इस विग्रह में 'उद्वेष्टना' शब्द से 'तत्करोति तदाचष्टे' इस सूत्र से णिच् प्रत्यय होता है। पुनः उसका 'आख्यानात् कृतस्तदाचष्टे कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवच्च कारकम्' इस वार्तिक से कृत् प्रत्यय का लोप हो जाता है, तब 'उद्वेष्ट' इस नाम धातु से 'तव्यत्तव्याऽनीयरः' इस सूत्र से 'अनीयर्' प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् करके 'उद्वेष्टनीया' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यह द्वि० विभक्ति का रूप है। कठिनविषमा—यहाँ दोनों पद विशेषणवाचक हैं परन्तु पूर्वपद को विशेषण एवं उत्तरपद को विशेष्य मानकर "विशेषणं विशेष्येण बहुलम्” इससे समास हुआ। एकवेणीम्—एका चासौ वेणी ऐसा विग्रह जहाँ किया जाता है वहाँ 'पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः' इत्यादि सूत्र से समास होता है एवं 'पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु' इससे 'एका' को पुंवद्भाव किया जाता है।
यहाँ "चित्तविभ्रम" नामक कामदशा ध्वनित होती है।
अलङ्कारः—यहाँ 'स्वभावोक्ति' नामक अलङ्कार है॥ २९॥
सा संन्यस्ताभरणमबला पेशलं धारयन्ती शय्योत्सङ्गे निहितमसकृद् दुःखदुःखेन गात्रम्। त्वामप्यस्रं नवजलमयं मोचयिष्यत्यवश्यं प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्रान्तरात्मा॥ ३०॥
अन्वयः—अबला, संन्यस्ताभरणम्, असकृत्, दुःखदुःखेन, शय्योत्सङ्गे, निहितम्, पेशलम्, गात्रम्, धारयन्ती, सा, त्वामपि, नवजलमयम्, अस्रम्, अवश्यम्, मोचयिष्यति, प्रायः, आर्द्रान्तरात्मा, सर्वः, करुणावृत्तिः, भवति॥ ३०॥
व्याख्या—अबला=दुर्बला, संन्यस्ताभरणम्=परित्यक्ताऽलङ्कारम्, असकृत् =पुनः पुनः, दुःखदुःखेन=अतिशयक्लेशेन, शय्योत्सङ्गे=शय्यामध्ये, निहितम्
२३४ मेघदूतम्
=स्थापितम्, पेशलम् = कोमलम्, गात्रम् = शरीरम्, धारयन्ती - बिभ्रती, सा = मत्प्रिया, त्वामपि = मेघमपि, नवजलमयम् = नूतननीरमयम्, अस्रम् = बाष्पम्, अवश्यम् = नूनम्, मोचयिष्यति = त्याजयिष्यति । अर्थान्तरेण द्रढयति स्वकथनं प्राय इति। प्रायः = बहुशः, आर्द्रान्तरात्मा = नर्महृदयः, सर्वः = निखिलः, करुणावृत्तिः = दयामयचित्तवृत्तिः, भवति = वर्तते ॥ ३० ॥
शब्दार्थः—अबला = दुर्बल, संन्यस्ताभरणम् = गहनों से रहित, असकृत् = बार-बार, दुःखदुःखेन = घोर कष्ट से, शय्योत्सङ्गे - शय्या पर, निहितम् = रखे हुए, पेशलम् - कोमल, गात्रम् = शरीर को, धारयन्ती - धारण करती हुई, सा - वह मेरी प्रिया, त्वामपि = तेरे द्वारा भी, नवजलमयम् = नवीन जलमय, अस्रम् = आंसुओं को, अवश्यम् = निश्चित ही, मोचयिष्यति = गिरवायेगी। प्रायः = प्रायशः, आर्द्रान्तरात्मा = कोमलहृदयवाले, सर्वः = सभी, करुणावृत्तिः - करुण स्वभाव के, भवति = होते हैं ॥ ३० ॥
भावार्थः—हे मेघ ! दुर्बला, परित्यक्ताऽलङ्कारं बहुशः महत्कष्टेन तल्पमध्यस्थापितं कोमलं शरीरं धारयन्ती सा मत्प्रिया त्वामपि नवतोयरूपेणाऽश्रूणि रोदयिष्यति, यतो हि प्रायः सर्व एव आर्द्रहृदयः दयालुस्वभावो भवति ॥ ३० ॥
हिन्दी—हे मेघ ! दुर्बल, आभूषणों से रहित, बार-बार अत्यन्त कष्ट से शय्या पर रखे अपने कोमल शरीर को धारण करती हुई वह मेरी प्रिया तुम्हें भी नवीन जलरूपी आंसुओं से रुलायेगी, क्योंकि आर्द्रहृदय वाले प्रायः सभी करुण स्वभाव के होते हैं ॥ ३० ॥
समासः—अविद्यमानं बलं यस्याः सा अबला ( न० बहु० ) संन्यस्तान्याभरणानि यस्य तत् = संन्यस्ताऽभरणम् (बहु०)। न सकृत् = असकृत् (नञ्०), शय्यायाः उत्सङ्गः = शय्योत्सङ्गः (ष० तत्०) तस्मिन् । नवञ्च तज्जलं = नवजलम् ( कर्मधा० ) तदेव नवजलमयम् । आर्द्रः अन्तरात्मा यस्य सः आर्द्रान्तरात्मा ( बहु० ) । करुणायां वृत्तिर्यस्य सः करुणावृत्तिः ( बहु० ) ।
उत्तरमेघः २३५
कोशः—गात्रं वपुः संहननम्, इत्यमरः । स्त्री योषिदबला, इत्यमरः । उत्सङ्गचिह्नयोरङ्कः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—'अबला' यहाँ का नञ् अत्यार्थक है, इसका अर्थ दुर्बला होगा। दुःखदुःखेन—यहाँ दुःखप्रकारमिति='दुःखदुःखम्' ऐसा होता है क्योंकि 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से दुःख को द्वित्व एवं कर्मधारयवद्भाव हुआ है। नवजलमयम्—यहाँ 'नवजल' शब्द से प्रचुर अर्थ में 'तत्प्रकृतवचने मयट्' इस सूत्र से मयट् प्रत्यय हुआ है। मोचयिष्यति—णिजन्त 'मोचि' धातु के लट् लकार के प्र० पुरुष के एकवचन का यह रूप है। यहाँ इस क्रिया के कर्ता 'त्वम्' इस पद से द्वितीया विभक्ति हुई है। इसकी उपपत्ति महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने 'मुच्' धातु को पचादि गणपठित मानकर, अतएव द्विकर्मक होने के कारण 'द्विकर्मसु पचादीनामुपसंख्यानम्' इससे द्वितीया हुई है, ऐसा बताया है। परन्तु शारदारञ्जन राय ने उक्त वार्तिक के सिद्धान्तकौमुदी या काशिका आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में न होने के कारण इसकी उपपत्ति दूसरे प्रकार से बताई है। उनके मतानुसार 'मुच्' धातु के अण्यन्तावस्था का कर्ता जो 'त्वम्' यह पद है उसकी ण्यन्तावस्था में 'गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता सणौ' इस सूत्र से कर्म संज्ञा हो जाती है, तब द्वितीया विभक्ति होगी। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि राय जी ने 'मुच्' धातु को भी गत्यर्थक ही माना है।
इस श्लोक में 'दुःखदुःखेन शरीरं धारयन्ती' इस कथन से 'मूर्च्छा' नामक कामदशा अभिव्यक्त होती है जो नवीं दशा है। महाकवि ने यहाँ आठ ही कामदशाओं का वर्णन किया है, जबकि 'साहित्य-शास्त्र' के अनुसार काम की १० दशायें होती हैं। प्रथम 'चक्षूरागः' और अन्तिम 'मृत्यु', इन दो दशाओं का वर्णन नहीं किया है। प्रथम का तो इसलिए नहीं किया कि नयनप्रीति अर्थात् समागमन जिनका पहले होगा उन्हीं का वियोग होगा और यह काव्य वियोगावस्था से ही प्रारम्भ होता है और अन्तिम दशा का कथन रसभङ्ग के भय से नहीं किया।
२३६ | मेघदूतम्
**अलङ्कारः—**इस श्लोक में 'अस्त्रमवश्यं मोचयिष्यति सा' इस कथन को 'प्रायः सर्वः' इत्यादि वाक्य के द्वारा समर्थित किया गया है। अतः यहाँ 'अर्थान्तरन्यास' नामक अलङ्कार है ॥ ३० ॥
जाने सख्यास्तव मनः मयि सम्भृतस्नेहमस्मा-
दित्यंभूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि ।
वाचालं मां न खलु सुभगंमन्यभावः करोति
प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद्भ्रातरुक्तं मया यत् ॥ ३१॥
**अन्वयः—**तव सख्याः, मनः, मयि, संभृतस्नेहम्, जाने । अस्मात्, अहम्, प्रथमविरहे, ताम्, इत्थंभूताम्, तर्कयामि । सुभगंमन्यभावः, माम्, वाचालम्, न करोति, खलु । हे ! भ्रातः, मया, यत्, उक्तम्, निखिलम्, अचिरात्, ते, प्रत्यक्षम् ॥ ३१ ॥
**व्याख्या—**तव = मेघस्य, सख्याः = मद्भार्यायाः, मनः = चेतः, मयि = मद्विषये, संभृतस्नेहम् = संवलितानुरागम्, जाने = जानामि । अस्मात् = अतएव, अहम् = यक्षः, प्रथमविरहे = आद्यवियोगे, ताम् = स्वप्रियाम्, इत्थंभूताम् = पूर्वकथितदशाप्राप्ताम्, तर्कयामि = अनुमिनोमि । सुभगम्मन्यभावः = सुभगमानित्वम्, माम् = यक्षम्, वाचालम् = वाचाटम्, न करोति = न सम्पादयति, खलु = निश्चयेन । हे भ्रातः ! = हे बन्धो ! मया = यक्षेण, यत् = तद्दीनदशादिकम्, उक्तम् = कथितम्, (तत्) निखिलम् = सम्पूर्णम्, अचिरात् = त्वरितम्, ते = मेघस्य, प्रत्यक्षम् = नेत्रसम्मुखम् ( भविष्यति, इति शेषः ) ॥ ३१ ॥
**शब्दार्थः—**तव = तेरी, सख्याः = सखी (मेरी प्रिया) का, मनः = चित्त, मयि = मेरे प्रति, संभृतस्नेहम् = अनुरागपूर्ण ( है, ऐसा ), जाने = जानता हूँ । अस्मात् = इसलिए, प्रथमविरहे = प्रथमवियोग में, ताम् = उसे, इत्थम्भूताम् = पहले कही गयी दीनदशा को प्राप्त हुई होगी (ऐसा) अहम् = मैं, तर्कयामि = अनुमान कर रहा हूँ । सुभगंमन्यभावः = अपने को सौभाग्यशाली समझने का
उत्तरमेघः २३७
अहंकार, माम् = मुझे, वाचालम् = अधिक बोलने वाला, न करोति=नहीं बना रहा है, ( किन्तु ) हे भ्रातः=हे बन्धु, यत्=जो कुछ भी, मया = मैंने, उक्तम् = कहा है। तत् = वह, निखिलम् = सभी, अचिरात् = शीघ्र ही, ते = तुम्हारी, प्रत्यक्षम् = आंखों के सामने आएगा ॥ ३१ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! मत्प्रियायाश्चित्तं मद्विषयेऽत्यन्तानुरागपूर्णमस्तीत्यहं जानामि। अस्मादहं तां स्वप्रियामस्मिन्नभूतपूर्ववियोगे तादृगवस्थाप्राप्तां संभावयामि। आत्मानं सौभाग्यशालिनं मत्वा नाऽहं बहु भाषयामि, ( अपितु ) हे भ्रातः ! यन्मयोक्तं तन्निखिलं त्वद्दग्गोचरीभविष्यति ॥ ३१ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! मेरी प्रिया का मन मेरे प्रति बहुत ही अनुरागपूर्ण है, ( इस बात को ) मैं जानता हूँ। इसलिए इस अभूतपूर्व वियोग में वह मेरी प्रिया 'ऐसी हो गयी होगी' ऐसा अनुमान करता हूँ। हे भाई ! मुझे 'अपने को सौभाग्यशाली समझने का अभिमान' अधिक बोलने वाला नहीं बना रहा है, ( अपितु ) जो कुछ भी मैंने उसकी दीन-दशादि का वर्णन किया है वह शीघ्र ही तुम्हारी आंखों के सामने आ जायेगा ॥ ३१ ॥
समासः—संभृतः स्नेहो यस्य तत् = संभृतस्नेहम् ( बहु० )। प्रथमश्चासौ विरहः प्रथमविरहः ( कर्मधा० )। इत्थं भूतामिति (सुप्सुपा)। सुभगम्मन्यस्य भावः = सुभगम्मन्यभावः ( ष० तत्० )। अक्षं प्रति इति = प्रत्यक्षम् ( अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीययेति समासः )।
कोशः—स्याज्जल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुगर्ह्यवाक्, इत्यमरः।
टिप्पणी—संभृतः = 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'भू' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके 'सम्भृतः' ऐसा रूप उपपन्न होता है। स्नेह—प्रीत्यर्थक 'स्निह्' धातु से 'घञ्' प्रत्यय करके स्नेह ऐसा रूप उपपन्न होता है। अस्मात्—यहाँ 'हेतौ' इस सूत्र से पञ्चमी हुई है। सुभगम्मन्य —आत्मानं सुभगं मन्यत इति 'सुभगम्मन्यः' यहाँ 'सुभग' उपपदक 'मन्' धातु से 'आत्ममाने खश्च' इस सूत्र से 'खश्' प्रत्यय करके 'अरुद्विषदजन्तस्य मुम्' इस सूत्र से मुमागम
१६ मे० दू०
२३८ मेघदूतम्
करके 'सुभगम्मन्य' ऐसा रूप उपपन्न होता है। वाचालम्—बहुगर्हा वाक् यस्य इस विग्रह में 'कुत्सायामिति वक्तव्यम्' इस वातिक से कुत्सा अर्थ में 'वाक्' शब्द से 'आलजाटचौ बहुभाषिणि' इस सूत्र से 'आलच्' प्रत्यय हुआ है।
अलङ्कारः—यहाँ तृतीय चरणोक्त अर्थ का चतुर्थ चरण कथित वाक्यार्थ हेतु है अतः यहाँ 'काव्यलिङ्ग' अलङ्कार है ।। ३१ ।।
रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्जनस्नेहशून्यं प्रत्यादेशादपि च मधुनो विस्मृतभ्रूविलासम् । त्वय्यासन्ने नयनमुपरिस्पन्दि शङ्के मृगाक्ष्या मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीति ॥३२॥
अन्वयः—अलकैः, रुद्धापाङ्गप्रसरम् अञ्जनस्नेहशून्यम्, अपि च, मधुनः, प्रत्यादेशात्, विस्मृतभ्रूविलासम्, त्वयि, आसन्ने, उपरिस्पन्दि, मृगाक्ष्या, नयनम् मीनक्षोभात्, चलकुवलयश्रीतुलाम्, एष्यति, इति शङ्के ।। ३२ ।।
व्याख्या—अलकैः = चूर्णकुन्तलैः, रुद्धापाङ्गप्रसरम् = अवरुद्धकटाक्षप्रक्षेपम्, अञ्जनस्नेहशून्यम् = कज्जलस्निग्धघरहितम्, अपि च = तथा च, मधुनः = मद्यस्य, प्रत्यादेशात् = त्यागात्, विस्मृतभ्रूविलासम् = प्रस्मृतभ्रूभङ्गम्, त्वयि = मेघे, आसन्ने = समीपस्थे ( सति ) उपरिस्पन्दि = ऊर्ध्वभागे स्फुरशीलम्, मृगाक्ष्याः = हरिणनेत्रायाः, नयनम् = लोचनम्, मीनक्षोभात् = मत्स्यसञ्चरणात्, चलकुवलयश्रीतुलाम् = चञ्चलनीलपद्मशोभोपमाम्, एष्यति = गमिष्यति, इति शङ्के = इति संभावयामि ।। ३२ ।।
शब्दार्थः—अलकैः = घुंघराले बालों से, रुद्धापाङ्गप्रसरम् = जिसके कटाक्ष-विशेष अवरुद्ध हो गये हैं, अञ्जनस्नेहशून्यम् = काजल की चिकनाहट से विहीन, अपि च = और भी, मधुनः = मदिरा (शराब) के, प्रत्यादेशात् = त्याग से, विस्मृतभ्रूविलासम् = जो भौंहों की भङ्गिमा को भूल गया है, त्वयि = तुम्हारे, आसन्ने =
उत्तरमेघः २३९
समीप आने पर, उपरिस्पन्दि = ऊपरी भाग में स्पन्दनयुक्त, मृगाक्ष्याः=मृगनयनी का, (वह) नेत्रम् = नेत्र, मीनक्षोभात् = मछली के चलने के कारण, चलकुवलयश्रीतुलाम् = हिलते हुए नीलकमल की शोभा की उपमा को, एष्यति = प्राप्त करेगा, इति शङ्के = ऐसा मैं अनुमान कर रहा हूँ ॥ ३२ ॥
भावार्थः —हे मेघ ! कटाक्षशून्यं कज्जलस्नेहरहितं विरहे मद्यपरित्यागात् परित्यक्तभ्रूविलासं मृगनेत्रायाः मत्प्रियायाः वामनेत्रं त्वयि समीपस्थे सति ऊर्ध्वभागे स्फुरणयुक्तं सत्, मत्स्यसञ्चरणेन सञ्चलन्नीलपद्मशोभोपमां प्राप्स्यतीति संभावयामि ॥ ३२ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! कटाक्ष एवं काजल से रहित, विरह में मद्यपान के परित्याग से जो भौंहों की क्रीड़ा को भूल गया है वह मेरी मृगनयनी प्रिया का नेत्र तुम्हारे समीप आने पर ऊपर के भाग में फड़कता हुआ, मछली के चलने से हिलते हुए नीलकमल की शोभा की उपमा को प्राप्त करेगा ॥ ३२ ॥
समासः—अपाङ्गयोः प्रसराः=अपाङ्गप्रसराः ( स० तत्० ) रुद्धा अपाङ्गप्रसरा यस्य तत् = रुद्धापाङ्गप्रसरम् (बहु०) । अञ्जनेन स्नेहः = अञ्जनस्नेहः (तृ० तत्०) तेन शून्यम् = अञ्जनस्नेहशून्यम् (तृ० त०) । भ्रुवोर्विलासः भ्रूविलासः ( ष० तत्० ) विस्मृतो भ्रूविलासो येन तत् = विस्मृतभ्रूविलासम् (बहु०) । मृगस्य इव अक्षिणी यस्याः सा मृगाक्षी (व्यधिकरण बहु०) तस्याः । मीनैः क्षोभः = मीनक्षोभः ( तृ० तत्० ), तस्मात् । चलञ्च तत् कुवलयम् (कर्म०) तस्य श्रीः = चलकुवलयश्रीः ( ष० तत्० ) तस्याः तुलाम् = चलकुवलयश्रीतुलाम् ( ष० तत्० ) ।
कोशः—अपाङ्गो नेत्रयोरन्तो, इत्यमरः । प्रत्यादेशो निराकृतिः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—रुद्धापाङ्ग०—विरह-व्रत में शरीर संस्कार मात्र का निषेध होने के कारण यक्षपत्नी के बाल बिखरे हुए हैं अतः कटाक्ष प्रक्षेप अवरुद्ध है, यह इस वाक्य का भाव है । अञ्जनस्नेहः—यहाँ भी उक्त कारण से ही यक्ष-प्रिया की आँखें कज्जल-विहीन हैं । विस्मृतभ्रूविलासम्—मद्यपान केवल
२४० मेघदूतम्
ब्राह्मण के लिए निषिद्ध है, भोग-योनि यक्ष इत्यादि के लिए उसका निषेध नहीं है, यक्षप्रिया पी सकती है, परन्तु प्रोषितभर्तृका के लिए 'मदिरा' त्याज्य होने के कारण वह मदिरा नहीं पीती, इसलिए छोड़े हुए भ्रूविलास को मानो वह भूल ही गयी है । उपरिस्पन्दि—इस वाक्य से इष्टप्राप्ति अर्थात् प्रियसमागम का लाभ ध्वनित होता है; क्योंकि नेत्र के ऊपरी भाग के फड़कने से इष्टप्राप्ति होती है । जैसा कि निमित्तनिदान में लिखा है—
'इष्टप्राप्तिं दृशोरूर्ध्वमपाङ्गे हानिमादिशेत् ॥' इति ।
मृगाक्षी—बहुव्रीहि समास से बने 'मृगाक्षि' शब्द से 'बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच्' इस सूत्र से समासान्त 'षच्' प्रत्यय होकर 'मृगाक्ष' ऐसा रूप बनता है । पश्चात् 'षिद्गौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से स्त्रीत्व विवक्षा में 'ङीष्' होकर 'मृगाक्षी' ऐसा रूप निष्पन्न होता है ।
अलङ्कारः—यहाँ उपमा अलङ्कार है एवं अन्यच्छायायोनि भी है, क्योंकि इसी अर्थ का श्लोक वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में आता है ।
तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्मराजीवृतं कृष्णविशालशुक्लम् ।
प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवाऽभिताम्रम् ॥ ३२ ॥
( वा० रा० सु०, २९।२ )
वामश्चास्याः कररुहपदैर्मुच्यमानो मदीयै-
र्मुक्ताजालं चिरपरिचितं त्याजितो दैवगत्या ।
सम्भोगान्ते मम समुचितो हस्तसंवाहनानां
यास्यत्यूरुः सरसकदलीस्तम्भगौरश्चलत्वम् ॥ ३३॥
अन्वयः—मदीयैः, कररुहपदैः, मुच्यमानः, चिरपरिचितम्, मुक्ताजालम्, दैवगत्या, त्याजितः, संभोगान्ते, मम, हस्तसंवाहनानाम्, समुचितः, सरसकदलीस्तम्भगौरः, अस्याः, वामः, ऊरुः, चलत्वम्, यास्यति ॥ २३ ॥
उत्तरमेघः २४१
व्याख्या—मदीयैः = मामकीनैः, कररुहपदैः = नखचिह्नैः, मुच्यमानः = परिहीयमानः, चिरपरिचितम् = चिराऽभ्यस्तम्, मुक्ताजालम् = मौक्तिकसरमयम्, दैवगत्या = भाग्यवशेन, त्याजितः = मोचितः, संभोगान्ते = सुरतसमाप्तौ, मम = यक्षस्य, हस्तसंवाहनानाम् = करमर्दनानाम्, समुचितः = योग्यः, सरसकदलीस्तम्भगौरः = रसान्द्रकदलीस्तम्भपाण्डुरः, अस्याः = मत्प्रियायाः, वामः = दक्षिणान्यः, ऊरुः = सक्थि, चलत्वम् = स्पन्दनं, यास्यति = प्राप्स्यति ॥ ३३ ॥
शब्दार्थः—मदीयैः = मेरे, कररुहपदैः = नखों के चिह्नों से, मुच्यमानः = मुक्त, चिरपरिचितम् = प्राचीन समय से अभ्यस्त, मुक्ताजालम् = मोतियों की लड़ी वाली ( करधनी ) से, दैवगत्या = भाग्यवश, त्याजितः = विमुक्त, संभोगान्ते = रति ( सुरत ) क्रीडा के पश्चात्, मम = मेरे, हस्तसंवाहनानाम् = हाथों के मर्दनों के, समुचितः = योग्य, सरसकदलीस्तम्भगौरः = रसपूर्ण केले के स्तम्भ ( तने ) के समान गोरी, अस्याः = इस मेरी प्रिया की, वामः = बायीं, ऊरुः = जांघ, चलत्वम् = चञ्चलता को, यास्यति = प्राप्त करेगी ॥३३॥
भावार्थः—हे मेघ ! त्वयि समीपस्थे मदीयनखचिह्नरहितः, भाग्यवशात् त्याजितमुक्तामयकटिभूषणः सुरतसमाप्तौ मदीयहस्तसंवाहनयोग्यः सरसरम्भास्तम्भविशदो मम प्रियायाः वाम ऊरुः चाञ्चल्यं प्राप्स्यति ॥ ३३ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! तुम जब मेरी प्रिया के समीप जाओगे उस समय मेरे नाखूनों के चिह्नों से रहित, भाग्यवश मोतियों की लड़ी वाली करधनी से हीन, संभोग के पश्चात् मेरे हाथों द्वारा सम्मर्दन के योग्य गीले-गीले केले के तने के समान गोरी मेरी प्रिया की बायीं जांघ फड़क उठेगी ॥ ३३ ॥
समासः—करे रुहन्तीति = कररुहाः ( उपपद ० ) कररुहाणां पदानि = कररुहपदानि ( ष० तत् ० ) तैः । चिरं परिचितं = चिरपरिचितम् ( सुप्सुपेति समासः ) । मुक्तानां जालं = मुक्ताजालम् (ष० तत् ०) । दैवस्य गतिः=दैवगतिः ( ष० तत् ० ) तया । संभोगस्य अन्तः = संभोगान्तः ( ष० तत् ० ) तस्मिन् । हस्ताभ्यां संवाहनानि = हस्तसंवाहनानि (तृ० तत् ०) तेषाम् । रसेन सहितः=
२४२ | मेघदूतम्
सरसः (तुल्य० बहु०), कदल्याः स्तम्भः = कदलीस्तम्भः (ष० तत्०)। सरसश्चासौ कदलीस्तम्भः = सरसकदलीस्तम्भः (कर्म० धा०), सरसकदलीस्तम्भ इव गौरः = सरसकदलीस्तम्भगौरः (उपमान कर्म० धा०)।
**कोशः—**पुनर्भवः कररुहो नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः। संवाहनं मर्दनं स्यात्, इत्यमरः। कदली वारणबुसा रम्भा मोचांशुमत्, इत्यमरः।
**टिप्पणी—मदीयैः—**मम इमानि = मदीयानि। यहाँ 'अस्मद्' शब्द का 'त्यदादीनि च' इस सूत्र से वृद्ध संज्ञा होती है, एवं 'वृद्धाच्छः' इस सूत्र से वृद्धसंज्ञक 'अस्मद्' शब्द से 'छ' प्रत्यय होता है और उसके स्थान पर 'आयनेयं नीयीयः फढखछघां प्रत्ययादीनाम्' इस सूत्र से 'ईय्' आदेश होता है। पश्चात् 'प्रत्ययोत्तरपदयोश्च' इस सूत्र से 'अस्मत्' के स्थान में 'मत्' आदेश करके 'मदीय' पद की सिद्धि होती है। उक्त रूप तृतीया विभक्ति के बहुवचन का है। कररुहाः—'करं रोहन्ति' इस विग्रह में 'कर' उपपदपूर्वक 'रुह्' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय हुआ है। **मुच्यमानः—**मोचनार्थक 'मुच्' (लृ) धातु से लट् लकार एवं कर्म में यक् प्रत्यय लाकर 'लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे' इस सूत्र से 'लट्' के स्थान में 'शानच्' आदेश करके 'मुच्यमान' ऐसा शब्द उपपन्न होता है। **त्याजितः—**इस शब्द की उत्पत्ति के विषय मे भी ३०वें श्लोक के 'मोचयिष्यति' पद की तरह महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी एवं डा० शारदारञ्जन रायजी का वैमत्य है। मल्लिनाथजी ने 'द्विकर्मसु पचादीनां चोपसंख्यानमिष्यते' इस वार्तिक के आधार पर 'त्यज्' धातु को द्विकर्मक माना है, परन्तु यह मत सिद्धान्तकौमुदीमान्य नहीं है। अतः रायजी ने 'त्यज्' धातु को भी गत्यर्थक मानकर इसे द्विकर्मक माना है। यहाँ 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'णिच्' प्रत्यय हुआ है। यह 'ऊरु' का विशेषण है। यहाँ 'कर्मवाच्य' का प्रयोग होने से गौण कर्म 'ऊरु' में प्रथमा विभक्ति हुई है। संवाहनम्—'सम्' उपसर्गपूर्वक 'वह्' धातु से णिच् प्रत्यय करके फिर धातु संज्ञा करके 'करणाधिकरणयोश्च' इस सूत्र से 'ल्युट्' प्रत्यय हुआ है। **सरस—**इस शब्द से
उत्तरमेघः २४३
कवि अच्छी तरह परिपक्व हरेभरे केले के तने के समान 'न कि सूखे तने के समान' इस भाव को ध्वनित करना चाहता है ।
अलङ्कारः—यहाँ 'उपमा' अलङ्कार है ।। ३३ ।।
तस्मिन् काले जलद ! यदि सा लब्धनिद्रासुखा स्या- दन्वास्यैनां स्तनितविमुखो याममात्रं सहस्व । मा भूदस्याः प्रणयिनि मयि स्वप्नलब्धे कथञ्चित् सद्यःकण्ठच्युतभुजलताग्रन्थि गाढोपगूढम् ।।३४।।
अन्वयः —हे जलद ! तस्मिन्, काले, सा, यदि, लब्धनिद्रासुखा, स्यात्, एनाम्, अन्वास्य, स्तनितविमुखः, याममात्रम्, सहस्व । अस्याः, प्रणयिनि, मयि, कथञ्चित्, स्वप्नलब्धे, गाढोपगूढवम्, सद्यःकण्ठच्युतभुजलताग्रन्थि, मा भूत् ।। ३४ ।।
व्याख्या —हे जलद !—हे मेघ ! तस्मिन् = पूर्वोक्ते, काले = समये, त्वयि समीपस्थ इति भावः । सा = मत्प्रिया, यदि = चेत्, लब्धनिद्रासुखा = प्राप्तस्वप्नामोदा, स्यात् = भवेत्, (तर्हि) एनाम् = मत्प्रियाम्, अन्वास्य = पृष्ठदेशमुपविश्य, स्तनितविमुखः = गर्जितरहितः, (सन्) तूष्णीं भूत्वेत्यर्थः । याममात्रम् = प्रहरमात्रम्, सहस्व = प्रतीक्षस्व । अस्याः = मत्प्रियायाः, प्रणयिनि = वल्लभे, मयि = यक्षे, भर्तरि, कथञ्चित् = केनापि प्रकारेण, स्वप्नलब्धे = स्वापावाप्ते, (सति) गाढोपगूढम् = दृढाऽऽलिङ्गितम्, सद्यः = तत्क्षणम्, कण्ठच्युतलताग्रन्थि = गलस्रस्तबाहुवल्लीग्रन्थनम्, मा भूत् = न स्यात् ।। ३४ ।।
शब्दार्थः—हे जलद ! = हे मेघ ! तस्मिन् = पहले कहे गये, काले = समय में (तुम्हारे समीप जाने पर), सा = वह मेरी प्रिया, यदि, लब्धनिद्रासुखा = नींद के सुख को प्राप्त कर रही, स्यात् = हो (तो), एनाम् = उस मेरी प्रिया के, अन्वास्य = पीछे बैठकर, स्तनितविमुखः = गर्जन से रहित होकर (निःशब्द), याममात्रम् = एक प्रहर मात्र, सहस्व = (उसकी) प्रतीक्षा करना । अस्याः = मेरी प्रिया के, प्रणयिनि = प्रियतम, मयि = मेरे, कथञ्चित् = किसी प्रकार, स्वप्न-
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लब्धे = सपने में प्राप्त होने पर, गाढोपगूढम् = दृढ़ आलिङ्गन, सद्यः = तुरत ही, कण्ठच्युतलताग्रन्थि = गले में बँधी लताओं जैसी भुजाओं का बन्धन विच्छिन्न, न स्यात् = न हो ॥ ३४ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! यदि तस्मिन् समये मत्प्रिया निद्रामग्ना स्यात्, तर्हि त्वं तस्याः पृष्ठदेशमुपविश्य निःशब्दः सन् याममात्रं तां प्रतीक्षस्व, यतो हि, येन केनापि प्रकारेण स्वप्नलब्धे मयि प्रेयसि सति (त्वद्गर्जितेन) सद्यः गाढाऽऽलिङ्गनं न स्यात् ॥ ३४ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! तुम्हारे समीप जाने के समय वह मेरी प्रिया यदि निद्रा-सुख ले रही हो तो तुम उसके पीछे निःशब्द बैठकर एक प्रहर मात्र उसकी प्रतीक्षा करना, क्योंकि उसके प्रियतम मेरे किसी प्रकार से स्वप्न में प्राप्त होने पर (तुम्हारे गर्जन से) कण्ठ में प्राप्त भुज-लताओं का गाढ़ आलिङ्गन बन्धन-रहित न हो जाय (टूट न जाए) ॥ ३४ ॥
समासः—निद्रायाः सुखम् = निद्रासुखम् (ष० त०) । लब्धं निद्रासुखं यया सा लब्धनिद्रासुखा (बहु०) । स्तनितात् विमुखः = स्तनितविमुखः (पं० तत्०) । याम एव याममात्रम् (मयूरव्यंसकादयश्चेति समासः) । स्वप्ने लब्धः = स्वप्नलब्धः (स० तत्०) तस्मिन् । गाढञ्च तदुपगूढम् = गाढापगूढम् (क० धा०) । कण्ठात् च्युतः = कण्ठच्युतः (पं० तत्०) भुजौ लते इव भुजलते (उपमित कर्म०) । भुजलतयोः ग्रन्थिः = भुजलताग्रन्थिः (ष० तत्०) । सद्यः कण्ठच्युतः = सद्यःकण्ठच्युतः (सुप्सुपा०) सद्यःकण्ठच्युतो भुजलताग्रन्थिः यस्य तत् = सद्यःकण्ठच्युतभुजलताग्रन्थि (बहु०) ।
कोशः—द्वौ यामप्रहरौ समौ, इत्यमरः । वाढ-वाढदृढानि च, इत्यमरः । स्तनितं गर्जितं मेघनिर्घोषे रसितादि च, इत्यमरः ।
टिप्पणी—जलदः—जलं ददाति इति जलदः, जल उपपदपूर्वक 'दा' धातु से 'आतोऽनुपसर्गे कः' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय करके धातु के 'आ'कार का लोप करके 'जलदः' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । स्यात्—सत्तार्थक 'अस्' धातु से लिङ्लकार का उक्त रूप है । अन्वास्य—'अनु' उपसर्गपूर्वक 'आस्'
उत्तरमेघः २४५
धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'ल्यप्' करके 'अन्वास्य' रूप निष्पन्न होता है। याममात्रम्—यहाँ 'कालाऽध्वनोरत्यन्तसंयोगे' इस सूत्र से द्वितीया हुई है। सहस्व—यह रूप मर्षणार्थक ( ष ) सह् धातु के लोट्लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का है। यक्ष मेघ से एक प्रहर तक प्रतीक्षा करने को कहता है; क्योंकि 'संभोग' एक प्रहर से अधिक नहीं हो सकता, उसके बाद यदि तुम गर्जन करोगे भी तो वह मेरे सहवास सुख को प्राप्त कर चुकी होगी अतः उससे कोई क्षति नहीं होगी, मध्य में गर्जने से वह उक्त सुख से वञ्चित रह जाएगी, यह भाव है। रतिविलास में संभोग की परमावधि एक प्रहर माना गया है—‘परमा तु रतिर्यूनामिष्टा यामावसायिकी' इति । उपगूढम्—'उप' उपसर्गपूर्वक 'गुह्' धातु से 'नपुंसके भावे क्त' इस सूत्र ते 'क्त' प्रत्यय करके ढत्व ष्टुत्व आदि करके 'ढो ढे लोपः' इस सूत्र से धातु के ढकार के लोप हो जाने पर 'ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' इस सूत्र से धातु के 'उ'कार को दीर्घ करके 'उपगूढ' ऐसा बनता है।
अलङ्कारः—यहाँ 'याममात्रं' सहस्व के प्रति उत्तरार्ध का वाक्यार्थ हेतु है। अतः 'काव्यलिङ्ग' अलङ्कार है। एवञ्च 'भुजलता' यहाँ लुप्तोपमा है। इस प्रकार दोनों के अङ्गाङ्गिभावतया रहने से 'संकर' अलङ्कार है ॥ ३४ ॥
तामुत्थाप्य स्वजलकणिकाशीतलेनानिलेन प्रत्याश्वस्तां सममभिनवैर्जालकैर्मालतीनाम् । विद्युद्गर्भः स्तिमितनयनां त्वत्सनाथे गवाक्षे वक्तुं धीरः स्तनितवचनैर्मानिनीं प्रक्रमेथाः ॥३५॥
अन्वयः—(हे मेघ !) ताम्, स्वजलकणिकाशीतलेन, अनिलेन, उत्थाप्य, अभिनवैः, मालतीनाम्, जालकैः, समम्, प्रत्याश्वस्ताम्, त्वत्सनाथे, गवाक्षे स्तिमितनयनाम्, मानिनीम्, विद्युद्गर्भः, धीरः, स्तनितवचनैः, वक्तुम्, प्रक्रमेथाः ॥ ३५ ॥
व्याख्या—( हे मेघ ! ) ताम् = मत्प्रियाम्, स्वजलकणिकाशीतलेन =
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निजोदकबिन्दुशिशिरेण, अनिलेन = वायुना, उत्थाप्य = प्रबोध्य, अभिनवैः = नूतनैः, मालतीनाम् = जातिकुसुमानाम्, जालकैः = कोरकैः, समम् = सार्धम्, प्रत्याश्वस्ताम् = सुस्थिताम्, त्वत्सनाथे = भवद्युक्ते, गवाक्षे = वातायने, स्तिमितनयनाम् = निष्पन्दलोचनाम्, मानिनीम् = मनस्विनीम्, ( मत्प्रियाम् ) विद्युद्गर्भः = विद्युदात्मा, धीरः = दृढः ( सन् ) स्तनितवचनैः = गर्जितवाग्भिः, वक्तुम् = भाषितुम्, प्रक्रमेथाः = उपक्रमस्व ॥ ३५ ॥
शब्दार्थः—(हे मेघ !) ताम् = उस मेरी प्रिया को, स्वजलकणिकाशीतलेन = अपने वारि-बिन्दु से शीतल, वायुना = वायु के द्वारा, उत्थाप्य = जगाकर, अभिनवैः = नूतन, मालतीनाम् = चमेली के, जालकैः = कलियों से ( एवं ) प्रत्याश्वस्ताम् = स्वस्थ, त्वत्सनाथे = तुम से युक्त, गवाक्षे = खिड़की पर, स्तिमितनयनाम् = निश्चल नेत्रों वाली (आँख गड़ाकर देखती हुई), मानिनीम् = मानिनी (उस मेरी प्रिया को), विद्युद्गर्भः = अपने भीतर बिजली को छिपाए हुए, धीरः = धैर्यपूर्वक, स्तनितवचनैः = गर्जनरूपीवाणी से, वक्तुं = कहना, प्रक्रमेथाः = आरम्भ करना ॥ ३५ ॥
भावार्थः—हे मेघ! सुप्तां मत्प्रियां निजसलिलकणशिशिरेण वायुना प्रबोध्य जातिकुड्मलैः साकं सुस्थितां त्वदावृते वातायने निश्चलनयनां विद्युतात्मा त्वं धीरः सन् गर्जितवचोभिः स्वकथनमारभस्व ॥ ३५ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! उस मेरी प्रिया को अपने जल-बिन्दु से शीतल वायु के द्वारा जगा कर चमेली की नयी कलियों के साथ सुस्थिता और तुमसे घिरी खिड़की की ओर आंख गढ़ा कर देखती हुई मनस्विनी ( उस मेरी प्रिया ) को अपने भीतर बिजली को रखे हुए तुम धैर्यपूर्वक अपने गर्जनरूपी वचनों से कहना प्रारम्भ करना ॥ ३५ ॥
समासः—जलस्य कणिका = जलकणिका (ष० तत्०), स्वस्य जलकणिका स्वजलकणिका (ष० तत्०) ताभिः शीतलः = स्वजलकणिकाशीतलः (तृ० त०) तेन । नाथेन सहितः = सनाथः (तुल्ययोग बहु० ) त्वया सनाथः = त्वत्सनाथः ( तृ० त० ) तस्मिन् । गवामक्षीव गवाक्षः ( उपमित कर्म० ) । स्तिमितै नयने
उत्तरमेघः २४७
यस्याः सा = स्तिमितनयना (बहु०) ताम् । विद्युत् गर्भः यस्य सः विद्युद्गर्भः ( बहु० ) । स्तनितान्येव वचनानि = स्तनितवचनानि ( रूप० क० ) तैः ।
कोशः—सुमना मालती जातिः, इत्यमरः । साकं सार्धं समं सह, इत्यमरः । क्षारको जालकं क्लीबे कलिका कोरकः पुमान्, इत्यमरः । सनाथं प्रभुमित्याहुः सहिते चित्ततापिनो, इति शब्दार्णवः । गर्भोपवारकेऽन्तःस्थे कुक्षिस्थे चार्भके मतः, इति शब्दार्णवः ।
टिप्पणी —उत्थाप्य—'उद्' उपसर्गपूर्वक णिजन्त 'स्थायि' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके पुगादि करके 'उत्थाप्य' ऐसा निष्पन्न होता है । प्रत्याश्वस्ताम्—'प्रति' एवं 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से कर्ता में 'क्त' प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके 'प्रत्याश्वस्ता' ऐसा निष्पन्न किया जाता है, यह रूप द्वितीया विभक्ति के एकवचन का है । मानिनी—प्रशस्तो मानो यस्याः सा मानिनी । धीरः—यहाँ इस पद को देने का अभिप्राय 'दृढ़तापूर्वक यक्षपत्नी को भलीभाँति समझावे, क्योंकि स्त्रियाँ स्वभाव से घबरालू होती हैं, अन्यथा जो स्वयं दृढ़ नहीं हैं वह दूसरे को धैर्य कैसे बँधायेगा' यह है ।
अलङ्कारः—इस श्लोक में 'जालकैः समम्' यहाँ 'सहोक्ति' एवं 'स्तनित' में वचन आरोप प्रकृत कथन में उपयोगी है अतः 'परिणाम' अलङ्कार, एवञ्च दोनों के परस्पर निरपेक्ष भाव से रहने के कारण 'संसृष्टि' नामक अलङ्कार है ।। ३५ ।।
भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे ! विद्धि मामम्बुवाहं तत्संदेशैर्हृदयनिहितैरागतं त्वत्समीपम् । यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यतां प्रोषितानां मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥ ३६॥
अन्वयः—हे अविघवे ! माम्, भर्तुः, प्रियम्, मित्रम्, हृदयनिहितैः, तत्सन्देशैः, त्वत्समीपम्, आगतम्, अम्बुवाहम्, विद्धि । यः, अबलावेणिमोक्षोत्सु-
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कानि, पथि, श्राम्यताम्, प्रोषितानाम्, वृन्दानि, मन्द्रस्निग्धैः, ध्वनिभिः, त्वरयति ॥ ३६ ॥
व्याख्या—सम्प्रति सन्देशप्रकारं निर्दिशति भर्तुरिति । हे अविधवे = हे सौभाग्यवति ! माम् = आगन्तुकं मेघम्, भर्तुः = पत्युः, प्रियम् = स्नेहास्पदम्, मित्रम् = सुहृदम्, हृदयनिहितैः = मनःसंस्थापितैः, तत्सन्देशैः = त्वत्भर्तृसन्देशैः, त्वत्समीपम् = भवत्पार्श्वम, आगतम् = आयातम्, अम्बुवाहम् = जलदम्, विद्धि = जानीहि। यः = अहमम्बुवाहः, अबलावेणिमोक्षोत्सुकानि = वियोगिनी-बद्धवेणिमोचनोत्कंठितानि, पथि = मार्गे, श्राम्यताम् = श्रान्तिमापन्नानाम्, प्रोषितानाम् = प्रवासिनाम्, वृन्दानि = समूहान्, मन्द्रस्निग्धैः = गम्भीरमधुरैः, ध्वनिभिः = स्तनितैः, त्वरयति = चाञ्चलयति, शीघ्रं गन्तुं प्रेरयति इति भावः ॥ ३६ ॥
शब्दार्थः—हे अविधवे ! = हे सौभाग्यवति ! माम् = मुझको, भर्तुः = (अपने) पति का, प्रियम् = स्नेही, मित्रम् = मित्र, (एवं) हृदयनिहितैः = हृदय में रखे हुए, तत्सन्देशैः = तुम्हारे पति के सन्देशों के साथ, त्वत्समीपम् = तुम्हारे पास, आगतम् = आया हुआ, अम्बुवाहम् = मेघ, विद्धि = जानो । यः = जो (मेघ), अबलावेणिमोक्षोत्सुकानि = विरहिणियों की बँधी वेणियों को खोलने के लिए उत्कण्ठित हो रहे, पथि = मार्ग में, श्राम्यताम् = थके-माँदे, प्रोषितानाम् = प्रवासियों के, वृन्दानि = समूहों को, मन्द्रस्निग्धैः, = मधुर एवं कर्णप्रिय, ध्वनिभिः = गर्जनों से, त्वरयति = ( गृह जाने के लिए ) शीघ्रता करवाता है ॥ ३६ ॥
भावार्थः—हे सौभाग्यवति ! मां निजवल्लभसुहृदं तत्सन्देशहरमम्बुवाह जानीहि । यो मेघः प्रवासिनां सङ्घान् गृहं गन्तुं शीघ्रतां कारयति ॥ ३६ ॥
हिन्दी—हे सुहागिन ! जो, अबलाओं की बँधी वेणियों को खोलने के लिए लालायित प्रवासियों के समूह को शीघ्र घर जाने की प्रेरणा देता है, वैसे मुझको सन्देश कहने के लिए तुम्हारे पास आया हुआ, अपने पति का प्रिय मित्र मेघ समझो ॥ ३६ ॥
समासः—विगतो धवो यस्याः सा विधवा (बहु०) । न विधवा अविधवा ( नञ्० ) तत्सम्बुद्धौ 'अविधवे' । हृदये निहिताः = हृदयनिहिताः (स० तत्०)
उत्तरमेघः २४९
तैः । तस्य सन्देशाः = तत् सन्देशाः ( ष० तत्० ) तैः । अबलानां वेणयः = अबलावेणयः ( ष० तत्० ), ताषां मोक्षः = अबलावेणिमोक्षः ( ष० तत् ), तस्मिन् उत्सुकानि अबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ( स० तत्० ) । मन्द्राश्च ते स्निग्धाः = मन्द्रस्निग्धाः, ( कर्मधा० ) तैः ।
कोशः—अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः । स्त्री योषिदबला योषा, इत्यमरः । धवः प्रियः पतिर्भर्ता, इत्यमरः ।
टिप्पणी—भर्तुः—‘भृ’ धातु से ‘तृच्’ प्रत्यय करके ‘भर्तृ’ ऐसा रूप साधु होता है । यह रूप उक्त शब्द के षष्ठी विभक्ति के एकवचन का है । निहितैः—‘नि’ उपसर्गपूर्वक ‘धा’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके धातु के स्थान में ‘दधातेर्हिः’ इस सूत्र से ‘हि’ आदेश करके ‘निहित’ ऐसा रूप बनता है। यहाँ तृतीया विभक्तिः के बहुवचन का रूप है । सन्देशैः—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘दिश्’ धातु से कर्म में ‘घञ्’ प्रत्यय करके ‘सन्देश’ रूप बनता है । अम्बुवाहम्—अम्बु वहतीति, इस विग्रह में ‘अम्बु’ उपपदक ‘वह’ धातु से ‘कर्मण्यण्’ इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके ‘अम्बुवाह’ रूप निष्पन्न होता है । यह द्वितीया के एकवचन का रूप है ॥ ३६ ॥
अलङ्कारः—यहाँ ‘अविधवे !’ यह साभिप्राय विशेषण है अतः ‘परिकर’ नामक अलङ्कार है । ३६ ।।
इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा त्वामुत्कण्ठोच्छ्वसितहृदया वीक्ष्य संभाष्य चैव । श्रोष्यत्यस्मात्परमविहिता सौम्य ! सीमन्तिनीनां कान्तोदान्तः सुहृदुपगतः संगमात्किञ्चिदूनः ॥३७॥
अन्वयः—इति, आख्याते, उन्मुखी, सा, उत्कण्ठोच्छ्वसितहृदया, मैथिली, पवनतनयम्, इव, त्वाम्, वीक्ष्य, सम्भाष्य, च, अस्मात्, परम्, अविहिता, श्रोष्यति, एव । सौम्य ! सीमन्तिनीनाम्, सुहृदुपगतः, कान्तोदान्तः, संगमात् किञ्चित्, ऊनः ॥ ३७ ॥