मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ | मेघदूतम्
टिप्पणी—वचनात्—यहाँ 'वच्' धातु से 'ल्युट्' प्रत्यय करके 'वचन' रूप निष्पन्न होता है। 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च' इस सूत्र से कर्म में पञ्चमी विभक्ति हुई है। आत्मनः—यहाँ पर 'आत्मन्' शब्द से द्वितीया विभक्ति प्राप्त थी क्योंकि वह 'उपकार' क्रिया का कर्म है, परन्तु सम्बन्ध की विवक्षा होने के कारण 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' इससे षष्ठी हो गयी। उपकर्तुम्—'उप' उपसर्गपूर्वक 'कृ' धातु से तुमुन् प्रत्यय करके 'उपकर्तुम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अव्यापन्न—वि+आ उपसर्ग पूर्वक 'पद' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके 'व्यापन्न' रूप बनता है, न व्यापन्नः अव्यापन्नः। सुलभविपदाम्—यह प्राणियों का विशेषण है। संसार में प्राणियों को विपत्ति प्राप्त होना सुलभ तो है ही। जैसा कि कवि ने अपने रघुवंश महाकाव्य में भी लिखा है—'विपदुत्पत्तिमंतामुपस्थिता।' इति। भगवान् पतञ्जलि भी योगदर्शन में लिखते हैं—
'परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः' इति।
अलङ्कारः—इस श्लोक में पूर्व के तीनों चरणों में कहे गये वाक्य का समर्थन चतुर्थ चरणोक्त 'पूर्वाभाष्यम्' इत्यादि से किया गया है, अतः 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है॥ ३८॥
अङ्गेनाङ्गं प्रतनु तनुना गाढतप्तेन तप्तं
सास्त्रेणास्रद्रुतमविरतोत्कण्ठमुत्कण्ठितेन ।
उष्णोच्छ्वासं समधिकतरोच्छ्वासिना दूरवर्ती
संकल्पैस्तैर्विशति विधिना वैरिणा रुद्धमार्गः ॥३९॥
अन्वयः—(हे अबले !) दूरवर्ती, वैरिणा, विधिना, रुद्धमार्गः, तनुना, गाढतप्तेन, सास्रेण, उत्कण्ठितेन, समधिकतरोच्छ्वासिना, अङ्गेन, प्रतनु, तप्तम्, अस्रद्रुतम्, अविरतोत्कण्ठम्, उष्णोच्छ्वासम्, अङ्गम्, तैः, सङ्कल्पैः, विशति ॥ ३९ ॥