मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २६७
टिप्पणी—प्रवृत्ता—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'वृत्' धातु से कर्ता में "क्त" प्रत्यय हुआ है। दक्षिणेन—"दक्षिण" चूंकि यह प्रकृतिवाची शब्द है अतः 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' से यहाँ तृतीया विभक्ति होनी चाहिए, परन्तु महाभाष्यकार पतञ्जलि 'तत्रापि करणत्वस्य प्रतीयमानत्वात्' इत्यादि हेतु देकर 'कर्तृकरणयोस्तृतीया' इसी सूत्र से तृतीया विभक्ति का व्याख्यान करते हैं। स्पृष्टम्—'स्पृश्' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके 'स्पृष्टम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। भवेत्—यहाँ संभावना में विधि लिङ् 'भू' धातु से आया है। इस श्लोक में सम्भावना का कथन तीन पदों द्वारा किया गया है अतएव यहाँ सम्भावना का अतिशय प्रतिपादन है, यह कहा जा सकता है। वे तीन पद हैं—१ यदि २ किल और 'भू' धातु से संभावना में विधि लिङ् लकार में बने रूप ३ 'भवेत्'।
वाल्मीकिरामायण में भी इसी भाव का श्लोक आता है।
'वाहि वात ! यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृशेः।
बद्धेत्तत्काममानस्य शक्यमेतेन जीवितम् ॥' (किष्कि०, १-५३)
संक्षिप्येत क्षण इव कथं दीर्घयामा त्रियामा
सर्वावस्थास्वहरपि कथं मन्दमन्दातपं स्यात् ।
इत्थं चेतश्चटुलनयने ! दुर्लभप्रार्थनं मे
गाढोष्माभिः कृतमशरणं त्वद्वियोगव्यथाभिः ॥४५॥
अन्वयः—दीर्घयामा, त्रियामा, क्षण, इव, कथम्, संक्षिप्येत ? अहरपि, सर्वावस्थासु, कथम्, मन्दमन्दातपम्, स्यात्, हे चटुलनयने ! इत्थम्, दुर्लभप्रार्थनम्, मे, चेतः, गाढोष्माभिः, त्वद्वियोगव्यथाभिः, अशरणम्, कृतम् ॥ ४५ ॥
व्याख्या—दीर्घयामा=दीर्घप्रहरा, त्रियामा=रजनी, क्षण इव =अल्पकाल इव, कथम्=केन प्रकारेण, संक्षिप्येत=लघ्वीभवेत्, अहरपि=दिवसोऽपि, सर्वावस्थासु = सकलदशासु, कथम् = केन प्रकारेण, मन्दमन्दाऽऽतपम् = न्यूनाऽऽतपम्, स्यात् = भवेत् ? हे चटुलनयने = चञ्चलनेत्रे ? इत्थम् = अनेन प्रकारेण, दुर्लभ-