मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ३७
टिप्पणी—जलद !—जल उपपदपूर्वक दानार्थक दो धातु से 'आतोऽनुपसर्गे कः' इस सूत्र से क प्रत्यय होकर 'उपपदमतिङ्' इस सूत्र से समास होकर जलद यह रूप बनता है। कथयतः—यहाँ णिजन्त 'कथि' धातु से 'लटः शतृशानचावाऽप्रथमा समानाधिकरणे' से शतृ प्रत्यय होकर कथयत् शब्द से 'आख्यातोपयोगे' इस सूत्र से पञ्चमी विभक्ति हुई है। प्रयाणम्—'प्र' उपसर्ग पूर्वक प्रयाणार्थक 'या' धातु से करण में 'ल्युट्' प्रत्यय करके 'प्रयाण' यह शब्द निष्पन्न होता है। तदनु—यहाँ 'अनु' को 'अनुर्लक्षणे' इस सूत्र से कर्म प्रवचनीय संज्ञा होकर 'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया' इस से द्वितीया विभक्ति हुई है। श्रोत्रपेयम्—श्रूयते आभ्यामिति श्रोत्रम्। श्रु धातु से औणादिक ष्ट्रन् प्रत्यय होकर 'श्रोत्र' शब्द बनता है। पातुं योग्यं पेयम् = पानार्थक पा धातु से 'अचो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय होकर 'ईद्यति' इस सूत्र से धातु के 'आकार' को ईत्व कर के 'पेयम्' यह रूप बनता है। सन्देशम्—'सम्' उपसर्गपूर्वक दिश् धातु से घञ् प्रत्यय का विधान कर 'सन्देश' यह शब्द निष्पन्न होता है। खिन्नः खिन्नः—क्षीणः क्षीणः यहाँ नित्यार्थ में 'नित्यवीप्सयोः' इस सूत्र से द्वित्व हुआ है। क्षीणः—क्षयार्थक 'क्षि' धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर 'क्षियो दीर्घात्' इस सूत्र से दीर्घ होकर नत्व, णत्वादि होकर क्षीण शब्द बना है। परिलघु—परितः लघुः परिलघु। यहाँ 'कुगतिप्रादयः' इस सूत्र से समास हुआ है। उपभुज्य—'उप' उपसर्ग पूर्वक भुज् धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में 'ल्यप्' आदेश करके उपभुज्य यह रूप बना है। अलङ्कार—यहाँ 'समासोक्ति' नामक अलंकार है ॥ १३ ॥
अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभि- र्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः । स्थानादस्मात् सरस-निचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान् ॥१४॥