भारतकोश
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मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पूर्वमेघः ३७

टिप्पणीजलद !—जल उपपदपूर्वक दानार्थक दो धातु से 'आतोऽनुपसर्गे कः' इस सूत्र से क प्रत्यय होकर 'उपपदमतिङ्' इस सूत्र से समास होकर जलद यह रूप बनता है। कथयतः—यहाँ णिजन्त 'कथि' धातु से 'लटः शतृशानचावाऽप्रथमा समानाधिकरणे' से शतृ प्रत्यय होकर कथयत् शब्द से 'आख्यातोपयोगे' इस सूत्र से पञ्चमी विभक्ति हुई है। प्रयाणम्—'प्र' उपसर्ग पूर्वक प्रयाणार्थक 'या' धातु से करण में 'ल्युट्' प्रत्यय करके 'प्रयाण' यह शब्द निष्पन्न होता है। तदनु—यहाँ 'अनु' को 'अनुर्लक्षणे' इस सूत्र से कर्म प्रवचनीय संज्ञा होकर 'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया' इस से द्वितीया विभक्ति हुई है। श्रोत्रपेयम्—श्रूयते आभ्यामिति श्रोत्रम्। श्रु धातु से औणादिक ष्ट्रन् प्रत्यय होकर 'श्रोत्र' शब्द बनता है। पातुं योग्यं पेयम् = पानार्थक पा धातु से 'अचो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय होकर 'ईद्यति' इस सूत्र से धातु के 'आकार' को ईत्व कर के 'पेयम्' यह रूप बनता है। सन्देशम्—'सम्' उपसर्गपूर्वक दिश् धातु से घञ् प्रत्यय का विधान कर 'सन्देश' यह शब्द निष्पन्न होता है। खिन्नः खिन्नः—क्षीणः क्षीणः यहाँ नित्यार्थ में 'नित्यवीप्सयोः' इस सूत्र से द्वित्व हुआ है। क्षीणः—क्षयार्थक 'क्षि' धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर 'क्षियो दीर्घात्' इस सूत्र से दीर्घ होकर नत्व, णत्वादि होकर क्षीण शब्द बना है। परिलघु—परितः लघुः परिलघु। यहाँ 'कुगतिप्रादयः' इस सूत्र से समास हुआ है। उपभुज्य—'उप' उपसर्ग पूर्वक भुज् धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में 'ल्यप्' आदेश करके उपभुज्य यह रूप बना है। अलङ्कार—यहाँ 'समासोक्ति' नामक अलंकार है ॥ १३ ॥

अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभि- र्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः । स्थानादस्मात् सरस-निचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान् ॥१४॥

३८मेघदूतम्

अन्वयः—अद्रेः शृङ्गं पवनः हरति किंस्वित् इति उन्मुखीभिः मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः चकितचकितं दृष्टोत्साहः सरसनिचुलात् अस्मात् स्थानात् पथि दिङ्नागानां स्थूलहस्तावलेपान् परिहरन् उदङ्मुखः खम् उत्पत ।

व्याख्या—अद्रेः=पर्वतस्य, शृङ्गम्=सानुम्, पवनः=वायुः, हरति किंस्वित् ? = कर्षति किम्, इति = एतादृश्याशंकयेति यावत्, उन्मुखीभिः=उन्नतास्याभिः, मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः=मूढसिद्धवधूभिः, चकितचकितम्=आश्चर्यसहितं यथा स्यात्तथा, दृष्टोत्साहः=प्रदर्शितोद्योगः, (सन्), सरसनिचुलात्=आर्द्रभूमिवेतसात्, अस्मात्=पुरोदृश्यमानात्, स्थानात्=आश्रमात्, पथि=अध्वनि, आकाशे इति भावः । दिङ्नागानां=दिग्गजानाम्, स्थूलहस्तावलेपान्=विशालशुण्डप्रहारान्, परिहरन्=परित्यजन्, उदङ्मुखः=उत्तराभिवदनः, ( सन् ) । खम्=आकाशम्, उत्पत = उद्गच्छ ।

शब्दार्थः—अद्रेः=पहाड़ की, शृंगम्=चोटी को, पवनः=वायु, हरति = ले जा रहा है, किंस्वित्=क्या ? ( इस शंका से ) उन्मुखीभिः=ऊपर को मुँह किये हुए, मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः = सीधी-सादी सिद्धों की वधुओं के द्वारा, चकितचकितम्=अत्यन्त आश्चर्य से, दृष्टोत्साहः=देखे गये उत्साह वाला, सरसनिचुलात् = गीले स्थल की वेतों से युक्त, पथि = रास्ते में, दिङ्नागानाम् = दिग्गजों के, स्थूलहस्तावलेपान् = लम्बी-लम्बी सूड़ों के प्रहारों को, परिहरन् = छोड़ता हुआ ( उनसे बचता हुआ ) उदङ्मुखः = उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, खम् = आकाश में, उत्पत = उड़ जाना ।

भावार्थः—हे मेघ ! अत्यधिकवेगेन गच्छतः भवत उद्योगमवलोक्य 'पवनः पर्वतशृङ्गं हरति किम्' ? इत्याशङ्कया मूढाः सिद्धप्रियाः आश्चर्य्यान्विताः भविष्यन्ति । तत आर्द्रस्थलवेतसात् पुरोदृश्यमानादस्मात् स्थानादाकाशमार्गे अन्तरायाणां दिग्गजानां पीवरशुण्डप्रहारान् परित्यजनलकागमनार्थमुत्तराभिमुखीभूय गगनमुत्पत ।

हिन्दी—हे मेघ ! अत्यधिक वेग से जाते हुए, तुम्हें देखकर भोली-भाली सिद्धों की प्रियाएँ 'वायु पर्वत की चोटी उड़ा कर ले जा रहा है क्या' ? ऐसा सोचकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हो जाएँगी । तुम भींगे स्थलवेतसों से परिपूर्ण

पूर्वमेघः ३९

इस आश्रम से गगनमार्ग में दिग्गजों की बड़ी-बड़ी सूँडों के आक्रमण से गगन मार्ग में बचते हुए अलकापुरी जाने के लिए उत्तर की ओर मुँह करके ऊपर उड़ जाओ ।

समासःउन्मुखीभिः—उन्नतं मुखं यासां ताः उन्मुखाः ताभिः (बहुव्रीहिः) मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः—सिद्धानाम् अङ्गनाः सिद्धाङ्गनाः (ष० त०) मुग्धाश्च ताः सिद्धाङ्गना मुग्धसिद्धाङ्गनाः (कर्म०) ताभिः । दृष्टोत्साहः—दृष्ट उत्साहो यस्य स दृष्टोत्साहः (बहु०) । सरस-निचुलात्—सरसा निचुला यस्मिंस्तत् सरसनिचुलम् (बहुव्री०) तस्मात् । दिङ्नागानां—दिशां नागाः =दिङ्नागाः (ष० तत्०) । तेषाम् । स्थूलहस्तावलेपान्—स्थूलाश्च ते हस्ताः =स्थूलहस्तावलेपान् (ष० त०) । उदङ्मुखः—उदक् मुखं यस्य स उदङ्मुखः (बहु०) ।

कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थल-वेतसे । शब्दार्णवः मतङ्गजो । गजो नागः कुञ्जरो वारणः करी इत्यमरः ।

टिप्पणीहरति—हरणार्थक हृधातु के वर्तमानकालिक लट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का रूप है (हृ + अ + ति) । किंस्वित्—"किम्" यह अव्यय है, और "स्वित्" यह अव्यय है— दोनों अव्यय मिलकर विकल्प और वितर्क इन दो अर्थों को प्रकाशित करते हैं। उन्मुखीभिः—यहाँ उन्मुख शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में "स्वाङ्गाच्चोपसर्जंनादसंयोगोपधात्" इस सूत्र से "ङीष्" प्रत्यय हुआ है। चकितचकितम्—चकितं यथा स्यात्तथा; यहाँ पर प्रकार अर्थ में "प्रकारे गुणवचनस्य" इस सूत्र से द्वित्व होकर 'कर्मधारयवदुत्तरेषु' इससे सु का लोप हो गया है। दृष्टः—दृश् धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर दृष्टः यह शब्द निष्पन्न होता है। स्थानात्—'ष्ठा' गतिनिवृत्तौ इस धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर स्थान यह रूप बना है, उस शब्द के पञ्चमी विभक्ति का यह रूप है। परिहरन्—'परि' उपसर्गपूर्वक 'हृ' धातु से वर्तमानकालिक लट् लकार के स्थान में 'शतृ' आदेश करके 'परिहरन्' यह रूप बनाया जाता

४० | मेघदूतम्


है। यहां महोपाध्याय मल्लिनाथ ने 'सरसनिचुलात्' और 'दिङ्नागानाम्' इन दो शब्दों के अधार पर उक्तार्थ के अलावे दूसरे अर्थ का भी प्रतिपादन किया है जो कि इस प्रकार है—सरसनिचुलात्=अर्थात् रसिक 'निचुल' नामक कालिदास के समकालीन कवि, जो कि दूसरे विरोधी कवियों द्वारा दिखाये गये दोषों का परिहरन करने वाले थे, ऐसे कवि के आश्रम से निर्दोष होने के कारण ऊँचे मुखवाले होते हुए मार्ग में अर्थात् सारस्वत मार्ग में विरोधी 'दिङ्नाग' जैसे आदरणीय कवि में हस्तावलेप=अर्थात् हस्तविन्यासपूर्वक दिखाये गये दोषों को दूर करते हुए अद्रेः=अर्थात् पर्वत की तरह ऊँचे दिङ्नागाचार्य की शृङ्गम्=प्रधानता को परिहरति=नष्ट करता है क्या ? इस कारण से सिद्धैः=महाकवियों द्वारा और अङ्गनाभिश्च=गुणशालिनी स्त्रियों द्वारा, दृष्टोत्साहः=उद्योग देखे जाते हुए, खम् उत्पत=आकाश में उड़ जाओ। परन्तु महोपाध्याय मल्लिनाथ जी का यह मत सर्वसम्मत नहीं है। दिङ्नागाचार्य कालिदास के विरोधी थे, यह भी एक विचारणीय विषय ही है। क्योंकि 'दिङ्नाग' नाम के अनेक विद्वान् हो गये हैं। बौद्ध दर्शन के विद्वान् वसुबन्धु के शिष्य 'दिङ्नाग' कालिदास के विरोधी इसलिए नहीं माने जा सकते, क्योंकि दोनों का समय भिन्न है। यदि यह कहा जाय कि कालभेद होने पर भी पूर्वकालिक विद्वान् के मत का खण्डन उत्तरकालिक कवि कर सकता है अतः दिङ्नाग का विरोधी महाकवि हैं, तो यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि कालिदास का काल आधुनिक बहुत से विद्वानों के मत में विक्रमीय प्रथम शताब्दी है जब कि दिङ्नागाचार्य का काल पाँचवीं शताब्दी है। और भी सम्प्रदायान्तर के विद्वान् के लिए आदरार्थक बहुवचनान्त का प्रयोग भी आपत्तिपूर्ण नहीं प्रतीत होता। अब समस्या यहाँ यह खड़ी हो जाती है कि—उत्तरदिशा जब एक है और एक दिशा में एक ही दिग्गज होता है तो महाकवि ने 'दिङ्नागानाम्' यह बहुवचनान्त का प्रयोग कैसे किया ? तो इसका समाधान यह है कि एक उत्तर दिशा में एक उत्तर दिशा के अलावे अन्य दिग्गजों के स्थूल सूड़ों के प्रहार से बचते हुए ऐसा अर्थ करने से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आ सकती है ॥ १४ ॥

पूर्वमेघः ४१

रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत् पुरस्तात् वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनुष्खण्डमाखण्डलस्य । येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः ॥ १५ ॥

अन्वयः — रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव प्रेक्ष्यम् आखण्डलस्य एतत् धनुष्खण्डम् पुरस्तात् वल्मीकाग्रात् प्रभवति । येन ते श्यामं वपुः स्फुरितरुचिना बर्हेण गोपवेषस्य विष्णोः ( श्यामं वपुः ) इव अतितरां कान्तिम् आपत्स्यते ।

व्याख्या — ( हे मेघ ) रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव = पद्मरागादिमणिप्रभासम्मिश्रणमिव, प्रेक्ष्यम् = दृश्यम्, आखण्डलस्य = इन्द्रस्य, एतत् = पुरोवर्ति, धनुष्खण्डम् = चापशकलम्, पुरस्तात् = अग्रतः, वल्मीकाग्रात् = नाकुविवरात्, प्रभवति = उद्गच्छति । येन = चापशकलेन, ते = तव "मेघस्येत्यर्थः" श्यामम् = कृष्णवर्णम्, वपुः = शरीरम्, स्फुरितरुचिना = धवलकान्तिना, बर्हेण = पिच्छेन, गोपवेषस्य = ग्वालवेषस्य, विष्णोः = हरेः "कृष्णस्येति यावत्", इव = यथा, अतितराम् = सातिशयम्, कान्तिम् = श्रियम्, आपत्स्यते = प्राप्स्यते ।

शब्दार्थः—(हे मेघ) रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव = रत्नों की कान्तियों के सम्मिश्रण जैसा, प्रेक्ष्यम् = दीखने वाला, आखण्डलस्य = इन्द्र का, एतत् = यह ( सामने ), धनुष्खण्डम् = धनुष का टुकड़ा, पुरस्तात् = सामने, वल्मीकाग्रात् = बांबी के अग्रभाग से, प्रभवति = निकल रहा है। येन = जिससे ( धनुष के टुकड़े से ) ते = तेरा, श्यामम् = काले रंग का वपुः = शरीर, स्फुरितरुचिना = उजली कान्ति वाले, बर्हेण = मोरपंख से, गोपवेषस्य = ग्वालवेषधारण किए हुए, विष्णोः = कृष्ण के, अतितराम् = अत्यधिक, कान्तिम् = शोभा को, आपत्स्यते = धारण करेगा ।

समासः—रत्नानां छाया = रत्नच्छायम् (ष० तत्०) आसमन्तात् व्यतिकरः आव्यतिकरः (उपपद० य०) रत्नच्छायस्य आव्यतिकरः=रत्नच्छायाऽऽव्यतिकरः

४२मेघदूतम्

(ष० तत्०)। वल्मीकस्य अग्रम् = वल्मीकाग्रम् (ष० तत्०) तस्मात् । धनुषः खण्डम्=धनुष्खण्डम् (ष० तत्०) । गोपानां वेषः=गोपवेषः (ष० तत्०) तस्य ।

कोशः—रत्नं मणिः द्वयोरश्मजातौ मुक्तादिकेऽपि च, इत्यमरः । आखण्डलः सहस्राक्षः, इत्यमरः । कृष्णे नीलाऽसितश्यामकालश्यामलमेचकाः, इत्यमरः । पिच्छ बर्हे नपुंसक, इत्यमरः । छाया सूर्यप्रिया कान्तिः, इत्यमरः ।

भावार्थः—( हे मेघ ! ) पद्मरागादिमणीनां संमिश्रणमिव सुन्दरमेतदिन्द्रधनुः पुरस्तात् वल्मीकविवरादाविर्भवति, येन धवलकांतिसंवलितेन, मयूरपिच्छेन गोपवेषस्य कृष्णस्येव तावकीनपि श्यामं शरीरं सातिशयं शोभासम्पन्नं भविष्यति ।

हिन्दी—हे मेघ ! पद्मराग आदि मणियों की प्रभा के सम्मिश्रण की तरह दर्शनीय इन्द्रधनुष सामने बांबी के अग्रभाग से निकल रहा है । जिस इन्द्रधनुष के टुकड़े से, श्याम रंग का यह तेरा शरीर, उज्ज्वल कांतिवाले मोरपंख से गोपवेषधारी कृष्ण के शरीर के समान अत्यधिक शोभा को प्राप्त करेगा ।

टिप्पणीरत्नच्छायाम्=रत्नानां छाया रत्नच्छायाम् ( ष० तत्० )। यहाँ ‘’छाया बाहुल्ये’’ इस सूत्र से नपुंसकलिङ्ग हुआ है । व्यतिकरः -“वि” और “अति” इन दो उपसर्गपूर्वक “कृ” धातु से “ऋदोरप्” इस सूत्र से “अप्” प्रत्यय करके गुणादि करके “व्यतिकर” यह रूप बना है । आसमंतात् व्यतिकर आव्यतिकरः यहाँ “कुगति प्रादयः” इस सूत्र से समास हुआ है । प्रेक्ष्यम्—“प्र” उपसर्गपूर्वक “ईक्ष” धातु से “ण्यत्” प्रत्यय होकर “प्रेक्ष्यम्”, यह शब्द बनता है । धनुष्खण्डम्—किसी-किसी पुस्तक में “धनुःखण्डम्” यह पाठ मिलता है जो कि पाणिनीय व्याकरण के अनुसार अशुद्ध है क्योंकि “नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य” इस सूत्र से यहाँ नित्य मूर्धन्य षकार होता है ।

इन्द्रधनुष के विषय में वृहत्संहिता में लिखा है—

सूर्यस्य विविधाः वर्णाः, पवनेन विघट्टिताः साभ्रे ।
वियति धनुः संस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥

४३

पूर्वमेघः

पुरस्तात् — '‘पूर्वायां दिशि’’ इस विग्रह में 'पूर्वा' शब्द से प्रकृत्यर्थ में "दिक्शब्देभ्य" सप्तमी पञ्चमी प्रथमाभ्यो "दिग्देशकालेष्वस्ताति" इस सूत्र से "अस्ताति" प्रत्यय लाकर "अस्ताति च" इस सूत्र से पूर्वा के स्थान पर "पुर" यह आदेश करके "पुरस्तात्" यह रूप बना है। अतितराम्— "अतितर" शब्द से "किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे" इस सूत्र से "आमु" प्रत्यय करके "अतितराम्" यह रूप बना है।

अलंकार—इस श्लोक के प्रथम चरण में एवं चतुर्थ में दो श्रौती उपमा निरपेक्ष रूप से है अतः यहाँ 'संसृष्टि' अलङ्कार है ॥१५॥

त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति भ्रू विलासानभिज्ञैः
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः ।
सद्यः सीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य मालं
किञ्चित्पश्चाद् व्रज लघुगतिर्भूय एवोत्तरेण ॥१६॥

अन्वयः—कृषिफलं त्वयि आयत्तम् इति हेतोः भ्रूविलासानभिज्ञैः प्रीतिस्निग्धैः जनपदवधूलोचनैः पीयमानः सीरोत्कषण-सुरभि मालं क्षेत्रं सद्यः आरुह्य किञ्चित् पश्चात् भूयः लघुगतिः उत्तरेण एव व्रज ।

व्याख्या—कृषिफलम् = सस्यादिकम्, त्वयि = मेघे, आयत्तम् = अधीनम्, इति = अस्मात्, हेतोः = कारणात्, भ्रूविलासानभिज्ञैः = कटाक्षवृत्त्यपरिचितैः, प्रीतिस्निग्धैः = स्नेहस्नपितैः । जनपदवधूलोचनैः = नीवृन्महिला नयनैः, पीयमानः = सादरमीक्षमाणः सीरोत्कषणसुरभि = लाङ्गलविदारणेन घ्राण-तर्पणं (यथा स्यात्तथा) मालम् = मालनामानम्, क्षेत्रम् = केदारम्, सद्यः = तत्क्षणम्, आरुह्य = आरोहणं विधाय, किञ्चित्पश्चात् = कियत्क्षणानन्तरन्, भूयः = पुनः, लघुगतिः = द्रुतगमनः (सन्) उत्तरेण एव = उत्तरमार्गेण एव, व्रज = गच्छ।

शब्दार्थ—कृषिफलम् = खेती का फल (धान आदि), त्वयि = तुम्हारे आयत्तम् = अधीन है, इति = इस, हेतोः = कारण से, भ्रूविलासानभिज्ञैः = भौंहों के विलास से अपरिचित (भोली-भाली), प्रीतिस्निग्धैः = स्नेह से ओत-

४४ मेघदूतम्

श्रोत, जनपदवधूलोचनैः = ग्रामीण महिलाओं की आँखों से; पीयमानः = आदर के साथ देखा जाता हुआ, सीरोत्कषणसुरभि = हल चलने के कारण जहां से भीनी सुगन्ध निकल रही है (ऐसे) मालक्षेत्रम् = माल नामक क्षेत्र पर (पठार पर), सद्यः = तुरत ही, आरुह्य = चढ़कर अर्थात् बरसकर, किञ्चित्-पश्चात् = कुछ देर बाद भूयः = फिर, लघुगतिः (सन्) = तेज गति वाला होकर, उत्तरेण एव = उत्तर दिशा की ओर ही, व्रज = जाना ।

हिन्दी—हे मेघ ! खेती का परिणाम (उपज) तुम्हारे अधीन है, इसलिए रास्ते के कटाक्ष विक्षेपादि से अपरिचित भोली-भाली ग्रामीण स्त्रियों की आँखों से आदरपूर्वक (सस्नेह) देखे जाते हुए तुम, जहाँ तुरत हल चलाया गया है ऐसे "माल" नामक पठारी भाग पर बरसकर उसे सुगन्धित बना कर कुछ समय के बाद फिर तेज गति से उत्तर मार्ग से ही चले जाना ।

समासः—भ्रुवः विलासः = भ्रूविलासः (ष० तत्०) तेभ्यः अनभिज्ञैः = भ्रूविलासानभिज्ञैः (ष० तत्०) । प्रीत्या स्निग्धैः = प्रीतिस्निग्धैः (तृ० तत्०) । जनपदस्य वधूः = जनपदवधूः तासां लोचनैः (ष० तत्०) । सीरैः उत्कषणम्—सीरोत्कषणम् (तृ० तत्०) तेन सुरभि यथा स्यात् तथा क्रियाविशेषणम् ।

कोशः—अधीनो निघ्न आयत्तः, इत्यमरः । नीवृज्जनपदो देशः, इत्यमरः । लाङ्गलं हलम्, गोदारणञ्च सीरोंऽधः, इत्यमरः । सुरभिर्घाणतर्पणः, इत्यमरः । केदारः क्षेत्रमस्यतु, इत्यमरः । लघुक्षिप्रमरं द्रुतम्, इत्यमरः ।

भावार्थः—हे मेघ ! कृषेः फलं सस्यादिकं त्वदधीनमत एव स्वाभाविक-स्नेह-स्नपितैः भ्रूविकारप्रदर्शनादक्षैः ग्राम्यवधूभिः सादरमवलोक्यमानस्त्वं लाङ्गलोत्कर्षणेन सुगन्धियुक्तं मालनामकमुन्नतं प्रदेशं वृष्टया सनाधीकृत्य कियत्कालानन्तरं द्रुतगत्या पुनरुत्तरेणैव मार्गेण गच्छ ।

टिप्पणीत्वय्यायत्तम्—यहाँ अधिकार विवक्षा में "युष्मद्" शब्द से सप्तमी हुई है । "आ" (ङ्) उपसर्गपूर्वक "गम्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके आयत्तम् यह रूप बनता है । उत्तरेण—यहाँ "प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्" से तृतीया हुई है ॥ १६ ॥

पूर्वमेघः ४५

त्वामासार—प्रशमित—वनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्रकूटः । न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः ॥१७॥

अन्वयः—आम्रकूटः सानुमान् आसार-प्रशमित-वनोपप्लवम् अध्वश्रम-परिगतं त्वाम् साधु मूर्ध्ना वक्ष्यति । क्षुद्रः अपि संश्रयाय मित्रे प्राप्ते प्रथम-सुकृताऽपेक्षया विमुखः न भवति । यः तथा उच्चैः किं पुनः ।

व्याख्या—आम्रकूटः=एतन्नामकः, सानुमान्=पर्वतः, आसार-प्रशमित-वनोपप्लवम्=धारासंपातापसारितदावानलं, अध्वश्रमपरिगतम्=मार्गपरिश्रम-क्लान्तम्, त्वाम्=भवन्तं मेघमिति यावत्; साधु=समीचीनम्, मूर्ध्ना=शिरसा, शृङ्गेण, वक्ष्यति=वोढा; क्षुद्रः अपि=साधारणोऽपि, संश्रयाय=आश्रयाय, मित्रे=सख्यो, प्राप्ते=आगते (सति) । प्रथमसुकृतापेक्षया=कृतपूर्वोकारसंस्मरणेन, विमुखः=पराङ्मुखः न भवति, यः=आम्रकूटः पर्वतः, तथा उच्चैः=तथाविधो महान् (सः), किं पुनः=विमुखो भविष्यति किम् ? कदापि न भविष्यति ।

शब्दार्थ—आम्रकूटः=आम्रकूट नाम का, सानुमान्=पर्वत, आसार-प्रशमितवनोपप्लवम्=मूसलाधार वृष्टि से दावाग्नि को शान्त करनेवाले, अध्व-श्रमपरिगतम्=मार्ग के परिश्रम से थके हुए, त्वाम्=तुम को, साधु=अच्छी तरह, मूर्ध्ना=शिर पर (चोटी पर) वक्ष्यति=धारण करेगा । क्षुद्रोऽपि=साधारण जन भी, संश्रयाय=आश्रय के लिए, मित्रे=मित्र के; प्राप्ते=आने पर, प्रथम-सुकृतापेक्षया=पहले के किये हुए उपकारों को याद कर, विमुखः न=मुँह नहीं मोड़ता, भवति=है । यः=जो आम्रकूट पर्वत, तथा उच्चैः=वैसा ऊँचा है । किं पुनः=क्या वह मुँह मोड़ेगा ? कभी नहीं मुँह मोड़ेगा ।

भावार्थः—हे मेघ ! धारासम्पातेन प्रशमित-वनाग्नि मार्गजन्य-परिश्रम-क्लान्तं त्वामाम्रकूटोऽद्रिः शिखरेण सम्यक् प्रकारेण धारयिष्यति । (यतोहि)

४६ मेघदूतम्

नीचोऽपि आश्रयाय गृहागतं मित्रमवलोक्य पूर्वकृतोपकारं स्मृत्य पराङ्मुखो न भवति, यः आम्रकूटपर्वतस्तादृशो महान् स कथं भविष्यति। नैव भविष्यतीतिभावः।

हिन्दी—हे मेघ ! मूसलाधार वृष्टि के द्वारा दावाग्नि को बुझाने वाले, मार्ग के परिश्रम से थके हुए तुमको आम्रकूट पर्वत शिखर पर धारण करेगा। (क्योंकि) छोटे भी (जन) आश्रय के लिए मित्र के आने पर पहले के उपकारों को याद कर मुंह नहीं मोड़ते तो फिर जो आम्रकूट उतना महान् है वह मुँह मोड़ेगा क्या ? कभी नहीं मुँह मोड़ेगा।

समासः—आम्राणां कूटो यत्र स आम्रकूटः ( बहुव्रीहिः ) । आसारेण प्रशमितो वनोपप्लवो येन तम् आसारप्रशमितवनोपप्लवम् ( बहुव्रीहिः ) । अध्वनः श्रमः = अध्वश्रमः ( ष० तत्० ) तेन परिगतस्तम् ( तृ० तत्० ) ।

कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । धारा-सम्पात-असारः, इत्यमरः । सरणिर्वर्त्म मार्गाध्व, इत्यमरः । क्षुद्रो दरिद्रः कृपणे, इति यादवः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः । पुंस्यादि पूर्वपौरस्त्य प्रथमाद्या, इत्यमरः ।

टिप्पणीआम्रकूटः—यहाँ पर कुछ टीकाकार 'आम्राः कूटेषु यस्य सः' इस प्रकार व्यधिकरण बहुव्रीहि समास मानते हैं । सानुमान्—सानवः सन्ति यस्मिन् ऐसे विग्रह में 'सानु' शब्द से 'मतुप्' प्रत्यय करके सानुमान् यह रूप बना है । वक्ष्यति—'वह' धातु के 'लृट्' लकार के प्रथम पुरुष के एक वचन का रूप है ( वह + स्य + ति ) । संश्रयाय—'सम्' उपसर्गपूर्वक सेवार्थक 'श्रिञ्' धातु से 'एरच्' इस सूत्र से भाव में अच् प्रत्यय करके 'संश्रयः' यह रूप बनता है, यहां 'तुमर्थाच्च भाववचनात्' से चतुर्थी हुई है ।

अलंकार—यहाँ अर्थान्तरन्यास एवं अर्थापत्ति इन दोनों अलंकारों के अङ्गाङ्गिभाव होने से 'सङ्कर' नामक अलङ्कार है ॥ १७ ॥

छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैः स्त्वय्यारूढे शिखरमचलः स्निग्धवेणीसवर्णे ।

पूर्वमेघः ४७

नूनं यास्यत्यमर—मिथुन—प्रेक्षणीयामवस्थां
मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः ॥१८॥

अन्वयः – परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैः छन्नोपान्तः अचलः स्निग्ध-वेणी-सवर्णे त्वयि शिखरम् आरूढे, मध्येश्यामः शेषविस्तारपाण्डुः भुवः स्तन इव अमरमिथुन-प्रेक्षणीयाम्, अवस्थां नूनं यास्यति ।

व्याख्या—( हे मेघ ! ) परिणतफलद्योतिभिः=पक्वफलशोभिभिः काननाम्रैः = वन्यचूतैः, छन्नोपान्तः=आवृतपार्श्वप्रदेशः, अचलः=पर्वतः आम्रकूटः इत्यर्थः । स्निग्धवेणी-सवर्णे = चिक्कणकेशपाशतुल्यवर्णे, त्वयि=मेघे, शिखरम्=शृङ्गम्, आरूढे=आरोहणंकृते सति, मध्येश्यामः=कृष्णान्तरः, शेषविस्तारपाण्डुः=मध्यभागातिरिक्तपीतवर्णः, भुवः=पृथिव्याः, स्तनः=कुचः, इव=यथा, अमरमिथुनप्रेक्षणीयाम्=देवयुगलावलोकनीयाम्, अवस्थाम् = दशाम्, नूनम् = अवश्यम् यास्यति = प्राप्स्यति ।

शब्दार्थः—हे मेघ ! परिणतफलद्योतिभिः=परिपक्वफलों से चमकनेवाले, काननाम्रैः=जंगल के आमों से, छन्नोपान्तः=ढके हुए, पार्श्वभागवाला, अचलः=आम्रकूटपर्वतः, स्निग्धवेणी-सवर्णे=चिकने केशपाश की तरह रंगवाले, त्वयि=तुम्हारे, शिखरम्=शिखर पर, आरूढे=चढ़ जाने पर, मध्येश्यामः=बीच में काला, शेषविस्तारपाण्डुः=और विस्तृत भाग में पीला, भुवः=पृथ्वी के, स्तन इव=स्तन की तरह, अमरमिथुनप्रेक्षणीयाम्=देवदम्पतियों के द्वारा दर्शनीय, अवस्थाम्=दशा को, नूनम्=अवश्य ही, यास्यति=प्राप्त करेगा ।

भावार्थः—( हे मेघ ) पक्वफलकान्तिभिः वनाम्रैराच्छादितपार्श्वभागः आम्रकूटोऽद्रिः कृष्णवर्णे त्वयि मेघे शृङ्गे सति मध्ये कृष्णः अन्तभागेषु पाण्डुरः पृथिव्याः स्तन इव देवदम्पतीनां दर्शनीयामवस्थां निश्चयमेव यास्यति ।

हिन्दी—हे मेघ ! चिकनी वेणी के समान काले रंगवाले तुम जब आम्रकूट के शिखर पर चढ़ जाओगे, तब वह पर्वत पके हुए फलों से चमकनेवाले जंगली

४ मे० दू०

४८ मेघदूतम्

आमों से घिरे हुए पार्श्व भागवाला देवदम्पतियों के देखने योग्य अवश्य बन जायेगा, जैसा कि बीच में काला और शेष विस्तृत भाग में पीला-सा पृथ्वी का स्तन हो ।

समासः— स्निग्धाया वेणी तस्याः सदृशः वर्णः यस्य सः स्निग्धवेणीसवर्णः तस्मिन् (बहुव्रीहिः) । काननेषु भवाः आम्राः काननाम्राः ( मध्यमपदलोपी ) तैः । परिणतैः फलैः द्योतन्ते तैः (तृ० तत्० ) । छन्नांः उपान्ताः यस्य सः छन्नोपान्तः (बहुव्रीहि) । शेषे विस्तारे पाण्डुः शेषविस्तारपाण्डुः (स० त०) ।

कोशः— पक्वं परिणतम्, इत्यमरः । कृष्णे नीलाऽसित-श्यामः, इत्यमरः । चिक्कणं मसृणं स्निग्धम्, इत्यमरः । वेणी तु केशबन्धे जलस्रुतौ, इति यादवः । हरिणः पाण्डुरः पाण्डुः, इत्यमरः । मिथुनं तु द्वयो राशिभेदे स्त्रीपुंस-युग्मके, इति मेदिनी ।

टिप्पणी— छन्नः—'छद्' इस धातु से क्त प्रत्यय करके छन्न इस तरह का रूप बनता है । स्निग्धा—'स्निह्' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके स्निग्धा यह रूप बनता है । **सवर्णः—**समानो वर्णः सवर्णः यहाँ 'ज्योतिर्जनपदरात्रिनाभि' इत्यादि सूत्र से समान के स्थान पर 'स' ऐसा आदेश किया गया है । आरूढः—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'रुह्' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके आरूढ ऐसा रूप बनता है । **अमरमिथुन-प्रेक्षणीयाम्—**यहाँ अमरमिथुनानां प्रेक्षणीया ताम् 'कृत्यानां कर्तरि वा' इस सूत्र से विकल्प से 'अमर मिथुन' शब्द से षष्ठी विभक्ति होती है तब षष्ठी समास किया गया है ॥ १८ ॥

स्थित्वा तस्मिन् वनचरवधुक्तकुञ्जे मुहूर्तं
तोयोत्सर्गद्रुततरगतिस्तत्परं वर्त्म तीर्णः ।
रेवां द्रक्ष्यस्युपलविषमे विन्ध्यपादे विशीर्णां
भक्तिच्छेदैरिव विरचिता भूतिमङ्गे गजस्य ॥ १९ ॥

अन्वयः—( हे मेघ ! ) वनचरवधूभुक्तकुञ्जे, तस्मिन् मुहूर्तं स्थित्वा,

पूर्वमेघः ४९

तोयोत्सर्गद्रुततरगतिः तत्परं वर्त्मतीर्णः उपल-विषमे विन्ध्यपादे विशीर्णाम्
रेवाम् गजस्य अङ्गे भक्तिच्छेदैः विरचिताम् भूतिम् इव द्रक्ष्यसि ।

व्याख्या—( हे मेघ ! ) वनचर-वधू-भुक्त-कुञ्जे=किरात-कामिनी-भुक्तलता-सदने, तस्मिन्=आम्रकूटे ( पर्वते ) मुहूर्त्तम् = किञ्चित्क्षणम्, स्थित्वा = विरम्य, तोयोत्सर्गद्रुततरगतिः = जलवर्षणेनातिशीघ्रगमनः तत्परम्=आम्रकूटानन्तरम्, वर्त्म=मार्गम्, तीर्णः=अतिक्रान्तः सन्, उपलविषमे = पाषाणनिम्नोन्नते, विन्ध्यपादे = विन्ध्याचल-प्रत्यन्तपर्वते, विशीर्णाम् = प्रसृताम्, रेवाम् = नर्मदाम्, गजस्य = हस्तिनः, अङ्गे=शरीरे, भक्तिच्छेदैः=रेखा-भङ्गिभिः, विरचिताम् = निर्मिताम्, भूतिम् = मातङ्गशृङ्गारं, इव = यथा, द्रक्ष्यसि = विलोकयिष्यसि ।

शब्दार्थः—( हे मेघ ! ) वनचरवधूभुक्तकुञ्जे=किरात-कामिनियों द्वारा उपभुक्त लताकुञ्जों वाले, तस्मिन् = उस, आम्रकूट पर्वत पर, मुहूर्त्तम् = कुछ देर, स्थित्वा = ठहरकर, तोयोत्संगद्रुततर-गतिः=जल बरसाने के कारण शीघ्र-गमनवाले ( तुम ), तत्परम् = आम्रकूट के आगे, वर्त्म = रास्ते को, तीर्णः=पार करके, उपलविषमे=पत्थरों के कारण ऊँची-नीची, विन्ध्यपादे = विन्ध्या-चलपर्वत की तलहटी में, विशीर्णाम् = फैली हुई, रेवाम् = नर्मदा को, गजस्य = हाथी के, अङ्गे = अङ्ग में, भक्तिच्छेदैः = चित्रकारी के द्वारा, विरचिताम् = बनायी गई, भूतिम् = सजावट, इव = की तरह, द्रक्ष्यसि = देखोगे ।

भावार्थः—हे मेघ ! आम्रकूट-पर्वतस्य किरातकामिनीभिः कृतसम्भोगे लतागृहे किञ्चित्क्षणं विश्रम्य तत्र जलवर्षणेन द्रुतगतिः सन् आम्रकूटात्परं मार्गमतिक्रम्य प्रस्तरबहुलान्निम्नोन्नत-भूमौ विन्ध्याद्रेस्तटे विस्तीर्णां नर्मदां गज-मस्तके रचनाभङ्गिभिर्विरचितां भस्मरेखामिवावलोकयिष्यसि ।

हिन्दी—हे मेघ ! वनचर वधुओं के द्वारा उपभुक्त लताकुञ्ज वाले उस आम्रकूट पर्वत पर कुछ देर विश्राम करके पानी बरसने के कारण शीघ्र गति से आम्रकूट के आगे के मार्ग को पार करके ऊँचे-नीचे पथरीले बिन्ध्याचल

५० मेघदूतम्

प्रान्त में विस्तृत नर्मदा नदी को, हाथी के शरीर में, रचना-विशेष के माध्यम से बनायी गयी शृङ्गार-रेखा की तरह देखोगे ।

समासः - वने चरन्तीति वनचराः ( उपपद तत्० ) तेषां वध्वः, ताभिः भुक्ताः कुञ्जाः यस्मिन्, तस्मिन् ( बहुव्रीहि )। तोयस्य उत्सर्गः = तोयोत्सर्गः ( ष० तत्० ) तेन द्रुततरगतिः = तोयोत्सर्गद्रुततरगतिः ( तृ० तत् ) द्रुततरा गतिर्यस्य स द्रुततरगतिः ( बहुव्रीहिः ) । तस्मात्परं = तत्परम् ( सुप्सुपेति-समासः ) । उपलेन विषमः उपलविषमः तस्मिन् ( तृ० तत्० ) । विन्ध्यस्य-पादे विन्ध्यपादे ( ष० तत्० )।

कोशः - निकुञ्जकुञ्जौ वा क्लीबे लतादि पिहितोदरे, इत्यमरः । मुहूर्त्तमल्पकाले स्याद् घटिका द्वितयेऽपि च, इति शब्दार्णवः । पादाः प्रत्यन्तपर्वतः, इत्यमरः । पादो ब्रध्ने तुरीयांशे शैलप्रत्यन्तपर्वते, इति मेदिनी । रेवा तु नर्मदा सोमोद्भवा मेकलकन्यका, इत्यमरः । भूतिर्मातङ्ग-शृङ्गारे जातौ भस्मनि सम्पदि, इति विश्वः ।

टिप्पणी - वनचरवधूभुक्त० — यहाँ वन उपपदपूर्वक गत्यर्थक "चर्" धातु से "उपपदमतिङ्" इस सूत्र से समास करके "चरेष्टः" इस सूत्र से "ट" प्रत्यय करके "वनचर" शब्द बनाया जाता है । "तत्पुरुषे कृति बहुलम्" से वैकल्पिक अलुक् समास करके "वनेचर" ऐसा रूप भी बनता है । द्रुततर-गतिः - अतिशयेन द्रुता = द्रुततरा तथा भूता गतिर्यस्य स द्रुततरगतिः । यहाँ "द्रुता" शब्द से "द्विवचन-विभज्योपपदे तरबीयसुनौ" इस सूत्र से "तरप्" प्रत्यय किया गया है एवं स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके "द्रुततरा" यह रूप निष्पन्न होता है । विन्ध्य पर्वत भी सात कुल पर्वतों में से एक हैं, जैसे—

महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः ।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः ॥

नर्मदा भी सात पूज्य नदियों में एक है । जैसा कि स्नान के समय लोग बोला करते हैं—

पूर्वमेघः ५१

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधि कुरु ॥

**अलङ्कार—**यहाँ समासोक्ति एवं श्रौती उपमा के अङ्गाङ्गिभाव से रहने के कारण संकर अलङ्कार है ॥ १९ ॥

तस्यास्तिक्तैर्वनगजमदैर्वासितं वान्तवृष्टि-
र्जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः ।
अन्तःसारं घन ! तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां
रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ॥ २० ॥

**अन्वयः—**हे घन ! वान्तवृष्टिः तिक्तैः वनगजमदैः वासितम् जम्बूकुञ्ज-प्रतिहतरयम् तस्याः तोयम् आदाय गच्छेः । अन्तःसारम् त्वाम् अनिलः तुलयितुं न शक्ष्यति हि रिक्तः सर्वः लघुः भवति पूर्णता गौरवाय ।

**व्याख्या—**हे घन ! हे जलद ! वान्तवृष्टिः = उद्गीर्णवर्षः, (सन्) तिक्तैः = कटुभिः तिक्तरसान्वितैश्चेत्यर्थः, वनगजमदैः = काननहस्तिदानवारिभिः, वासितम् = सुगन्धितम्, जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयम् = जाम्बवनिकुञ्जप्रतिबद्धजवम् = तस्याः = नर्मदायाः, तोयम् = जलम्; आदाय = नीत्वाः, गच्छेः = व्रज । अन्तः-सारम् = अन्तःस्थितत्वम् बलमिति यावत् जलपरिपूर्णमितिभावः । त्वाम् = मेघम्, अनिलः = वायुः, तुलयितुम् = मापयितुम्; न शक्ष्यति = न समर्थो भविष्यति, हि = निश्चयेन, रिक्तः = निःसारः शून्य इत्यर्थः, सर्वः = सकलः, लघुः = न्यूनः, हेय इति भावः, भवति = वर्तते, पूर्णता = सारवत्ता, गौरवाय = गरिम्णे भवति ।

**शब्दार्थः—**हे मेघ ! वान्तवृष्टिः = जल बरसाये हुए, तिक्तैः = सुगन्धित वनगजमदैः = जंगली हाथियों के मदजल से, वासितम् = सुगन्धित, जम्बूकुञ्ज-प्रतिहतरयम् = जामुन के निकुञ्ज से रोके हुए वेगवाले, तोयम् = जल को, आदाय = लेकर, गच्छेः = जाना । अन्तःसारम् = भीतर से शक्तिशाली, त्वाम् = तुझ को, अनिलः = वायु, तुलयितुम् = हिलाने में, न शक्ष्यति = समर्थ नहीं

५२मेघदूतम्

होगा, हि = क्योंकि, रिक्तः = भीतर से खाली, सर्वः = सभी, लघुः = हल्का ( हेय ) "और" पूर्णता = गुरुता, गौरवाय = गौरव के लिए, भवति = होता है ।

भावार्थः—हे मेघ ! तत्र जलवर्षणानन्तरं सुगन्धिभिर्वन्यगजानां दानवारिभिः सुवासितं जम्बूनिकुञ्जावरुद्धवेगं नर्मदाजलं गृहीत्वा व्रज ! जलवत्वादन्तःसारं त्वां पवनः प्रकम्पयितुं समर्थो न भविष्यति, यतो हि निःसारः सर्वोऽपि हेयः भवति, केवलं सारवतैव गौरवास्पदं भवति ।

हिन्दी—हे मेघ ! वहाँ जल बरसाने के बाद जंगली हाथियों के सुगन्धित मदजल से सुवासित जामुनों के निकुञ्जों के द्वारा रोके गये वेग वाले नर्मदा नदी के जल को लेकर (आगे) जाना । भीतर से शक्तिशाली तुझे वायु हिला नहीं सकेगा, क्योंकि प्रत्येक वस्तु जो भीतर से निःसार हो, हल्की होती है एवं भरापन गुरुता के लिए होता है ।

समासः—वान्ता वृष्टिर्येन स वान्तवृष्टिः (बहुव्रीहिः) । वनस्य गजा वनगजाः ( ष० तत्० ) तेषां मदैः वनगजमदैः (ष० तत्०) । जम्बूनां कुञ्ज-जम्बूकूञ्जः ( ष० तत्० ) तैः प्रतिहतो रयः यस्य तम् जम्बुकुञ्जप्रतिहतरयम् (बहुव्रीहि ) । अन्तः सारो यस्य तम् अन्तःसारम् (बहुव्रीहिः) ।

कोशः—वृष्टिर्वर्षम्, इत्यमरः । तिक्तो रसे सुगन्धे च, इति विश्वः । जम्बू स्त्री जम्बुजाम्बवम्, इत्यमरः । सारो बले स्थिरांशे च, इत्ययरः, सारो बले मज्जनि च स्थिरांशे, न्याये च नीरे च घने सारम्, इति विश्वः । भवेत् प्रतिहतं द्विष्टे प्रतिस्खलितरुद्धयः, इति मेदिनी । मदो रेतसि कस्तूर्यां गर्वे हर्षेभदानयोः, इति विश्वः ।

टिप्पणी—(दु) वम् धातु से कर्म में क्त प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके 'वान्ता' ऐसा प्रयोग बनता है । यहाँ "वम्" धातु का "उगलना" अर्थ होने पर भी गौणवृत्ति का आश्रय लेने के कारण जुगुप्सा व्यंजक अश्लीलता नहीं आ पायी है । क्योंकि "निष्ठ्यूतोद्गीर्णवान्तादिगौणवृत्तिव्यपाश्रयम् । अति सुन्दरमन्यत्र ग्राम्यकक्षां विगाहते ।" ऐसा दण्डी लिखते हैं । आदाय—आङ्उप-

पूर्वमेघः ५३

सर्गपूर्वक "दा" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके उक्त रूप निष्पन्न होता है। गच्छेः—यहाँ "विधिनिमन्त्रणामन्त्रणादि" सूत्र से विधि में लिङ् है। तुलयितुम्—यहां "तुल" धातु से "तत्करोति तदाचष्टे" इस सूत्र से "णिच्" प्रत्यय करके पश्चात् "समानकर्तृकेषु तुमुन्" इस सूत्र से "तुमुन्" प्रत्यय किया गया है। शक्ष्यति—'शक्' धातु के लृट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है। (शक् + स्य + ति)। प्रस्तुत श्लोक का महोपाध्याय मल्लिनाथजी ने एक दूसरा भी अर्थ निकाला है, जैसे कि आयुर्वेद-शास्त्रानुसार वमन के बाद मानव को कसैला, हल्का और चरपरा जल पीना चाहिए ताकि वायुविकार न होवे, इसलिए हे मेघ ! तुम जल वमन करने के पश्चात् सुगन्धित एवं जामुन के कुञ्ज में रुके हुए प्रवाह के कारण कसैला नर्मदा का जल पीकर जाना, तब तुम्हें पवन नहीं हिला सकेगा, अन्यथा वमन के कारण भीतर से निःसार तुम्हें पवन हिला देगा, क्योंकि भीतर से शून्य सभी हल्के होते हैं, पूर्णता ही गौरव के लिए होती है।

अलङ्कारः—यहाँ तृतीयचरण के विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थचरण के सामान्य अर्थ से किया गया है, अतः यहाँ "अर्थान्तरन्यास" नामक अलङ्कार है॥ २०॥

नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं केसरैरर्धरूढै- राविर्भूत-प्रथम-मुकुलाः कन्दलीश्चानुकच्छम्। जग्ध्वाऽरण्येष्वधिकसुरभिं गन्धमाघ्राय चोर्व्याः सारङ्गास्ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम्॥२१॥

अन्वयः—अर्धरूढैः केसरैः हरितकपिशम् नीपम् दृष्ट्वा अनुकच्छम् आविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दलीः च जग्ध्वा अरण्येषु उर्व्याः अधिकं सुरभिम् गन्धम्, च आघ्राय सारंगाः जललवमुचः ते मार्गम् सूचयिष्यन्ति।

व्याख्या—(हे मेघ!) अर्धरूढैः = अर्धोत्पन्नैः, केसरैः = किञ्जल्कैः, हरितकपिशम् = हरिद्‌धूसरम्, नीपम् = कदम्बम्, दृष्ट्वा = विलोक्य, अनुकच्छम् =

५४ मेघदूतम्

मन्वनूपम् जलप्रायदेशसमीपे इत्यर्थः, आविर्भूत-प्रथममुकुलाः = सञ्जातपूर्व-कुड्‌मलाः, कन्दलीश्च = भूकन्दलीश्च, जग्ध्वा = भुक्त्वा, अरण्येषु = काननेषु, उर्व्याः = पृथिव्याः, अधिकसुरभिम् = उत्कट-सुगन्धियुक्तम्, आघ्राय = घ्रात्वा, सारङ्गाः = कुरङ्गाः, जललवमुचः = सलिलबिन्दुवर्षकः, ते = मेघस्य, मार्गम् = पन्थानम्, सूचयिष्यन्ति = निर्देशं करिष्यन्ति ।

शब्दार्थः—( हे मेघ ! ) अर्धरूढैः = आधे निकले हुए, केसरैः = रेशों से, हरितकपिशम् = हरे और धूसर रंगवाले, नीपम् = कदम्ब को, दृष्ट्वा = देखकर, अनुकच्छम् = दलदल में, आविर्भूतप्रथममुकुलाः = जिनमें पहले-पहले कलियाँ प्रकट हुई हैं, कन्दलीः = केले के समान पुष्प वृक्षों को, जग्ध्वा = खाकर, अरण्येषु = वनों में, उर्व्याः = पृथ्वी की, अधिक-सुरभिम् = अत्यन्त सुरभित, गन्धम् = सुगन्ध को, आघ्राय = सूंघकर, सारंगाः = मृग, हाथी, भ्रमर, जललवमुचः = जलबिंदु बरसाने वाले, ते = तेरे, मार्गम् = मार्ग को, सूचयिष्यन्ति = सूचित करेंगे ।

भावार्थः—( हे मेघ ! ) हस्तिभ्रमरमृगाः अर्धोत्पन्नकेसरैः हरितधूसरं कदम्बकुसुमं विलोक्य, जलप्रायदेशे उत्पन्नपूर्वकूङ्‌मलाः भूमिकन्दलीश्च भुक्त्वा, अरण्येष्वत्यधिकसुरभि भूमिगन्धमाघ्राय सलिलबिंदु-त्यजतस्ते पन्थानमनुमापयिष्यति ।

हिन्दी—हे मेघ ! हाथी, मृग और भौंरे अर्धविकसित केसर से हरे-धूसर रंगवाले कदम्बपुष्प को देखकर, दल दल से पहले-पहले जिनमें कलियाँ प्रकट हो रही हैं, ऐसे भूमिकन्दलियों के नये कुङ्‌मलों को खाकर, जंगलों में अधिक सुगन्धित पृथ्वी के सुगंध को सूंघकर, जलबिंदु बरसाने वाले तेरे मार्ग को सूचित करेंगे ।

समासः—हरितञ्च तत् कपिशम् = हरितकपिशम् (कर्मधारयः) । कच्छस्य समीपे अनुकच्छम् ( अव्ययीभावः ) । आविर्भूताः प्रथमा मुकुलाः यासां ताः आविर्भूतप्रथममुकुलाः ( बहुव्रीहिः ) । साराण्यंगानि येषां ते ( मृगादयः ) ( बहुव्रीहिसमासः ) ।

पूर्वमेघः ५५

कोशः—पलाशो हरितो हरित् । श्यावः स्यात् कपिशो धूम्रधूमिलो कृष्णलोहिते, इत्यमरः । अथ स्थलकदम्बके । नीपः स्यात्पुलके, इति शब्दार्णवः । जलप्रायमनूपं स्यात्पुंसि कच्छस्तथाविधः, इत्यमरः । कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः । द्रोणपर्णी स्निग्ध-कन्दा कन्दली भूकदल्पपि, इति शब्दार्णवः । सारंगश्चातके भृङ्गे कुरङ्गे च मतङ्गजे, इति विश्वः ।

टिप्पणी—सारङ्गाः—साराण्यंगानि येषां ते सारङ्गाः ऐसा समास किया जाता है, परन्तु यहाँ सवर्ण दीर्घ न होकर शकन्ध्वादि गण में पाठ होने के कारण "शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्" इससे पररूप होकर "सारंग" शब्द सिद्ध होता है । "सारंगः पशुपक्षिणोः" इसके अनुसार सारंग शब्द का अर्थ हाथी, हिरण, भौंरा, चातक आदि किया जाता है । जग्ध्वारण्येष्वधिक०—इसके स्थान पर कोई-कोई टीकाकार "दग्ध्वारण्येष्वधिकसुरभिम्" ऐसा पाठ मानते हैं । इस विषय में उनका कहना है कि इस श्लोक में दो बार ही केवल "च" शब्द का प्रयोग किया गया है, एक दूसरे पाद में तथा दूसरा, तीसरे पाद में । पहला च नीपं और आघ्राय को जोड़ता है । ऐसी दशा में यदि जग्ध्वारण्ये० को शुद्ध पाठ माना जाय तो दृष्ट्वा, जग्ध्वा, और आघ्राय तीनों एक ही साथ आ जाते हैं एवं उनको जोड़ने वाला केवल दो च ही रह जाते हैं तथा जग्ध्वा का कर्म इससे बहुत दूर हो जाता है । परन्तु उचित तो "जग्ध्वारण्ये०" आदि पाठ ही है क्योंकि कवि ने यहाँ सारंग शब्द का प्रयोग इसलिए किया है कि उसके तीन कर्ता अभिप्रेत हैं हाथी, भौंरे और हरिण इसलिए पूर्वकालिक क्रियाएँ भी तीन रहनी चाहिए, एक मूल क्रिया है और दो क्रियाओं के जोड़ने के लिए दो "च" का रहना उचित है ।

अलङ्कार—यहाँ वृष्टि का अनुमान किया गया है इसलिए यहाँ अनुमानालंकार है ॥ २१ ॥

अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरांश्चातकान् वीक्षमाणाः श्रेणीभूताः परिगणनया निर्दिशन्तो बलाकाः । त्वामासाद्य स्तनितसमये मानयिष्यन्ति सिद्धाः सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसम्भ्रमालिङ्गितानि ॥ २२ ॥

५६ मेघदूतम्

**अन्वयः—**अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरान् चातकान् वीक्षमाणाः श्रेणीभूताः बलाकाः परिगणनया निर्दिशन्तः सिद्धाः स्तनितसमये सोत्कम्पानि प्रियसहचरी-सम्भ्रमालिङ्गितानि आसाद्य त्वाम् मानयिष्यन्ति ।

**व्याख्या—**अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरान् = वारिकणग्रहणपटून्, चातकान् = सारंगान्, वीक्षमाणः = अवलोकयमानः, श्रेणीभूताः = पंक्तिबद्धाः, बलाकाः = बकपंकतीः, परिगणनया = एका, द्वे, तिस्रः इति क्रमपूर्वकेण संख्यानेन, निर्दिशन्तः = अंगुल्या निर्देशं कुर्वन्तः, सिद्धाः = देवयोनि-विशेषाः, स्तनित-समये = रति-समये, त्वद्गर्जनकाले वा, सोत्कम्पानि = उत्कम्पसहितानि, प्रियसहचरी-संभ्रमालिङ्गितानि = स्निग्धप्रियात्वराश्लेषानि, आसाद्य = प्राप्य, त्वाम् = मेघम्, मानयिष्यन्ति = साधुवादान् वदिष्यन्ति ।

**शब्दार्थः—**अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरान् = जल के कणों को ग्रहण करने में चतुर, चातकान् = “चातक” नामक पक्षियों को, वीक्षमाणः = देखते हुए, श्रेणीभूताः = पंक्तिबद्ध, बलाकाः = वकपंक्तियों को, परिगणनया = एक-दो तीन इस तरह गिनकर, निर्दिशन्तः = अंगुली से दिखाते हुए, सिद्धाः = देव-योनिविशेष, स्तनितसमये = संभोगकाल में अथवा (तुम्हारे गर्जन काल में ), सोत्कम्पानि = कम्पन के सहित, प्रियसहचरीसम्भ्रमालिङ्गितानि = अपनी प्यारी सहचरियों के भय के साथ भरपूर आलिंगन को, आसाद्य = प्राप्त कर, त्वाम् = तुम्हें (मेघ को ), मानयिष्यन्ति = धन्यवाद देंगे ।

**भावार्थः—**हे मेघ ! वर्षणजलग्रहणनिपुणान् चातकान् पश्यन्तो बद्धपंक्तीः बलाकाः एका द्वे तिस्रः इत्थं संख्यानेन दर्शयन्तः सिद्धाः रतिक़ाले त्वद्गर्जनेन भीतानां कामिनीनां स्वेच्छयाऽऽश्लेषं प्राप्य त्वां धन्यवादन् व्याहरिष्यन्ति ।

**हिन्दी—**हे मेघ ! वर्षा के जल-विन्दुओं को ग्रहण करने में चतुर चातकों को देखते हुए, पंक्तिबद्ध बकपंक्तियों को एक, दो, तीन इस प्रकार अंगुली से गिनकर बताते हुए (दिखाते हुए) सिद्धलोग, संभोग काल में तुम्हारे गरजने के कारण भयभीत अपनी प्रियाओं के भरपूर आलिंगन को प्राप्तकर तुम्हें धन्यवाद देंगे ।