भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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चतुर्थोऽङ्कः २८७

प्रकोष्ठे सुश्लिष्ट-विहङ्गवाटी-सुखनिषण्णानि अन्योन्यचुम्बनपराणि सुखमनुभवन्ति पारावतमिथुनानि। दधिभक्तपूरितोदरो ब्राह्मण इव सूक्तं पठति पञ्जरशुकः। इयमपरा स्वामिसम्माननालब्धप्रसुरा इव गृहदासी अधिकं कुरकुरायते मदनसारिका। अनेकफलरसास्वादप्रतुष्टकण्ठा कुम्भदासीव कूजति परपुष्टा। आलम्बिता नागदन्तेषु पञ्जरपरम्पराः। योध्यन्ते लावकाः। आलाप्यन्ते पञ्जरकपिञ्जलाः।

शब्दार्थः— सुश्लिष्टविहङ्गवाटीसुखनिषण्णानि=सुन्दर चिड़िया घर में आराम से बैठे हुये, अन्योन्यचुम्बनपराणि=एक दूसरे के चूमने में लगे हुये, पारावत-मिथुनानि=कबूतरों के जोड़े, अनुभवन्ति=अनुभव कर रहे हैं। दधिभक्तपूरितोदरः=दही भात से भरे हुये पेट वाला, पञ्जरशुकः = पिंजड़े का तोता, सूक्तम्=अच्छी अच्छी बातें, स्वामिसम्माननालब्धप्रसरा=मालिक द्वारा किये गये सम्मान के कारण बढ़ी हुयी अर्थात् मुँह लगी, मदनसारिका=मैना, अनेकफलरसास्वादप्रहृष्ट-कण्ठा=अनेकफलों के रसों को चखने से खिले हुये कण्ठवाली, कुम्भदासी=कुट्टिनी, परभृता=कोयल, नागदन्तेषु=खूँटियों पर। लावकाः=बटेर। कपिञ्जलाः=गौरवर्ण के तीतर पक्षी, विविधमणिचित्रितम्=अनेक मणियों से जटिल, रविकिरणसन्तप्तम्=सूर्य की किरणों से सन्तप्त, विधुवृति=हवा कर रहा है। चन्द्रपादाः=चन्द्रमा की किरणें, वृद्धमहल्लका=बड़े बुड़े पुरुष, गृहसारसाः=पालतू सारस ।

अर्थ—विदूषक— (प्रवेश करके और देखकर) अरे ! आश्चर्य है, यहाँ सातवें प्रकोष्ठ (भवनखण्ड) में भी सुन्दर बने हुये चिड़ियाघर में आराम से बैठे हुये, परस्पर चुम्बन करने वाले कबूतरों के जोड़े आनन्द का अनुभव कर रहे हैं। दही भात (खाने) से भरे हुये पेट वाले ब्राह्मण के समान पिंजरे का तोता सूक्त=अच्छी-अच्छी बातें बोल रहा है। दूसरी, यह मैना, अपने मालिक के अधिक आदर पाने से मुँह लगी नौकरानी के समान, कुर कुर शब्द कर रही है। अनेक फलों के रसों को चखने से प्रहृष्ट=विकसित कण्ठवाली यह कोयल कुट्टिनी स्त्री के समान कूक रही है। खूँटियों पर पिंजड़ों की पंक्तियाँ लटक रहीं हैं। बटेर लड़ाई जा रही है। तित्तिर पक्षियों से बात की जा रही है। पिंजड़े के कबूतर उड़ाये जा रहे हैं। आनन्द से नाचता हुआ, विभिन्न प्रकार की मणियों से चित्रित सा यह पालतू मोर, सूरज की किरणों से गर्म हुये भवन को अपने पंखों को फड़फड़ाने से, मानों हवा कर रहा है। (दूसरी ओर देख कर) इधर, एकत्रित की गई चन्द्रमा की किरणों के समान ऊँची जाति के हंसों के जोड़े सुन्दर स्त्रियों के पीछे पीछे अच्छी चाल सीखते हुये इधर घूम रहे हैं। दूसरे ये पालतू सारस पक्षी बहुत बूढ़ें पुरुषों के समान इधर उधर घूम रहे हैं। अरे ! आश्चर्य है, इस वेश्या ने तो अनेक प्रकार के पक्षिसमूहों से (घर) भर रखा है। सचमुच मुझे वेश्या का यह घर (इन्द्र

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